खेल

काशी के प्रमुख खेल

किसी स्थान की महत्ता उसकी अवस्थिति एवं वहां रहने वाले लोगों से बनती है, काशी में रहने वाले मस्त मलंग तो हैं ही, लगता है जैसे इस स्थान की बनावट भी विशेष ध्यान देकर के की गयी है। याद कीजिए यूनान – ओलंपिक के स्टेडियम के ध्वस्त अवशेष को या फिर किसी भी सभागार  को …, ये सभी आदर्श स्वरुप में अर्ध-चंद्राकार रूप में होते है, बनारस का निर्माण गंगा किनारे अर्ध चंद्राकार दिव्य सभागार रूप में की गयी है। जहां नित्य-प्रतिदिन घाट किनारे सीढियों पे दर्शक इकट्ठे होते हैं और गंगा नदी के किनारे शव-दाह की क्रिया होती है और यंही से शुरू होता है गंगा के प्रवाह के साथ साथ कृष्ण की लीला या महारास और शिव की समाधि और इस महाक्रीड़ा को बनारस अलमस्त होकर अंगीकार करता है और पद्मश्री छन्नू लाल गाते  है …. .”खेले मसाने में होरी दिगंबर खेले मसाने में होली”  बचपन में बाबा ने एक वाकया सुनाया था – काशिराज के दरबार का, एक पूर्व काशी नरेश बड़े शौकीन रहे, एक रियाजी से बात फंस गई। हुआ यूँ कि महाराज ने पुरस्कार स्वरुप दो सिक्के दिए और पहलवान ने सिक्कों की लिखावट को हथेली में मसलते हुए वापस कर दिया, इबारत मिट गयी थी। महाराज ने मौके की नजाकत को ताड़ते हुए तुरंत सिक्के को हथेली में अंगूठे से दबाते हुए दो टुकड़े करके वापस पहलवान की ओर उछाल दिए ” देखा ध्यान से निखालिस चाँदी हौ “. प्रसिद्ध समाजशास्त्री जॉन डेवी के सिद्धांत  play is life ” खेल ही जीवन है ” के अनुसार जीवन के विस्तृत आयाम एवं विविध जटिल स्तरों पे व्यक्ति अपने पौरुष एवं तकनीक के सहारे संघर्षरत रहता है. आइये काशी के एक पक्ष जो की खेल, खिलाडी, और बनारसी खेलों से होते हुए उपरोक्त दोनों कथा-सिद्धांत में  लड़ते – झगड़ते हुए १०० से २०० रु की enlightenment मोक्ष की योगा क्लासेज में भी रमता है और समाधि के भी दो भेद बना के निर्बीज और सबीज की  सैद्धांतिक विवेचना करता है….

खेल: सहनशक्ति, लोच, संतुलन, ताकत, बुधिमत्ता और सामंजस्य क्षमता आदि की सहायता से किये गए मनोरंजनात्मक कार्यों को खेल कहते हैं, खेल के व्यापक प्रसार को समझने के लिए हम इसे अग्रलिखित भागों में बाँट सकते है.

व्यक्तिगत खेल : अकेले खेले जाने वाले खेल शतरंज, टेनिस , बैडमिंटन आदि।

समूहगत खेल : समूह या दल में खेले जाने वाले खेल हाकी , क्रिकेट, फुटबॉल आदि ,

प्रत्यक्ष खेल : प्रत्यक्ष भागीदारी वाले खेल ,

अप्रत्यक्ष खेल ; वे खेल जिनमे खिलाडी प्रत्यक्ष भागीदार नहीं होता है जैसे कबूतर, मुर्गा,भैंसा लड़ाई आदि,

इनडोर खेल(अंतरावासीय खेल) :  कैरोम बोर्ड शतरंज टेबल टेनिस आदि ,

आउटडोर खेल : मैदान मे खेले जाने वाले सभी खेल.

मल्खंभ – आधुनिक जिम्नास्टिक की जननी का उदभव एवं विकास काशी के ही अखाड़ों में हुआ। जिसका नाम मल्खंभ पड़ा। अखाड़ों में पाये जाने वाले जोड़ी के काफी बड़े स्वरूप को जमीन में बीचोबीच गाड़ देते हैं। फिर उस पर चढ़ कर खिलाड़ी कलाबाजी करते हैं।

एक्का दौड़ – काशी के इस प्राचीन आवागमन के साधन में पुराने रईसों ने मनोरंजन का एक उपाय निकाल लिया। इसके बाद एक्का की दौड़ प्रतियोगिता शुरू हुई। यह खेल मुगलों के शासनकाल में विकसित हुआ था।

कबूतरबाजी – एक्का दौड़ की ही तरह कबूतरबाजी भी मुगलों के ही समय में मनोरंजन के साधन के रूप में उभरी। लोग अपने घरों की छतों पर कबूतरों के घर बनवाते हैं और उन्हें प्रशिक्षित करते हुए देर तक और दूर तक उड़ने के लिए तैयार करते हैं।

शतरंज – मस्तिष्क विकास के लिए खेला जाने वाला यह विशिष्ट खेल काशी के समाज में अति महत्वपूर्ण स्थान रखता है। सफेद और काले मुहरों से 64 खानों की बिसात पर खेला जाने वाला ये खेल बनारस की विशिष्ट जीवनशैली का परिचायक है।

योग – महर्षि पतंजलि द्वारा 6वीं शदी में योग के सिद्धांतों की रचना की गयी। योग के सिद्धांत मुख्य रूप से आठ हैं। जिन्हें अष्टांग योग भी कहा जाता है। कालांतर में भारतीय मनीषा एवं जीवन दर्शन को  और मजबूत करते हुए बनारस से निकले इन सूत्रों ने भारतीय दर्शन के 6 शाखाओं में अपना एक विशिष्ट स्थान प्राप्त किया। बनारस से निकली इस जीवन्त विधा द्वारा आज भी देश-विदेश के लोग अपने जटिल जीवन को सरल आरोग्यमय और सुखमय बना रहे हैं।

– धनंजय त्रिपाठी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *