सिक्ख

काशी का सिख समाज

* डॉ. अत्रि भारद्वाज

किसी भी शहर के विकास में वहां के नागरिकों का अविस्मरणीय योगदान होता है। काशी के विकास और निर्माण में अग्रवाल बंधुओं, मारवाड़ी बन्धुओं, बंग बंधुओं और राजस्थानी बन्धुओं की तरह सिखसमाज का भी बहुत योगदान होता है।

काशी विश्व की प्राचीनतम नगरी है। वाराणसी, जो काशी नाम से लोकप्रिय है, भारतीय संस्कृति का प्रतीक है। यह भारत की सात पुरियों में से एक है। भौगोलिक दृष्टिकोण से वाराणसी गंगा की उर्वर मध्य घाटी में गंगा के बायें तट पर केन्द्रीय स्थिति से लाभान्वित है। भारत पाक विभाजन के बाद पंजाबी और सिख भारत के अन्य शहरों में आ बसे तो बनारस अछूता क्यों रहता ? यहां भी सिख समाज के लोगों ने आकर जबरदस्त श्रम किया , उत्तरोत्तर व्यवसाय में प्रगति की और काशी को श्रम व ईमानदारी का संस्कार दिया।

सवा लाख से एक लड़ाऊं।

तभी तो गोविंद सिंह नाम कहाऊं।।

इन पंक्तियों को सिख समाज ने हमेशा चरितार्थ किया, अपने कर्म और धर्म से। सिख दिलेर कौम है। सिख धर्म का मूल 1469 ई. में ही बंध गया था। जब अकाल पुरख ने अपने गुण आकार में प्रकट किये, तो उस आकार का नाम गुरूनानक हुआ। सिखधर्म में सेवाभाव की महत्ता है। इसी सेवा भाव ने बनारस की पहचान में इजाफा किया। सिखधर्म से सबंधित एक विदेशी विद्वान का कथन है कि गुरू गंथ साहिब के उपदेशों से यह पूरी तरह सिद्ध हो जाता है कि सिख धर्म संसार में एक नया एवं बिल्कुल भिन्न धर्म है। असल में यह धर्म ऐसा है कि जिसे जीवन के आध्यात्मिक की आध्यमिक दृष्टि से देखा जाये तो यह सारे संसार में लगभग अपने किस्म का अकेला है। सिख धर्म का मूल अकाल पुरख है। अकालपुरख के स्वरूप और गुणों का बखान प्रमुख तौर पर मूल मंत्र से मिलता है। इसी मान्यता को सिखों ने भी बनारस में भी स्थापित किया। जम्मू कश्मीर के मनावर से विस्थापित होकर बनारस आए सरदार मूलसिंह के बड़े पुत्र सरदार जोगेन्दर सिंह बग्गा अब नहीं है, लेकिन उन्होंने अपने परिवार के साथ कड़ी मशक्कत कर प्रतिष्ठा प्राप्त की। साहित्य लेखन में उनकी बेहद रूचि थी। उनके छोटे भाई सरदार राम सिंह बग्गा बताते हैं कि 1947 में बनारस आने पर अपने पुश्तैनी कपड़े का व्यवसाय किया, मगर चला नहीं, फिर गैस वेल्डिंग का काम शुरू किया, फिर मोटर पार्ट्स की बिक्री का व्यवसाय किया। आज मेहनत और ईमानदारी के बूते वर्कशाप और फैक्ट्री भी है। वे मानते हैं कि जो कुछ कमाया जाय, वह ईमानदारी से कमाया जाय और मिल बांट कर खाया जाय। इसीलिए लंगर प्रथा शुरू हुयी। सिख के लिए मुश्किल से मुश्किल समस्या में भी गुरू की टेक को कायम रखने का आदेश है। गुरू ग्रन्थ साहिब में मुक्ति के साथ जीवन शब्द भी आता है। इसका अर्थ है अपने जीवन में ही मुक्त होना और सिखो ने अपने कर्म से जीवंत बनारस को भी जीवन दिया है। सेवा व सिमरन सिख धर्म के मूल सिद्धान्त हैं।

इसी के आधार पर प्रमुख समाज सेवी व गुरू नानक खालसा स्कूल के चेयरमैन सरदार जसवीर सिंह सब्बरवाल, व्यापारी नेता सरदार अजीत सिंह बग्गा, समाजसेवी व व्यवसायी सरदार कुलभूषण सिंह, समाजिक कार्यकर्ता व नेता जी राजनारायण के सहयोगी सरदार प्रीतपाल सिंह पाली, गुरूबाग गुरुद्वारे के मुख्यग्रंथी भाई सुखदेव सिंह, अविधवक्ता गरेन्द्र सिंह, हर एक के सुख-दुःख के बराबर काम आने वाले शेर-ओ-शायरी के शौकीन सरदार मंजीत सिंह उन शख्शीयतों में हैं, जिन्होंने मानवता का मान बढ़ाया है। शिक्षाविद करतार कौर पेंटल सिंख समाज की महिलाओं में वह नाम है जिनके आगे अपने आप झुक जाता है।

सिख समाज का काशी से गहरा नाता इसलिए भी है कि इलाहाबाद त्रिवेणी से चलकर गुरुतेगबहादुर साहब ने मिर्जापुर चुनार, भुइली साहब आदि स्थानों से होते भाई कल्याण जी को उनके निवास स्थान काशी में आकर दर्शन दिया। बता दें कि कल्याण जी गुरुनानक देव के अनुयायी थे और इनकी उम्र 100 से ऊपर थी। गुरुद्वारा नीचीबाग सिखों के नवें गुरु तेगबहादुर साहब का है। गुरु नानक देव के बताए मार्ग पर चलते हुए सिख समाज में ‘सच्चे सौदे’ का व्यापार करके ‘सच्ची कीरत’ की शुरुआत की और इसी परम्परा को निभाते हुए सिख समाज ने काशी के साथ पूरे देश और विदेश में प्रतिष्ठा प्राप्त की।

लंका (वाराणसी) पर पंजाब के गुजरावाला से आकर लाला काशीराम गुजराल ने बनारस में व्यापार की शुरुआत की। उनके सरदार स्टोर्स व सरदार प्रोविजलन स्टोर्स की ख्याति पूरे बनारस में फैली। लाहौर से वनस्पतिशास्त्र में एम.एस.सी. करके महामना मदन मोहन मालवीय के आमंत्रण पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में आए डॉ. याज्ञवल्क्य भारद्वाज के साथ लाला काशी राम का बड़ा याराना था और उन्होंने इनको भरपूर सहयोग भी दिया। आज लाला काशी राम के पत्र, पौत्र उनके व्यवसाय को आगे बढ़ा रहे हैं। आज उनके पुत्र अन्य व्यवसाय में अपना कौशल दिखा रहे हैं। वाराणसी के डीरका के ओलम्पियन धावक सरदार गुलजार सिंह ने भी इस शहर का मान बढ़ाया। गुलजारा सिंह की प्रेरणा से कई नौजवान धावक बने और मैडल प्राप्त किए। हिन्दू धर्म का प्रमुख स्थान होने के साथ-साथ बनारस सिखों का भी मुख्य धार्मिक स्थान है। क्योंकि ऋषि-मुनियों के इसी आदि स्थान पर सिख धर्म के प्रवर्तक गुरु नानक देव महाराज और हिन्द की चादर, हिन्दू धर्म की तीलक व जनेऊ के रखवाले नवम गुरु बादशाह गुरुतेग बहादुर महाराज और गुरुगोविन्द सिंह के पवित्र चरण भी पड़े। सिख धर्म के व्यास माने जाने वाले, भाई गुरुदास और दशमेश पिता द्वरा भेजे गये प्रथम पांच निर्मल संतों ने भी कभी इसी नगरी को अपना आवास बनाया था।

 काशी के प्रमुख गुरूद्वारे

छठवें गुरु श्री हरिगोविन्द के समय गुरु-घर के वेद व्यास महान विद्वान भाई गुरुदास प्रचलित परम्परा के अनुसार काबुल से आकर काशी में ठहरे। यहां रह कर गुरु व सिक्खी की बहुत सेवा की। उन्हीं के प्रचार का ही फल था कि बहुत से लोग बड़े-बड़े विद्वान और उस समय के काशी नरेश तक भाई गुरुदास के सेवक बन गये थे। राजा ने उनकी बड़ी सेवा की और रहने के लिए विश्वेसरगंज में सुन्दर स्थान प्रदान किया। जो आज चेतनमठ के नाम से मशहूर है। सिखों ने जहां काशी में धार्मिक भावना की अलग जगायी, वहीं व्यापार का साम्राज्य भी खड़ा किया। सम्मान से जीने का संदेश दिया। आज हर क्षेत्र में सिख यश अर्जित कर रहा है। किसी भी काम को छोटा न समझना और हर काम लगन व ईमानदारी से करने का संदेश हर सिख भाई देता है।

