शिवालय

काशी के शिव मन्दिर

काशी यानी देवों के देव महादेव की नगरी। माना जाता है कि काशी भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी हुई है। इस पावन नगरी को भगवान शिव कभी छोड़कर नहीं जाते। यहां हर गली मोहल्ले में भगवान शिव शिवलिंग रूप में विद्यमान हैं।

kashi_vishwanathविश्वेश्वर (विश्वनाथ मंदिर)- ‘हर-हर महादेव शम्भो काशी विश्वनाथ गंगे‘ काशी में प्रवेश करते ही धार्मिक प्रवृत्ति वाले हिन्दुओं के मुंह से यह सूक्त वाक्य बरबस ही निकल पड़ता है। तमाम श्रद्धालुओं के मन में बाबा विश्वनाथ के प्रति आस्था हिलोरें मारने लगती हैं। काशीवासियों के लिए तो विश्वनाथ जी कण-कण में समाये हुए हैं। अमूमन जब दो बनारसी मिलते हैं तो हर-हर महादेव के उद्घोष के साथ अभिवादन करते हैं। वहीं, इसे बाबा विश्वनाथ की महिमा कहा जाये या महात्म्य बाहर से काशी आने वाले लोगों की प्राथमिकता में बाबा का दर्शन प्रमुख होता है। माना जाता है कि बाबा विश्वनाथ के दर्शन से जन्म-जन्मांतर का बंधन छूट जाता है मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है और शरीर शुद्ध हो जाता है। बाबा दरबार से करीब एक दो किलोमीटर की परिधि में ऐसा लगता है जैसे माहौल पूरी तरह से शिवमय हो गया है सभी दिशाओं से लगभग एक ही स्वर कानों में मिश्री की तरह घुलता रहता है वह है ओम नमः शिवाय-ओम नमः शिवाय और लोग बाबा के दर्शन के लिए व्याकुल रहते हैं। बाबा विश्वनाथ को ही विश्वेश्वर कहा जाता है। काशी के सर्वोच्च पदासीन संचालक के रूप में विश्वेश्वर ही हैं। भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक काशी विश्वनाथ हैं। पुराणों के अनुसार विश्वनाथ जी ही लिंगअधिपति हैं एवं पंचक्रोशी यात्रा में पड़ने वाले प्रधान हैं। भगवान शिव को काशी अति प्यारी है। इसलिए भोलेनाथ काशी को छोड़कर कभी नहीं जाते। इस पर एक दोहा भी प्रचलित है जिसे काशीवासी अक्सर दुहाराते रहते हैं।

चना चबैना गंग जल जो पुरवै करतार। काशी कबहुं न छोड़िये विश्वनाथ दरबार।।

भगवान शिव का वास और पतित पावनी मां गंगा का प्रवाह काशी को स्वर्ग से भी अधिक सुंदर और पवित्र बना देता है। मान्यता के अनुसार 6वीं शताब्दी में जब गुप्तवंश का शासन था उसी समय विश्वेश्वर के प्रचीन शिवायतन की स्थापना हुई थी जो बाद में कालचक्र प्रवाह में लुप्त हो गया। जिसके काफी समय बाद 14वीं शताब्दी में इस शिवायतन का पुनर्निर्माण कराया गया। विदेशी शासकों का जब भारत पर प्रभुत्व हुआ तो उसका प्रभाव धर्म और मंदिरों पर भी पड़ा। जौनपुर के शर्की बादशाहों ने 1436-1448 के मध्य विश्वनाथ मंदिर को तोड़वा दिया। जिसके मलबे से जौनपुर की बड़ी मस्जिद का निर्माण कराया गया। बाद में मुगल शासक अकबर के शासनकाल में हुए राजा टोडरमल के समय में पं0 नारायण भट्ट ने विश्वनाथ मंदिर निर्माण कर शिवलिंग की स्थापना कराया। लेकिन जब कट्टर मुगल शासक औरंगजेब गद्दी पर बैठा तो उसने हिन्दुओं की आस्था यानी मंदिरों पर कुठाराघात करना शुरू कर दिया। औरंगजेब की धार्मिक अहिष्णुता का खौफनाख प्रभाव काशी के मंदिरों पर भी पड़ा। मंदिर ध्वस्त करने के क्रम में औरंगजेब के निर्देश पर 2 सितम्बर 1669 को काशी विश्वनाथ मंदिर ध्वस्त कर दिया गया। मान्यता के अनुसार उस दौरान शिव ज्ञानवापी के पास स्थित कुंए में कूद पड़े थे। ऐसे में श्रद्धालु इसी कुंए में भगवान शिव का जलाभिषेक किया करते थे। वहीं, एक किंवदंती के अनुसार यहां के पंडों ने बाबा विश्वनाथ को कुंए से निकाल लिया था। बाद में बाबा विश्वनाथ की अनुकंपा से इंदौर की महारानी अहिल्या बाई होल्कर ने 1777 में वर्तमान विश्वनाथ जी के मंदिर का निर्माण करवाया। महारानी के मुख्य पुरोहित जयराम शर्मा की अगुवाई में जन्माष्टमी के दिन सोमवार 25 अगस्त 1777 को इस मंदिर की स्थापना हुई। आंकड़ों के अनुसार मंदिर निर्माण में उस वक्त 3 लाख रूपये की लागत लगी थी। भले ही विश्वनाथ जी का मंदिर स्थापत्य कला की कसौटी पर सामान्य हो लेकिन खगोलीय दृष्टि का बोजोड़ उदाहरण है। प्रसिद्ध यात्री जेम्स प्रिंसेप ने विश्वनाथ मंदिर की खगोलीय KV_temple_newव्याख्या प्रस्तुत की। जिसके अनुसार मंदिर का मुख्य अन्तःक्षेत्र 108 फीट (32.92मीटर) के चौकोर चौक (प्लेटफार्म) पर बना है। जिसका हर किनारा सांस्कृतिक खगोलीय प्रारूप को दर्शाता है। मंदिर का 27 चंद्र नक्षत्रों का द्योतक है एवं 108 ब्रह्माण्डीय समन्वयक संख्या 12 राशियों, मास एवं 9 ग्रहों का गुणनखंड है। मंदिर निर्माण में खगोलशास्त्र का कितनी बारीकी से प्रयोग किया गया है इसका प्रमाण आधार अष्टपद विन्यास को देखने से मिलता है। मंदिर के पूर्व से दक्षिण की ओर ज्ञान मण्डप, तारकेश्वर मण्डप, मुक्ति मण्डप, दण्डपाणि मण्डप, श्रं‘गार मण्डप, गणेश मण्डप, ऐश्वर्य मण्डप एवं भैरव मण्डप है। इस विन्यास के केन्द्र में 8 गुणे 8 ग्रिड के फलक का 64 समूह है। जिसे बाबा विश्वनाथ का प्रवित्र क्षेत्र कहा जाता है। पूर्णतया पत्थरों से निर्मित इस मंदिर का शिखर भगवान शिव के त्रिशूल की आकृति सा प्रतीत होता है। मध्य शिखर पर स्वर्ण कलश जबकि पहले पर दण्डपाणिश्वर शिव एवं सबसे उपर भगवान शिव का ध्वज है जो दूर से ही दिखाई देता है। शिखर की उंचाई 51 फीट है। मंदिर के द्वार पर नौबतखाना भी है जिसका निर्माण वारेन हेस्टिंग्स एवं अली इबाहिम खां के निर्देश पर सन् 1880 में किया गया। महाराजा नेपाल ने मंदिर में एक घण्टा दान दिया था। मंदिर का आकर्षण उस समय और बढ़ गया जब 1839 में लाहौर के महाराजा रणजीत सिंह ने शिखर पर सोने की चादर चढ़वाया। जिसका आधार तांबे का है। माना जाता है कि करीब 2.5 मन सोना सोने की पर्त में प्रयोग किया गया है। मंदिर के शिखर पर जब सूर्य की रोशनी का मिलन होता है तो पूरा मंदिर चमक उठता है। इस दौरान ऐसा लगता है जैसे सूर्यदेव बाबा विश्वनाथ का दर्शन करने आये हैं। जहां शिव हों वहां नंदी बैल निश्चित ही रहेगा। बाबा विश्वनाथ मंदिर में गर्भगृह के ठीक सामने नंदी बैल है। जिसे नेपाल नरेश ने स्थापित करवाया था। वैसे तो बाबा का दर्शन-पूजन करने हर समय देश भर से श्रद्धालु आते रहते हैं लेकिन सावन माह और महाशिवरात्रि पर तो मंदिर से लेकर गोदौलिया चौराहे तक दर्शन करने के लिए श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। बाबा के प्रति श्रद्धा का ऐसा भाव रहता है कि सावन महीने में भक्त जलाभिषेक करने के लिए कई घंटे कतारों में खड़े रहते हैं। हाथों में गंगाजल लिए श्रद्धालु बाबा विश्वनाथ का दर्शन पाने के लिए आतुर हरते हैं। वहीं सावन के सोमवार को तो जैसे आस्था का सैलाब बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए उमड़ पड़ता है। इस दौरान कावंरियों सहित लाखों श्रद्धालु दुग्धाभिषेक व जलाभिषेक कर धन्य हो जाते हैं। इसी तरह से महाशिवरात्रि पर्व पर भी बाबा का दरबार भक्तों से पट जाता है। शहर में ऐसा लगता है जैसे सभी लोग बाबा विश्वनाथ का दर्शन करने ही जा रहे हैं। प्रतिदिन बाबा विश्वनाथ का अभिषेक सुबह एवं शाम को गंगाजल से किया जाता है। शाम की झांकी बेहद ही आकर्षित करने वाली होती है। यह झांकी फूल, चन्दन एवं सुगन्धित पदार्थों से सजायी जाती है। इस दौरान पण्डितों द्वारा मंत्रोच्चारण किया जाता है। जिसे देखने के लिए काफी संख्या में श्रद्धालु मंदिर में पहुंचते हैं। इस मौके पर बाबा को भांग, पान एवं अन्य पदार्थों का चढ़ावा चढ़ाया जाता है। सर्दी के मौसम में बाबा को साल और जरी के चद्दर से रात्रि का शयन कराया जाता है। रोजाना अगस्तकुण्ड मोहल्ले से घड़ों में गंगाजल भरकर लाया जाता है जिसमें दो घड़ों में दूध रहता है। इसी जल से गर्भगृह को धोया जाता है। बाबा का दरबार प्रातः तीन बजे खुलता है। इस दौरान 3 से 4 बजे तक भव्य मंगला आरती होती है। मंगला आरती होने से लेकर दिन में 11 बजे तक भक्त गर्भगृह में बाबा का दर्शन करते हैं। वहीं दिन में 11 से 12 बजे तक गर्भगृह के बाहर से दर्शन होता है। बाबा की भोग आरती दिन में 12 बजे होती है। शाम को 7 बजे संध्या आरती आयोजित होती है। रात 9 बजे श्रृंगार आरती एवं साढ़े 10 बजे शयन आरती की जाती है। आरती मंदिर के महंत कराते हैं जिसमें बहुत से पंडित सम्मिलित होते हैं। सुरक्षा की दृष्टि से अतिसंवेदनशील मंदिर परिसर में पुलिस अधीक्षक ज्ञानवापी तमाम पुलिसकर्मियों सहित केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवान हर पल तैनात रहते हैं। कैंट से करीब 6 किलोमीटर दूर शहर के मध्य में बाबा विश्वनाथ का भव्य मंदिर स्थित है। आटो या रिक्शा के जरिये गोदौलिया चौराहे पर पहुंचकर सीधे पैदल कुछ मीटर चलने पर बांयी ओर विश्वनाथ गली है। गली से होते हुए करीब 1 किलोमीटर चलने पर बाबा विश्वनाथ का दरबार स्थित है। मुख्य मंदिर तक पहुंचने के लिए कई गेट हैं जहां पुलिस के जवान चेकिंग करते रहते हैं। बाबा के दर्शन के लिए ऑनलाइन बुकिंग भी होती है। मंदिर के प्रबंधन के लिए कार्यपालक समिति भी गठित की गयी है जिसके चेयरमैन मण्डलायुक्त हैं। वहीं, समिति में जिलाधिकारी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक एवं अन्य अधिकारी शामिल हैं। साथ ही विश्वनाथ मंदिर न्यास भी है जिसके अध्यक्ष वर्तमान में अशोक द्विवेदी हैं। मंदिर कार्यप्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन के लिए अक्सर कार्यपालक समिति एवं मंदिर न्यास की बैठक होती है। जनवरी 2014 में हुई बैठक के दौरान निर्णय लिया गया कि मंदिर के पुजारी एवं सेवादार जल्द ही वैदिक परिधानों में नजर आयेंगे। विश्वनाथ गली धार्मिक वस्तुओं के विक्रय का भी एक बड़ा केन्द्र है। गली में रूद्राक्ष की माला से लेकर सभी प्रकार की धार्मिक वस्तुएं मिल जाती हैं। देश के जाने माने नेता, अभिनेता और उद्योगपति अक्सर बाबा दरबार में मत्था टेकने आते रहते हैं।

मृत्युंजय महादेव

mahamritunjay-temple-sकाशी में भगवान शिव के विभिन्न नामों से स्थापित महत्वपूर्ण शिवलिंगों में मृत्युंजय महादेव का भी स्थान है। धार्मिक आस्था के केन्द्र में भगवान शिव काशी के सर्वोच्च संचालक हैं। इस प्राचीन शहर में बाबा विश्वनाथ के बाद मृत्युंजय महादेव की भी दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन-पूजन करने आते हैं। कहा जाता है कि मृत्यंजय महादेव के दर्शन से अकाल मृत्यु नहीं होती है। बाबा अपने भक्तों की रक्षा स्वयं करते हैं। मान्यता के अनुसार मृत्युंजय महादेव स्वयंभू शिवलिंग हैं। इनके भक्तों को कभी भय नहीं सताता क्योंकि अपने भक्तों की रक्षा स्वयं ये करते हैं। वर्तमान में जिस स्थान पर मृत्युंजय महादेव का मंदिर स्थित है वहां प्राचीन काल में वन था। जंगल के बीच भक्त मृत्युंजय महादेव के दर्शन पूजन करने आते थे। बाद में भक्तों के सहयोग से वर्तमान भव्य मंदिर का निर्माण किया गया। विशाल मंदिर परिसर में घुसते ही बायीं ओर मृत्युंजय महादेव हैं। इनका दर्शन सड़क से भी किया जा सकता है क्योंकि गर्भगृह में लगी खिड़कियों से मृत्युंजय महादेव को आसनी से देखा जा सकता है। इस मंदिर में महाशिवरात्रि पर्व पर बड़ा आयोजन होता है। जिसकी तैयारी एक दो दिन पहले से ही शुरू कर दी जाती है। महाशिवरात्रि वाले दिन तो भोर से ही भक्तों की कतार लग जाती है। गर्भगृह की साफ-सफाई के बाद भक्तों के जलाभिषेक करने का क्रम शुरू हो जाता है जो देर रात तक चलता रहता है। इस दौरान बाबा का रूद्राभिषेक भी किया जाता है। साथ ही रात्रि में महाआरती का आयोजन वैदिक मन्त्रोच्चारण के साथ होता है। पूरा मंदिर परिसर इस दिन हर-हर महादेव के उद्घोष से गुंजायमान रहता है। इसी तरह सावन माह में भी मंदिर में काफी संख्या में आम भक्तों के अलावा कावंरिया जलाभिषेक करने पहुंचते हैं। वहीं सावन के प्रत्येक सोमवार को बाबा का अलौकिक श्रृंगार किया जाता है। मृत्युंजय महादेव मंदिर में कई और देवी-देवताओं की मूर्तियां हैं। जिनका धार्मिक रूप से बहुत महत्व है। इस मंदिर परिसर में एक और खास बात है। यहां एक ऐतिहासिक कूप है जिसे धनवन्तरी कूप कहा जाता है। कहा जाता है कि आयुर्वेद के जनक धनवन्तरी ने इस कूप में विभिन्न प्रकार की औषधियों का मिश्रण कर दिया था। जिससे इस कूप का जल अमृत के समान हो गया। मान्यता के अनुसार धनवन्तरी कूप के औषधियुक्त जल को पीने से कई प्रकार के रोगों से मुक्त रहा जा सकता है। यह मंदिर दर्शनार्थियों के लिए प्रातःकाल 4 से रात 12 बजे तक खुला रहता है। मृत्युंजय महादेव की आरती प्रातःकाल साढ़े 5 बजे सायं आरती साढ़े 6 बजे एवं शयन आरती रात साढ़े 11 बजे सम्पन्न होती है। इनका प्रसिद्ध मंदिर के 52/39 दारानगर विश्वेश्वरगंज में स्थित है। इन्हीं के पास काशी के कोतवाल कहे जाने वाले बाबा कालभैरव का मंदिर भी है। कैंट स्टेशन से करीब 7 किलोमीटर दूर इस मंदिर तक पहुंचने के लिए ऑटो द्वारा मैदागिन चौराहे पर पहुंचकर पैदल जाया जा सकता है।

पशुपतिनाथ मंदिर

पशुपतिनाथ मंदिर
पशुपतिनाथ मंदिर

वैसे तो पशुपतिनाथ का प्रसिद्ध मंदिर नेपाल में स्थित है लेकिन उस मंदिर का प्रतिरूप मंदिर वाराणसी में भी है। इस मंदिर की खासियत यह है कि जैसा नेपाल में पशुपतिनाथ का मंदिर है बिल्कुल उसी शैली का काशी का मंदिर भी है। स्थापत्य कला की दृष्टि से बेहतरीन यह मंदिर काफी प्राचीन है। इस मंदिर को देखने से ऐसा एहसास होता है जैसे नेपाल के किसी मंदिर में मौजूद हैं। अपने आप में यह मंदिर काशी के अन्य शिव मंदिरों से बिल्कुल भिन्न है। नेपाली लकड़ी के प्रयोग से निर्मित यह मंदिर लोगों को खूब आकर्षित करता है। मंदिर के भीतर गर्भगृह में पशुपतिनाथ के रूप में शिवलिंग स्थापित हैं। माना जाता है कि काशी के इस पशुपतिनाथ के दर्शन से वही फल प्राप्त होता है जो नेपाल के पशुपतिनाथ के दर्शन से होता है। इस मंदिर का निर्माण नेपाल के राजा राजेन्द्र वीर विक्रम साहा जो कि धार्मिक प्रवृत्ति के थे ने पशुपतिनाथ के आशीर्वाद से सन् 1843 में ललिता घाट पर कराया था। मंदिर का निर्माण नेपाल से आये कारीगरों ने किया था। मंदिर निर्माण में प्रयोग की गयी लकड़ी को भी राजा ने नेपाल से ही मंगवाया था। कारीगरों ने मंदिर में लगायी गयी लकड़ी पर बेहतरीन नक्काशी उभारा। मंदिर के चारो तरफ लकड़ी का दरवाजा होने के साथ भित्ती से लेकर छत तक सबकुछ लकड़ी से बनाया गया है। इन लकड़ियों पर विभिन्न प्रकार की कलाकृतियां उभारी गयी हैं। जो देखने में बेहद आकर्षित करती हैं। वहीं इन लकड़ियों पर कई जगह कामसूत्र की वैसी ही आकृतियां बनायी गयी हैं जैसी खजुराहो के मंदिरों पर बनी हैं। काशी में इस तरह की आकृति सम्भवतः इसी मंदिर पर है। मंदिर के बाहर एक बड़ा सा घण्टा भी है। वहीं दक्षिण द्वार के बाहर पत्थर का नंदी बैल भी है। पशुपतिनाथ का यह मंदिर सुबह साढ़े 4 बजे खुलता है जो दोपहर 12 बजे तक खुला रहता है। वहीं पुनः मंदिर सायं 3 बजे से रात 8 बजे तक खुला रहता है। मंदिर में आरती सुबह 5 बजे एवं शाम को साढ़े 6 बजे सम्पन्न होती है। शाम की आरती में मौसम के अनुसार कुछ फेरबदल भी होता रहता है। सप्ताह के प्रत्येक सोमवार को मंदिर में पशुपतिनाथ जी का रूद्राभिषेक होता है। साथ ही महाशिवरात्रि में भी पशुपतिनाथ जी का अभिषेक होता है। इस दिन दर्शन-पूजन के लिए काफी संख्या में श्रद्धालु मंदिर में पहुंचते हैं। अन्य अवसरों पर स्थानीय लोगों से ज्यादा नेपाली श्रद्धालु इस मंदिर में दर्शन-पूजन के लिए अधिक आते हैं। मंदिर की देख-रेख के लिए नेपाल सरकार आर्थिक सहायता प्रदान करता है। इस मंदिर के पुजारी जीवन पौड़िल हैं। कैंट से करीब 6 किलोमीटर दूर यह मंदिर ललिता घाट पर डी 1/64 में स्थित है।

 विश्वनाथ मन्दिर (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय)

birlamandirवाराणसी के सर्वोच्च संचालक बाबा विश्वनाथ के मुख्य मंदिर के अलावा यहां उनका एक और मंदिर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर में स्थित है जिसे नये विश्वनाथ जी या बिरला मंदिर कहा जाता है। मां सरस्वती के तपस्थली यानी बी0एच0यू0 में स्थापित नये विश्वनाथ जी के मंदिर में छात्रों के अलावा काशी दर्शन करने आने वाले ज्यादातर श्रद्धालु भी आते हैं। स्वच्छता, हरियाली और वृक्षों के बीच स्थित इस मंदिर का शिखर बहुत उंचा है। काफी बड़े परिसर में स्थित बिरला मंदिर दो मंजिला है इसका निर्माण संगमरमर के पत्थरों से किया गया है। इस मंदिर का निर्माण देश के जाने माने उद्योगपति बिरला घराने के राजा बिरला ने कराया है। शिव जी का यह भव्य मंदिर 1965 में बनकर तैयार हुआ। इस मंदिर की कल्पना बी0एच0यू0 के संस्थापक स्वयं पं0 मदन मोहन मालवीय जी की थी। जिसे मूर्त रूप दिया बिरला परिवार ने। मंदिर जितना बाहर से देखने में खूबसूरत लगता है उससे ज्यादा परिसर के भीतर की बनावट है। बी0एच0यू0 विश्वविद्यलय के मध्य में स्थित इस मंदिर का शिखर दूर से ही दिखाई देता है। बिरला मंदिर के चारो ओर हरा-भरा उद्यान है जिससे मंदिर की सुन्दरता में चार चांद लग जाता है। मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित किया गया है। मंदिर परिसर में पंचमुखी शिव प्रतिमा, हनुमान जी की प्रतिमा, मां पार्वती एवं सरस्वती जी की प्रतिमा है। इसके अलावा नटराज की मूर्ति भी स्थापित है। मंदिर के दूसरे तल पर शिव जी की ध्यान की मुद्रा में स्थापित प्रतिमा है। इस प्रतिमा के दाहिनी ओर मां दुर्गा की प्रतिमा एवं बायीं ओर भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की प्रतिमा है। मंदिर प्रांगण में दाहिनी ओर यज्ञशाला स्थित है जिसके बगल में शिवलिंग को निहारती नंदी की प्रतिमा है। शिवरात्रि के दिन बी0एच0यू0 के कुलपति नये विश्वनाथ जी पहुंचकर जलाभिषेक कर दर्शन-पूजन करते हैं। इस मौके पर काफी संख्या में भक्त बिरला मंदिर पहुंचते हैं। यह मंदिर दर्शनार्थियों के लिए प्रातःकाल 4 से दोपहर 12 बजे तक फिर पुनः दोपहर 1 से रात 9 बजे तक मंदिर खुला रहता है। वहीं शिवरात्रि सहित बड़े त्यौहारों पर मंदिर सुबह 4 से रात 12 बजे तक खुला रहता है। मंदिर में आरती सुबह 4 बजे फिर पौन 5 बजे दिन में पौने 12 बजे फिर दोपहर 1 बजे शाम को पौने 7 बजे, साढ़े 7 बजे और पौने 9 बजे आरती होती है। वहीं, हर सोमवार को सुबह 7 से 8 बजे के बीच में बाबा का रूद्राभिषेक किया जाता है। कैंट स्टेशन से करीब 7 किलोमीटर दूर बी0एच0यू0 कैंपस में स्थित इस मंदिर तक ऑटो द्वारा पहुंचा जा सकता है।

 

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ओकारेश्वर

ओंकारेश्वर- भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग है। काशी में यह ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर में है। नाड़ी शास्त्र के स्वर के अनुसार ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग अकार, मकार और ऊकार का सूचक है। काशी खंड के अनुसार इसी लिंग का नाम कपिलेश्वर और नादेश्वर भी है। इनके दर्शन-पूजन से सभी लिंगों की पूजा का फल मिल जाता है। वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को इनकी वार्षिक पूजा और श्रृंगार किया जाता है। इस दौरान काफी संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं। साथ ही पूरा माहौल हर-हर महादेव के जयघोष से गूंज उठता है।

Kaleshwar
कालेश्वर

कालेश्वर- कालेश्वर लिंग द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एक उज्जैन के महाकालेश्वर का प्रतीक हैं। इनका मंदिर वृद्धकाल महामृत्युंजय पर स्थित है। मान्यता के अनुसार यह लिंग महामृत्युंजय रूप हैं। इनकी पूजा से रोगों से छुटकारा और अपमृत्यु का निवारण होता है।

केदारेश्वर-

केदारेश्वर का नाम आते ही हिमालय के केदारनाथ की कल्पना अन्तः करण में बनने लगती है। जिनके दर्शन के लिए हर वर्ष हजारों श्रद्धालु जाते हैं। जिनका बहुत महात्म्य है। प्राचीन काल में काशी के राजा मान्धाता भी हर वर्ष केदारनाथ जाकर दर्शन-पूजन करते थे। राजा की केदारनाथ में असीम विश्वास एवं श्रद्धा थी। दर्शन करते-करते राजा मान्धाता वृद्धावस्था में पहुंच गये। उनका स्वास्थ्य खराब हो गया। जिसकी वजह से राजा केदारनाथ का दर्शन करने नहीं जा सके। इसका राजा मान्धाता को बहुत कष्ट हुआ। दर्शन न करने से व्यथित राजा भगवान शिव को भोग kedareshwarलगाने के लिए खिचड़ी बनाकर विलाप करने लगे। मान्यता के अनुसार उसी खिचड़ी में से भगवान शिव प्रकट हुए और राजा को वरदान दिया और नित्य दर्शन देने के लिए खिचड़ी के स्वरूप में ही शिवलिंग बन गये। तभी गौरी केदारेश्वर शिवलिंग अन्य शिवलिंगों से अलग थाली में रखी गयी खिचड़ी के आकार का प्रतीत होता है। एक अन्य कथा के अनुसार वशिष्ट नामक पाशुपत के वृद्ध होने पर उनके वरदान में केदार प्रकट हुए। कहा जाता है कि काशी में केदारेश्वर 15 कला में विराजमान हैं कि इनके दर्शन से विश्वनाथ जी के दर्शन का फल प्राप्त होता हैं। कहा गया है कि केदार के अन्तर्गृह में मरने वालों को भैरवी यातना नहीं होती। वहीं हिमालय के केदारनाथ के दर्शन से अधिक काशी के केदारेश्वर के दर्शन से पुण्य प्राप्त होता है। गौरी केदारेश्वर का मंदिर केदारघाट के बिल्कुल ऊपर है। मंदिर का द्वार ठीक गंगा जी के सामने खुलता है। मंदिर के सामने घाट पर गौरी कुण्ड भी है। बारिश के मौसम में जब गंगा का पानी बढ़ता है तो कुण्ड भर जाता है। मंदिर में बड़ा आयोजन महाशिवरात्रि पर्व पर होता है। इस दिन बाबा की 8 बार पूजा होती है एवं रात्रि 12 बजे महाभिषेक होता है। बाबा का वार्षिक श्रृंगार मकर संक्रांति पर्व पर होता है। हर महीने त्रयोदशी तिथि पर मंदिर में प्रदोष की पूजा होती है। इस दौरान लकड़ी के बने नंदी बैल पर शिव पार्वती की प्रतिमा को बैठाकर गर्भगृह की तीन बार प्रदक्षिणा करायी जाती है। मंदिर के पुजारी धुर्लीपार्ली नारायण शास्त्री बताते हैं कि इस मंदिर को भी नुकसान पहुंचाने का मुस्लिम शासकों ने प्रयास किया था। गर्भगृह के बाहर स्थित नंदी बैल को तोड़ने की कोशिश हुई थी। जिसका निशान आज भी नंदी बैल पर मौजूद है। लेकिन बाबा के प्रभाव से सैनिक मंदिर को नुकसान नहीं पहुंचा सके।

मंदिर में बाबा की 4 बार आरती होती है। मंदिर भोर में साढ़े 3 बजे से रात्रि 10 बजे तक खुला रहता है। इस दौरान आरती प्रातः काल साढ़े 4 बजे फिर दिन में 10 बजे, सायंकाल साढ़े 4 बजे एवं रात्रि 9 बजे मन्त्रोच्चारण और घण्ट घड़ियाल नगाड़े के साथ होती है। आरती शुरू होने से पहले करीब आधा घंटा गर्भगृह बंद रहता है। कदरेश्वर शिवलिंग के अलावा मंदिर परिसर में में कई अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं। जिनमें गणेश जी की काले रंग की प्रतिमा के अलावा गौरी, कार्तिकेय, दण्डपाणि भैरोनाथ, विनायक सहित शिव जी के अनन्य भक्त चण्डकेश्वर की प्रतिमा भी स्थापित है। मंदिर में पूजा-पाठ कुमार स्वामी मठ की ओर से होता है। चूंकि मंदिर में पूजा-पाठ की जिम्मेदारी दक्षिण भारतीय कुमार स्वामी मठ की ओर से होता है इसलिए यहां काफी संख्या में दक्षिण के दर्शनार्थी दर्शन पूजन के लिए पहुंचते हैं। कैंट से आटो अथवा रिक्शा से सोनारपुरा पहुंचकर पैदल या रिक्शा द्वारा करीब पांच सौ मीटर भीतर गली में जाने पर यह पवित्र मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। वहीं, हरिश्चन्द्र घाट से होते हुए भी केदारघाट नजदीक है जहां से मंदिर में दर्शन पूजन के लिए आसानी से जाया जा सकता है।

रामेश्वर- रामेश्वर द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से है। इनका मूल स्थान तमिलनाडु में है। काशी में प्रसिद्ध रामेश्वर मंदिर पंचक्रोशी यात्रा मार्ग पर है। इस मंदिर परिसर में कई देवी देवता स्थापित हैं। मान्यता के अनुसार श्रीराम ने अपने भाइयों के साथ पंचक्रोशी यात्रा किया था। सभी ने एक-एक शिवलिंग की स्थापना की थी। यह मंदिर विशिष्ट दक्षिण भारतीय शैली में निर्मित किया गया है। कार्तिक पूर्णिमा को श्रद्धालु वरूणा नदी को हिन्द महासागर की पाल्क खाड़ी मानकर विशेष पूजा अर्चना करते हैं।

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मध्यमेश्वर

मध्यमेश्वर- हिमालय के पहाड़ पर स्थित शिवलिंग का प्रतिरूप मध्यमेश्वर स्वयंभू लिंग हैं। जो काशी क्षेत्र के नाभि केन्द्र के रूप में वर्णित हैं। पद्यपुराण के अनुसार मध्यमेश्वर वह केन्द्र हैं जिसके पांच कोश लगभग 17.600 किलोमीटर वृत्त बनता है वह क्षेत्र काशी है।

मणिकर्णिकेश्वर- काशी में शिव मणिकर्णिकेश्वर मणिकर्णिका घाट के पास हैं। यह शिव के नृत्य और विष्णु को आशीष प्रदान करने के रूप में हैं। काशी में होने वाली सभी धार्मिक तीर्थ यात्राओं में इस लिंग का वर्णन मिलता है।

