पत्रकार

काशी के पत्रकार

राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द

Raja siv prsadशिवप्रसाद का जन्म 03 फरवरी सन् 1820 को वाराणसी के भुतही इमली मुहल्ले में हुआ था। गृह नगर के ही शिक्षण संस्थानों से इन्होंने शिक्षा ग्रहण किया। पेशे से वकील शिवप्रसाद ने सन् 1852 में वाराणसी के मीर मुंशी का पद ग्रहण किया। सरकार द्वारा इनको सन् 1870 में ‘सितारेहिन्द’ एवं सन् 1874 में ‘राजा’ की उपाधि प्रदान की गई। राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द को वाराणसी के पत्रकारिता का जनक कहा जाता है। इनके द्वारा सन् 1845 में वाराणसी का प्रथम हिन्दी साप्ताहिक समाचार पत्र बनारस अखबार’ निकाला गया जो हिन्दी प्रदेश से निकलने वाला प्रथम हिन्दी पत्र था। इसके तत्कालीन संपादक रघुनाथ थत्ते थे, समाचार पत्र के सिद्धान्त की घोषणा इस प्रकार हुई-

सुबनारस अखबार यह शिवप्रसाद आधार। सुधि विवेक जन निपुन को चितहित बारंबार।।

गिरिजापति नगरी जहाँ गंगा अमर जलधार। नेत शुभाशुभ मुकुर को लाखों विचार-विचार।।

बनारस अखबार में हिन्दी-उर्दू मिश्रित भाषा का प्रयोग होता था जो उस समय की स्वाभाविक एवं सजीव भाषा थी, अखबार में स्थानीय समाचार होते थे तथा संस्कृत के कुछ अनुवादों को भी प्रकाशित किया जाता था। शिवप्रसाद अखबार में उर्दू का प्रयोग करते थे परन्तु उन्होंने हिन्दी के उन्नयन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। कई स्कूलीय पाठ्य-पुस्तकों को हिन्दी में तैयार किया। वह पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होने सरकारी एवं न्यायालय के कामकाज में उर्दू के स्थान पर हिन्दी प्रयोग की मांग की। कई विद्वानों ने इनको हिन्दी नवजागरण का अग्रदूत कहा, शिवप्रसाद हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी, संस्कृत, फारसी के विद्वान थे पर वे एक लिपी एक व्याकरण के हिमायती थे। वे हिन्दी-उर्दू साहित्य रचना के अतिरिक्त दर्शन, इतिहास, भूगोल, विज्ञान, एवं धर्मशास्त्र से सम्बन्धित विचारों को भी वे अपने लेखनी से व्यक्त करते थे। विभिन्न विषयों पर उनके लेख स्वाभाविक, सहज भाषा एवं बेजोड़ शैली में होता था। वास्तव में उन्होंने हिन्दी को उर्दू से प्रतिस्पर्धी बनाकर शिक्षित समाज में प्रतिष्ठित किया। वाराणसी की पत्रकारिता में इस अतुल्य योगदान को सदैव याद किया जायेगा।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

