वैष्णव मन्दिर

आदि केशव

भगवान विष्णु के काशी में स्थित मंदिरों की बात की जाये तो आदि केशव का मंदिर काफी प्राचीन एवं धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। कथा के अनुसार राजा दिवोदास से काशी प्राप्ति की इच्छा से गणेश जी सहित सभी देवताओं को भगवान भोलेनाथ ने काशी भेजा था, लेकिन काशी को प्राप्त करने की उनकी इच्छा पूरी adikeshavन हो सकी। क्योंकि जो भी देवता काशी को दिवोदास से मुक्त कराने आये वे यहां की सुन्दरता देखकर वापस भगवान शिव के पास नहीं गये। अन्ततोगत्वा शिव जी ने इस कार्य के लिए भगवान विष्णु को काशी भेजा। भगवान शिव के निर्देश पर विष्णु जी लक्ष्मी सहित गरूड़ पर सवार होकर शिव जी की प्रदक्षिण कर उन्हें प्रणाम किया और मंदराचल पर्वत से काशी के लिए चल पड़े। काशी में उन्हें वरूणा गंगा संगम स्थल पर श्वेत द्वीप दिखाई दिया। वे अपने वाहन के साथ इसी स्थान पर उतर गये। संगम पर उन्होंने स्नान किया। जिससे यह तीर्थ विष्णु पादोदक के नाम से प्रसिद्ध हुआ। स्नान के बाद भगवान विष्णु ने भोलेनाथ का स्मरण कर काले रंग के पत्थर की अपनी त्रैलोक्य व्यापिनी मूर्ति आदि केशव की स्वयं स्थापना की। साथ ही कहा कि जो लोग अमृत स्वरूप अविमुक्त क्षेत्र (काशी ) में मेरे आदि केशव रूप का दर्शन-पूजन करते हैं, वे सब दुःखों से रहित होकर अंत में अमृत पद को प्राप्त करेंगे। तभी से इस स्थान का महत्व धार्मिक रूप से बढ़ गया। गंगा जी के किनारे आदि केशव के मंदिर का निर्माण गहड़वाल नरेश ने कराया था। जिसे 1194 में तोड़ दिया गया। मुस्लिम शासन के दौरान उपेक्षित इस मंदिर का पुनर्निर्माण 1807 में ग्वालियर के महाराजा सिन्धिया के दीवान मालो ने कराया। बाद में 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजी फौज ने इस मंदिर का अधिग्रहण कर लिया और पुजारी को बाहर कर दर्शन-पूजन पर प्रतिबंध लगा दिया। करीब 2 वर्ष बाद 1859 में पुजारी केशव भट्ट ने अंग्रेज कमिश्नर को प्रार्थना पत्र देकर मंदिर में पूजा पाठ शुरू करने की आज्ञा मांगी। तब जाकर मंदिर में पूजा शुरू हुई हालांकि आम दर्शनार्थियों के लिए प्रतिबंध यथावत था। इस मंदिर में निर्बाध रूप से दर्शन-पूजन 19वीं सदी से शुरू हुआ। पत्थरों से निर्मित इस मंदिर के मध्य गर्भगृह में आदि केशव की अलौकिक मूर्ति स्थापित है उन्हीं के बगल में केशवादित्य की मूर्ति भी है। बड़े से मंदिर परिसर में ही ज्ञानकेशव एवं हरिहरेश्वर महादेव का मंदिर है। साथ ही संगमेश्वर महादेव का भी छोटा सा मंदिर है। आदि केशव मंदिर में समय-समय पर भजन-कीर्तन एवं श्रृंगार के कार्यक्रम तो होते रहते हैं लेकिन बड़ा आयोजन वर्ष भर में 3 बार होता है। चैत्र महीने की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को बारूनी पर्व मनाया जाता है। इस दौरान मंदिर के आस-पास मेले का आयोजन होता है। काफी संख्या में भक्त वरूणा-गंगा संगम में स्नान कर आदि केशव का दर्शन करते हैं। इसके बाद भाद्र महीने के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को बामन द्वादशी मेला लगता है। जबकि पूष माह के कृष्ण पक्ष की प्रथमा तिथि को नगर परिक्रमा होती है। इस दौरान श्रद्धालु नगर भ्रमण करते हुए वरूणा-गंगा तीर्थ पर स्नान करने के बाद आदि केशव का दर्शन-पूजन कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। पंचक्रोशी यात्रा के दौरान भी यात्री आदि केशव पहुंचकर दर्शन-पूजन करते हैं। आदि केशव मंदिर दर्शनार्थियों के लिए प्रातःकाल 5 से दोपहर 12 तक एवं शाम को 3 रात साढ़े 9 बजे तक खुला रहता है। सुबह की आरती सूर्योदय के समय होती है एवं शाम की आरती रात साढ़े आठ बजे मन्त्रोच्चारण के बीच सम्पन्न होती है। इस मंदिर की खासियत यह है कि गर्भगृह के पास से मां गंगा की अविरल धारा बहती हुई दिखाई देती है। मंदिर बेहद शांत एवं रमणीय लगता है। कैंट स्टेशन से करीब आठ किलोमीटर दूर राजघाट के पास बसंता कालेज से होते हुए वरूणा-गंगा संगम पर यह बेहद सुन्दर मंदिर स्थित है।

 बाला जी मन्दिर, पंचगंगा घाट

bala ji 01काशी और मंदिर एक दूसरे के पूरक ही नहीं बल्कि पहचान भी हैं। इस प्राचीन जीवंत शहर में कल्पनाओं से अधिक मंदिर विद्यमान हैं। जिनमें देवी-देवताओं की प्रतिमा श्रद्धालुओं को सम्मोहित कर लेती है। इस शहर के प्रसिद्ध घाट हों या गली-मोहल्ले अथवा विश्वविद्यालय यहां तक कि घरों में भी मंदिर स्थित हैं। इन मंदिरों से निकलने वाले मंत्रों, घण्ट-घड़ियालों की आवाज एवं माथे पर त्रिपुण्ड का लेपन किये लोग काशी की धार्मिकता का प्रमाण देते हैं। घाटों पर अनेकों मंदिर हैं। उन्हीं मंदिरों में से पंचगंगा घाट पर स्थित है बाला जी का मंदिर। घाट के बिल्कुल उपर स्थित इस मंदिर में बाला जी एवं उनकी पत्नी श्रीदेवी एवं भूदेवी की प्रतिमा स्थापित है। छोटे लेकिन महत्वपूर्ण बाला जी के इस मंदिर की सुंदरता बगल से ही प्रवाहमान माँ गंगा की अविरल धारा से और बढ़ जाती है। इस मंदिर के गर्भगृह को छोड़कर वर्तमान में बाकी का हिस्सा निर्माणाधीन है। मंदिर के इतिहास के बारे में पुजारी भालचंद्र गोकर्ण ने बताया कि कई सौ वर्ष पहले बाला जी की मूर्ति घाट किनारे ही निवास करने वाले एक गरीब ब्राह्णण को गंगा में मिली थी। उस ब्राह्णण ने मूर्ति को वहीं एक पेड़ के नीचे स्थापित कर दिया। सन 1857 के पहले पेशवाओं ने इस मूर्ति की स्थापना मंदिर में की।

बाला जी मन्दिर, पंचगंगा घाट
बाला जी मन्दिर, पंचगंगा घाट

बाला जी के दर्शन-पूजन के माहात्म्य के बारे में बताया जाता है कि इनके दर्शन से व्यक्ति के सभी पाप कट जाते हैं और धन सम्पदा की प्राप्ति होती है। इस मंदिर में शारदीय नवरात्र में वृहद स्तर पर कार्यक्रम का आयोजन होता है। इस दौरान नौ दिनों तक बाला जी का अलग-अलग तरीके से श्रृंगार होता है। जिनके दर्शन के लिए काफी संख्या में दर्शनार्थी मंदिर में पहुंचते हैं। वहीं, कार्तिक पूर्णिमा के दिन इनका विषेश रूप से मख्खन से श्रृंगार किया जाता है। यह अनूठा श्रृंगार बालाजी मंदिर का प्रतीक बन गया है। मंदिर आम दर्शनार्थियों के लिए सुबह 6 बजे से 10 बजे तक एवं सायं साढ़े 5 बजे से साढ़े 7 बजे तक खुला रहता है। मंदिर में सुबह की आरती साढ़े 6 बजे एवं शयन आरती सायं 7 बजे होती है।

बिन्दु माधव मंदिर

Bindu-Madhav
बिन्दु माधव मंदिर

हर कंकड़ में शिव के वास वाली इस मस्तमौला नगरी में भगवान विष्णु के भी मंदिरों की एक लम्बी श्रृंखला है। पौराणिक मान्याताओं के अनुसार काशी में स्थित मंदिरों में भगवान विष्णु की प्रतिमाओं में वे विराजमान रहते हैं। यहां स्थित विष्णु मंदिरों में बिन्दु माधव का मंदिर काफी प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि बिन्दु माधव के दर्शन-पूजन से सारे पाप कट जाते हैं और भक्त को तीनों लोकों का सुख प्राप्त होता है। कथा के अनुसार भगवान शिव के कहने पर प्रभु विष्णु मन्दराचल पर्वत से काशी विशेष कार्य को संपादित करने आये। उस समय यहां के राजा दिवोदास थे। भगवान विष्णु अपने कार्य को पूरा कर काशी की सुन्दरता देखकर मोहित हो गये। उन्हें गंगा जी का पंचनदी तीर्थ (पंचगंगा घाट) बहुत भाया। इसी तीर्थ पर ऋषि अग्नि बिन्दु रहते थे। उन्होंने भगवान को अपने सम्मुख देखा तो उनकी स्तुति करने लगे। अग्नि बिन्दु की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उनसे कोई वरदान मांगने को कहा। इस पर अग्नि बिन्दु ने बड़े ही निर्मल भाव से भगवान विष्णु से उनके काशी में रहने का वरदान मांगा। इस पर भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान देते हुए पंचगंगा घाट पर विराजमान हो गये जो बिन्दु माधव के नाम से प्रसिद्ध हुए। पूर्व में इनका प्रसिद्ध मंदिर वर्तमान में पंचगंगा घाट पर स्थित आलमगीर की मस्जिद की जगह था। भारत में जब मुस्लिम शासन का प्रभाव था तो उस दौरान इस मंदिर को भी ध्वस्त कर दिया गया। बाद में श्रद्धालुओं ने इनका मंदिर पंचगंगा घाट के पास गली में बनवाकर मूर्ति की स्थापना की। मान्यता के अनुसार बिन्दू माधव के दर्शन से सभी प्रकार के कष्ट दूर हो जाते हैं और सुख-समृद्धि बढ़ती है। यदि पंचगंगा तीर्थ पर स्नान करके बिन्दु माधव का दर्शन किया जाये तो और ज्यादा पुण्य मिलता है। इस तीर्थ पर स्नान का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि कहा जाता है कि कार्तिक महीने में प्रतिदिन विश्वेश्वर महादेव यहां स्नान करने आते हैं। इसी महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी को बिन्दु माधव का आकर्षक श्रृंगार किया जाता है। मंदिर में इस दौरान उत्सव जैसा माहौल रहता है। इस दौरान श्रद्धालु मंदिर में पहुंचकर दर्शन-पूजन कर आशीर्वाद लेते हैं। बिन्दु माधव का मंदिर पंचगंगा घाट पर के 22/37 में स्थित है। कैंट रेलवे स्टेशन से यह मंदिर करीब 8 किलोमीटर दूर है। आटो द्वारा मैदागिन चौराहे पर पहुंचकर वहां से पैदल ही गलियों में से बिन्दू माधव के मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। यह मंदिर प्रातःकाल 4 से रात 8 बजे तक दर्शनार्थियों के लिए खुला रहता है। मंगला आरती प्रातः 4 बजे श्रृंगार आरती सुबह 8 बजे एवं शयन आरती रात 8 मन्त्रोच्चारण के बीच सम्पन्न होता है।

