सारनाथ

       काशी के तीर्थ स्थलों में सारनाथ का विशेष महत्व है। यह बौद्ध धर्म का एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। क्योंकि यहां पर भगवान बुद्ध ने बोध गया से ज्ञान प्राप्त कर आषाढ़ पूर्णिमा के दिन पंचवर्गीय भिक्षुओं को अपना प्रथम उपदेश दिया था। जिसे धम्मचक्कपवत्तनसुत के नाम से जाना जाता है। सारनाथ वाराणसी के कैण्ट रेलवे स्टेशन से 8 कि0मी0 तथा वाराणसी से 6.4 कि0मी0 उत्तर की ओर स्थित है। सारनाथ में उत्तर रेलवे का एक छोटा स्टेशन भी है। भगवान बुद्ध के निम्नलिखित चिन्हों की वजह से सानाथ आज भी संसार भर में प्रसिद्ध हैं।

चौखण्डी स्तूप : यह वाराणसी से सारनाथ जाने वाली सड़क के बायें किनारे पर स्थित है। यह सारनाथ से करीब 800 मीटर दक्षिण पश्चिम में है। यह स्तूप मिट्टी के बहुत ऊँचे टीले पर पक्की ईंटो के ठोस थूहा के ऊपर आठ फलक रूप इमारत है। चौकोर कुर्सी पर बना होने के कारण चौखण्डी स्तूप कहा जाता है। यह 84 फीट ऊँचा ईटों के टूटे-फूटे एक प्राचीन स्तूप का अवशेष है। यहीं पर खुदाई से बुद्ध की धम्मचक्कपवत्तन की मुद्रा में बैठी एक मूर्ति प्राप्त हुई है। जो भगवान बुद्ध की बैठी अवस्था में संसार की सबसे सुन्दर मूर्ति बताई जाती है।

       ऐतिहासिक आधार पर बाबर के बेटे हुंमायू ने भाग कर चौखण्डी में छिप कर शरण ली थी। जिससे उसकी जान बची अकबर (हुंमायू का बेटा) ने सन् 1588 में उसी स्मृति में चौखण्डी के ऊपरी भाग (शिखर) को बनवाया। उपरी भाग तक पहुँचने के लिए पैदल मार्ग है।

dhammek stupधम्मेक स्तूप : भगवान बुद्ध ने अपने धम्म का प्रथम ऐतिहासिक उपदेश पंचवर्गीय भिक्षुओं को जिस स्थान से दिया था वह धम्मेक या धमेक आदि नामों से जाना जाता है। यहीं से बुद्ध ने “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय और लोकानुकम्पाय” का आदेश पंचवर्गीय भिक्षुओं को दिया था। सम्राट अशोक ने इसे अति विशेष ईंटों एवं पत्थरों द्वारा 30 मीटर घेरे में गोलाकार और 46 मीटर ऊंचे एक स्तूप के रूप में बनवाया था। अशोक यहां अपने राज्यारोहण के 20 वर्ष बाद अपने गुरू मोंगलिपुत्र तिस्य के साथ आये थे। स्थिर पाल-वसन्तपाल के शिलालेख के अनुसार धम्मेक का पुराना नाम धर्मचक्र स्तूप था। प्रथम उपदेश देने के वजह से बौद्धअनुयायी इसे साक्षात बुद्ध मान कर इसकी पूजा वन्दना और परिक्रमा आदि करते हैं।

धर्म राजिक स्तूप : सम्राट अशोक से पूर्व भगवान बुद्ध की अस्थियों पर केवल आठ स्तूपों का निर्माण किया गया था। अशोक ने आठ स्तूपों में से सात की खुदाई करके उनमें से बुद्ध के शरीर की धातुओं को निकाल कर उनका विस्तार कर अनेक स्तूप बनवाये जो धर्मराजिक स्तूप कहलाये। ऐसा ही एक सारनाथ में बनवाया था। मूल स्तूप का व्यास 13.49 मीटर था। इस स्तूप का क्रमशः छः बार परिवर्द्धन किया गया। पहला कुषाण काल में और 5वीं था 6वीं शताब्दी में जब चारों ओर 4.6 मीटर चौड़ा प्रदक्षिणा पथ जोड़ा गया। तीसरी बार हर्षवर्धन के राज्यकाल (सातवीं शताब्दी) जब स्तूप की कुर्सी तक पहुंचने के लिए चारों दिशाओं में एक-एक एकाश्मक सोपान लगा दिये गये। चौथा परिवर्द्धन 9वीं या 10वीं शताब्दी तथा छठां 12वीं शताब्दी में हुआ। साथ ही कुमार देवी (बौद्ध) ने अपना धर्मचक्र जिन महाविहार में बनवाया था। कालान्तर में वाराणसी के राजा चेत सिंह और दीवान जगत सिंह ने 1794 में धर्मराजिक स्तूप को विध्वंस कर दिया था। जहां से 8.23 मी0 की गहराई पर एक गोलाकार पत्थर के सन्दूक में भगवान बुद्ध की अस्थियां पाई गयी थी। जिसे गंगा में बहा दिया गया। पत्थर का सन्दूक आज भी कलकत्ता के संग्रहालय में सुरक्षित है। वर्तमान समय में धमराजिक स्तूप के नाम पर मात्र नींव ही सुरक्षित है।