bhartendu harischand raहरिश्चन्द्र का जन्म 9 सितम्बर 1850 को भदैनी स्थित नाना खिरोधरलाल के घर हुआ था। ठठेरी बाजार निवासी गोपालचन्द्र इनके पिता एवं माता पार्वती देवी थीं, इनके पिता की गिनती काशी के रईसों में होती थी। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा ठठेरी बाजार स्थित महाजनी स्कूल में हुई उसके पश्चात क्वीन्स कालेज में प्रवेश लिया जहाँ इन्होंने कक्षा चार तक ही शिक्षा ग्रहण की। शिवाला मुहल्ले के रईस बाबू गुलाबराय की पुत्री मन्नो देवी से इनका विवाह हुआ। स्वभाव से स्वछन्दवादी हरिश्चन्द्र ने कुछ समय तक राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द के सानिध्य में रहकर कलम से आग उगलने की दीक्षा प्राप्त की। 15 अगस्त 1867 को काशी से कविवचन सुधा’ मासिक पत्रिका का प्रकाशन कर हिन्दी पत्रकारिता के नये युग का सूत्रपात किया, प्रारम्भ में इसमें कवितायें छपती थी पर शीघ्र ही यह पत्रिका पाक्षिक हो गई और इसमें राजनीतिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीयता पर लेख और समाचार भी प्रकाशित होने लगे। इसके पश्चात् हरिश्चन्द्र ने हरिश्चन्द्र मैगजीन’, बालाबोधिनी’ का भी सम्पादन किया। हरिश्चन्द्र मैगजीन का प्रकाशन 1873 में हुआ इसमें साहित्य, राजनीतिक, धर्म आलोचना, दर्शन, इतिहास, व्यंग्य आदि का समावेश होता था। यह पत्रिका अत्यन्त लोकप्रिय हुई और सरकार इसकी सौ प्रतियां खरीदती थी लेकिन अंग्रेज सरकार विरोधी देशभक्ति लेख ने जब पत्रिका में स्थान बनाना आरम्भ कर दिया तो सरकार ने इसे लेना बन्द कर दिया। महिलाओं के दशा से समाज को अवगत कराने के लिये हरिशचन्द्र ने 1874 में बालाबोधिनी’ पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ किया, यह पत्रिका नारी-जागरण के विचार से अत्यन्त महत्वपूर्ण थी, इसमें महिलाओं से सम्बन्धित विभिन्न विषयों पर लेख प्रकाशित होते थे।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने पत्रकारिता के माध्यम से राष्ट्र, समाज, एवं भाषा की लड़ाई लड़ते रहे, अपने लेख के माध्यम से जहाँ उन्होंने अंग्रेज शासकों द्वारा हो रहे अत्याचारों का विरोध किया वहीं कुछ गलत करने पर आम जनता को भी लताड़ लगाई। समाज में फैले झूठे आडम्बरों एवं कितने ही सामाजिक कुरीतियों पर व्यंग्य बाण से प्रहार करते थे जो मन को गुदगुदाने वाले एवं हृदय को झकझोरने वाले होते थे। स्वयं कई भारतीय भाषाओं के जानकार थे परन्तु हिन्दी भाषा के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया, वे उर्दू को हिन्दी की एक शैली मानते थे। अपने पत्रिकाओं में सरल सहज एवं स्पष्ट शैली के हिन्दी भाषा प्रयोग कर हिन्दी को जन साधारण तक पहुंचाने का सफल प्रयास किया।

बाबूराव विष्णु पराड़कर

padadker jiपराड़कर जी का जन्म 16 नवम्बर 1883 को काशी में हुआ था, इनके पिता विष्णुशास्त्री पराड़कर माता अन्नपूर्णा बाई थीं। इनके पिता संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान थे फलतः पराड़कर जी की भी शिक्षा सनातनी ब्राम्हणों की भाँति वैदिक रीति से हुई। प्रारम्भ में इन्होंने डाक-तार विभाग में नौकरी की लेकिन क्रान्तिकारियों से प्रभावित होकर यह नौकरी छोड़ दी और स्वयं क्रान्तिकारियों के दल में शामिल हो गये। पत्रकारिता की शुरूआत इन्होंने सन् 1906 में ‘हिन्दी बंगवासी’ से की उसके पश्चात ‘हितवार्ता’ ‘भारत मित्र’ केसरी में काम किया। हितवार्ता से इन्होंने राजनीतिक पत्रकारिता की शुरूआत की थी। पराड़कर जी की पत्रकारिता का जुनून सन् 1920 में काशी से प्रकाशित आज’ समाचार पत्र से शुरू हुआ, आज’ के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा कि ‘‘हमारा उद्देश्य देश के लिये सर्व प्रकार से स्वातन्त्रय उपार्जन ही है। हम हर बात को स्वतंत्र होना चाहते हैं’’, सन् 1938 में महिलाओं पर आधारित मासिक पत्रिका ‘कमला’ का प्रकाशन किया, इसके पश्चात 1943 में ‘संसार’ के संपादक का पद ग्रहण किया, परन्तु कुछ समय के पश्चात आज’ में संपादक के रूप में पुनः लौट आये। पराड़कर जी ने हिन्दी पत्रकारिता के पत्रकार कला को नया स्वरूप, नयी दिशा एवं नवीन गति प्रदान की, इनकी संपादन कला ने हिन्दी पत्रकारिता के मानदण्ड को स्थिर किया, अग्रलेख का स्वरूप तय किया, आज’ से पूर्व कोई भी हिन्दी पत्रों के अग्रलेख पर ध्यान नहीं देता था, लेकिन आज में प्रकाशित इनके राजनीतिक एवं अर्थशास्त्र सम्बन्धित अग्रलेख को विद्वान भी बड़े ध्यान से पढ़ते थे। ‘आज’ जब अंग्रेजों की दृष्टि में चढ़ा तो कुछ समय के लिये इसके प्रकाशन को बन्द कर पराड़कर जी ने गुप्त रूप से रणभेरी और खबर’ का सुव्यवस्थित ढंग से प्रकाशन किया। इसके संपादक एवं प्रकाशन स्थल का अंग्रेज शासक पता नहीं लगा सके। हिन्दी के विकास, भाषा-नीति और लीपि के सम्बन्ध में पराड़कर जी का योगदान महत्वपूर्ण है। उन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिये तर्क संगत और वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किये हिन्दी साहित्य में सर्व श्री, श्री, राष्ट्रपति, मुद्रास्फिती, लोकतन्त्र, स्वराज्य, वातावरण, वायुमण्डल, अर्न्तराष्ट्रीय आदि सैकड़ों शब्दों का नवीन अविष्कार किया। उन्होंने शब्द-प्रयोग, वाक्य विन्यास, क्रियायें और मुहावरों वचन एवं लिंग सम्बन्धित दोषों को दूर किया। इनकी लेखन शैली व्याकरण सम्मत एवं मुहावरेदार होती थी जिसमें कहीं भी कृतिमता नहीं होती थी। अपनी पत्रकारिता के माध्यम से ही जहां उन्होंने समाज में हो रहे अत्याचार, अन्याय, कुरितियों आदि का विरोध किया वहीं अंग्रेज सरकारों के विरूद्ध आम जनता में स्वतंत्रता प्राप्ति के लिये देशप्रेम की भावना को धार देने का भी काम किया।