तिलभाण्डेश्वर-

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तिलभाण्डेश्वर

माना जाता है कि काशी के कंकड-कंकड़ में शिवशंकर वास करते हैं। काशी के महात्म्य में स्वयंभू शिवलिंगों का अदितिय स्थान है, जिन्हें देखने से अदभुत अनुभव होता है; उन्हीं स्वयंभू शिवलिंगों में से एक हैं- तिलभाण्डेश्वर महादेव। काशी के प्राचीन मंदिरों में से एक तिलभाण्डेश्वर का मंदिर शहर के भीड़भाड़ वाले इलाके मदनपुरा के बी.17/42 तिलभाण्डेश्वर गली में स्थित है। तिलभाण्डेश्वर शिवलिंग की विशिष्टता यह है कि इनका आकार काशी के तीन सबसे बड़े शिवलिंगों में से एक है और हर वर्ष इसमें तिल भर की वृद्धि होती है। इस स्वयंभू शिवलिंग के बारे में वर्णित है कि प्राचीन काल में इस क्षेत्र की भूमि पर तिल की खेती होती थी। एक दिन अचानक तिल के खेतों के मध्य से शिवलिंग उत्पन्न हो गया। जब इस शिवलिंग को स्थानीय लोगों ने देखा तो पूजा-अर्चन करने के बाद तिल चढ़ाने लगे। मान्यता है कि तभी से इन्हें तिलभाण्डेश्वर कहा जाता है। काशीखण्डोक्त इस शिवलिंग में स्वयं भगवान शिव विराजमान हैं। बताया जाता है कि मुस्लिम शासन के दौरान मंदिरों को ध्वस्त करने के क्रम में तिलभाण्डेश्वर को भी नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गयी। मंदिर को तीन बार मुस्लिम शासकों ने ध्वस्त कराने के लिए सैनिकों को भेजा लेकिन हर बार कुछ न कुछ ऐसा घट गया कि सैनिकों को मुंह की खानी पड़ी। अंगेजी शासन के दौरान एक बार ब्रिटिश अधिकारियों ने शिवलिंग के आकार में बढ़ोत्तरी को परखने के लिए उसके चारो ओर धागा बांध दिया जो अगले दिन टूटा मिला। कई जगह उल्लेख मिलता है कि माता शारदा इस स्थान पर कुछ समय के लिए रूकी थीं। वहीं, कर्नाटक राज्य से विभाण्डक ऋषि काशी आये तो यहीं रूककर पूजा-पाठ करने लगे। मंदिर निर्माण के बारे में बताया जाता है कि विजयानगरम के किसी राजा ने इस भव्य एवं बड़े मंदिर को बनवाया था। तीन तल वाले इस मंदिर में मुख्य द्वार से अंदर जाने पर दाहिनी ओर नीचे गलियारे में जाने पर विभाण्डेश्वर शिवलिंग स्थित हैं। इस शिवलिंग के उपर तांबे की धातु चढ़ायी गयी है। मान्यता के अनुसार विभाण्डेश्वर के दर्शन के उपरांत तिलभाण्डेश्वर का दर्शन करने पर सारी मनोकामना पूर्ण हो जाती है। बनारसी एवं मलयाली संस्कृति के उत्कृष्ट स्वरूप वाले इस मंदिर में भगवान अइप्पा का भी मंदिर स्थित है जिसकी दीवारों पर मलयाली भाषा में जानकारियां लिखी हुई हैं। इस मंदिर के आगे उपर सीढ़ियां चढ़ने पर बायीं ओर स्थित हैं- स्वयंभू शिवलिंग तिलभाण्डेश्वर। सुरक्षा की दृष्टि से गर्भगृह को लोहे की जाली से बंद कर दिया गया है। काशी के इस सबसे बड़े शिवलिंग को देखकर भक्त सहज ही आकर्षित हो जाते हैं। गर्भगृह के बायीं ओर की दीवार पर भोलेनाथ की योगदृष्टणा मुद्रा में मूर्ति है। दाहिनी ओर दीवार पर भी शिवलिंग स्थापित हैं। वहीं, गर्भगृह के दाहिनी ओर छोटे से मंदिर में मां पार्वती की दिव्य मूर्ति स्थापित है। इसी मंदिर के बगल में ही विशालकाय करीब 18 फीट उंचा शिवकोटिस्तूप भी है। जिसे आन्ध्र प्रदेश के भक्तों ने बनवाया है। इस स्तूप में वहां से आने वाले भक्त एक कागज पर शिव-शिव दो बार लिखकर डालते हैं। मंदिर में रहने वाले पुजारियों के मुताबिक अब तक करीब 10 करोड़ से ज्यादा शिव का नाम लिखकर भक्त स्तूप में डाल चुके हैं। तिलभाण्डेश्वर मंदिर में वर्ष में चार बड़े आयोजन होते हैं। महाशिवरात्रि के दिन शिव के पंचमुखेश्वर रूप को जो कि तांबे का बना हुआ है तिलभाण्डेश्वर शिवलिंग के उपर रखा जाता है; जिसके दर्शन के लिए काफी संख्या में भक्त उमड़ते हैं। वहीं मकर संक्रांति वाले दिन बाबा का चंदन श्रृंगार किया जाता है। सावन महीने में मंदिर में रूद्राभिषेक होता है जबकि दीपावली पर अन्नकूट का आयोजन किया जाता है। इस दौरान भजन-कीर्तन का सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होता है। मंदिर खुलने का समय सुबह 5 बजे से रात्रि साढ़े 9 बजे तक है। वहीं दिन में 1 से 4 बजे के बीच गर्भगृह बंद रहता है। प्रतिदिन आरती सुबह 6 बजे होती है। मंदिर परिसर में ही तिलभाण्डेश्वर मठ भी स्थित है। जिसमें साधु संत रहते हैं। जबकि मंदिर की गतिविधियों को देखने की जिम्मेदारी केरला के साधु संत निभा रहे हैं।

 व्यासेश्वर- गंगा जी के उस पार रामनगर के ऐतिहासिक किले के परिसर में शिवालय भी हैं। जिन्हें व्यासेश्वर कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस शिवलिंग की स्थापना वेदों के रचयिता वेदव्यास ने की थी। माघ महीने के हर सोमवार को इस शिवलिंग दर्शन पूजन के लिए दर्शनार्थियों की भीड़ लगी रहती है।

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कर्दमेश्वर

कर्दमेश्वर महादेव मंदिर – अर्द्धचन्द्राकार रूप में प्रवाहित उत्तरवाहिनी माँ गंगा के किनारे स्थित विद्या और संस्कृति की राजधानी काशी नगरी अपनी धार्मिक और पौराणिक स्थानों की विशाल संख्या और उनमें व्याप्त विविधता के लिए विश्वविख्यात है, काशी की महिमा का उल्लेख अनेक पुराणों में मिलता है; जिसमें स्कन्द पुराण का काशी खण्ड में है। सामान्य जनजीवन हो या आस्था का केन्द्र स्थल मंदिर, सभी स्वयं में एक विस्तृत प्रभाव समेटे हुए है। काशी की धार्मिक परम्पराओsं में यात्रा तथा यात्रा के दौरान काशी खण्ड में स्थित देवालयों में दर्शन-पूजन का विशेष महत्व है। इसी क्रम में पंचक्रोशी यात्रा में पहले विश्राम के रूप में प्रसिद्ध है कर्दमेश्वर महादेव मंदिर। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से करीब 5 किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण-पश्चिमी दिशा में यह मंदिर स्थित है। एक बड़े चतुर्भुजाकार तालाब के पश्चिमी ओर स्थित यह मंदिर उड़ीसा के विकसित मंदिरों सा प्रतीत होता है। साथ ही मूर्तिकला की सम्पन्नता लिए यह चंदेल इतिहास का प्रतीक है। एक अभिलेख के अनुसार तालाब के घाटों का निर्माण रानी भवानी (1720-1810) द्वारा 1751 या 1757 में कराया गया है।

इतिहास व कालक्रम – कर्दमेश्वर मंदिर का उल्लेख पंचक्रोशी महात्म्य में कर्दमेश के तौर पर है। यहीं पर पंचक्रोशी यात्री अपना पहला पड़ाव या विश्राम करते है। स्कन्द पुराण का काशीखण्ड स्पष्ट रूप से कर्दमेश्वर का उल्लेख नहीं करता बल्कि एक कथा कर्दमेश्वर से अवश्य जुड़ी है। इस कथा के अनुसार एक बार जब प्रजापति कर्दम शिव पूजा में ध्यानमग्न थे। उनका पुत्र कुछ मित्रों के साथ तालाब में नहाने गया स्नान के दौरान उसे एक घड़ियाल ने खिंच लिया। डरे हुए मित्रों ने यह बात कर्दम को बतायी कर्दम बिना बाधित हुए ध्यानमग्न रहे परन्तु ध्यानावस्था में ही वह पूरे विश्व के घटनाक्रम को देख सकते थे। उन्होंने देखा कि उनका पुत्र एक जल देवी द्वारा बचाकर समुद्र को सौंप दिया गया है। जिसे समुद्र में गहनों से सजाकर शिव के गण को सौप दिया शिवगण ने शिव आज्ञा से बालक को उसके घर पहुंचाया। ध्यानावस्था से उठने पर कर्दम ने अपने पुत्र को सम्मुख पाया कर्दम का यहीं पुत्र कर्दमी के नाम से जाने गये तथा पिता की आज्ञा से वाराणसी चले आये। कर्दमी ने एक शिवलिंग स्थापित कर पांच हजार वर्षों तक अत्यन्त कठोर तप किया। शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें वरूणा के पश्चिमी क्षेत्र के धन, माणिक्य, समुद्र, नदी, तालाब, वापी जल के प्रत्येक स्रोत का स्वामी घोषित किया एक अन्य वरदान ने शिव ने कहा कि मणिकर्णेश के दक्षिण-पश्चिम स्थित जो लिंग है वह वरूणेश के नाम से जाना जायेगा दिये गये वर्णन का सही स्थान पता लगाने पर इस बात पर सहमति बनती है कि बताया गया मंदिर वरूणेश मंदिर ही कर्दमेश्वर मंदिर है। काशीखण्ड तथा तीर्थ विवेचन खण्ड यह दर्शाते है कि वरूणेश लिंग गहड़वाल काल का है। जिसका सम्बन्ध कर्दम से है। जो बाद में कर्दमेश्वर नाम से जाना गया।

वर्तमान कर्दमेश्वर मंदिर के निर्माण के सही समय का निर्णय कर पाना वस्तुतः जटिल है। हैवेल के अनुसार यह मुस्लिम आक्रमण के पहले का बना हुआ है। प्रो0 अग्रवाल के अनुसार यह गहड़वाल वंश का एकमात्र अवशेष है। वर्तमान मंदिर की दीवारों को देखकर यह प्रतीत होता है कि यह मंदिर 12वीं शताब्दी के बाद बना है। मंदिर के शेषभाग अपने स्थापत्य विशेषता में मध्यकालीन स्थापत्य को दर्शाता है। इस प्रकार यह भी हो सकता है कि सम्पूर्ण मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी के बाद किसी पुराने मंदिर के ध्वंसावशेष पर बना हो इस प्रकार का काशीखण्ड कथा में वर्णित पंचक्रोशी महात्म्य में कर्दमेश्वर तथा वरूणेश्वर की व्याख्या हो सकती है कि इसी समय दोनों शिवलिंग अस्तित्व में रहे हों और समय के साथ कर्दमेश्वर महत्वपूर्ण होता गया और वरूणेश्वर अज्ञात रह गया।

DSCN1552वास्तु योजना – कर्दमेश्वर मंदिर पंचरथ प्रकार का मंदिर है इसकी तल छंद योजना में एक चौकोर गृर्भगृह अन्तराल तथा एक चतुर्भुजाकार अर्द्धमण्डप है। मंदिर का निचला भाग अधिष्ठान, मध्यभित्ति क्षेत्र माण्डोवर भाग है जिस पर अलंकृत तांखे बने हुए है। ऊपरी भाग में नक्काशीदार कंगूरा वरांदिका व आमलक सहित सजावटी शिखर है। मंदिर का पूर्वाभिमुख मुख्य द्वार तीन फीट पांच इंच चौड़ा तथा छः फीट ऊँचा है। मंदिर का गर्भगृह जिसका बाहरी माप 12×12 फीट तथा भीतरी माप 8 फीट 8 इंच चौड़ा तथा 8 फीट लम्बा है। इसी गर्भृगृह के मध्य ही कर्दमेश्वर शिवलिंग अवस्थित है। गर्भगृह के ही उत्तर-पश्चिमी कोने में छः फीट की ऊचाई पर एक जल स्रोत है। जिससे शिवलिंग पर लगातार जलधारा गिरती रहती है।

वास्तुशिल्प और मूर्तिशिल्प के आधार पर यह मंदिर बहुत ही रोचक है। मंदिर के विखण्डित कुर्सी या खम्भों की स्थिति को देखकर यह प्रतीत होता है कि मंदिर का अर्द्धमण्डप एक बेहतर निर्माण रहा होगा शिखर में भी आधुनिक तरह का छत तथा लकड़ियों के आधार पर सादे पत्थरों द्वारा तैयार शिखर भी इस तथ्य को और स्पष्ट करते है। आधार की अपेक्षा खम्भे काफी हद तक सादे है। पत्तियों या अर्द्ध हीराकार नक्काशी सजावट खम्भों पर पन्द्रहीं शताब्दी में पाये जाते थे। कर्दमेश्वर मंदिर के अर्द्धमण्डप के दो स्तम्भों पर अभिलेख है। जो 14वीं-15वीं शताब्दी से है। जिनसे पुष्ट होता है कि अर्द्धमण्डप के निर्माण में पुरानी सामग्री को पुनः प्रयोग में लाया गया है। कर्दमेश्वर मंदिर पर बनी मूर्तियां शिल्प के दृष्टिकोण से सामान्य प्रकृति की है। परन्तु कुछ आकृतियां जैसे दक्षिण भित्ती पर बनी उमा महेश्वर की मूर्ति खजुराहों की मंदिरों पर बनी आकृतियों की तरह है। लेकिन उनमें आकर्षण और मोहित करने वाली सुन्दरता का अभाव है। इसी प्रकार उत्तरी तरफ निर्मित रेवती और ब्रम्हा की मूर्ति के केश सज्जा से स्पष्ट रूप से गुप्तकालीन मूर्ति कला का प्रभाव दिखता है। मंदिर पर बनी आकृतियां पुष्ट और मृदु साथ ही चेहरे पर प्रभावकारी मुस्कान है। जबकि नाग और शेर का चित्र अपरिपक्व व भावहीन है। कुछ चित्रों में गोल पत्तीनुमा या लम्बवत आंख की संरचना वाली बिन्दी लगाये चित्र भी हैं। वामन तथा विष्णु की मूर्तियों में बने आभूषणों में घुँघरू की उपस्थिति भी बहुत बाद की मूर्ति शिल्प विशेषता है। ऐसे ही पश्चिमी भाग पर खड़ी मुद्रा में विष्णु की मूर्ति के माथे पर यू आकार का चिन्ह है जो वर्तमान समय में भी प्रचलित है। निःसंदेह कर्दमेश्वर मंदिर पर उत्कीर्ण मूर्तियां तेजस्वी है परन्तु उनमें आकर्षण व जीवंतता का अभाव है। उनके चेहरे पर मुस्कान बाहर से थोपी गयी प्रतीत होती है। भले ही इन चित्रों खजुराहो के मंदिरों पर उत्कीर्ण चित्रों जैसा लालित्य मिश्रित तथा जीवंत भाव न हो परंतु मंदिर की भित्तियों पर उनकी स्थिति तथा मूर्ति विध्वन्स के विवरण यह प्रमाणित करते हैं कि कुछ मूर्तियां बेहतर स्थिति में रही होंगी।

वर्तमान में मंदिर के सम्पूर्ण देख-रेख का जिम्मा उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग का है। पुरातत्व विभाग द्वारा मन्दिर पर किये गये कृत्रिम रंगों के प्रयोग से पत्थरों हुए नुकसान के मद्देनजर सफाई एवं संरक्षण का कार्य किया जा रहा है। हाल ही में धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इस मंदिर के गर्भगृह के अष्टधातु से निर्मित अरघे का एक हिस्सा विगत महीने में चोरों द्वारा काट लिया गया था। हालांकि कुछ ही दिनों बाद पुलिस प्रशासन ने अरघे को बरामद कर लिया।

