मंदिर

काशी विश्वनाथ मंदिर

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विश्वनाथ मन्दिर

देश-देशान्तर में काशी विश्वनाथ मंदिर प्रसिद्ध हैं। यह देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक लिंग है। देश के

कोने-कोने से भक्त बाबा विश्वनाथ का दर्शन-पूजन करने हर समय आते हैं। खासकर सावन के महीने में गेरुआ वस्त्र धारण किए हुए काँवरिया बाबा का जलाभिषेक करने आते हैं। दिन में चार बार बाबा विश्वनाथ की आरती होती है। आरती बड़े ही धूमधाम से होती है। शयन आरती खास आकर्षण रहती है। शिवलिंग का अरघा स्वर्ण जड़ित है। लिंग के चारों ओर चांदी का चौकोर घेरा है। विश्वनाथ मंदिर का निर्माण राजा टोडरमल ने 1582 ई0 में कराया था। मंदिर का पुनः निर्माण 1777 ई0 में अहिल्याबाई होल्कर ने कराया था। 1839 ई0 में महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के कलश पर स्वर्णपत्र लगवाया था। यह मंदिर गोदौलिया चौराहे से आगे है।

नया विश्वनाथ मंदिर

नया विश्वनाथ मन्दिर

 

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर में ही नया विश्वनाथ मंदिर है। मंदिर के बुर्ज की उंचाई 252 फीट है। मंदिर को वास्तुकला की दृष्टि से काफी समृद्धशाली और आधुनिक बनाया गया है। इस मंदिर का निर्माण मालवीय जी की प्रेरणा से उद्योगपति युगल किशोर बिरला ने बनवाया है। मंदिर की दीवारों पर पूरा श्रीमद्भगवत् गीता और वेदों के कुछ श्लोक अंकित किए गए हैं। मंदिर परिसर के आसपास हरियाली और साफ-सफाई रहती है।

भारत माता मंदिर

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भारत माता मन्दिर

दर्शनीय स्थल के रूप में काशी विद्यापीठ विश्वविद्यालय में स्थित भारत माता मंदिर लोगों को काफी आकर्षित करता है। यह मंदिर अपने आप में अनूठा है। मंदिर में भारतवर्ष के भौगोलिक मानचित्र को काले पत्थर में दिखाया गया है। पहाड़, नदियाँ, मैदान और समुद्र को भी दर्शाया गया है। इस मंदिर का निर्माण शिवप्रसाद गुप्त जी ने कराया था। इसका उद्घाटन महात्मा गांधी ने 1936 में किया था। मंदिर का मानचित्र प्रख्यात कलाकार बाबू दुर्गाप्रसाद खत्री ने किया था।

संकटमोचन मंदिर, वाराणसी

संकटमोचन मंदिर

संकटमोचन मंदिर हनुमान जी का मंदिर है। माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण गोस्वमी तुलसीदास जी ने कराया था। लगभग 1608 ई0 1611 ई0 के बीच संकटमोचन मंदिर को बनाया गया है। मान्यता है कि तुलसीदास जी ने रामचरितमानस का कुछ अंश संकटमोचन मंदिर के पास विशाल पीपल के पेड़े के नीचे बैठकर लिखा था। चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को यहां हनुमान जयंती धूम-धाम से मनायी जाती है। इस दौरान मंदिर में बड़े स्तर पर संगीत कार्यक्रम आयोजित होता है। जिसमें देश के ख्यातिलब्ध गायक अपना गायन और संगीत प्रस्तुत करते हैं। हर मंगलवार और शनिवार को मंदिर में अन्य दिनों की अपेक्षा श्रद्धालुओं की खूब भीड़ जुटती है। मंदिर परिसर में काफी संख्या में बन्दर भी रहते हैं।

बड़ा गणेश

Bada ganeshदेव भूमि काशी से सभी को लगाव रहा है। भगवान शिव तो इस नगरी को कभी छोड़कर जाते ही नहीं। काशी में विघ्नकर्ता गणेश जी के भी कई मंदिर स्थापित हैं। यहां 56 विनायक भी हैं जिनका मंदिर है। इन 56 विनायकों के प्रमुख हैं बड़ा गणेश जिन्हें वक्रतुण्ड भी कहा जाता है। इनका विशाल एवं प्रसिद्ध मंदिर लोहटिया में इन्हीं के नाम पर पड़े मोहल्ले बड़ा गणेश में स्थित है। मंदिर परिसर के मध्य में गर्भगृह में सिन्दूरी रंग की बड़ा गणेश की विशाल प्रतिमा स्थापित है। इस प्रतिमा को देखने से अदभुत आभास होता है। बड़ा गणेश की प्रतिमा के साथ गर्भगृह में इनका पूरा परिवार पत्नी रिद्धि-सिद्धी एवं पुत्र शुभ लाभ भी हैं। जबकि गर्भगृह के बाहर हाल में गणेश जी के वाहन मूसक की भावपूर्ण प्रतिमा स्थापित है। जिसे देखकर ऐसा लगता है कि गणेश जी को ले जाने के लिए बिल्कुल तैयार है। मंदिर परिसर में ही स्थित एक कुंए के पास दन्तहस्त विनायक की प्रतिमा है। इसके अलवा मंदिर में मन्सा देवी, संतोषी मां, हनुमान जी की भी प्रतिमांयें हैं। कहा जाता है कि बड़ा गणेश के दर्शन करने से सारे रूके हुए कार्य सम्पूर्ण हो जाते हैं और तरक्की मिलती है। बड़ा गणेश का जन्मोत्सव धूमधाम से भादों महीने में मनाया जाता है। इस दौरान गणेश जी का दूध, दही, घी, शहद एवं गंगाजल से पंचामृत स्नान कराया जाता है। स्नान कराने के बाद आकर्षक ढंग से प्रतिमा का श्रृंगार होता है। वहीं, गणेश जी के स्नान के बाद उस पंचामृत को श्रद्धालुओं में प्रसाद स्वरूप वितरित किया जाता है। जन्मोत्सव के पर्व पर मंदिर दर्शनार्थियों से पट जाता है। वहीं दूसरा बड़ा कार्यक्रम माघ महीने में होता है। इस माह की चतुर्थी को कई हजार की संख्या में दर्शनार्थी गणेश जी का दर्शन-पूजन कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इस दिन प्रातःकाल 4 बजे से ही श्रद्धालुओं की कतारें दर्शन के लिए लग जाती हैं दर्शन-पूजन रात 12 बजे तक चलता है। इस दौरान काफी दूर-दूर से भक्त बड़ा गणेश के समक्ष अपना मत्था टेकते हैं। वहीं प्रत्येक सप्ताह बुधवार को भी काफी संख्या में भक्त मंदिर में आते हैं। मान्यता के अनुसार बड़ा गणेश से सच्चे मन से जो भी मनोकामना की जाती है वह निश्चिय ही पूरी होती है। यह मंदिर प्रातःकाल 4 बजे से रात साढ़े 10 बजे तक खुला रहता है। मंगला आरती सुबह साढ़े 4 बजे, मध्यान आरती दिन में साढ़े 10 बजे एवं शयन आरती रात साढ़े 10 बजे सम्पन्न होती है। मन्दिर कैन्ट स्टेशन से करीब 5 किलोमीटर दूरी पर स्थित है।