 मुंशी प्रेमचन्द

      प्रेमचन्द का जन्म 31 जुलाई 1880 को काशी के लमही ग्राम में हुआ था। पत्रकारिता की शुरूआत इन्होंने सन् 1905 में‘जमाना’पत्रिका से की। कानपुर से छपने वाली इस पत्रिका में हकीम वरहम के उपन्यास ‘कृष्णकुँवर’ संबंधी प्रथम आलोचनात्मक निबन्ध के प्रकाशन के बाद तत्कालीन सम्पादक मुंशी दयानारायण निगम ने पत्र के सम्पादन, टिप्पणी लेखन और अनुवाद इत्यादि कार्यों में भी प्रेमचन्द का सहयोग लेना प्रारंभ कर दिया। तत्पश्चात् सन 1923 में प्रेमचन्द ने कुछ समयावधि के लिए काशी से ‘मर्यादा’ (मासिक) का प्रकाशन किया। मार्च सन 1930 में‘साहित्य और स्वदेश की सेवा’ जैसे आदर्श विचारधारा के साथ प्रेमचंद ने ‘हंस’ नामक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया। काशी से प्रकाशित होने वाले इस साहित्यिक मासिक पत्र द्वारा प्रेमचन्द ने हिन्दी भाषा ही नहीं स्वतन्त्रता की भी लड़ाई लड़ी। हंस के प्रथम सम्पादकीय में ही पत्र-नीति की घोषणा इस प्रकार हुई-

      ‘भारत ने शान्तिमय समर की भेरी बजा दी है, ‘हंस’ भी मानसरोवर की शान्ति छोड़कर, अपनी नन्हीं सी चोंच में चुटकी भर मिट्टी लिये समुद्र पाटने, आजादी के जंग में योग देने चला है।’

      लगातार घाटे और सन 1930 में जमानत जब्त होने के बावजूद प्रेमचन्द ने हंस के उग्र रूख को बनाए रखा। सन् 1932 में इन्होंने ‘जागरण’ पत्र का प्रकाशन भी शुरू कर दिया। पत्रकारिता के क्षेत्र में बाधक तत्कालीन परिस्थितियों में इन पत्रों से प्रेमचन्द ने जिस आदर्श को स्थापित किया, वह सदा स्मरण किया जायेगा।