गौतमेश्वर महादेव

Gautemeshwarवाराणसी की पहचान भगवान शिव हैं। काशी के कण-कण में वास करने वाले भगवान भोले के यहां हर स्थान पर मंदिर मिल जायेंगे। काशी खण्डोक्त शिवालयों की बात की जाये तो गौतमेश्वर महादेव का मंदिर महत्वपूर्ण है। इनका मंदिर गोदौलिया चौराहे से चौक की ओर बढ़ते ही कुछ कदम की दूरी पर दाहिने तरफ भव्य द्वार के भीतर काशीराज काली मंदिर के बगल में स्थित है। बेहद छोटे से इस मंदिर में गौतमेश्वर महादेव हैं। मान्यता के अनुसार गौतम ऋषि ने इनको स्थापित किया था। जिसके बाद से श्रद्धालु यहां दर्शन-पूजन करने लगे। इनका मंदिर प्रातःकाल 4 बजे से पूर्वाह्न 10 बजे तक एवं शाम को 4 से रात 9 बजे तक खुला रहता है। बाबा की आरती सुबह 5 बजे एवं शाम को 7 बजे मन्+त्रोच्चारण के बीच सम्पन्न होती है। महाशिवरात्रि पर्व पर इनके मंदिर पर काफी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर जलाभिषेक करते हैं। इस दौरान बाबा का भव्य श्रृंगार भी होता है। वहीं सावन महीने में भी कावंरियों सहित आम श्रद्धालु गौतमेश्वर महादेव का दर्शन करते हैं। मान्यता के अनुसार इनके दर्शन से आयु में वृद्धि होने के साथ ही सुख समृद्धि बढ़ती है।

सोमेश्वर महादेव

सोमेश्वर महादेव
सोमेश्वर महादेव

भारत में काशी एक ऐसा स्थान है जहां द्वादश ज्यातिर्लिंगों के प्रतिरूप स्थित हैं। बाबा विश्वनाथ यहां द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं देश में स्थित अन्य स्थानों के मूल ज्योतिर्लिंगों के प्रतिरूप काशी में विराजमान हैं। यहां स्थित इन्हीं प्रतिरूप ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं सोमनाथ के प्रतिरूप सोमेश्वर महादेव। इनका छोटा सा मंदिर मान मंदिर घाट के ऊपर चढ़ने पर यात्रियों के ठहरने के लिए संचालित होने वाले एक गेस्ट हाउस के दाहिने तरफ मुड़ी गली में कुछ कदम पर ही दाहिनी ओर है। आस-पास के निवासियों के अनुसार मंदिर में कोई नियमित पुजारी नहीं है। स्थानीय लोग ही मंदिर खोलकर पूजा-पाठ करते हैं। वैसे मंदिर सुबह 5 से 8 बजे एवं शाम 6 से रात 8 बजे तक खुला रहता है। वहीं, दिन में भी मंदिर में बनी खिड़कियों से बाबा का दर्शन किया जा सकता है। मान्यता के अनुसार इनके दर्शन से सोमनाथ के दर्शन के बराबर ही पुण्य फल प्राप्त होता है। लोगों के अनुसार महाशिवरात्रि एवं सावन में काफी संख्या में श्रद्धालु बाबा का जलाभिषेक कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इस मंदिर के पास ही वाराही देवी का प्रसिद्ध मंदिर भी है। सोमेश्वर महादेव के दर्शन के लिए दशाश्वमेध घाट से मानमंदिर घाट होते हुए पहुंचा जा सकता है।

बैजनाथेश्वर महादेव

baijnatheswarभारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक बैजनाथ जी का मुख्य मंदिर बिहार में स्थित है। इस महत्वपूर्ण मंदिर में सावन माह में देश के कोने-कोने से श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं। कहा जाता है कि इनका दर्शन करने से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और भक्त मोह माया के बंधनों से मुक्त हो जाता है। काशी में बैजनाथ जी के ही प्रतिरूप ज्योतिर्लिंग बैजनाथेश्वर महादेव हैं। इनका प्राचीन मंदिर बैजनत्था क्षेत्र में स्थित है। मान्यता के अनुसार बैजनाथेश्वर महादेव स्वयंभू हैं। इन्हीं के नाम पर बैजनत्था मोहल्ले का नाम पड़ा है। मान्यता के अनुसार बैजनाथेश्वर महादेव के दर्शन से वही फल प्राप्त होता है जो मुख्य बैजनाथ जी के दर्शन से मिलता है। बैजनाथेश्वर मंदिर का निर्माण इंदौर की महारानी अहिल्या बाई होल्कर ने करवाया था। बाद में इस मंदिर का जीर्णोद्धार श्रद्धालुओं के सहयोग से हुआ। मंदिर परिसर में ही एक कुंआ है। साथ ही परिसर में अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी हैं। इस मंदिर में बड़ा आयोजन महाशिवरात्रि एवं सावन महीने में होता है। महाशिवरात्रि के अवसर पर मंदिर में महाआरती होती है। साथ ही रूद्राभिषेक एवं मंगला आरती की जाती है। जबकि सावन महीने में इस मंदिर में जलाभिषेक करने काफी संख्या में कावंरिया आते हैं। पूरे सावन माह में मंदिर में जमकर श्रद्धालु दर्शन-पूजन के लिए उमड़ते हैं। इस माह में बाबा का अलग-अलग ढंग से श्रृंगार किया जाता है। साथ ही प्रत्येक सोमवार को भी इस मंदिर में दर्शनार्थियों की संख्या अधिक रहती है। यह मंदिर दर्शनार्थियों के लिए सुबह 4 से दोपहर साढ़े 12 बजे तक एवं सायं 4 से रात 10 बजे तक खुला रहता है। इनकी आरती प्रातः 6 बजे दोपहर 12 बजे एवं सायं साढ़े 7 बजे सम्पन्न होती है। मंदिर के वर्तमान पुजारी राम सुबेदी हैं। यह बैजनत्था क्षेत्र में बी0 37/1 ए0 में यह मंदिर स्थित है। कमच्छा होते हुए इस मंदिर तक पहुंचा जा सकता है।

जोगेश्वर महादेव

गंगा तरंग-रमणीय-जटाकलापं गौरी निरंतर विभूषित वामभागम्

नारायण-प्रिय मनंग-मदापहारं वाराणसीपुरपत्भिज विश्वनाथम

यह श्लोक भगवान शिव के वाराणसी के कण-कण में विद्यमान होने का साक्ष्य देता है। वैसे भगवान शिव व वाराणसी के विषय में किसी साक्ष्य की जरूरत नहीं क्योंकि यह शाश्वत सत्य है। काशी में ऐसा कोई स्थान नहीं होगा जहां शिवलिंग के रूप में देवाधिदेव महादेव विराजमान न हों। इस पावन देवभूमि पर आकार की दृष्टि से सबसे बड़े तीन शिवलिंगों में जोगेश्वर महादेव एक हैं। मान्यता के अनुसार जोगेश्वर महादेव के आकार में वर्ष भर में एक जौ के बराबर वृद्धि होती है। जिससे यह शिवलिंग काफी विशाल है। कहा जाता है कि इनका लगातार तीन साल तीन महीने दर्शन-पूजन करने से योग की प्राप्ति होती है और मनुष्य सभी बंधनों से मुक्त होकर परमसुख को प्राप्त करता है। जोगेश्वर महादेव स्वयंभू शिवलिंग हैं। इनका प्राचीन नाम जैगीषश्वेर था। कथा के अनुसार जिस स्थान पर वर्तमान में जोगेश्वर महादेव हैं। वहां प्राचीनकाल में एक गुफा थी जिसमें जैगीष नाम के ऋषि तपस्या में लीन थे। जब भगवान शिव अपने पूरे परिवार के साथ काशी छोड़कर मन्दराचल पर्वत जाने लगे तो तपस्यारत जैगीष ऋषि ने शिव जी से काशी को छोड़कर नहीं जाने की विनती की। लेकिन शिव जी नहीं माने और मन्दाराचल पर्वत चले गये। अपने ईष्ट देव के जाने से उद्वेलित जैगीष +ऋषि उसी गुफा में हठ योग करते हुए तपस्या में लीन हो गये। तपस्या करते हुए जैगीष ऋषि को सदियों बीत गया जिससे उनका शरीर जीर्ण-शीर्ण हो गया। उधर जब भगवान शिव को जैगीष ऋषि के बारे में ध्यान आया तो उन्होंने अपने गण नंदी को तुरंत एक लीलारूपी कमल देकर जैगीष ऋषि को स्पर्श कराने के लिए भेजा। गुफा में पहुंचकर नंदी ने भगवान शिव के दिए कमल को तपस्यारत जैगीष ऋषि से स्पर्श कराया। कमल के छूते ही जैगीष +ऋषि का शरीर फिर से सुन्दर और कांतिमय हो गया। इसके बाद जैगीष ऋषि गुफा से बाहर निकले तो साक्षात भगवान शिव का दर्शन पाया। शिव जी के दर्शन से भावविभोर हुए जैगीष ऋषि उनकी स्तुति करने लगे। अपने भक्त के असीम भक्ति से प्रसन्न शिव जी ने जैगीष ऋषि से वरदान मांगने को कहा। इस पर ऋषि ने भगवान शिव से उनके प्रतिदिन दर्शन का वरदान मांगा। उसी दौरान उस स्थान पर शिवलिंग प्रकट हुआ। मान्यता के अनुसार यही शिवलिंग जोगेश्वर महादेव हैं। जोगेश्वर महादेव का मंदिर ईश्वरगंगी मोहल्ले में आदर्श इण्टर कालेज के पास स्थित है। पहले इस स्थान पर जंगल था। जंगज के बीच विद्यमान शिवलिंग के दर्शन के लिए भक्त आते थे। हाल ही में जोगेश्वर महादेव मंदिर का भव्य निर्माण किया गया है। बड़े से मंदिर परिसर में एक कुंआ भी है कहा जाता है कि इस कुंए का पानी हमेशा मीठा रहता है और इसके पानी को पीने से कई रोग दूर हो जाते हैं। जोगेश्वर महादेव मंदिर में महाशिवरात्रि पर्व पर बड़ा आयोजन होता है। इस दिन जोगेश्वर महादेव का रूद्राभिषेक किया जाता है। इसके बाद भजन-कीर्तन चलता रहता है। वहीं रात को रात्रि जागरण किया जाता है। साथ ही भण्डारा भी होता है। इस मौके पर भोर से ही दर्शनार्थियों का तांता दर्शन-पूजन के लिए लग जाता है। सावन महीने में भी इस मंदिर में काफी संख्या में श्रद्धालु दर्शन-पूजन के लिए आते हैं और जलाभिषेक करते हैं। महाशिवरात्रि और सावन में जोगेश्वर महादेव का विशेष श्रृंगार किया जाता है। इनका मंदिर प्रातः 4 से दोपहर 1 बजे तक एवं सायंकाल 3 से रात 10 बजे तक खुला रहता है। जबकि आरती सुबह 5 बजे एवं सायं 7 बजे सम्पन्न होती है। वर्तमान में मंदिर के मुख्य पुजारी स्वामी मधुर कृष्ण हैं।

अमलेश्वर महादेव

अमलेश्वर महादेव
अमलेश्वर महादेव

भारत में द्वादश ज्योतिर्लिंगों में अमरनाथ जी का महत्वपूर्ण स्थान है। इनके दर्शन के लिए देश भर से श्रद्धालु जाते रहते हैं। इन्हीं के प्रतिरूप काशी में अमलेश्वर महादेव हैं। कहा जाता है कि अमलेश्वर महादेव स्वयंभू शिवलिंग हैं। इनका छोटा सा मंदिर भदैनी मोहल्ले में स्थित है। बेहद छोटे से मंदिर में स्थापित अमलेश्वर महादेव का मंदिर सड़क से करीब छः फीट नीचे है। बाहर से मंदिर गुफा की तरह लगता है। आयताकार इस मंदिर के मध्य में अमेलश्वर महादेव स्थापित हैं। इस शिवलिंग की खासियत यह है कि शिवलिंग में ही एक ओर गणेश जी तो दूसरी ओर माता पार्वती की आकृति बनी हुई है। जबकि मंदिर की दीवार पर कार्तिकेय महराज की आकृति उभरी हुई है। इस मंदिर में जाने से पूरे शिव परिवार का दर्शन एक साथ हो जाता है। कहा जाता है कि अमलेश्वर महादेव के दर्शन-पूजन से वही फल प्राप्त होता है जो अमरनाथ जी के दर्शन से होता है। इनका मंदिर हर समय दर्शन-पूजन के लिए खुला रहता है। इस मंदिर में सावन एवं महाशिवरत्रि में काफी संख्या में श्रद्धालु दर्शन-पूजन करने आते हैं। इस दौरान बाबा का श्रृंगार भी किया जाता है। वहीं प्रत्येक सोमवार को भी दर्शन-पूजन करने वालों की अच्छी संख्या रहती है। बाबा की आरती सुबह छः एवं शाम 8 बजे सम्पन्न होती है। मंदिर के पुजारी कमलेश पंडित हैं। भदैनी मोहल्ले में स्थित इस मंदिर तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। मंदिर भदैनी घाट के पास है।

त्र्यम्बकेश्वर महादेव

देश भर में स्थित द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक त्र्यम्बकेश्वर महादेव का मंदिर महाराष्ट्र के नासिक जिले में स्थित है। इनका प्रतिरूप मंदिर काशी में लोलार्क कुण्ड के पास स्थित है। काफी प्राचीन यह मंदिर देखने में बेहद खूबसूरत लगता है। लाल पत्थरों से निर्मित रथाकार शैली में निर्मित इस मंदिर की खासियत यह है कि इतना प्राचीन होने के बाद भी इसकी भीतरी दीवारों पर की गयी बेहतरीन चित्रकारी आज भी मौजूद है। जो देखने में बेहद खूबसूरत लगती है। मंदिर की सीढ़ियों से लेकर गर्भगृह से निकलने वाले जल के लिए पत्थरों पर की गयी नक्काशी खास आकर्षित करती है। इस छोटे से मंदिर के गर्भगृह के चारो ओर द्वार हैं। गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है। मान्यता के अनुसार काशी में स्थित त्र्यम्बकेश्वर महादेव के दर्शन-पूजन करने से वही फल प्राप्त होता है जो नासिक में त्र्यम्बकेश्वर महादेव के दर्शन से फल मिलता है। महाशिवरात्रि एवं सावन महीने में इनके मंदिर में दर्शनार्थियों की काफी भीड़ रहती है। वहीं, जो श्रद्धालु काशी के द्वादश ज्योतिर्लिंगों के दर्शन का संकल्प लेते हैं वे भी यहां दर्शन-पूजन के लिए आते हैं। प्रत्येक वर्ष अप्रैल महीने में बाबा का वार्षिक श्रृंगार किया जाता है। यह मंदिर दर्शनार्थियों के लिए प्रातःकाल साढ़े 6 से दोपहर साढ़े 11 बजे तक एवं शाम को 3 बजे से रात 7 बजे तक खुला रहता है। जबकि आरती सुबह 7 एवं सायं 6 बजे सम्पन्न होती है। इस मंदिर के पुजारी दुर्गा मिश्र हैं। पंडित दुर्गा प्रसाद मिश्र के अनुसार यह मंदिर काफी पुराना है और इसमें स्थापित त्र्यम्बकेश्वर महादेव स्वयंभू नहीं हैं बल्कि किसी ने स्थापित किया है हालांकि वह ये तो नहीं बता सके कि इस मंदिर का निर्माण किसने और कब करवाया। अस्सी चौराहे से सोनारपुरा की ओर करीब पांच सौ मीटर बढ़ने पर दाहिनी ओर मुड़ी गली में कुछ कदम जाने पर बायीं ओर जाने पर लोलार्क कुण्ड से पहले ही यह मंदिर है। इसी मंदिर के पास लोलार्केश्वर महादेव का मंदिर भी है।