जगन्नाथ मंदिर, अस्सी

वाराणसी को यूं ही लघु भारत होने का गौरव प्राप्त नहीं है। बल्कि इसके पीछे एक बड़ा कारण यह है कि इस शहर में भारत की विभिन्न संस्कृतियां, सभ्याताएं एवं प्रसिद्ध मंदिरों की प्रतिमूर्ति की झलक मिलती है। शायद ही कोई दूसरा ऐसा शहर हो जहां उस शहर के अलावा दूसरे शहर की छाप महसूस की जा सके। लेकिन बनारस इस मामले में समग्रता लिए हुए है। यह प्रचीन शहर अपने अस्तित्व के साथ पूरे भारत की तस्वीर बयां करता है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि बनारस ऐसा गुलदस्ता है जिसमें हर रंग के फूल लगे हुए हैं। यही इसकी सबसे बड़ी विशिष्टता है। जो इस अद्भुत क्षेत्र को सदियों से नवीन बनाये हुए है। यही कारण है कि देश-विदेश से आने वाले ज्यादातर पर्यटक इसे एक बार में देखकर अघाते नहीं। मन को असीम शांति देने वाली चकाचौंध लिए यह शहर कभी भी उदास या हताश नहीं होता बल्कि सदैव प्रफुल्लित रहता है। बात मंदिरों की जाये तो वाराणसी को मंदिरों का शहर कहा ही जाता है। क्योंकि इस शहर में मंदिरों की संख्या बहुत अधिक है। यहां देश के द्वादश ज्योतिर्लिंग की प्रतिमूर्ति के अलावा उड़ीसा के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर को भी देखा जा सकता है। काशी के अस्सी क्षेत्र में जगन्नाथ मंदिर लगभग दो सौ वर्ष से भी प्रचीन है। यह मंदिर उड़ीसा के मुख्य जगन्नाथ मंदिर सा प्रतीत होता है। मंदिर की स्थापत्य कला सहित अन्य कई समानतायें मुख्य जगन्नाथ मंदिर जैसी हैं। इस मंदिर में चार द्वार बनाये गये हैं। पहले द्वार से मंदिर की दूरी करीब तीन सौ मीटर से ज्यादा है। सभी द्वार एक सीध में हैं। पहले द्वार से ही ध्यान से देखने पर मंदिर में स्थापित जगन्नाथ जी, सुभद्रा एवं बलराम की मूर्ति दिखायी देती है। मंदिर से एक द्वार के पहले एक छोटा सा कुण्ड भी है। इस मंदिर में जगन्नाथ जी, सुभद्रा एवं बलराम की मूर्ति है। प्रत्येक वर्ष वाराणसी में भी जगन्नाथ जी की रथयात्रा धूमधाम से निकाली जाती है। इस दौरान मंदिर में कई कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। जो लोग किसी कारणवश उड़ीसा के मुख्य जगन्नाथ जी मंदिर दर्शन-पूजन के लिए नहीं जा पाते उनके लिए काशी में यह मंदिर अच्छा विकल्प है। यह मंदिर दर्शनार्थियों के लिए प्रातःकाल 5 से दोपहर 12 बजे तक एवं सायं 3 से रात्रि 9 बजे तक खुला रहता है। मंदिर में आरती प्रातः साढ़े 7 बजे एवं शयन आरती रात्रि 9 बजे सम्पन्न होती है। यह मंदिर अस्सी चौराहे से अस्सी घाट की ओर बढ़ने पर दाहिनी ओर है।