मदन मोहन मालवीय

     मालवीय जी का जन्म 25 दिसम्बर सन 1861 को प्रयाग में हुआ था। इन्होंने कालाकांकर (प्रतापगढ़) के राजा रामपाल सिंह के आमंत्रण पर उनके पत्र ‘हिन्दोस्थान’ में सन 1885 में बतौर सम्पादक पत्रकारिता जीवन की शुरूआत की और आपसी मतभेद के कारण 1888 में नौकरी छोड़ दी। तत्पश्चात् 1891 में ‘इण्डियन ओपीनियन’ पत्र का प्रकाशन किया। बिहार के सच्चिदानन्द सिन्हा द्वारा क्रमशः सन 1893 और 1903 में प्रकाशित ‘हिन्दुस्तान रिव्यू’ और ‘इण्डियन पीपल’ में भी मालवीय जी का सहयोग था। सन 1907 में प्रयाग से मालवीय जी ने ‘अभ्युदय’ तेजस्वी पत्र का प्रकाशन किया और इस साप्ताहिक पत्र का स्वतंत्रता संग्राम में उल्लेखनीय योगदान रहा। सन 1909 में प्रयाग में ‘मालवीय शेष लीडर’ प्रकाशन हुआ। अनेक मित्रों के सहयोग से शुरू इस पत्र में मालवीय जी 20 वर्षों तक संपादक बने रहे। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद काशी में रहते हुए सन 1933 में काशी से प्रकाशित होने वाले ‘सनातन धर्म’ साप्ताहिक पत्र के संरक्षक और संचालक की गुरूत्तर भूमिका निभाना शुरू किया। मालवीय जी ने समय-समय पर अन्य पत्र संचालकों की भी सहायता की, उदाहरण के तौर पर सन 1909 में प्रयाग के ‘स्वराज्य’ को आर्थिक मदद दी। इसके अतिरिक्त ‘भारत’, ‘हिन्दुस्तान’,’मर्यादा’ आदि पत्रों के मूल प्रेरणा स्रोत भी रहे।

कृष्णदेव प्रसाद गौड़ (बेढ़ब बनारसी)

     बेढ़ब बनारसी का जन्म सन् 1895 में हुआ। सन् 1930 में काशी से प्रकाशित होने वाली साप्ताहिक पत्र ‘भूत’ के संस्थापक सम्पादक रहे। बेढ़ब बनारसी हास्यव्यंग्य पत्रकारिता के बहुमूल्य निधि थे जिन्होंने काशी के रंग-तरंग को बखूबी जगजाहिर किया। इनके व्यंग्य लेखन में अगर चुभन का अहसास था तो दो पल में वह गुदगुदी भी पैदा कर देता था। ये सन 1934 में हास्य व्यंग्य पत्रिका ‘खुदा की राह पर’ का सम्पादन प्रारंभ करने के साथ तरंग (हास्य व्यंग पत्र) और अन्य कई पत्रों के भी संपादक रहें। वाराणसी से प्रकाशित दैनिक ‘आज’ में भी कई वर्षों तक बेढ़ब बनारसी ने हास्य व्यंग्यपूर्ण टिप्पणी लेखन का कार्य किया। साथ ही डी0ए0वी0 इण्टर कॉलेज के प्रधानाचार्य पद के कर्तव्य का सफल निर्वाहन किया।

पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र

     उग्र जी का जन्म 1900 ई0 में उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में हुआ थ। ये मनोविनोदी होने के साथ-साथ पत्रकारिता के भी प्रेमी रहे व सन 1921 में काशी से ‘उग्र’ नामक पत्र का सम्पादन किया। तत्पश्चात् 1924 में प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक पत्र ‘भूत’ में प्रधान संपादक बालचन्द्र अष्ठाना के सहयोगी भूमिका में रहे। इसी वर्ष कलकत्ता में प्रकाशित ‘मतवाला’ पत्र में हास्य व्यंग्य की विशिष्ट स्तम्भ लेखन का कार्य शुरू किया। कुछ वर्षों बाद उग्र जी ने पुनः ‘उग्र’ पत्र का प्रकाशन शुरू किया। सन् 1942 ई0 में उज्जैन से प्रकाशित होने वाले मासिक पत्र ‘विक्रम’ और 1945 के उपरान्त 1948  में मिर्जापुर से ‘मतवाला’ का प्रकाशन प्रारंभ किया। फिर 1954 में दिल्ली से प्रकाशित ‘उग्र’ साप्ताहिक का सम्पादन किया। दिल्ली के ‘हिन्दी पंच’, इन्दौर के ‘स्वराज्य’ तथा ‘वीणा’ और काशी की ‘खुदा की राह’ पत्रिका में भी इनका उल्लेखनीय सहयोग रहा। हिन्दी, अंग्रेजी सहित कई भाषाओं के मर्मज्ञ उग्र जी का देहांत 1967 में हो गया।