अस्सी संगमेश्वर मंदिर

Assisangmeshwarअस्सी घाट पर प्राचीन अस्सी संगमेश्वर का मंदिर स्थित है। पंचक्रोशी यात्रा के दौरान यात्री इस मंदिर में दर्शन पूजन करने के लिए आते हैं। इस मंदिर की बनावट सामान्य है। मंदिर में आमने-सामने दो दरवाजे हैं जबकि दो तरफ बड़ी-बड़ी खिड़कियां लगी हुई हैं। इस मंदिर के गर्भगृह में पांच शिवलिंग स्थापित हैं। वहीं मंदिर की दीवारों पर हनुमान जी सहित अन्य देवताओं की मूर्तियां लगी हुई है। दर्शनार्थियों के लिए यह मंदिर प्रातःकाल 5 से दोपहर 11 बजे तक एवं सायं 4 से रात 9 बजे तक खुला रहता है। महाशिवरात्रि एवं सावन महीने में काफी संख्या में लोग दर्शन-पूजन करते हैं। इस दौरान मंदिर में भक्त रूद्राभिषेक भी कराते हैं। अस्सी चौराहे से यह मंदिर घाट की ओर कुछ ही दूर पर है।

लोलार्केश्वर महादेव

लोलार्केश्वर महादेवबनारस में लोलार्क कुण्ड का धार्मिक रूप से अपना अलग स्थान है। इसी कुण्ड की सीढ़ियों के उपर लोलार्केश्वर महादेव का मंदिर है। कहा जाता है कि लोलार्क कुण्ड में स्नान करने के बाद लोलार्केश्वर महादेव के दर्शन करने से सभी प्रकार के कष्ट दूर हो जाते हैं और सुख-शांति आती है। लोलार्क कुण्ड से सटे हुए लोलार्केश्वर महादेव का मंदिर बनावट की दृष्टि से सामान्य है। छोटे से मंदिर परिसर में कई देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं। वहीं मंदिर में ही पेड़ भी है। लोलार्केश्वर महादेव कुण्ड के बिल्कुल सामने विद्यमान हैं। लोलार्केश्वर महादेव के मंदिर में समय-समय पर रूद्राभिषेक सहित अन्य अनुष्ठान भक्त कराते रहते हैं। वहीं इनका वार्षिक श्रृंगार हर वर्ष अप्रैल महीने में होता है। इस दौरान मंदिर को आकर्षक ढंग से सजाया जाता है। साथ ही सांस्कृतिक कार्यक्रम का भी आयोजन किया जाता है। जिसमें महिलाएं भक्ति गीत गाती हैं। साथ ही सायंकाल भण्डारे का आयोजन किया जाता है। यह मंदिर दर्शनार्थियों के लिए प्रातःकाल 6 से दोपहर 11 बजे तक एवं सायं 4 से रात 9 बजे तक खुला रहता है। आरती सुबह 7 बजे एवं सायं साढ़े 7 बजे सम्पन्न होती है।

 

शिव ज्योतिर्लिंग: भारत एवं काशी

क्रमांक   शिव ज्योतिर्लिंग          भारत में मूल-स्थान        काशी में अवस्थिति

1.     सोमेश्वर               सोमनाथ, गुजरात            सोमेश्वर, मानमन्दिर घाट के समीप डी 16/34

2.     मल्लिकार्जुन      श्रीशैल, आन्ध्र प्रदेश          त्रिपुरान्तकेश्वर, सिगरा (शिवपुरवा) टीला, डी 59/95

3.     महाकालेश्वर        उज्जैन, मध्य प्रदेश           वृद्धकालेश्वर, महामृत्युंजय,के 52/39

4.     ओंकारेश्वर            मान्धाता, मध्यप्रदेश        आंकारेश्वर, पठानी टोला, ए 33/23

5.     वैद्यनाथ                  देवघर, झारखण्ड              वैद्यनाथेश्वर, कमच्छा, बी 37/1

6.     भीमशंकर               पुणे, महाराष्ट्र                    भीमेश्वर, काशीकरवट,सी के 32/12

7.     रामेश्वर                   रामेश्वरम्, तमिलनाडु       रामेश्वर, कुण्ड डी 54/45

8.     नागेश्वर                   द्वारका के समीप, गुजरात  नागेश्वर, भोंसला घाट, सी के 2/1

9.     विश्वेश्वर                   वाराणसी विश्वनाथ जी ज्ञानवापी,सी के 35/19

10.    न्न्यम्बकेश्वर          नासिक, महाराष्ट्र       न्न्यम्बकेश्वर, बड़ादेव, डी 38/21

11.    केदारेश्वर       चमोली (हिमालय में), उत्तरांचल     केदारेश्वर, केदार घाट, डी 6/102

12.    घुष्मेश्वर                 एलोरा, महाराष्ट्र           घुश्र्णीश्वर कमच्छा, बी 21/123

शिव स्वयंभूलिंग: भारत एवं काशी

क्रमांक   शिव ज्योतिर्लिंग    भारत में मूल-स्थान     काशी में अवस्थिति

1.     अविमुक्तेश्वर    चमोली (हिमालय में), उत्तरांचल   ज्ञानवापी, राधाकृष्ण धर्मशाला,सी के 30/1

2.     ओंकारेश्वर      मान्धाता, मध्य प्रदेश     ओंकारेश्वर, पठानी, टोला,ए 33/23

3.     ज्येष्ठेश्वर      ज्येष्ठस्थान, गुजरात      सप्तसागर, कर्णघण्टा, के 62/144

4.     मध्यमेश्वर      चमोली (हिमालय में), उत्तरांचल   मैदागिन, दारानगर, के 53/62

5.     महादेव  वृन्दारक क्षेत्र    आदि महादेव, त्रिलोचन, ए 3/92

6.     विश्वेश्वर वाराणसी, उ0 प्र0 विश्वनाथ जी, ज्ञानवापी,सी के 35/19

7.     वृषभध्वज      गंगा सागर, पश्चिम बंगाल कपिलेश्वर, कपिलधारा

8.     केदारेश्वर       चमोली (हिमालय में), उत्तरांचल   केदार घाट, बी 6/102

9.     कर्पदीश्वर       छागलन्द तीर्थ   पिसाचमोचन, सी 21/40

10.    स्वयंभू लिंग    नकुलीश्वर क्षेत्र   महालक्ष्मीश्वर के समीप,डी 54/114

11.    भूर्भूवः लिंग     गन्धमादन पर्वत भूत भैरव, के 62/26

12.    (आत्मा) वीरेश्वर उज्जैन, मध्य प्रदेश      सिन्धिया घाट सी के 7/158

काशीखण्डोक्त काशी के ज्ञात शिव लिंग

क्रमांक  शिव लिंग      काशीखण्ड-श्लोक     वाराणसी में अवस्थिति

1.     अगस्तीश्वर     61.177; 100.81       अगस्तकुण्डा मुहल्ला, गोदौलिया, डी 36/11

2.     अघोरेश्वर       17.87  कामेश्वर, ए 2/21 वृक्ष तले मढ़ी में

3.     आग्नेयेश्वर     17.120 निकटस्थ स्वर्लीनेश्वर, ए 12/2

4.     अग्नीधर्मीश्वर    100.63 जागेश्वर मठ में, ईश्वरगंगी,जे 66/4

5.     अग्नीश/अग्नीश्वर 84.73; 79.119;100.85.19;157.9, 161 अग्नीश्वर घाट के समीप, पटनी टोला, सी के 2/1

6.     अग्निवर्णेश्वर    65.14  निकटस्थ स्वर्लीनेश्वर, ए 12/2

7.     ऐरावतेश्वर      67.179; 97.134       वृद्धकाल मंदिर परिसर में,के 52/39

8.     ऐश्वर्येश 81.87-8       कचौड़ी गली के 34/60 दुर्मुख विनायक के समक्ष

9.     अमरेश  69.118 लोलार्क-कुण्ड, सीढ़ियों पर,बी 2/20

10.    अम्बरीश 77.69  केदार मंदिर परिसर, बी 6/102, संप्रति लुप्त

11.    अम्बिकेश्वर     67.219 रत्नेश्वर के समीप, वृद्धकाल मार्ग पर के 53/38

12.    अमृतेश/अमृतेश्वर 73.45; 94.1; 100.32.70.53; 94.14-9   स्वर्गद्वारी नीलकण्ठ,सी के 33/28

13.    अंगारकेशान     17.15  ऋणामोचन तालाब के दक्षिण, सम्प्रति लुप्त

14.    अंगारकेश्वर     17.12  मुक्तकुण्ड के समीप, सम्प्रति लुप्त

15.    अंगारेश अंगारेश्वर 86.103.17.21;84.74   आत्मावीरेश्वर मंदिर दालान में,सी के 7/158

16.    अंगिरसेश अंगिरशेश्वर    97.249.18.20  जंगमबाड़ी रोड, डी 35/79; एवं स्वर्गद्वारी, सी के 10/16

17.    अंतकेश्वर       68.69-70; 97.132     वृद्धकाल मंदिर परिसर,के 52/39

 18.    आनुसूयेश्वर     97.21  नारद घाट, दत्तात्रेय मठ,डी 25/11

19.    आपस्तम्बेश्वर   97.157 मध्यमेश्वर में बूढ़े बाबा,के 53/116

20.    अप्सरेश्वर      66.3; 100.92  राधाकृष्ण धर्मशाला, सी के 30/1

21.    आषाढ़ीश आषाढ़ीश्वर     100.64.55.27;97.177 काशीपुरा, रानी भवानी कोठी, के 63/53; एवं मच्छरहहा फाटक, गोविन्दपुरा सी के 54/24

22.    अश्वतरेश       97.203 गोमठ, ब्रह्मनाल, सी के 8/14 ए

23.    आश्विनेयेश्वर    97.44  गंगामहल के निकट,सी के 2/26

24.    अत्रीश्वर 18.14; 97.12  कोदई चौकी, डी 50/33, अब नारद घाट, दत्तात्रेय मठ,डी 25/11

25.    अट्टहास 97.30, 32-3   काश्मीरीमल हवेली, शीतला के निकट सी के 7/92

26.    अवधूतेश्वर      97.181 निकटस्थ पशुपतेश्वर,सी के 13/85

27.    अविमुक्त       39.75; 64.116; 73.35  विश्वनाथ मंदिर, सी के 35/19 कचहरी का दक्षिण भाग

28.    अविमुक्तेश अविमुक्तेश्वर 39.90-7; 40.1-3.61.117; 100.16.10.93; 39.76; 39.80-6; 55.4; 61.116; 100.47, 94 (1) ज्ञानवापी दक्षिण फाटक-केवल स्थान पूजा; (2) राधाकृष्ण धर्मशाला, ज्ञानवापी सी के 30/1; (3) मणिकर्णिका रोड, सी के 10/22 ए, ब्रह्मनालेश्वर में

29.    अविमुक्तेश्वरेश्वर 79.92  विश्वनाथ मंदिर परिसर सी के 35/19 दक्षिणी दिशा

30.    अयोगंधेश्वर     69.20  पुष्कर तालाब, असि, मुमुक्षु भवन से पूर्व की ओर

31.    बालचन्द्रेश      97.121-3      प्राचीन तालकर्णेश्वर औसानगंज, के 56/114

32.    बलीश  97.37  वृद्धकाल मंदिर परिसर,के 52/39

33.    बन्दीश्वर 97.136 बालीश रूप में, वृद्धकाल मंदिर परिसर, के 52/39

34.    बाणेश/बाणेश्वर   97.38, 206.33.139; 53.80; 69.92  (1) प्रहलाद घाट पंचाग्नि अखाड़ा, के 11/30; (2) सुखलाल शाह मुहाल सी के 13/17

35.    भद्रकर्णेश्वर     69.105 रामेश्वर के समीप, भुईली ग्राम, पँचक्रोशी मार्ग

36.    भद्रेश/भद्रेश्वर    97.238.97.47-8       प्राचीन भदऊँ, पटनी टोला, सी के 2/4

37.    भागीरथीश्वर     61.158 स्वर्गद्वारी मणिकर्णिका गली,सी के 11/11

38.    भैरवेश  97.141 काल भैरव का पश्चिमी कोना, के 32/7

39.    भारभूत/भारभूतेश/भारभूतेश्वर     74-45.55.27.10.91; 55.13-4; 69.158; 100.64  राजादरवाजा गली, गोबिन्दपुरासी के 54/44

40.    भारद्वाजेश्वर    65.9   वशिष्ठ-वामदेव मन्दिर परिसर, संकठा घाट, सी के 7/161

41.    भस्मगात्र       69.121-2      काशी करवट से दक्षिण,सी के 31/15

42.    भवानीश 10.96  भवानीश्वर रूप में, अन्नपूर्णा मंदिर के समीप, राम मंदिर, डी 8/38

43.    भव/भवेश्वर     69.99.69.100  भीमचण्डी के समीप, मंदिर परिसर में

44.    भीमेश/भीमेश्वर  69.122.69.119-20; 70.72     भीमेश्वर, काशी करवट,सी के 31/12

45.    भीष्मेश 75.78  (1) त्रिलोचन घाट, तट के पास मढ़ी में (2) विश्वनाथ मन्दिर में, शनैचरेश्वर, सी एच 35/19, वृहस्पति

46.    भृंगीश्वर 33.129 धनवन्तरीश्वर, वृद्धकाल मंदिर,के 52/39

47.    भूर्भुवः  69.148 भूतभैरव, के 63/26; (गणाधिप, विलुप्त)

48.    भूतधात्रीश      74.51  सुखलाल शाह फाटक,सी के 13/15

49.    भूतीश  97.176 (1) भूतेश्वर, दशाश्वमेध, डी 17/50; (2) काशीपुरा, रानी बेतिया मंदिर, आषाढ़ीश्वर

50.    ब्रह्मेश/ब्रह्मेश्वर  10.90; 70.32; 73.46; 74.45; 97.239; 242.52.73, 96, 99; 83.97; 100.81 (1) ब्रह्मा घाट के 22/82; (2) बालमुकुन्द चौहट्टा, खालिसपुरा,  डी 33/66;

51.    ब्रह्मीश 100.89 शकरकंद गली, डी 7/6

52.    बृहस्पतीश्वर या विभाण्डेश्वर      10.90; 17.59, 61, 64; 97.95   आत्मावीरेश्वर मंदिर के समक्ष, सिंधिया घाट, सी के 7/133

53.    बुधेश्वर  15.48, 50, 67  आत्मावीरेश्वर मंदिर, सी के 7/158

54.    चण्डीश/चण्डीश्वर 69.57-8; 73.47.97.169; 100.90       कालिका गली, डी 8/27

55.    चन्द्र   86.108 सिंधिया घाट के समीप सिद्धेश्वरी मंदिर में, सी के 7/124

56.    चन्द्रेश/चन्द्रेश्वर  10.87; 14.25; 69.107; 100.45, 85.14.38, 41, 46, 49, 56, 59, 66, 69, 76; 15.67; 17.62; 73.33; 79.105; 84.76; 97.38, 116 सिंधिया घाट के समीप, सिद्धेश्वरी मंदिर में, सी के 7/124

57.    चतुः समुद्रकूप   97.168 कुँआ में काशीपुरा मार्ग, के 63/46

58.    चतुर्मुखेश चतुर्मुखेश्वर    55.10.55.9    (1) वृद्धकाल में, के 52/39; (2) प्रयाग लिंग आदि केशव, ए 37/51

59.    चतुर्वक्त्रेश्वर     100.89 शकरकंद गली, डी 7/19

60.    छागलेश 53.128 पितृकुण्डा, सी 18/52

61.    चित्रगुप्तेश्वर     70.38-9; 97.200, 202; 100.84 मच्छरहट्टा फाटक, सी के 57/77

62.    चित्रांगदेश्वर/ चित्रांगेश 70.43;77.76, 72.97.249      क्षेमेश्वर घाट के समीप, कुमारस्वामी मठ, बी 14/118

63.    दाक्षायणीश्वर    67.218 सतीश्वर, वृद्धकाल मार्ग, के 46/32

64.    दक्षेश/दक्षेश्वर    97.131; 100.49; 87.4-5; 89.134, 137- 9; 94.36; 97.129; 100.30  वृद्धकाल कूप से उत्तर, विशाल लिंग; के 52/39

65.    दमनेश  97.87  द्वार पर, मढ़ी में मकरेश्वर

66.    दण्डी/दण्डीश्वर   69.101.69.103 आदि केशव, ए 37/51

67.    दशहरेश्वर      52.95  शीतला मंदिर, दशाश्वमेध घाट, डी 18/19

68.    दशाश्वमेधेश     52.71, 91-2   शीतला मंदिर, दशाश्वमेध घाट, डी 18/19

69.    दत्तात्रेयेश्वर     33.142; 61.13; 97.233 (1) आदि केशव मंदिर द्वार के बाहर, ए 37/51; (2) ब्रह्मा घाट, के 18/48; (3) अगस्तकुण्डा, अगस्तीश्वर मंदिर, डी 36/11

70.    देहलिविघ्नेश    57.72  देहली विनायक मंदिर, पँचक्रोशी मार्ग

71.    देवादेव  69.11  ढुण्ढीराज गली, संन्यासी मार्ग, सी के 37/12

72.    देवालेश्वर       97.171 सप्तसागर, भूतभैरव, के 63/30

73.    देवयानीश्वर     97.227 नकुलीश्वर रूप में, अक्षय वट के जड़ में, सी के 35/20

74.    धन्वन्तरीश्वर    97.137 वृद्धकाल मंदिर में, के 52/39

75.    धर्मेश/धर्मेश्वर   10.89; 73.33; 81.15, 23, 31, 44-6; 83.101; 86.109; 100.28, 88.69.37; 78.47, 52-3, 55; 79.25; 803; 81.47, 74-7; 100.46   (1) मीरघाट, धर्मकूप, डी 2/21 (2) कामेश्वर से दक्षिण, ए2/9, लुप्त

76.    धौतपापेश्वर     33.156 पंचगंगा घाट, दालान में

77.    धु्रवकुण्ड/धु्रवेश/धु्रवेश्वर 97.234.97.236;      21.128; 97.234    कोदई की चौकी, सनातन धर्म कॉलेज परिसर में, डी 49/10

78.    दिलीपेश 97.242 देवनाथपुरा, शिवाला

79.    दिवोदासेश्वर     58.214 मीरघाट, धर्मकूप, विश्वभुजा गौरी मन्दिर में, डी 2/15

80.    द्रमिचण्डेश्वर    53.124 जैतपुरा, नागकुआँ से दक्षिण, ‘मल्लू हलवाई का मन्दिर’ जे 11/14

81.    दुर्वासेश 97.177 कामेश्वर मंदिर परिसर, ए 2/9

82.    दुर्वासेश्वर       85.74  रानी बेतिया मंदिर में, आषाढ़ीश्वर के समीप

83.    द्वारेश्वर 97.256 दुर्गा मंदिर के दक्षिण, दुर्गाकुण्ड, बी 27/1

84.    गभस्तीश/ गभस्तीश्वर     33.154; 84.61; 97.183, 185-6, 193; 100.50.49.27; 49.77-9   पंचगंगा घाट मंगलागौरी मंदिर परिसर, के 24/34

85.    गणाध्यक्ष       69.128-9; 97.58      भटौली ग्राम, पँचक्रोशी मार्ग

86.    गन्धर्वेश्वर      66.21-3       नागकुण्ड से पश्चिम (भीरन सागर) कुण्ड के समीप, सम्प्रति लुप्त

87.    गणेश्वर गणेश्वरेश्वर      10.88.97.231  चौखण्डी ग्राम, पँचक्रोशी मार्ग

88.    गंगेश गंगेश्वर   10.91;97.207; 100.31, 50, 93.19.1, 5-7, 10-1  ज्ञानवापी, पीपल के नीचे, सी के 35/1

89.    गर्गेश   97.87  श्रमोदक कूप से पूर्व, सम्प्रति लुप्त

90.    गरुड़ेश गरुडेश्वर  10.88; 83.96 50.142  (1) कामेश्वर, खखोलादित्य के लघु-मंदिर में, ए 2/9; (2) जंगमबाड़ी, तेलियाना, डी 31/39 ए

91.    गौतमेश्वर      97.238 गोदौलिया, काशी नरेश शिवाला, डी 37/33

92.    घण्टकर्णेश्वर 53.33  कर्णघण्टा, के 60/66

93.    गोकर्ण/गोकर्णेश/गोकर्णेश्वर      74.45.10.88; 53.81; 97.233.53.82;

100.83 दयालु गली, कोदई की चौकी, डी 50/34 ए

94.    गोप्रेक्ष   100.55; 73.60; 97.9. 11, 13, 21, 24   गोपी गोविन्द मंदिर में, लाल घाट, ए 4/24

95.    ग्रहेश   97.201 काल भैरव, दण्डपाणि गली, के 31/50

96.    हलीशेश 97.140 धन्वन्तरीश्वर के निकट, जे 30/22

97.    हनुमदीश्वर      97.43  नीचे की ओर, हनुमान घाट मढ़ी में, बी 5/19

98.    हरिकेशेश/हरिकेशेश्वर      97.233.10.95  जंगमबाड़ी, खारी कुँआ, डी 7/166

99.    हरिश्चन्द्र/हरिश्चन्द्रेश/हरिश्चन्द्रेश्वर    100.86.97.248.10.95; 61.78; 69.80   (1) संकठा घाट, सी के 7/166; (2) पातालेश्वर के समीप, डी 32/118

100.   हस्तिपालेश्वर    97.133 वृद्धकाल मंदिर परिसर, के 52/39

101.   हाटकेश/हाटकेश्वर       69.149, 69.151.100.83       (1) दालमण्डी गुदड़ी बाजार, सी के 43/189 (2) हड़हा सराय, सी के 43/189

102.   हेतुकेश  97.174 हड़हा तालाब, सम्प्रति लुप्त

103.   हिरण्यगर्भ / हिरण्यगर्भेश     73.60.100.54  त्रिलोचन घाट के समीप, मढ़ी मे

104.   हुण्डेश  66.32  (1) शैलपुत्री, वरणा तट, मढ़िया घाट, ए 40/11; (2) धूपचण्डी देवी मंदिर, पिछवाड़े में, जे 12/134

105.   इन्द्रद्युम्नेश्वर   77.70; 84.68  कूचबिहार, कालीबाड़ी के पिछवाड़े में, बी 13/98

106.   इन्द्रेश/इन्द्रेश्वर   10.95; 70.28; 97.117.81.41-3 (1) निकट करकोटकवापी (नाग कूप) सम्प्रति लुप्त; (2) तारकेश्वर के समीप, मणिकर्णिका घाट, पीपल के नीचे

107.   ईशान/ईशानेश/ईशानेश्वर     10.88; 73.60; 100.55.14.6-7, 9-11; 69.94; 97.214; 100.89.69.93     (1) कोतवालपुरा (सिनेमा के समीप), सी के 37/43 (2) दानेश्वर, प्रह्लाद घाट

108.   जैगीषव्यगुहालिंग 97.170 जैगीषव्य गुहा के द्वार पर, जागेश्वर मठ जे 66/3

109.   जैगिषव्येश्वर    10.87; 63.80, 85      (1) ईश्वरगंगी, नरहरिपुरा, जे 66/4; (2) सप्तसागर, भूतभैरव के 63/28

110.   जललिंग 69.161 मणिकर्णिका के समीप, जलशायी घाट जल में अदृश्य

111.   जमदग्नीश्वर    97.141 काल भैरव से पूर्व, के 32/57

112.   जम्बुकेश जम्बूकेश्वर     10.87; 73.61; 97.159; 100.60’ 65.19  (1) लोहटिया बड़े गणेश में, के 58/103 (2) बड़े गणेश, के 58/103

113.   जनकेश 68.70; 97.253 (1) वृद्धकाल, के 52/39; (2) संकठा मंदिर के अन्दर संकठाजी के समीप, सी के 7/159

114.   जाँगलेश 97.258 (1) दुर्गा मंदिर में, दुर्गा कुण्ड, बी 27/1 (2) मुकुट कुण्डा, नबाबगंज

115.   जराहरलिंग      97.204 बागीश्वर, जैतपुरा, जे 6/85

116.   जरासंधेश/जरासंधेश्वर     83.103.97.240; 100.80    त्रिपुरभैरवी, दीवार में डी 5/101 (लुप्तः डी 3/79)

117.   जटी, जटीश्वर    69.78  पातालेश्वर नाम से, घर के दरवाजे पर, डी 32/17

118.   जयन्त/जयन्तेश  69.72.97.135  (1) मृत्युंजय मंदिर से उत्तर, वृद्धकाल, के 52/39; (2) भूत भैरव, के 63/27

119.   ज्ञानेश/ज्ञानेश्वर   61.141; 73.45.81.47; 84.58   लाहौरी टोला, डी 1/32

120.   ज्येष्ठ/ज्येष्ठेश/ ज्येष्ठेश्वर      73.61’ 13.29, 10.87; 65.2, 82.63.10-3, 20/65.1, 37, 44; 66.1-2, 7, 164; 17.166       भूत भैरव, सप्तसागर, काशीपुरा, के 62/44

121.   ज्योर्तिरूपेश्वर    73.47; 94.30-1, 34    भूत भैरव, सप्तसागर, काशीपुरा, के 62/44

122.   कचेश   97.228 शुक्रेश्वर में लघु-लिंग, कालिका गली, डी 8/20

123.   कहोलेश 65.18; 97.256 (1) शुक्रेश्वर में लघु-लिंग, कालिका गली, डी 8/30; (2) कमच्छा देवी मंदिर से उत्तर कोल्हुआ, बी 21/12

124.   काल कालकेश   97.221; 97.201       हनुमान घाट, बी 4/44

125.   कालंजरेश्वर     77.71  क्षेमेश्वर घाट, कुमारस्वामी मठ, बी 14/10

126   कालराज        31.150; 67.164; 69.107; 97.199      दण्डपाणि गली, काल भैरव, के 31/49

127.   कलशेश/कलशेश्वर       97.201.10.86; 61.193; 84.75; 100.85  कालशेश्वर की ब्रह्मपुरी फाटक, सी के 7/101

128.   कालेश/कालेश्वर  10.86; 53.58; 97.129.53.57   (1) वृद्धकाल में, वृद्धकालेश्वर के 52/39 (2) काल भैरव के समीप, दण्डपाणि मंदिर में, के 31/49

129.   कम्बलाश्वतरेश   61.81  गोमठ, काकाराम गली, सी के 8/18 ए

130.   कम्बलेश 97.203 गोमठ, ब्रह्मनाल, सी के 8/14 ए

131.   कामेश/कामेश्वर  10.87; 73.34; 85.78; 86.109; 97.96; 100.29.33.122; 69.23; 85.75-6; 97.97; 100.46   (1) मच्छोदरी, कामेश्वर, ए 2/9; (2) घासी टोला, गली के नुक्कड़ पर, के 30/1

132.   कन्दुकेश कन्दुकेश्वर     10.96; 65.38-43, 85; 100.24’ 65.37   सप्तसागर, भूतभैरव, के 63/29

133.   कपालेश/कपालीश 97.65, 108.69.112    लाट भैरव तालाब, ए 17/123

134.   कपर्दीश/कपर्दीश्वर       10.96; 54.1; 5, 56, 79-80; 55.2; 69.68.69.67  जनसा ग्राम, पँचक्रोशी मार्ग

135.   कपिलेश/कपिलेश्वर      33.158; 73.157; 97.217.73.158; 83.67; 97.77; 97.82-3       (1) कपिलेश्वर गली, दूध विनायक, के 23/14; (2) निकुम्भ के समीप, गड्ढे में, विश्वनाथ मंदिर में, सी के 35/19

136.   करन्धमेश्वर     97.252 निकटस्थ लोलार्क कुण्ड, चामुण्डा, बी 2/17

137.   करवीरेश्वर      97.115 लक्ष्मी कुण्ड, डी 52/41

138.   कर्कोटकेश्वर कर्कोटकेश    66.23; 97.117.66.26  नाग कुण्ड की सीड़ियों पर, जे 23/206

139.   करुणेश्वर करुणेश 73.45; 94.20-8.97.223; 100.88       (1) लाहौरी टोला, ललिता घाट, फूटे गणेश सी के 34/10; (2) वर्णेश्वर, ढुण्ढिराज गली,

सी के 36/10

140.   कश्यपेश 100.82 जंगमबाड़ी मार्ग, डी 35/79

141.   कात्यायन कात्यायनेश/कात्यायनेश्वर    97.258.68.66.65.12   सिंधिया घाट के समीप, आत्मावीरेश्वर मंदिर में, सी के 7/158

142.   केदार/केदारेश    55.8; 73.33; 77.1-5, 25, 46, 60, 62-7; 86.109; 97.250; 100.27, 45.10.87; 77.9-10     (1) केदार घाट, बी 6/102; हरि-हर रूप (2) कालिका गली, कालीजी, डी 8/17 (3) अगस्तकुण्डा, अगस्तेश्वर, डी 36/11; (4) सिंधिया घाट, बृहस्पतीश्वर में, सी के 7/133

143.   कीकसेश्वर      100.83 हड़हा सराय, सी के 48/45

144.   किरणेश्वर       33.155 मंगलागौरी, गली में, के 23/83

145.   किरातेश 55.8; 69.157-8 (1) भारभूतेश्वर, गुप्तेश्वर के नाम से, सी के 52/15 (2) निकटस्थ जयंतेश्वर, लाली घाट

146.   कोटीश/कोटीश्वर  96.63-4.97.62 (1) त्रिलोचन मंदिर में पुनः स्थापित, ए 2/80; (2) साक्षी विनायक, डी 10/49

147.   क्रत्वीश्वर       18.21  (1) कोनिया घाट, वरणा पार, पीपल तले; (2) ज्ञानविनायक, सीढ़ियों पर सी के 33/36

148.   कृष्णेश  97.34  संकठा की दीवार में हरिश्चन्द्रेश्वर के समक्ष, सी के 7/159

149. कृत्तिवास/कृत्तिवासस्/कृत्तिवासेश्वर    24.81; 69.59, 62, 72; 69.3; 100.45.68.67-8; 69.55; 73.32; 86.108; 100.25.10.86; 33.166-7; 68.29, 34-5, 38-45, 49, 60, 84-5    वृद्धकाल मार्ग पर, दारानगर,के 46/23

150.   क्षमेश/क्षमेश्वर   97.249.77.72  क्षेमेश्वर घाट, कुमार स्वामी मठ, बी 14/12

151.   कुबेरेश/कुबेरेश्वर  55.11.13.162-3       (1) विश्वनाथ के प्रागंण में उत्तर के ओर (2) अन्नपूर्णा मंदिर में, पूर्वोत्तर में

152.   कुब्जाम्बरेश्वर    70.60  पितामहेश्वर में, सी के 7/92

153.   कुक्कुटेश/कुक्कुटेश्वर      66.4.53.59; 69.75     (1) राणा महल, वक्रतुण्ड विनायक, डी 21/22. (2) काल भैरव, दण्डपाणि भैरव, के 31/49. (3) दुर्गा मंदिर द्वारा से दक्षिण, दुर्गा कुण्ड, बी 27/1.