सारनाथ

मन्दिर, सारनाथ

भगवान बुद्ध ने सारनाथ में ही ज्ञानप्राप्ति के बाद अपने पांच शिष्यों को पहला धार्मिक उपदेश दिया था। सारनाथ बौद्धों का पवित्र तीर्थ रहा है। पुरातत्व खुदाई में यहां कई बौद्ध कालीन स्मृति चि मिले हैं। इनमें दम्भराजिका स्तूप, अशोक स्तंभ, धम्मेक स्तूप (जहां बुद्ध ने अपना पहला प्रवचन दिया था) प्रमुख है। सारनाथ में एक छोटा सा सरोवर पार्क, मृगदाव (हिरणों का पार्क) चीनी बुद्ध मंदिर, तिब्बती मंदिर, महाबोधि महाविद्यालय, धर्मशाला तथा प्राचीन सारंगनाथ मंदिर काफी आकर्षित करता है। बौद्ध भिक्षुओं के अलावा काफी संख्या में लोग यहां घूमने आते हैं। सारनाथ कैंट स्टेशन से करीब 10 किलोमीटर दूर है।

दुर्गा मंदिर दुर्गाकुण्ड 

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दुर्गा मन्दिर

दुर्गाकुण्ड में माँ दुर्गा का भव्य एवं विशाल मंदिर है। जहां हर समय दर्शनार्थियों का आना लगा रहता है। खासकर नवरात्र में तो इस मंदिर का महत्व और बढ़ जाता है। शारदीय नवरात्र के चौथे दिन माँ को कुष्माण्डा माता के रूप में पूजा जाता है। इस दौरान मंदिर को भव्य तरीके से सजाया जाता है। मंदिर के चारो ओर लाइटिंग बेहतरीन ढंग से की जाती है। रात को जब मंदिर पर लगी ये लाइटें झिलमिलाते हैं तो अलग ही नजारा उभरता है। सावन महीने में भी मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। इस दौरान गीत-संगीत के कार्यक्रम का भी आयोजन मंदिर परिसर में होता है। जिसमें नामचीन संगीत कलाकार भाग लेते हैं। पूरे महीने मेला लगा रहता है। मंदिर के मुख्य द्वार समेत अलग-बगल फूल-माला एवं धार्मिक सामग्रियों की कई दुकानें हैं।

मानस मंदिर

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मानस मन्दिर

दुर्गाकुण्ड मंदिर से ही कुछ दूरी पर भव्य मानस मंदिर स्थित है। सफेद संगमरमर से निर्मित इस मंदिर में विदेशी पर्यटक भी आते हैं। तुलसी मानस मंदिर नाम से प्रसिद्ध इस मंदिर का निर्माण 1964 में कलकत्ता के एक व्यापारी ने कराया था। मंदिर के आस-पास सुन्दर उद्यान है जो इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाता है। मंदिर में भगवान राम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान जी की मूर्ति के अतिरिक्त अन्य देवी-देवताओं के चलायमान प्रतिमा भी स्थापित है। मंदिर की दीवारों पर तुलसीदास कृत रामचरित मानस की चौपाईयां अंकित हैं। मंदिर में सुबह शाम श्रद्धालुओं की भीड़ ज्यादा रहती है। वहीं सावन महीने में तो दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है।

कर्दमेश्वर

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कर्मदेश्वर

कर्दमेश्वर मंदिर काशी का सबसे प्राचीन शिवमंदिर है। यह करीब 1 हजार वर्ष पुराना मंदिर है। पंचक्रोशी मार्ग पर पड़ने वाले कंदवा गांव में यह मंदिर स्थित है। मंदिर की स्थापत्य कला बेहतरीन है। पंचक्रोशी यात्रा करने वाले यात्री यहाँ दर्शन-पूजन करने के पश्चात आगे की यात्रा करते है। महाशिव रात्रि के दिन इस मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। वहीं, सावन में कांवरियों सहित स्थानीय लोग भी दर्शन-पूजन करते हैं।