अशोक स्तम्भ : बुद्ध के दिये 84 हजार उपदेशों की देशना सेashok stambh प्रेरित अशोक ने बुद्ध के जीवन से सम्बन्ध रखने वाले स्थानों पर शैल स्तम्भ (पत्थर के स्तम्भ) बनवाए थे। स्तम्भों के अलावा शिलालेख चैत्य और बुद्ध विहारों का भी निर्माण कराया था। इसी कड़ी में निर्मित यह स्तम्भ मूलगन्ध कुटी से पश्चिम दिशा में बनाया गया था। मूल रूप से यह 15.25 मीटर ऊँचा था। जिसके ऊपरी सिरे पर चार सिंह (सिंह शीर्ष) थे। अब यह केवल 2.03 मीटर टूटे हुए डण्डे की तरह अपने वास्तविक स्थान पर खड़ा है। स्तम्भ का आधार 2.44 मीटर लम्बा, 1.83 मीटर चौड़ा व 0.46 मीटर मोटा पत्थर है। जिसके खांचे में शेष स्तम्भ खड़ा है। इस पर तीन लेख उत्कीर्ण है। पहला सम्राट अशोक ने ब्राह्मी लिपि में संघ के सम्बन्ध में लिखवाया है कि – “जो भिक्षु और भिलखुणी संघ में फूट डालेंगे और संघ की निंदा करेंगे उन्हें सफेद कपड़े पहना कर संघ से बाहर कर दिया जायेगा।”

अशोक सिंह शीर्ष (राजचिन्ह) : अशोक स्तम्भ के ऊपरी सिरे पर पीठ से सटाकर उकडूं मुद्रा में बैठे हुए चार सिंह चारों दिशाओं की तरफ मुँह किए स्थापित हैं। इस चारों सिंहों के उपर भगवान बुद्ध का 32 तिल्लियों वाला धम्म चक्र विद्यमान था। जो आज उसके ऊपर स्थापित नहीं है। वह सारनाथ संग्रहालय में प्रवेश करने के स्थान पर ही एक हॉल में सुरक्षित रखा गया है। इसकी उत्कृष्ट कलाकारी इसे अद्वितीय प्रतिमाओं में शामिल करती है जिसके कारण सरकार ने इसे अपना राजचिन्ह घोषित किया है। यह सिंह शीर्ष चार भागों में बंटा है। (1) पलटी हुई कमल की पंखुडियों से ढका हुआ कुम्भिका भाग (2) गोलाकार भाग जिसमें चार धर्मचक्र व चार पशु क्रमशः हाथी, वृषभ (सांड), अश्व व सिंह बने हुए हैं। (3) चारों सिंह एक दूसरे के विपरीत पीठ सटाकर चारों दिशाओं की ओर मुंह कर उकइं मुद्रा में बैठे हैं। (4) इन चारों के ऊपर धर्मचक्र स्थापित था जो अब नहीं है। यह प्रतिमा भूरे रंग की बलुआ की बनी है।

आधुनिक मूलगन्ध कुटी विहार : इसका शिलान्यास सन् 1922 में उत्तर प्रदेश के गवर्नर माननीय एच0आई बप्लर के कर कमलों से हुआ। mulgandhइसका निर्माण चार वर्षों तक रूका रहा। पुरातत्व विभाग के डायरेक्टर जनरल जॉन मार्शल ने विहार बनाने की स्वीकृति दी। चुनार के पत्थरों तथा ईंटों से निर्माण कार्य पूर्ण हुआ। 11 नवम्बर सन् 1931 को इसका उद्घाटन पुरातत्व विभाग के डायरेक्टर दयाराम साहनी ने किया। अनागारिक धम्मपाल जी ने नवनिर्मित बुद्ध विहार का नाम मूलगन्ध कुटी विहार रखा। यहां रखी बुद्ध की अस्थियों को हर वर्ष कार्तिक माह की पूर्णिमा वाले दिन श्रद्धालुओं के पूजन के लिए बाहर रखा जाता है और सम्पूर्ण सारनाथ में जुलूस के साथ परिक्रमा करके उसको दुबारा उसी स्थान पर रखा जाता है।  

  • – अरविन्द कुमार मिश्र

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