विश्वविद्यालय

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय

देश-विदेश से पर्यटक हर समय काशी में घूमने के लिए आते हैं। अपने आप में पर्यटन की दृष्टि से सब कुछबनारस हिदू विश्व विद्यालय, वाराणसी  समेटे हुए है। काशी में ऐतिहासिकता के साथ आधुनिकता भी लोगों को अपनी ओर सहज ही आकर्षित करती है। वैसे तो यहां घूमने के लिए बहुत कुछ है लेकिन काशी में आकर बीएचयू न घूमा जाय तो कुछ अधूरा सा रह जाता है। बीएचयू में स्थित भारत कला भवन और नये विश्वनाथ जी में हर समय लोगों का तांता लगा रहता है। काशी को शिक्षा की नगरी बनाने और भारत की प्रगति में सहयोग करने के उद्देश्य से महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने 4 फरवरी (बसंत पंचमी के दिन) सन् 1916 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की। यह विश्वविद्यालय 1370 एकड़ भूमि में फैला हुआ है। पूरा विश्वविद्यालय परिसर हरे-भरे पेड़ पौधों से आच्छादित है। विश्वविद्यालय में 14 संकाय, 124 स्नातकोत्तर विभाग, 72 छात्रावास, हर साल करीब 15 हजार छात्र-छात्राएं अध्ययन करते हैं। साथ ही 18 सौ शिक्षक-शिक्षिकाएं कार्यरत हैं। विश्वविद्यालय के गायकवाड़  केन्द्रीय ग्रंथालय में काफी पुरानी पुस्तक-पुस्तिकाएं हैं। छात्रावास के भवन पुराने मंदिर शैलियों में बने हुए हैं। माना जाता है कि गर्मियों के मौसम में विश्वविद्यालय परिसर का तापमान पूरे काशी के तापमान से दो से तीन डिग्री कम रहता है। बीएचयू कैंट स्टेशन से लगभग 8 किलो मीटर दूरी पर है। आवागमन के लिए सिटी बस आटो रिक्शा उपलब्ध रहते हैं।

सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालयसम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी

काशी में सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में वेद, उपवेद, वेदांग, शिक्षा, व्याकरण, छंद, निरुक्त, ज्योतिषशास्त्र, दर्शनशास्त्र, मीमांसा, न्याय, स्मृति, पुराण समेत गणित, अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान, अंग्रेजी की पढ़ाई भी होती है। ईस्ट इंडिया कंपनी के एजेंट जोनाथन डंकन ने 1791 में संस्कृत कालेज शुरु किया। 1958 में यह कालेज विश्वविद्यालय में परिवर्तित हो गया। इसका नामकरण सम्पूर्णानंद के नामकरण पर किया गया। विश्वविद्यालय के सरस्वती ग्रंथालय में लगभग 60 हजार पांडुलिपियां समेत 40 हजार पुराने ग्रन्थ हैं। विश्वविद्यालय का मुख्य भवन वास्तुशिल्प का बेहद आकर्षक उदाहरण है। साथ ही वेधशाला भी अद्भुत है। यह विश्वविद्यालय जगतगंज में है। यह विश्वविद्यालय भारतीय आर्ष ज्ञान के प्रमुख केन्द्र के रूप में विद्यमान है।

सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय का मुख्य भवन आकर्षण का केन्द्र

सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय पारम्परिक भारतीय भाषाओं की शिक्षा का केन्द्र ही नहीं रहा है बल्कि यहां से ऐतिहासिकता का भी गहरा सम्बंध रहा है। विश्वविद्यालय परिसर में कुछ ऐसी चीजें हैं जिनका अस्तित्व विभिन्न संस्कृतियों और उससे जुड़ी कलाओं का हमें आज भी आभास कराता है। विश्वविद्यालय परिसर में ऐसा ही एक नायाब उपहार मुख्य भवन के रूप में हमारे सामने आज भी जीवंतता लिए खड़ा है। यह भवन आजादी के लिए प्रथम आंदोलन शुरू होने से कुछ वर्ष पहले बनकर तैयार हुआ। इस आलीशान भवन के बनने की शुरूआत 1848 में हुई। अंग्रेज आर्किटेक्ट मेजर मारखम किट्टो के निर्देशन में तमाम कलाकारों की सहायता से यह भवन 4 वर्ष यानी 1852 में बनकर तैयार हुआ। इस खूबसूरत इमारत को रोम की गोथिक शैली में बनाया गया है। भवन का निर्माण ईंटों से किया गया है लेकिन इसकी खूबसूरती को और आकर्षक बनाने के लिए दीवारों पर पत्थर लगाये गये हैं। इस भवन के निर्माण में वैज्ञानिकता का खास ध्यान रखा गया। जिसके तहत उस समय फाल्स सीलिंग का प्रयोग किया गया जो उस दौरान वस्तुतः कहीं प्रचलन में नहीं था। साथ ही इसमें बारिश के पानी के संचयन के लिए रेनवाटर हारवेस्टिंग तकनीकी इस्तेमाल किया गया था। जिससे भवन से बारिश का पानी अन्दर ही अन्दर पास ही एक कुंए में चला जाता था। भवन में दो सभागार पूर्वी एवं पश्चिमी हैं। साथ ही कई छोटे-छोटे कक्ष भी हैं। इसके निर्माण में वैज्ञानिकता एवं वास्तु का मिलाजुला समावेश है। तभी तो भवन की छतों पर बारह राशियों के रंगों के अनुकूल शीशे लगे थे। जिससे छनकर सूर्य की किरणें भवन के भीतर प्रवेश करती थीं। भवन में प्रतिध्वनि को रोकने की भी व्यवस्था की गयी थी। भवन के मुख्य द्वार पर संस्कृत, हिन्दी, अरबी और पाली भाषाओं में नीति वाक्य लिखे हुए हैं। इस भवन का निर्माण सरकारी खजाने से नहीं बल्कि दानदाताओं के सहयोग से हुआ है जिसमें प्रमुख रूप से काशी नरेश, राजा दरभंगा, कूच बिहार स्टेट थे। वर्तमान में यह भवन रखरखाव की कमी के कारण जीर्णशीर्ण हो गया है। भवन की दीवारें खराब हो रही हैं। कभी चमकने वाले इस भवन के पत्थरों पर काले-काले धब्बे उभर आये हैं। यदि इस ऐतिहासिक भवन की समुचित देख-रेख की जाये तो इसे बर्बाद होने से बचाया जा सकता है और इसकी खूबसूरती लोगों को हमेशा देखने के लिए मिल सकती है।

 महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ

 सर्वविद्या की राजधानी काशी में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ विश्वविद्यालय भी अपने गरिमामयी इतिहास व योगदान के कारण वर्तमान में शिक्षा के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। स्वतन्त्रता आंदोलन की लड़ाई को धार देने के उद्देश्य से बसंत पंचमी के दिन 10 फरवरी 1921 को इस विश्वविद्यालय की स्थापना

राष्ट्ररत्न शिवप्रसाद गुप्त ने की। इसका शिलान्यस महात्मा गांधी ने किया था। स्थापना के समय इस विश्वविद्यालय का नाम ‘काशी विद्यापीठ’ था जो बाद में ‘महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ’ हो गया। स्वतन्त्रता के पहले तक यह विश्वविद्यालय सरकारी अनुदान नहीं लेता था। यहां छात्रों को निशुल्क शिक्षा दी जाती थी। शिक्षक भी अवैतनिक शिक्षण कार्य करते थे। स्वतन्त्रता के बाद इस विश्वविद्यालय में शिक्षकों को वेतन मिलने लगा और छात्रों से निर्धारित शुल्क लिया जाने लगा। शुरू में इसका संचालन भदैनी से होता था कुछ समय बाद ही वर्तमान परिसर में इसका संचालन होने लगा। पहले यहां शास्त्री की पढ़ाई होती थी लेकिन धीरे-धीरे समये के साथ कई पाठ्यक्रम जुड़ते गये। काशी विद्यापीठ के प्रथम कुलपति भारतरत्न डॉ भगवान दास हुए। इस पद को कई विद्वानों ने सुशोभित किया। काशी विद्यापीठ के कुलपति रहे विद्वानों में आचार्य नरेन्द्र देव, डॉ सम्पूर्णानंद, आचार्य बीरबल,  प्रो राजाराम शास्त्री, डॉ दूधनाथ चतुर्वेदी, प्रो विद्यानिवास मिश्र थे। विश्वविद्यालय परिसर में ही अपने आप में अनूठा भारत माता का मंदिर भी है। जिसका शिलान्यास भी महात्मा गांधी ने किया था। काशी विद्यापीठ की स्थापना के कई उदे्श्य थे। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं।

  • स्वाधीनता और स्वदेश प्रेम के भाव के साथ लोक सेवा और मानवमात्र की बन्धुत्व के संचार में सहायता देना
  • आध्यात्म विद्या की नींव पर प्रतिष्ठित भारतीय शिष्टता के संस्कार और विकास में सहयोग देना
  • संसार के प्राचीन शास्त्र, शिल्प, कला और ज्ञान-विज्ञान आदि की वृद्धि तथा प्रचार करने में सहायता देना

अपने इन्हीं उद्देश्यों के साथ स्वतन्त्रता आंदोलन की लड़ाई का गवाह बना यह विश्वविद्यालय आज देश के विकास में महत्वपूर्ण एवं युवाओं को निखारने में महती भूमिका निभा रहा है। वर्तमान में इसके कुलपति भूगोलविद डॉ0 पृथ्वीश नाग हैं।

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