अन्नपूर्णा मंदिर

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अनपुर्णा मन्दिर

काशीवासियों को अन्न से परिपूर्ण करने वाली माँ अन्नपूर्णा का मंदिर ज्ञानवापी में विश्वनाथ मंदिर के पास ही स्थित है। ऐसी मान्यता है कि बिना अन्नपूर्णा माँ का दर्शन किये विश्वनाथ दर्शन पूर्ण नहीं होता। 16वीं सदी तक माँ अन्नपूर्णा को भवानी और गौरी रूप में पूजा होती थी। 1781 में विष्णु महादेव नाम के किसी व्यक्ति ने मंदिर बनवाया। जिसमें गौरी की मूर्ति रखी गई। मुसलमान शासकों ने इस मंदिर को भी ध्वस्त करा दिया। बाजीराव पेशवा द्वितीय ने 1828 में अन्नपूर्णा मंदिर का निर्माण कराया। मंदिर में अन्नपूर्णा जी की स्वर्ण प्रतिमा  है। कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा तक दर्शनार्थियों उस प्रतिमा का दर्शन करते है। कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को ही मंदिर में अन्नकूट का आयोजन किया जाता है। इस दौरान लोग माँ के भोग को पाने के लिए लालायित रहते हैं।

काल भैरव

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काल भैरव

भगवान शिव की इस नगरी काशी के व्यवस्था संचालन की जिम्मेदारी उनके गण सम्भाले हुए हैं। उनके गण भैरव हैं जिनकी संख्या चौसठ है एवं इनके मुखिया काल भैरव हैं। काल भैरव को भगवान शिव का ही अंश माना गया है। इन्हें काशी का कोतवाल भी कहा जाता है। बिना इनकी अनुमति के कोई काशी में नहीं रह सकता। मान्यता के अनुसार शिव के सातवें घेरे में बाबा काल भैरव है। इनका वाहन कुत्ता है। इसलिए काशी के बारे में कहा भी जाता है कि यहां विचरण करने वाले तमाम कुत्ते काशी की पहरेदारी करते हैं। पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार एक बार अपनी वर्चस्वता साबित करने के लिए ब्रह्मा एवं विष्णु भगवान शिव की निंदा करने लगे। जिससे शिव जी अति क्रोधित हो गये। क्रोध में आकर शिव जी तांडव करने लगे जिसके प्रभाव से प्रलय जैसी स्थिति उत्पन्न हो गयी। इसी दौरान शिव जी में से उनकी भीषण स्वरूप वाली आकृति भैरव के रूप में उत्पन्न हुई। भगवान शिव के क्रोध से उत्पन्न भैरव ने अपने बांयें हाथ की अंगुली एवं दाहिने पैर के अंगूठे के नाखून से ब्रह्मा जी के पांचवे सिर को काट दिया। जिससे भैरव पर ब्रह्महत्या का पाप लग गया। ब्रह्महत्या के पाप से छुटकारा पाने के लिए भगवान शिव ने भैरव को एक उपाय बताया। उन्होंने भैरव को ब्रह्माजी के कटे कपाल को धारण कर तीनों लोकों का भ्रमण करने को कहा। ब्रह्महत्या की वजह से भैरव काले पड गये। भ्रमण करते हुए जब काल भैरव काशी की सीमा में पहुंचे इस दौरान उनका पीछा कर रही ब्रह्महत्या काशी की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकी। ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त होने पर कालभैरव प्रसन्न हो गये और तभी से काशी की रक्षा मे लग गये। साथ ही उन्होंने काशी की सुरक्षा के लिए 8 चौकियां भी स्थापित की। बाबा कालभैरव का प्रसिद्ध मंदिर विश्वेषरगंज स्थित के 32/22 भैरवनाथ में है। बड़े से मंदिर परिसर में बाबा की दिव्य प्रतिमा स्थापित है। माना जाता है कि मार्ग शीर्ष के कृष्णपक्ष की अष्टमी को सायंकाल बाबा कालभैरव उत्पन्न हुए हैं। इस दिन को बाबा के जन्मोत्सव के रूप में धूमधाम से मनाया जाता है। इस दौरान बाबा की प्रतिमा का कई प्रकार के सुगन्धित फूलों से आकर्षक ढंग का श्रृंगार किया जाता है। इसी दिन को ही भैरवाष्टमी भी कहते हैं और इनकी वार्षिक यात्रा भी होती है। एक पैर पर खड़े बाबा कालभैरव काशी के दण्डाधिकारी हैं। प्रत्येक रविवार को बाबा कालभैरव के दर्शन-पूजन का विशेष विधान है। इस दिन काफी संख्या में भक्त दर्शन करने बाबा दरबार में पहुंचते हैं। वाराणसी में नियुक्त होने वाले तमाम बड़े प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारी सर्वप्रथम बाबा विश्वनाथ एवं काल भैरव का दर्शन कर आशीर्वाद लेते हैं। कालभैरव का मंदिर प्रातःकाल 5 से दोपहर डेढ़ बजे तक एवं सायंकाल साढ़े 4 से रात साढ़े 9 बजे तक खुला रहता है। मंदिर में सुरक्षा के भी समुचित उपाय किये गये हैं। पुलिस के जवान तो तैनात रहते ही हैं साथ ही मंदिर परिसर में सीसीटीवी कैमरा भी लगा हुआ है। मान्यता के अनुसार बाबा कालभैरव के दर्शन से सभी प्रकार के कष्ट दूर हो जाते हैं। माना गया है कि बिना कालभैरव के दर्शन के बाबा विश्वनाथ के दर्शन-पूजन का फल प्राप्त नही होता है। कैन्ट स्टेशन से करीब पाँच किलोमीटर दूर यह मंदिर स्थित है। कैन्ट से ऑटो द्वारा मैदागिन पहुंचकर वहां से पैदल ही काल भैरव के मंदिर तक पहुंचा जा सकता है।

तिलभाण्डेश्वर महादेव

माना जाता है कि काशी के कंकड-कंकड़ में शिवशंकर वास करते हैं। काशी के महात्म्य में स्वयंभू शिवलिंगों का अदितिय स्थान है, जिन्हें देखने से अदभुत अनुभव होता है; उन्हीं स्वयंभू शिवलिंगों में से एक हैं- तिलभाण्डेश्वर महादेव। काशी के प्राचीन मंदिरों में से एक तिलभाण्डेश्वर का मंदिर शहर के भीड़भाड़ वाले इलाके मदनपुरा के बी.17/42 तिलभाण्डेश्वर गली में स्थित है। तिलभाण्डेश्वर शिवलिंग की विशिष्टता यह है कि इनका आकार काशी के तीन सबसे बड़े शिवलिंगों में से एक है और हर वर्ष इसमें तिल भर की वृद्धि होती है। इस स्वयंभू शिवलिंग के बारे में वर्णित है कि प्राचीन काल में इस क्षेत्र की भूमि पर तिल की खेती होती थी।DSCN1978 एक दिन अचानक तिल के खेतों के मध्य से शिवलिंग उत्पन्न हो गया। जब इस शिवलिंग को स्थानीय लोगों ने देखा तो पूजा-अर्चन करने के बाद तिल चढ़ाने लगे। मान्यता है कि तभी से इन्हें तिलभाण्डेश्वर कहा जाता है। काशीखण्डोक्त इस शिवलिंग में स्वयं भगवान शिव विराजमान हैं। बताया जाता है कि मुस्लिम शासन के दौरान मंदिरों को ध्वस्त करने के क्रम में तिलभाण्डेश्वर को भी नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गयी। मंदिर को तीन बार मुस्लिम शासकों ने ध्वस्त कराने के लिए सैनिकों को भेजा लेकिन हर बार कुछ न कुछ ऐसा घट गया कि सैनिकों को मुंह की खानी पड़ी। अंगेजी शासन के दौरान एक बार ब्रिटिश अधिकारियों ने शिवलिंग के आकार में बढ़ोत्तरी को परखने के लिए उसके चारो ओर धागा बांध दिया जो अगले दिन टूटा मिला। कई जगह उल्लेख मिलता है कि माता शारदा इस स्थान पर कुछ समय के लिए रूकी थीं। वहीं, कर्नाटक राज्य से विभाण्डक ऋषि काशी आये तो यहीं रूककर पूजा-पाठ करने लगे। मंदिर निर्माण के बारे में बताया जाता है कि विजयानगरम के किसी राजा ने इस भव्य एवं बड़े मंदिर को बनवाया था। तीन तल वाले इस मंदिर में मुख्य द्वार से अंदर जाने पर दाहिनी ओर नीचे गलियारे में जाने पर विभाण्डेश्वर शिवलिंग स्थित हैं। इस शिवलिंग के उपर तांबे की धातु चढ़ायी गयी है। मान्यता के अनुसार