काशी में सिक्ख धर्म के प्रवर्तक गुरु नानकदेव, गुरु तेगबहादुर एवं गुरु गोविन्द सिंह जी पधारे थे। सिक्ख धर्म के व्यास भाई गुरुदास और दशमेश पिता द्वारा भेजे गए प्रथम निर्मल सन्तों ने भी इसी पुरी को को अपना आवास बनाया था। विक्रम संवत् 1563 महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर काशीपुरी गुरुद्वारा गुरुबाग में गुरुनानक देव का आगमन हुआ था। आप पण्डित गोपाल शास्त्री जी के लक्सा स्थित बाग में रुके। यहां रहक कर आपने अपने उपदेशामृत से जनता को प्रभावित किया। जिसके फल स्वरूप पण्डित गोपाल शास्त्री ने अपना बाग गुरु नानकदेव को समर्पित कर दिया। यही बाग गुरुबाग के नाम से प्रसिद्ध है। इसी स्थान पर गुरुद्वारा स्थापित है, जो सिख भाइयों का प्रमुख तीर्थस्थल है।

गुरुद्वारा बड़ी संगत नीचीबाग

आसभैरव (नीचीबाग) में गुरुनानकदेव जी के अनुयायी कल्याण जी रहते थे। सिक्ख सम्प्रदाय के नवम् गुरु तेगबहादुरजी 1666 ई. में काशी आगमन पर यहीं रुके थे। यहीं पर स्थित गर्भगृह में आपने 13 दिन तक की तपस्या की थी। सुनते हैं कि एक दिन ग्रहण के अवसर पर बाबा कल्याणदास जी ने गुरुतेग बहादुरजी से गंगा स्नान के लिए कहा। इसी पर गुरु जी ने घर की भूमि में लगी एक शिला को को खुदवा दिया। शिला के हटते ही गंगा की निर्मल धारा बह चली। यह स्थल बाऊली साहब के नाम से प्रसिद्ध है और इसके जल को अमृत मानकर श्रद्धालु जन ग्रहण करते हैं। गुरुतेग बहादुरजी ने अपना मलमल का एक चोला (कुर्ता) तथा चरणपादुका भाई कल्याणजी को प्रदान किया, जो यहां पर मौजूद है। पटना साहिब से आनन्दपुर साहिब जाते समय सात गुरु गोविन्द सिंह जी ने भी यहां निवास किया था और आपने अपना मखमली (जूता) इस संगत को प्रदान किया जो आज भी सुरक्षित है।

यहां पर गुरु तेगबहादुर गोविन्द सिंह जी तथा माता साहिब देव जी के हुक्मनामें भी सुरक्षित हैं। यहीं पर एक गुरुद्वारा बना जो उदासी महन्तों के अधिकार में था। सिक्खों ने बड़ी कठिनाई से इसे इनके कब्जे से मुक्त कराकर सन् 1950 ई. में इसका जीर्णोद्धार कराया।

काशीनिवास के काल में गुरु तेगबहादुर सिंह जी ने जगतगंज धूपचचंडी के श्रद्धालुजनों के निवेदन पर जगतगंज त्रिमुहानी पर एक मकान में रहकर सतसंग किया था। यह मकान भी गुरुजी को समर्पित कर दिया गया। उपर्युक्त तीनों स्थान का प्रबन्ध गुरुद्वारा प्रबन्ध समिति करती चली आ रही है।

विश्वेश्वरगंज के समीप जतनबर मुहल्ले में चेतनपीठ स्थित है जहां छठवे गुरु हरीगोविन्द साहब जी के समय गुरु घराने के व्यास भाई गुरुदास महाराज जी काबुल से आकर काशी में ठहरे थे। इससे प्रभावित होकर उस समय के काशी नरेश जी ने यह स्थान प्रभावित कर दिया था।

गुरुगोविन्द सिंह जी ने आनन्दपुर साहिब से अपने पांच शिष्यों को भगवा कपड़ा पहनकर संस्कृत विद्या अध्ययन के लिए भाई गुरुदास के पास भेजा था। आज तक इस स्थान में निर्मल संस्कृत विद्यालय चल रहा है। यह स्थान निर्मल संतो ंके प्रबंध में है।

इस प्रकार काशी सिक्खों का भी मुख्य धार्मिक स्थान है। यहां दूर-दूर से सिक्ख यात्री इन स्थानों के दर्शनार्थ आते रहते हैं।

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