154.   कुण्डेश/कुण्डेश्वर  97.105-6.53.78-9     असि घाट (पुनः स्थापित); लोलार्क कुण्ड के ऊपरी हिस्से में

155.   कुन्तीश्वर       97.18-9       कोनिया घाट, वरणा पार

156.   कुष्माण्डेश      97.206 स्वर्गद्वारी सी के 10/16

157.   लक्ष्मीश 97.113 लक्ष्मी कुण्ड, (सोरहियानाथा), डी 52/54

158.   लाँगलीश/लाँगलीश्वर      10.93; 55.21; 97, 214; 100.64, 91.50.20      खोवा बाजार, सी के 28/4

159.   लोमशेश 68.67  वृद्धकाल मंदिर में, के 52/59, लोमलेश

160.   मदालसेश्वर     97.230; 100.655      मदालसेश्वर, इंग्लिशिया लाईन, कालिका गली, डी 5/133

161.   मध्यमेश/मध्यमेश्वर      97.149.153-4.10.90; 67.177-8; 73.60; 97.151; 100.54 दारा नगर, मध्यमेश्वर, के 53/63

162.   (आदि) महादेव  10.96; 51.21; 55.12; 69.27-35, 117; 73.32; 74.120; 79.99; 86.180; 97.7, 9, 26; 100.45       आदि महादेव, त्रिलोचन, ए 3/92

163.   महाकाल/महाकालेश/महाकालेश्वर     69.20; 97.131.97.131.53.29; 100.39, 93      (1) महामृत्युंजय, वृद्धकाल मंदिर, के 52/39 (2) काल भैरव से पूर्व दिशा में, के 32/24 (3) ज्ञानवापी मण्डप के दक्षिण-पूर्व कोने में, पीपल के नीचे

164.   महालक्ष्मीश्वर    10.91; 69.124; 97.109 लक्ष्मीकुण्ड, (सोरहियानाथ), डी 52/54

165.   महामुण्डेश्वर     97.69  वागीश्वरी मंदिर, जैतपुरा, जे 6/63

166.   महानादेश्वर     69.22  आदि महादेव, ए 3/92

167.   महापशुपतेश    97.213 (नेपाल के) पशुपतिनाथ रूप में, ललिता घाट, डी 1/67

168.   महासिद्धीश्वर    97.254 कुरुक्षेत्र के समीप, असि, बी 2/282

169.   महेश/महेश्वर    100.94.41.70; 69.130; 70.30; 73.47; 100.38  (1) तट पर खुले में मणिकर्णिका घाट (2) ज्ञानवापी मण्डप के दक्षिण-पूर्व कोने में

170.   मालतीश/मालतीश्वर      68.68.97.135  मृत्यंजय मंदिर, वृद्धकाल, के 52/39

171.   मनः प्रकामेश/मनः प्रकामेश्वर  100.89.100.65 साक्षी विनायक, विश्वनाथ गली, डी 10/50

172.   मणिकर्णिका     100.79 मणिकर्णिका का घाट, खुले में

173.   मणिकर्णेश/मणिकर्णिकीश/मणिकर्णिकीश्वर/मणिकर्णीश/मणिकर्णीश्वर    12.97.61.104.61.105.10.92; 73.35; 74.45; 97.204.61.112; 86, 109; 100.46   मणिकर्णीश्वर, गोमठ आश्रम, ब्रह्मनाल सी के 8/12

174.   मरीचीश्वर      18.17  नागकुँआ, मरीचि कुण्ड, मीरसागर, डी 25/11

175.   मार्कण्ड/मार्कण्डेयेश/मार्कण्डेयेश्वर    10.92.100.92.61.165.170     ढुण्ढिराज गली, बाजार, सी के 36/10

176.   मरुकेश्वर       69.159 नैऋत्यीश्वर नाम से, पुष्पदंतेश्वर के समीप, देवनाथपुरा, डी 32/102

177.   मातृश्वर 18.16  पितृकुण्डा, मातृकुण्ड तट पर, सम्प्रति लुप्त

178.   मयूरेश मयूरेश्वर 53.80.53.79   असि घाट, बी 2/175

179.   मोक्षद्वारेश्वर    73.46; 94.20; 94.29   ललिता घाट के समीप, सी के 34/10

180.   मोक्षेश/मोक्षेश्वर  10.91; 97.223; 100.94’ 61.115 ज्ञानवापी मस्ज़िद के पश्चिम (लुप्त)

181.   मृत्य्वीश 97.129 महामृत्युंजय, के 52/39

182.   मुचुकुन्देश      97.238 बड़ादेव नाम से, गौदौलिया, डी 37/40

183.   मुखप्रक्षेश्वर     97.188 मंगला गौरी मंदिर के समीप के 24/34

184.   मुक्तेश्वर       97.258 (1) गोवा बाई पोखरा, मंदिर, बी 27/20; (2) पार्क के समीप, तिलभाण्डेश्वर, बी 17/99

185.   मुण्डेश  66.23  (1) शैलपुत्री, वरणा तट, मढ़िया घाट, ए 40/11 ; (2) धूपचण्डी देवी मंदिर, पिछवाड़े, जे 12/134

186.   नादेश/नादेश्वर   73.164; 97.80.73.156, 159, 74.104   अकारेश्वर, पीपल के तले पड़ा लिंग

187.   नागेश्वर 100.86 (1) भोंसला घाट, सी के 1/21; (2) जल में लिंग, नाग कुण्ड, जे 23/206

188.   नहुषेश  97.239.       रामेश्वर मंदिर, पँचक्रोशी मार्ग

189.   नैऋतेश/नैऋतेश्वर       97.249.69.160 पुष्पदंतेश्वर से पश्चिम, डी 32/107, मारूकेश्वर नाम से प्रचलित

190.   नक्षत्रेश्वर 15.9, 16, 19   आदि केशव, ए 37/51

191.   नकुलीश/नकुलीश्वर      97.217.69.116, 120; 100.63, 91      विश्वनाथ अक्षयवट मंदिर में, सी के 35/20

192.   नलकूबरलिंग    70.58, 60; 97.97-9    मणिकर्णीश्वर के समीप, पितामहेश्वर में, सी के 7/92

193.   नन्दीश्वर/नन्दीकेश       97.29.10.89; 73.47; 100.39, 93       (1) राजा-नदेश्वर कोठी, मलदहिया, एस 18/240; (2) ज्ञानवापी से पूर्व, वृहदाकार वृषभ

194.   नारदेश्वर 97.56-7       नारद प्लाट, तैलंग मठ, डी 25/12

195.   नर्मदेश/नर्मदेश्वर       61.172; 75.11; 92.1, 27, 30; 93.1; 100.31, 50.10.91; 92.24   त्रिलोचन मंदिर से पूर्व, ए 2/19

196.   निकुम्भेश/निकुम्भेश्वर     97.225-6.55.11       विश्वनाथ मंदिर में, पार्वती मंदिर में, सी के 35/19

197.   नीलकण्ठ/नीलकण्ठेश्वर    69.59-60; 77.98.61.197      (1) भेलूपुरा, बी 20/15; (2) ब्रह्मनाल, नीलकण्ठ, मणिकर्णिका मार्ग, सी के 33/23

198.   निष्कलंकेश     100.92 ढुण्ढिराज गली, बाजार, सी के 35/34

199.   निष्पापेश्वर     83.82  गौरी कुण्ड के समीप, केदार घाट, तट के समीप

200.   निवासेश/निवासेश्वर      10.89; 63.16-7; 97.167.’ 73.61 भूत भैरव, के 63/27

201.   ओंकार/ओंकारनाथ/ओंकारेश 33.118; 73.73-6. ओंकारेश्वर 73.147, 155, 162-3;74.106-7   61.189, 167; 73.32, 166-71, 174-6; 74.58, 74, 80, 82, 95, 100, 117-8, 121; 75.24, 60; 76.156; 86.108; 87.2; 94.36; 100.26-7, 44 ओंकारेश्वर, पठानी टोला, टीला, ए 33/23 अन्य सम्बद्ध लिंगः अकारेश्वर तथा मकारेश्वर, उकारेश्वर तथा बिंदु विलुप्त

202.   पंचनादेश्वर      97.191 तैलंग मठ के समीप, विंदु माधव की ओर, के 22/11

203.   पंचपाण्डव       97.198 पंच-पांडव, खोवा बाजार, सी के 28/10

204.   पापनाशन       97.204 पोखरे के ऊपरी भाग में, ए 34/34

205.   परद्रव्येश्वर      100.91 ढुण्ढिराज गली, बाजार, सी के 35/34

206.   परान्नेश 100.91 ढुण्ढिराज गली, बाजार, सी के 35/34

207.   पराशरेश्वर      65.2, 84      (1) भदैनी, लोलार्क, बी 2/21 (2) कर्णघण्टा तालाब, व्यासेश्वर के दक्षिण, के 60/66, सम्प्रति जल में

208.   पर्वतेश/पर्वतेश्वर  10.90; 100.80.61.78  सिंधिया घाट, सी के 7/156

209.   पार्वतीश/पार्वतीश्वर      90.1, 21-5; 91.1; 100.31, 49.33.128; 69.49   त्रिलोचन, आदि महादेव मंदिर, ए 3/92

210.   पशुपति/पशुपतिश्वर     10.90; 69.110-1, 114; 70.53; 77.14, 16.’ 61.106.97.181.’ 97.93; 100.49, 84  (1) मलदहिया, सी के 30/40, लोहा मण्डी में; (2) पाशुपतेश्वर गली, नन्दन साहू लेन, सी के 13/66; (3) ललिता घाट, डी 1/68, नेपाल नरेश द्वारा स्थापित

211.   पवनेश्वर 13.4   भूतभैरव, के 63/14

212.   पिप्लेश्वर       84.64  बिंदुमाधव मंदिर के समीप, पीपल तले

213.   पिशाचेश 97.235 पिशाचमोचन, कुण्ड के समीप, सी 21/40

214.   पितामह/पितामहेश/पितामहेश्वर     97.205.66.6.61.150, 192; 66.5; 69.36, 38; 100.85    किशनलाल याज्ञिक का मकान, शीतला गली, सी के 7/92, (प्रपितामहेश्वर के साथ)

215.   पितृीश/पितृीश्वर 54.2; 97.235.53.128  पितरकुण्ड, सी 18/47

216.   प्रह्लादेश्वर      97.35  प्रह्लादघाट, ए 10/81

217.   प्रणव/प्रणवेश/प्रणवेश्वर 69.19.73.161, 172.74.108, 119       त्रिलोचन घाट, हिरण्यगर्भेश्वर

218.   प्रपितामहालिंग   70.56, 58     किशनलाल याज्ञिक का मकान, शीतला गली सी के 7/92, (प्रपितामहेश्वर नाम से)

219.   प्रतिग्रहेश्वर      100.92 ढुण्ढ़िराज गली, बाजार, सी के 34/35

220.   प्रयाग/प्रयागेश/प्रयागेश्वर       97.17,61.36, 39, 44.61.203 (1) संगमेश्वर, आदि केशव, चतुर्मख (2) शूलटंकेश्वर, दशाश्वमेध ब्रह्मेश्वर के रूप में; (3) मढ़िया और ककरहा घाट के मध्य पुनः स्थापित (4) दशाश्वमेध, बंदी देवी, डी 17/100

221.   प्रीतिकेश/प्रीतिकेश्वर      97.218; 100.65.10.89  साक्षी विनायक के पिछवाड़े, डी 10/8

222.   पृथ्वीश्वर 83.74  साक्षी विनायक के पिछवाड़े, डी 10/8

223.   पुलहेश  18.99  पुलस्त्येश्वर के समक्ष, सी के 10/16, चबूतरे पर

224.   पुलस्तीश्वर/पुलस्त्येश      61.188.18.99  (1) जंगमबाड़ी मठ, द्वार पर, डी 32/102 (2) जवविनायक, स्वर्गद्वारी, सुरेका भवन, सी के 33/43

225.   पुष्पदंतेश्वर     97.246-7      बंगाली टोला, देवनाथपुरा, डी 35/77

226.   राजराजेश       100.90 (1) घुघुराली गली रोड, सी के 39/57; (2) ढुण्ढिराज गली, बाजार, सी के 35/33; (3) स्वर्गद्वारी, चबूतरे के नीचे, सी के 10/16

227.   रत्नेश/रत्नेश्वर   67.28-32, 164-5, 194-5, 200, 203; 73.33; 86.108; 93.38; 100.25, 45.’ 10.92; 33.165; 66.148; 67.1, 3, 17-8, 36, 43-4, 46, 51, 54, 61, 63, 130, 137, 150, 161, 184-5, 211-7, 221-3; 79.96   वृद्धकाल के मार्ग पर, के 53/40

228.   रेवतेश/रेवतेश्वर  97.194.97.190 बिन्दुमाधव घाट की सीढ़ियों पर, लघु शिव मंदिर में

229.   रूद्रेश/रूद्रेश्वर    97.89.69.90-1; 97.91  त्रिपुर भैरवी मंदिर के समीप, डी 5/21

230.   षड़ानन  67.220 आदि महादेव मंदिर परिसर, ए 3/92

231.   सागरेश/सागरेश्वर 83.64; 97.41  (1) संकठा मंदिर परिसर में, सी के 7/159; (2) संकठा मंदिर से पूर्व दिशा में, सप्तर्षि मंदिर के समीप

232.   शैलेश/शैलेश्वर   66.142-8, 149; 73.60; 94.37; 97.62; 100.52.33.135; 66.124; 67.7; 69.86; 70.37; 100.25       मढ़िया घाट, वरणा नदी तट पर, ए 40/11

233.   शक्रेश   97.210, 213   इन्द्रेश्वर नाम से प्रचलित, मणिकर्णिका घाट के ऊपरी भाग में

234.   शालकटंकट     69.61  मंडुवाडीह बाजार, ककरमत्ता तालाब के पास

235.   संगमेश्वर       70.77  (1) असि घाट के समीप; (2) आदि केशव, नीचे की ओर, ए 37/51

236.   शंकुकर्ण 69.44  शंकुधारा के सामने, बी 22/196

237.   समुद्रेश 97.214 बाँसफाटक मार्ग से दक्षिण, सी के 37/32

238.   संवर्तेश  97.198 पंचपांडव, ज्ञानवापी के समीप, सी के 28/10

239.   शनैश्चरेश्वर/शनीश्वर 17.127.10.94  विश्वनाथ मंदिर परिसर, सी के 35/99

240.   संगमेश/संगमेश्वर 61.6; 73.60; 84.2.10.95; 15.9; 97.16; 100.53  (1) असि संगम, असि हरिहर आश्रम, बी 1/169; (2) वरणा संगमः आदि  केशव, नीचे की ओर, ए 37/51

241.   शंकुकर्णेश्वर     53.27-8; 97.86 शंकुधारा, कुण्ड के समीप, बी 22/120

242.   शान्तनवलिंग    75.77  शान्तेश्वर, त्रिलोचन घाट की मढ़िया में

243.   सरस्वतीश्वर     75.9   हिरण्यगर्भेश्वर के समीप, त्रिलोचन घाट

244.   शशिभूषण      69.17  हनुमान घाट, बी 4/44

245.   शतकाल        97.172 ठठेरी बाजार, नीचे की ओर, के 17/24

246.   सतीश्वर 93.1-2, 30, 33, 37-8; 100.32, 50      वृद्धकाल मार्ग, रत्नेश्वर मंदिर, के 46/32

247.   शौनकेश 97.158 बड़े गणेश के समीप, के 58/103, 1822 तक अस्तित्त्व, तदोपरान्त लुप्त

248.   सिद्धयोगीश्वर    14.64  सिद्धेश्वरी मंदिर में, सी के 7/124

249.   सिद्धेश्वर 67.176; 97.164; 97.245       सिद्धेश्वरी मंदिर में, सी के 7/124

250.   सिद्ध्यष्टकेश्वर  67.173 बड़े गणेश में, के 58/103

251.   शिवलिंग 51.65; 53.21; 69.104  सर्वमान्य

252.   स्कन्द/स्कन्देश्वर 61.120.33.125; 69.25; 70.29; 97.26   आदि महादेव के समीप, ए 3/92 विलुप्त

253.   सोमनाथ 100.81 कर्दमेश्वर के समीप, कंदवा, पँचक्रोशी मार्ग पर

254.   सोमेश/सोमेश्वर  97.197.10.95.83.95  (1) मानमंदिर घाट के समीप, डी 16/34, (2) पाण्डेय घाट, डी 25/34, सीढ़ी पर; (3) वागीश्वरी, जैतपुरा, जे 6/85

255.   श्रीकण्ठ  69.65.-6      लक्ष्मीकुण्ड, डी 52/38

256.   स्थाणु   69.7   कुरूक्षेत्र तालाब के समीप, बी 2/247

257.   सुकेश/सुकेश्वर   97.142.53.126 काशी गौशाला के समीप, पश्चिमी द्वार, एक कमरे में के 40/20

258.   शुक्रेश   16.124, 126, 128; 17.128; 61.135; 73.61; 97.227-30.16.128; 100.58 कालिका गली, डी 8/30

259.   सूक्ष्मेश/सूक्ष्मेश्वर 68.69.69.70   धूपचण्डी मंदिर के पीछे, विकटद्विज विनायक समीप, जे 12/134