रामचन्द्र वर्मा

     जनवरी सन 1890 में काशी में जन्में श्री रामचन्द्र वर्मा के पत्रकार जीवन का प्रारम्भ नागपुर में प्रकाशित साप्ताहिक ‘हिन्द केसरी’ से 1907 में हुआ। तत्पश्चात् एक वर्ष तक ‘बिहार बन्धु’ के सहकारी सम्पादन कर 1913 से 1916 तक काशी से प्रकाशित ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ के भी सम्पादक रहे। प्रथम विश्वयुद्ध के समय दैनिक बने ‘भारत जीवन’ पत्र में इनका सम्पादन सहयोग रहा एवं बाबू रामकृष्ण वर्मा के मृत्यु के बाद ‘भारत जीवन’ के प्रधान सम्पादक रहे। रामचन्द्र वर्मा का निधन सन् 1961 में हुआ।

गंगाप्रसाद गुप्त

     गुप्त जी के पत्रकार जीवन की शुरूआत सन् 1903 में काशी के प्रकाशित ‘मित्र’ नामक मासिक पत्र से हुआ था। यहीं से प्रकाशित ‘भारतजीवन’ (साप्ताहिक) के सम्पादकीय विभाग में 1904 में कार्य किया। तत्पश्चात् 1905 में काशी से प्रकाशित ‘इतिहास माला’ (मासिक) और 1907 में नागपुर से प्रकाशित ‘हिन्द केसरी’ में प्रधान सम्पादक रहे। 1914 में स्वयं ही काशी से ‘हिन्द केसरी’ का संचालन किया। साथ ही ‘श्री वेकेंटश्वर समाचार’ (बम्बई) और ‘मारवाड़ी पत्र’ (नागपुर) में भी क्रमशः 1907 और 1909 में सहायक सम्पादक की भूमिका में रहे। काशी से प्रकाशित होने वाला ‘हिन्द केसरी’ इनके पत्रकार जीवन का अन्तिम पत्र रहा।

पं0 गंगाशंकर मिश्र

      पं0 गंगाशंकर मिश्र का जन्म सन 1887 में हरदोई जिले के भगवन्त नगर में हुआ था। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर की शिक्षा के दौरान ही ‘अभ्युदय’ में लिखना प्रारंभ कर दिया था। सन 1919 से लगभग 28 वर्षों तक कमच्छा स्थित तैलंग लाइब्रेरी में लाइब्रेरियन पद पर कार्य करने के बाद इन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के सयाजी राव गायकवाड़ पुस्तकालय (केन्द्रीय ग्रंथालय) के ग्रन्थालयाध्यक्ष का पदभार संभाला। पुस्तकालय विज्ञान की विधिवत शिक्षा नहीं ग्रहण करने के बावजूद पंडित जी ने पुस्तकालय विज्ञान के क्षेत्र में सरल पद्धतियों का सूत्रपात किया। पं0 गंगाशंकर मिश्र को ‘मंडन मिश्र’,’किताबी कीड़ा’इत्यादि भिन्न-भिन्न नामों से भी जाना जाता है। ‘किताबी कीड़ा’ नाम से वे आहार-विहार, साफ-सफाई इत्यादि विषयों पर भी लिखा करते थे। भारतीय संस्कृति के विभिन्न विषयों पर ‘छानबीन’ नाम से ज्ञानमंडल यंत्रालय से प्रकाशित 14 खण्डों में विभक्त 280 लेखों का निबंध संग्रह उल्लेखनीय है। पंडित जी ने वाराणसी और कलकत्ता से प्रकाशित होने वाले ‘सन्मार्ग और ‘सिद्धान्त’ पत्रिका का भी संपादन किया।

मुकुन्दीलाल श्रीवास्तव

     25 अक्टूबर 1896 को मध्यप्रदेश के ग्राम गौर झामर, जिला सागर में जन्में श्री मुकुन्दीलाल श्रीवास्तव को काशी के पत्रकार परम्परा की श्रृंखला का सशक्त कड़ी माना जाता है। काशी से प्रकाशित दैनिक ‘आज’ पत्र से इन्होंने अपने पत्रकारिता जीवन की शुरूआत की और फरवरी 1921 से जुलाई 1921 तक इसके सहायक सम्पादक रहे। सन् 1938 में ‘आज’ के साप्ताहिक अंक के प्रकाशन शुरू किये जाने पर विनोद शंकर व्यास के साथ मुंकदी लाल जी प्रधान सम्पादक नियुक्त हुए। लगभग 5 वर्षों तक इसमें कार्य करने के पश्चात वे 1943 में दैनिक पत्र ‘संसार’ में चले गये। इन दो प्रमुख हिन्दी पत्रों के साथ इन्होंने युगधारा (मासिक) और ज्ञानमण्डल यन्त्रालय से प्रकाशित होने वाले मासिक पत्र ‘स्वार्थ’ का भी सम्पादन किया। सन 1984 में इनका निधन हुआ।

पण्डित माधव प्रसाद मिश्र

     श्री माधव प्रसाद मिश्र का जन्म सन 1871(भाद्रशुक्ल 13 संवत् 1928) में पंजाब के हिसार जिले में भिवानी के पास कूंगड़ नामक ग्राम में हुआ था। सनातन धर्म के समर्थक पण्डित माधव प्रसाद मिश्र ने देवकीनन्दन खत्री की सहायता से जनवरी, सन् 1900 में काशी से ‘सुदर्शन’ नामक मासिक पत्रिका का प्राकाश्न प्रारंभ किया। इस पत्र का प्रमुख उद्देश्य हिन्दी भाषा और सनातन धर्म का प्रचार करना था। हिन्दी भाषा की प्रबल समर्थन के अतिरिक्त सुदर्शन में तत्कालीन पत्रकारिता एवम् स्वदेश प्रेम संबंधी कई लेख प्रकाशित हुए। जब महामना मालवीय जी ने छात्रों को राजनीतिक आन्दोलनों से दूर रहने की सलाह दी तब ‘सुदर्शन’ में उनके नाम एक अत्यन्त शोभापूर्ण ‘खुली चिट्ठी’ छापी गई। मिश्र जी ने ‘सुदर्शन’ के अतिरिक्त ‘वैश्योपकारक’ का भी सम्पादन किया। लेकिन अर्थाभाव के कारण ‘सुदर्शन’ ढ़ाई वर्ष चलकर बन्द हो गया और ‘वैश्योपकारक’ भी लगभग दो वर्ष तक चला। 1994 में प्लेग के कारण असमय मृत्यु के शिकार हो गये।

सम्पादकाचार्य लक्ष्मण नारायण गर्दे

     गर्दे जी का जन्म सन् 1889 में महाशिवरात्रि के दिन हुआ था। अपने पत्रकारिता जीवन की शुरूआत इन्होंने थाणे के मराठी पत्र ‘हिन्दू पंच’ से की। तत्पश्चात् ‘वेंकेण्टेश्वर समाचार’ में कुछ ही दिनों तक काम करने के बाद ये काशी लौट आये। सन 1908 में पराड़कर जी की प्रेरणा से कलकत्ता के ‘हिन्दी बंगवासी’ से सम्पादकीय जीवन का प्रारम्भ किया और कुछ ही दिनों में ‘भारत मित्र’ के सहकारी सम्पादक नियुक्त हो गए। भारत मित्र में काम करते हुए गर्दे जी ने महाराष्ट्र रहस्य- लेखमाला चलायी व सन 1913 में गणपति कृष्ण गुर्जर के सहयोग से काशी में ‘नवनीत’ नामक पत्र का प्रकाशन किया। इस पत्र की विशिष्टता श्री सम्पूर्णानन्द, पं0 बनारसी दास चतुर्वेद, पण्डित रामनारायण, हनुमान प्रसाद पोद्दार जैसे विद्वानों के लेख का प्रकाशन था। सम्पूर्णानन्द जी का सबसे पहला लेख और पहले ग्रन्थ का कुछ भाग छापने का श्रेय नवनीत को ही जाता है। लेकिन अर्थाभाव के कारण ढाई वर्ष बाद इस पत्र को बन्द कर देना पड़ा।

      सन् 1919 के लगभग गर्दे जी को ‘भारतमित्र’ के सम्पादकीय विभाग में शामिल किया गया और कुछ ही दिनों में प्रो0 प्रधान सम्पादक बन गये। इन्होंने सन् 1925 में कलकत्ते से ‘श्रीकृष्ण संदेश'(साप्ताहिक) का प्रकाशन किया और इसके बाद वे ‘विजय’ नामक पत्र के भी सम्पादक रहे। काशी से प्रकाशित दैनिक ‘सन्मार्ग’ में ‘चक्रपाणी’ के नाम से लेखन कार्य किया। लखनऊ के ‘असोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड’ से प्रकाशित ‘नवजीवन’ गर्दे जी के जीवन का अंतिम पत्र था। हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में श्री लक्ष्मी नारायण गर्दे का महत्वपूर्ण योगदान रहा। उहाहरण के तौर पर सन 1915 में गांधीजी के काशी आगमन पर गर्दे जी ने भारत मित्र के विशिष्ट प्रतिनिधि की हैसियत से इण्टरव्यू लिया था। हिन्दी पत्रों में तथा पत्रकारिता में ‘इण्टरव्यु’ (भेंटवार्ता) की आधुनिक पद्धति का प्रवर्तन और प्रचलन का श्रेय इन्हें ही जाता है। डॉ0 सम्पूर्णानन्द की पुस्तक ‘कर्मवीर गांधी’ को ‘ग्रन्थ प्रकाशित समिति की ओर से बतौर संस्थापक छपवाने की जिम्मेदारी मिलने पर इन्होंने ‘कर्मवीर’ हटाकर ‘महात्मा’ शब्द रख दिया। यानि गांधी के साथ ‘महात्मा’ शब्द जोड़ने का परोक्ष श्रेय गर्दे जी को है। कलकत्ते से प्रकाशित होने वाले पत्र ‘विश्वमित्र’ और ‘विशाल भारत’ का नाम गर्दे जी ने ही रखा था। सन् 1960 में इनका देहांत हो गया।

गोविन्दशास्त्री दुग्वेकर  

     सागर (मध्य प्रदेश) के निवासी श्री गोविन्द शास्त्री ‘दुग्वेकर’ का जन्म 17 सितम्बर 1883 को हुआ था। अपने पत्रकार जीवन की शुरूआत इन्होंने सन 1905 में लोकमान्य तिलक के प्रेरणा से पूना के साप्ताहिक पत्रों ‘हिन्दूपंच’ एवम् ‘अरूणोदय’ के सम्पादन से की। सन 1908 में ‘अरूणोदय’ छोड़कर दुग्वेकर जी काशी चले आये और भारतेन्दु (मासिक) के सम्पादक नियुक्त हुए। इसके उपरान्त 1923 में यहीं से ‘भारतवर्ष’ तथा ‘आर्य महिला’ का सम्पादन किया। जबकि सन 1915 ‘निगमागम चन्द्रिका’ और बालाबोध का भी सम्पादन किया। हिन्दू संस्कृति के कट्टर समर्थक के रूप में कई धार्मिक पत्र-पत्रिकाओं से सम्बद्ध रहने एवं संपादन करने के बाद 1931 में अन्तिम पत्रिका ‘गृहस्थ’ (मासिक) की सम्पादन की और 26 जून 1931 को इनका निधन हो गया।

दुर्गाप्रसाद खत्री

     गोस्वामी जी का जन्म जनवरी 1966 में उत्तर प्रदेश के वृन्दावन नामक स्थान पर हुआ था। इनके पत्रकार जीवन का प्रमुख क्षेत्र काशी ही रहा और 1817 में इन्होंने ‘उपन्यास’ पत्रिका का प्रकाशन कर हिन्दी में कथा पत्रकारिता की शैली प्रारम्भ की। सन 1906 में काशी से प्रकाशित होने वाले ‘बाल प्रभाकर’ का भी सम्पादन किया। इससे पूर्व 1900 में नागरी प्रचारिणी सभा के अनुमोदन में 3 वर्षों तक सरस्वती के प्रकाशन के समय इसके पांच सम्पादकों से एक रहे। सन 1932 में गोस्वामी जी का निधन हो गया।