गोपाल मंदिर

गोपाल मंदिर
गोपाल मंदिर

वाराणसी यानी मंदिरों का शहर। विश्व के इस सबसे पुराने शहर की खासियत यह रही है कि यहां कदम-कदम पर मंदिर मिल जायेंगे। इन मंदिरों से जुड़ा हुआ है बेहतरीन इतिहास और लोगों की असीम आस्था। बात जब काशी की होती है तो सबसे पहले शिवमंदिर ही चर्चा में आते हैं। लेकिन यहां का गोपाल मंदिर भी अनुपम एंव अद्वितीय है। बनारस के हृदय अर्थात पक्के मोहाल में यह भव्य मंदिर स्थित है। इस मंदिर की खास बात यह है कि यहां शुद्धता का विशेष रूप से ध्यान दिया जाता है। आलम यह है कि गोपाल जी को लगने वाला भोग भी मंदिर परिसर में ही तैयार किया जाता है जिसके लिए मंदिर में ही गोशाला है। साथ ही जिस वस्त्र को पहन कर एक बार भगवान की सेवा हो जाती है दोबारा उस वस्त्र को पहनकर सेवा नहीं की जाती। भगवान की मूर्ति को स्पर्श करने का अधिकार केवल दो व्यक्तियों को ही है। वही लोग भगवान का श्रृंगार एवं आरती करते हैं। इस मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण दो रूपों में स्थापित हैं। एक रूप में गोपाल जी एवं दूसरे में मुकुन्द लाल जी की मनमोहक मूर्ति मंदिर में स्थापित है। कहा जाता है कि गोपाल जी एवं राधिका की जो मूर्ति मंदिर में स्थापित है उसकी सेवा बहुत पहले उदयपुर के राणावंश की लाढबाई नाम की महिला करती थी। उस महिला से यह प्रतिमा श्रीमद्वल्लभाचार्य के चतुर्थ पौत्र गोस्वामी श्री गोकुलनाथ ने प्राप्त कर सेवा शुरू की और इनके वंशज आज भी सेवा में लगे हुए हैं। गोपाल जी की अलौकिक मूर्ति को काशी गोलोकवासी गोस्वामी जीवनलाल जी महराज लाये और 1787 ई0 में स्थापना की। जबकि वर्तमान में जो मंदिर का स्वरूप है उसका निर्माण 1834 ई0 में गोस्वामी जीवन ने ही कराया था। इसी वजह से इस मंदिर को जीवनलाल जी की हवेली के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर के बगल में ही मुकुन्द लाल जी का भी मंदिर है जिसका निर्माण 1898 में किया गया। इस मंदिर में मुकुन्द लाल की बालरूप की मनोहारी प्रतिमा स्थापित है। पक्के मोहाल जैसे अति सकरे क्षेत्र में यह विशाल एवं भव्य मंदिर बेहद खूबसूरत लगता है। मंदिर के ठीक पीछे ही इसका सुन्दर एवं हरा-भरा उद्यान है। जिसके एक कोने पर बैठकर गोस्वामी तुलसीदास जी ने विनयपत्रिका की रचना की थी। इस उद्यान की महत्ता इसलिए भी बढ़ जाती है कि यहां महात्मा नंददास ने साधना किया था। प्रत्येक वर्ष होली से पहले इस उद्यान में गोपाल जी का होलीउत्सव मनाया जाता है। इस दौरान उद्यान को बेहद आकर्षक ढंग से सजाकर फूल एवं गुलाल के साथ होली खेली जाती है। साथ ही भजन-कीर्तन एवं होली गीत गाये जाते ह़ैं। मंदिर परिसर में प्रचीन सात कुंए भी हैं जिसे पहले सप्तकुण्डी कहा जाता था। इस मंदिर में दर्शन का समय बेहद छोटा एवं सीमित है। प्रातःकाल के दर्शन में मंगला, श्रृंगार, पालना एवं राजभोग का दर्शन होता है। वहीं, शाम को उत्थापन, भोग, आरती एवं शयन आरती के दौरान मंदिर का पट खुलता है। पट खुलने के लगभग 15 मिनट के भीतर ही उसे बंद भी कर दिया जाता है। इस मंदिर में मुरलीधर पुस्तकालय एवं वाचनालय भी है जहां बैठकर विद्वतजन अध्ययन करते हैं। मंदिर के मुख्य महंत श्री श्याम मनोहर जी हैं। मंदिर में कृष्ण जन्माष्टमी धूमधाम से मनायी जाती है साथ ही भगवान का अन्नकूट एवं श्रृंगार होता है। कैंट स्टेशन से करीब पाँच् किलोमीटर दूर यह मंदिर चौखम्भा क्षेत्र में स्थित है। चौक थाने के सामने ठठेरी बाजार से होते हुए भारतेन्दु भवन के आगे जाने पर यह मंदिर स्थित है।

 उडुपि श्री कृष्ण मध्व मंदिर, अस्सी

काशी में दक्षिण भारतीय परम्परा एवं संस्कृति की भी महक मिलती है। जिसकी झलक यहां की गलियों में घूमने पर मिलने वाले मठ, मंदिरों से हो जाती है। वाराणसी में कई सारे दक्षिण भारतीय मठ तो हैं ही वहीं कुछ मंदिर भी स्थापित हैं। दक्षिण भारतीय मंदिरों की बात करें तो अस्सी घाट से नगवां वाले मार्ग पर कुछ मीटर जाने पर दाहिनी ओर उडुपि श्री कृष्ण मध्व मंदिर है। चार मंजिला इस मंदिर में पहले तल पर हाल में काले रंग की बेहद ही आकर्षित करने वाली श्री कृष्ण की मूर्ति स्थापित है। बाकी तलों पर रहने की व्यवस्था की गयी है। यह मंदिर दक्षिण भारतीयों के लिए खास महत्व रखता है। काशी आने वाले ज्यादातर दक्षिण भारतीय इस मंदिर में आकर मत्था अवश्य टेकते हैं। कहा जाता है कि इस मंदिर में दर्शन-पूजन करने से जीवन में प्रसन्नता बनी रहती है। यह मंदिर दर्शनार्थियों के लिए प्रातः 6 से दोपहर 11 बजे तक एवं सायं 4 से रात 9 बजे तक खुला रहता है। वहीं आरती सुबह साढ़े 7 बजे एवं सायं साढ़े 6 बजे सम्पन्न होती है।

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