260.   शूलटंक 69.39  दशाश्वमेध घाट, डी 17/111

261.   सुमुखेश 55.25-6       त्रिलोचन, पादोदक कूप, ए 3/87

262.   शुष्केश्वर 97.253 असि घाट, बी 1/185, काशी आश्रम, शुक्रेश्वर

263.   स्वप्नेश्वर      70.93  शिवाला, हनुमान मंदिर, बी 3/150

264.   स्वर्गद्वारेश्वर    73.46; 94.29  स्वर्गद्वारी, ब्रह्मनाल, सी के 10/16

265.   स्वर्लीन/स्वर्लीनेश्वर     10.95; 69.24; 73.60.84.31    प्रह्लाद घाट, पंचाग्नि अखाड़ा, ए 13/30

266.   स्वर्णकेश 97.224 ढुण्ढिराज गली, दण्डपाणि में, सी के 36/10

267.   स्वयंभूलिंग     69.124 लक्ष्मीकुण्ड, महालक्ष्मीश्वर के समीप, डी 54/114

268.   श्वेतेश  97.198 पंचपांडव मंदिर, ज्ञानवापी, सी के 28/10

269.   तक्षकेश्वर       66.11  औघड़नाथ की तकिया, द्वार के बाहर, के 64/113

270.   तारकेश/तारकेश्वर       53.120; 73.45; 81.41; 97.210; 100.39, 50, 93.10.89; 53.121; 61.119, 121; 69.153-4  (1) ज्ञानवापी, गौरीशंकर की मढ़ी में; (2) विश्वनाथ, गणपत राय खेमका मंदिर, सी के 35/17; (3) मणिकर्णिका घाट; (4) केदार घाट, गंगा तट के समीप

271.   त्रिरेश (=प्राणवेश?)               97.236 आंेकारेश्वर, पठानी टोला, टीला, ए 33/23; अन्य सम्बद्ध अक़ारेश्वर व मकारेश्वर। ऊकारेश्वर और बिन्दु विलुप्त

273.   तिलपर्णेश्वर     53.122; 100.65       दुर्गा मंदिर द्वारा दुर्गाकुण्ड, बी 27/1

274.   त्रिलोचन 100.27; 69.23; 73.2, 6, 32; 75.5, 11-2, 15, 25-9, 32, 38, 57, 64-8, 71; 76.14, 98, 153, 157, 162, 165-8       त्रिलोचन घाट, ऊपरी भाग, ए 2/80

275.   त्रिपुरान्तक      69.73-4; 97.232; 100.64      सिगरा (शिवगिरि/शिवपुरवा) टीला, डी 59/95

276.   त्रिपुरेश  33.138; 69.91 त्रिपुरभैरवी मंदिर, डी 5/24

277.   त्रिसंध्येश/त्रिसंध्येश्वर      10.96; 100.88.61173, 175    (1) लाहौरी टोला, फूटे गणेश, सी के 1/40. (2) ललिता घाट, डी 1/40

278.   त्र्यम्बक 69.79  बड़ादेव, गोदौलिया, त्रिलोकीनाथ, डी 38/21

279.   तुंग/तुगेश्वर     97.140.97.138 (1) वेदेश्वर के समीप, आदि केशव, ए 37/51; (2) धन्वन्तरीश्वर नाम से, वृद्धकाल मंदिर में, के 52/39

280.   त्वष्ट्रीश 97.189 विश्वकर्मेश्वर रूप में, बृहस्पतीश्वर मंदिर, सी के 7/133

281.   उद्दालकेश्वर     70.78; 97.83  (1) लोलार्क कुण्ड, बी 2/20. (2) राजमंदिर, हनुमान मंदिर, के 20/159

282.   उग्र     69.97-8       लोलार्क कुण्ड

283.   उग्रेश्वर  97.113 लक्ष्मीकुण्ड, लक्ष्मी के समीप, डी 52/40

284.   उपशान्तशिव    10.96; 73.61; 97.49; 100.56   अग्नीश्वर घाट, पटनी टोला, सी के 2/4

285.   ऊर्ध्ववरेतस्     69.63-4       फुलवरिया-मंडुवाडीह, कुष्मांड विनायक में

286.   उर्वशीश 100.63 औसानगंज, गोलाबाग, जे 56/108, पीपल के समीप

287.   उटजेश्वर 65.86  गोला दीनानाथ में

288.   उतथ्यवामदेवेश  97.202 संकठा घाट, सप्तर्षि मंदिर, सी के 7/161

289.   वागीश्वर        67.168 जैतपुरा, वागीश्वरी मंदिर में, जे 6/33

290.   वैद्यनाथ 21.126; 97.236; 100.82       वैजनत्था, कमच्छा, बी 37/1

291.   वैद्येश्वर 97.138 कोदई की चौकी, डी 50/20 ए

292.   वैरोचनेश्वर      33.140; 61.184; 97.37 सीमा विनायक के समीप, सिद्धेश्वरी, गली में दीवार के समीप

293.   वाल्मीकेश्वर     75.82  (1) मलदहिया, बाल्मीकि टीला, सी के 21/14, जीर्णवस्था में समाप्त; (2) भेलूपुर, नीलकण्ठ, विशाल लिंग, बी 20/15; (3) त्रिलोचनेश्वर में, ए 3/80 पीछे विशाल लिंग

294.   वामदेव लिंग/वामदेवेश्वर      100.87.65.12  संकठा घाट, सप्तर्षि मंदिर, सी के 7/161

295.   वराहेश  10.94; 97.196 दशाश्वमेध घाट, राम मंदिर, डी 17/111, जीर्णावस्था में

296.   वरुणेश  10.94; 12.97-8, 100.97.206   (1) सिद्धि विनायक के ऊपरी भाग में, सी के 8/8; (2) करुणेश्वर, ढुण्ढिराज गली, सी के 36/10

297.   वशिष्ठ/वशिष्ठेश/वशिष्ठेश्वर      61.171.10.94; 61.166; 97.34.18.21; 61.170   संकठा घाट, सप्तर्षि मंदिर, सी के 7/161

298.   व़ासुकीश/वासुकीश्वर      100.79.66.7   (1) आत्मावीरेश्वर के समीप, सिंधिया घाट, सी के 7/155; (2) नारद घाट, नारदेश्वर के समक्ष, डी 25/11

299.   वेदेश्वर  97.14-4       आदि केशव मे, ए 37/51

300.   विभाण्डेश       97.256 तिलभाण्डेश्वर मंदिर में, बी 17/99, कुँए में

301.   विधि/विधीश/विधीश्वर 70.46.10.94; 97.243.70.46    अगस्त्येश्वर मंदिर, गोदौलिया के द0पू0 दिशा में, डी 36/11

302.   विद्येश/विद्येश्वर 100.85.97.38  नीमवाली ब्रह्मपुरी, सी के ए 2/41

303.   विघ्नेश 57.62  विघ्नराज विनायक मंदिर, चित्रकूट तालाब, धूपचण्डी, जे 12/32

304.   विजयलिंग      69.61  विश्वनाथ मंदिर में निकुम्भ, सी के 35/19

305.   विजयेश 69.62  मंडुवाडीह, ककरमत्ता, शालकंट विनायक में

306.   विमलेश/विमलेश्वर      97.73.69.24   नया महादेव मुहल्ला, नीलकण्ठ नाम से, ए 10/47

307.   वीरभद्रेश 97.155.55.4; 100.94  (1) मध्यमेश्वर से दक्षिण, शिवाला, के 53/63; (2) ज्ञानवापी मस्ज़िद के उ0पू0, सी के 35/1; सम्प्रति जीर्णावस्था में

308.   वीररामेश्वर    84.69    राम घाट, के 24/10

309.   वीरेश/वीरेश्वर    10.103, 105, 109.112-3; 11.160; 73.34; 82.1; 83.54; 84.77; 86.109; 100.21  10.121; 17.62; 51.106; 61.185; 82.3; 111.23; 84.115; 97.39; 100.46, 85.   आत्मावीरेश्वर नाम सी के 7/158

310.   विरूपाक्ष/विशालाक्षीश्वर    69.130; 97.226       विश्वनाथ परिसर में, विशाल लिंग, सी के 35/19

311.   विशालाक्षीश     10.93  मीर घाट, विशालाक्षी मंदिर में, सी के 3/85

312.   विश्वकर्मेश/विश्वकर्मेश्वर    86.10; 100.30.73; 84 86.1-2; 97.69; 100.46  बृहस्पतीश्वर में, सिद्धेश्वरी, सी के 7/133

313.   विश्वलिंग       11.130 सिद्ध विनायक (मणिकर्णिका) के पीछे सी के 9/9

314.   विश्ववसु 97.243 विश्वसुलिंग नाम से, अगस्त्येश्वर मंदिर में, सी के 36/11

315.   विश्वेदेवेश्वर     97.154-5      मध्यमेश्वर से दक्षिण, के 53/63

316.विश्वेश/विश्वेश्वर/विश्वनाथ       9.52; 13.163; 17.128; 21.113; 33.17; 35.51; 38.107; 42.43; 48.55; 51.101; 53.28; 55.20; 61.145; 69.74; 75.54; 95.41; 96.5-6; 97.225; 100.33, 47, 77, 102, 104.3.86-7, 89, 19; 10.93; 11.119- 121; 21.42, 109- 10, 123, 127; 22.37; 26.130-2; 32.126; 34.36, 66; 49.15; 73.35; 74.46; 97.124; 19.15, 42; 96.97.3.26-7; 5.31; 61.113; 100.97       ज्ञानवापी, विश्वनाथ मंदिर, सी के 35/19, (विश्वनाथ)

317.   वृद्धकालेश/वृद्धकालेश्वर     10.86; 55.9; 61.24.24.72-3, 80-1; 67.180; 73.46; 97.124     मृत्युंजय मंदिर, वृद्धकाल के 52/39

318.   वृक्षभध्वज/वृषध्वज 70.74; 73.60; 100.56 ’ 62.85  कपिलेश्वर, कपिलधारा, पँचक्रोशी मार्ग, वरणा पार

319.   वृषभेश्वर 66.19; 97.25  वृषेश्वर, गोरखनाथ टीला, मैदागिन, के 58/75

320.   व्याघेश्वर/व्याघेश/व्याघेश्वर/व्याघलिंग       65.8283. ’ 65.75, 85-6; 100.24, 59. 10.94; 97.165.73.61; 97.169    सप्तसागर, भूतभैरव, के 63/16

321.   व्यासेश/व्यासेश्वर       10.94; 97.143, 145.53.37; 95.68, 71-4; 97.178       (1) कर्णघण्टा, व्यासकूप,के 60/67;(2) विश्वनाथ मंदिर को भीतरी प्रांगण, उत्तर में, सी के 35/19; (3) व्यासनगर (व्यासपुरी), साहूपुरी, रामनगर

322.   याज्ञवल्क्येश    97.34  संकठा मंदिर के समीप, सी के 7/159; सीमा तथा सेना विनायक के मध्य

323.   यमेश/यमेश्वर   51.106, 108, 110.51.107, 115 यम घाट, संकठा घाट के समीप, तट पर

324.   यमुनेश 10.93; 75.10  त्रिलोचन मंदिर, ए 2/80

नोट:   काशीखण्डोक्त 524 शिवलिंगों की सूची में 200 अज्ञात है, जिसकी सूची परिशिष्ट 4 में दी गई है अर्थात् 324 शिव लिंग अस्तित्व में है।

काशीखण्डोक्त काशी के अज्ञात शिव लिंग

क्रमांक            शिव लिंग        काशीखण्ड, श्लोक

1.     अदितेश 97.208

2.     आहुतीश 97.103

3.     आज्यपेश्वर     97.162

4.     क्रोधनेश्वर      65.17

5.     अक्षपादेश       97.174

6.     अर्लकेश 97.230

7.     अनलेश्वर       69.165

8.     अनन्तेश्वर      61.198

9.     अनारकेश्वर     97.59

10.    अश्वत्थामेश्वर   75.80

11.    औतथ्येश्वर     65.12

12.    अवभ्रातकेश्वर    97.56

13.    भाभ्रवेयेश्वर     65.16

14.    बाषुकुलीश      97.84

15.    भृगु    97.75

16.    भुवनेश  97.75

17.    ब्रह्मरातेश्वर     97.161

18.    चैत्ररथ  97.193

19.    चक्रेश   97.50-1, 107, 208

20.    चतुर्वेदेश्वर      69.81

21.    च्यवनेश/च्यवनेश्वर      68.66; 97.101.65.16

22.    दधिकल्पेश्वर    97.185

23.    दमिचण्डेश      97.118

24.    दारुकेश 70.80

25.    देवेशजयंत      69.71

26.    धरणीश 81.44

27.    धर्मशास्त्रेश्वर    33.133

28.    धातेश  97.197

29.    धिषषेश 17.62

30.    धुंधुमारीश्वर     66.26

31.    दीप्तेश  69.114

32.    दृधेश   97.200

33.    दृक्केश  10.88

34.    द्रोणेश  75.79, 89

35.    द्रुमिचण्डेश      10.88

36.    गदाधरेश्वर      66.6

37.    गालवेश्वर       65.13

38.    गौरीश्वर 49.28

39.    गयाधीश 97.241

40.    गायत्रीश्वर      97.112

41.    गोभिलेश 97.182

42.    हरेश्वर  69.80

43.    हरिदीश 97.258

44.    हरिकेशवन      100.82

45.    हारीतेश्वर       65.13

46.    हर्षितलिंग/हर्षितेश्वर       69.87.69.88

47.    हस्तीश्वर       97.135

48.    हिमस्थेश       69.131

49.    हिरण्यकशिपु लिंग       97.23

50.    हिरण्याक्षलिंग/हिरण्याक्षेश्वर    97.241.97.29

51.    ईश    86.67

52.    ईश्वर   51.45; 89.124

53.    जाबालीश्वर      65.5

54.    जैमिनीश 97.194-5

55.    जालकेश्वर      65.19

56.    जलेश   65.19

57.    जालेश  65.19

58.    जाम्बवतीश्वर    97.44

59.    जारूधीश 65.19

60.    जातूकर्णेश्वर     65.11

61.    जीमूतवाहनेश    97.182

62.    कालिंग  69.107-8

63.    कालिंदमेश्वर    65.17

64.    कामदा  85.73

65.    कणादेश 65.15; 97.175

66.    कनकेश 97.197

67.    कंकेश   65.17

68.    कण्ठेश्वर 65.18

69.    कण्वेश्वर 65.12

70.    कपिलेशान      73.165

71.    कपोतवृत्तीश    65.17

72.    कौस्तुभेश्वर     97.84-5

73.    कौसुमेश्वर      65.13

74.    खट्वांगेश       97.71-2

75.    खूरकर्तरीश      61.163

76.    किटीश्वर 61.205

77.    क्षेत्रज्ञ   97.15

78.    कुम्भि  65.13

79.    कुन्तलेश्वर      65.17

80.    लाँगल  73.46

81.    लिखितेश्वर     97.178

82.    लोकपालेश्वर     8143-4

83.    लोककेश 97.211

84.    माद्रीश्वर 65.9

85.    मगधेयेश्वर      65.18

86.    महाबल 69.11

87.    महालयलिंग     97.92

88.    महालिंग 69.84

89.    महातेजस       69.44-7

90.    महाव्रतलिंग     69.25

91.    महायोगीश्वर     69.48

92.    महोदरेश्वर      53.35-6

93.    महोत्कटेश्वर     69.23

94.    मखेश्वर 10.96; 84.62

95.    मण्डलेश 97.100

96.    माण्डव्येश/माण्डव्येश्वर     97.196.65.3

97.    मंत्रेश्वर  69.88

98.    मनुलिंग 97.237

99.    मरुत्तेश/मरुत्तेश्वर      10.91; 65.18;97.210.’ 84.71

100.   मतंगेश 65.18; 97.161-1

101.   मित्रवरूणेश्वर    10.97

102.   मुण्डासुरेश्वर     97.25

103.   मुण्डेश  97.243

104.   नैध्रुवेश्वर 65.14

105.   नैगमेयेश्वर      97.27

106.   नैमिष/नैमिषारण्य      69.10.69.11

107.   नलेश्वर 69.165

108.   नंदिशेणेश्वर     53.56

109.   निर्जरेश 97.205

110.   पैतेश्वर  97.204

111.   पँचशिखरेश्वर    97.103

112.   पँचकेश  55.12

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