विभाण्डेश्वर के दर्शन के उपरांत तिलभाण्डेश्वर का दर्शन करने पर सारी मनोकामना पूर्ण हो जाती है। बनारसी एवं मलयाली संस्कृति के उत्कृष्ट स्वरूप वाले इस मंदिर में भगवान अइप्पा का भी मंदिर स्थित है जिसकी दीवारों पर मलयाली भाषा में जानकारियां लिखी हुई हैं। इस मंदिर के आगे उपर सीढ़ियां चढ़ने पर बायीं ओर स्थित हैं- स्वयंभू शिवलिंग तिलभाण्डेश्वर।DSCN2005 सुरक्षा की दृष्टि से गर्भगृह को लोहे की जाली से बंद कर दिया गया है। काशी के इस सबसे बड़े शिवलिंग को देखकर भक्त सहज ही आकर्षित हो जाते हैं। गर्भगृह के बायीं ओर की दीवार पर भोलेनाथ की योगदृष्टणा मुद्रा में मूर्ति है। दाहिनी ओर दीवार पर भी शिवलिंग स्थापित हैं। वहीं, गर्भगृह के दाहिनी ओर छोटे से मंदिर में मां पार्वती की दिव्य मूर्ति स्थापित है। इसी मंदिर के बगल में ही विशालकाय करीब 18 फीट उंचा शिवकोटिस्तूप भी है। जिसे आन्ध्र प्रदेश के भक्तों ने बनवाया है। इस स्तूप में वहां से आने वाले भक्त एक कागज पर शिव-शिव दो बार लिखकर डालते हैं। मंदिर में रहने वाले पुजारियों के मुताबिक अब तक करीब 10 करोड़ से ज्यादा शिव का नाम लिखकर भक्त स्तूप में डाल चुके हैं। तिलभाण्डेश्वर मंदिर में वर्ष में चार बड़े आयोजन होते हैं। महाशिवरात्रि के दिन शिव के पंचमुखेश्वर रूप को जो कि तांबे का बना हुआ है तिलभाण्डेश्वर शिवलिंग के उपर रखा जाता है; जिसके दर्शन के लिए काफी संख्या में भक्त उमड़ते हैं। वहीं मकर संक्रांति वाले दिन बाबा का चंदन श्रृंगार किया जाता है। सावन महीने में मंदिर में रूद्राभिषेक होता है जबकि दीपावली पर अन्नकूट का आयोजन किया जाता है। इस दौरान भजन-कीर्तन का सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होता है। मंदिर खुलने का समय सुबह 5 बजे से रात्रि साढ़े 9 बजे तक है। वहीं दिन में 1 से 4 बजे के बीच गर्भगृह बंद रहता है। प्रतिदिन आरती सुबह 6 बजे होती है। मंदिर परिसर में ही तिलभाण्डेश्वर मठ भी स्थित है। जिसमें साधु संत रहते हैं। जबकि मंदिर की गतिविधियों को देखने की जिम्मेदारी केरला के साधु संत निभा रहे हैं।

 कबीर प्राकट्य धाम, लहरतारा

 गगन मण्डल से उतरे, सदगुरु सत्य कबीर।

जलज मांहि पौढ़न किये, सब पीरन के पीर।।

 DSCN3281मानवमात्र को सत्य, अहिंसा, एकता तथा विश्वबन्धुत्व का उपदेश देने वाले सदगुरू कबीरदास के जन्म के सम्बन्ध में कई किवदंतियां प्रचलित है। कुछ लोगों का यह कहना है कि संवत 1455 (सन् 1398) की ज्येष्ठ पूर्णिमा, दिन सोमवार को मांगलिक ब्रह्ममुहुर्त में काशी के लहरतारा तालाब के किनारे स्वामी रामानन्द के शिष्य अष्टानन्द ध्यानमग्न थे, अचानक उन्हें कुछ आभास हुआ और उन्होंने अपने आंखे खोली, उन्होंने देखा कि आकाश से एक दिव्य ज्योतिपुंज तालाब में खिले एक कमल पुष्प पर पड़ी और क्षण मात्र में वह ज्योतिपुंज नवजात शिशु के रूप में परिवर्तित हो गया। जबकि कुछ लोगों के मध्य यह मान्यता है कि नीरू-नीमा नामक नवदम्पत्ति लहरतारा तालाब के पास से गुजर रहे थे तभी उनकि दृष्टि तालाब के पास पड़े एक नवजात शिशु पर पड़ी, मोहवश नवदम्पत्ति ने शिशु को अपनाकर उसका पालन-पोषण किया, कालान्तर में यहीं बालक कबीरदास के नाम से संसार में प्रसिद्ध हुआ।

DSCN3305सन् 1948 में पंथ श्री हजुर उदित नाम साहेब (आचार्य कबीर पंथ) के मन में लालसा जगी की कबीरदास के जन्म स्थान का दर्शन हो जाये। उन्होंने लोगों से पूछकर कबीरदास के जन्म स्थान का पता लगाया और दर्शन किया। उस समय यहां दूर-दूर तक जल एवं जलकुम्भी ही दिखाई पड़ रही थी, उन्होंनें कबीरदास का ध्यान कर उस जल को अपने मस्तक से लगाया तभी उनके मन में विचार आया कि इस पवित्र स्थान पर कबीर पंथ का केन्द्र स्थापित किया जाये। 18 वर्ष पश्चात सन् 1967 में ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन श्री हजुर उदित नाम साहेब ने कबीर पंथ के तत्कालीन महन्त, सन्त एवं भक्तो के उपस्थिति में वर्तमान कबीर मन्दिर की नींव रखी। आम जनता एवं पंथ अनुयायियों सहयोग से सन् 2002 में मन्दिर का निर्माण पूर्ण हुआ, मन्दिर निर्माण में लाल पत्थरों का प्रयोग किया गया है। तथा शैली कलात्मक एवं आर्कषक है। जहाँ पर मन्दिर में कबीरदास की कमल पुष्प पर प्रतिमा है वहीं पर कबीरदास नीरू-नीमा को प्राप्त हुये थे। मन्दिर परिसर में ही एक तालाब स्थित है जो कबीर पंथियों में श्रद्धा तीर्थ के रूप में जाना जाता है। प्रत्येक वर्ष दस जून को मन्दिर परिसर में कबीर जयन्ती का उत्सव मनाया जाता है इस अवसर पर तीन दिवसीय विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन होता है, जिसमें कबीर अमृतवाणी एवं सत्संग प्रमुख है। गुरू पूर्णिमा को भी संत्सग एवं कबीर अमृतवाणी जैसे कार्यक्रमों का आयोजन होता है। मन्दिर परिसर में ही प्राणीक हिलींग पद्धति द्वारा लोगों को चिकित्सा सेवा प्रदान किया जाता है। मन्दिर में देश-विदेश के साथ ही स्थानीय भक्तों एवं अनुयायियों का आवागमन होता है। वर्तमान में मन्दिर के मुख्य आचार्य पंथ श्री हजुर अर्धनाम साहेब हैं। मन्दिर अक्टूबर से फरवरी तक सुबह 7 से 12 बजे एवं सायं 3 से 5 बजे तक तथा मार्च से सितम्बर तक सुबह 5.30 से 11 बजे एवं सायं में 4 से 6 बजे तक आम दर्शनार्थियों के लिये खुला रहता है। मंदिर की दूरी कैंट स्टेशन से लगभग दो किलोमीटर है।

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