रामकृष्ण रघुनाथ खाडिलकर

     खाडिलकर जी का जन्म 1 अप्रैल 1914 को महाराष्ट्र में हुआ था। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से बी0एस0सी0 परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद सन् 1935 ई0 में ‘आज’ में कार्यरत हुए। पूर्व में विभिन्न मराठी पत्रों में लेखन के पश्चात् सन् 1936 ई0 में ‘आज’ के सम्पादकीय विभाग में शामिल होना महाराष्ट्रीय खाडिलकर जी के कृतित्व के उज्जवल पक्ष को उजागर करता है। जुलाई 1937 में कुछ महीनों के लिए ‘आज’ से इनका सम्बन्ध विच्छेद हो गया था। 1942 में ‘आज’ का प्रकाशन कुछ काल के लिए स्थगित कर दिये जाने पर खाडिलकर जी का सम्बन्ध ‘आज’ से पुनः छूट गया तथा सितम्बर 1942 में काशी से प्रकाशित दैनिक पत्र ‘खबर’ के प्रधान सम्पादक नियुक्त हुए। ‘खबर’ के संचालकों द्वारा 1943 में प्रकाशित दैनिक ‘संसार’ में सह सम्पादक नियुक्त हुए। इसी वर्ष अक्टूबर में ‘संसार’ के साप्ताहिक संस्करण का बम्बई से प्रकाशन प्रारम्भ होने पर इन्हें बम्बई जाना पड़ा और 1994 तक ये पत्र के सम्पादक तथा प्रेस मैनेजर के पद पर कार्य करते रहे। 1914 के अगस्त माह में ‘संसार’ द्वारा ही संचालित लखनऊ से प्रकाशित ‘अधिकार’ पत्र में डेढ़ वर्ष सम्पादन के बाद 1946 में पुनः ‘संसार’ में इनका आगमन हुआ। सितम्बर 1947 में लखनऊ के ‘नवजीवन’ पत्र में लक्ष्मण नारायण गर्दे जी के नेतृत्व में उपसम्पादक पद संभाला और सन 1948 में पुनः ‘आज’ में उप सम्पादक हो गये। सन् 1955 में पराकडकर जी के मृत्यु के बाद इन्हें स्थानापन्न सम्पादक की भूमिका भी निभानी पड़ी एवम् 1956 की फरवरी माह में ‘आज’ के प्रधान सम्पादक तथा ज्ञानमण्डल संस्थान बोर्डस ऑफ डाइरेक्टर्स के सदस्य बनाये गये। सन 1957 में ज्ञानमण्डल लिमिटेड के अध्यक्ष बन जाने के बाद अपने कार्यक्षेत्र में विस्तार करते हुए ‘आज’ में नये-नये और लोकप्रिय स्तम्भ निकाला और ‘आज’ को भारत का सर्वश्रेष्ठ हिन्दी दैनिक बनाने का प्रयन्त किया। इससे पूर्व 25 मार्च 1942 से ‘आज’ में पहले पृष्ठ पर बिना डबल कालम के मेकअप करने का श्रेय इन्हें ही जाता है। सम्पादकीय प्रतिभा के गुणी खाडिलकर जी का निधन 25 फरवरी 1960 को हुआ।

पं0 रघुनंदन प्रसाद शुक्ल अटल  

     रघुनंदन प्रसाद का जन्म सन 1903 (संवत् 1960 की गोपाष्टमी के दिन) में काशी के श्री गोविन्द प्रसद शुक्ल के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में हुआ था। धनाभाव के कारण वाराणसी के हरिश्चन्द्र कालेज से 10वीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद हिन्दू स्कूल, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की इण्टरमीडिएट कक्षा में प्रवेश लेने पर भी रघुनंदन जी को पढाई छोड़नी पड़ी। लेकिन अपने अल्प स्वाध्याय एवं भाषिक कौशल के बल पर इन्होंने बंबई के ‘वेंकटेश्वर समाचार’ दैनिक के सम्पादकीय विभाग में स्थान पा लिया। संस्कृत, हिन्दी, गुजराती अन्य कई भारतीय भाषाओं के ज्ञाता रघुनंदन जी को अपनी बीमारी के कारण पत्र के प्रमुख संपादक का पद अस्वीकार कर काशी लौटना पड़ा। स्वस्थ होते ही ये तत्कालीन प्रतिष्ठित हिन्दी दैनिक ‘आज’ के सम्पादकीय विभाग में आ गये, जहां इन्होंने बाबू राव विष्णु पराड़कर और पंडित कमला पति त्रिपाठी जैसे विख्यात सम्पादकों के वरिष्ठ सहयोगी के रूप में कार्य किया। पराड़कर जी के ‘संसार’ के संपादक बनने पर रघुनंदन जी उनके सबसे भारेसेमंद सहयोगी के रूप में साथ गये। तत्पश्चात् रघुनंदन जी ने ‘पंडित’ पत्रिका का सम्पादन किया। वही स्वामी करपात्री जी के धर्मसंर्घ के दैनिक पत्र ‘सन्मार्ग’ के काशी, कलकत्ता और दिल्ली संस्करणों की सफलतापूर्वक स्थापना का श्रेय इन्हें ही जाता है। नागरी प्रचारिणी सभा के हिन्दी विश्वकोश और सांगवेद विद्यालय के महत्वपूर्ण ग्रन्थों के सम्पादन के अतिरिक्त रघुनंदन जी ने हिन्दी, संस्कृत और उर्दू में कई कविताएँ, निबंध और कहानियाँ लिखीं। गीवार्ण वाग्वर्धिनी सभा (काशी) द्वारा अपनी स्वर्ण जयन्ती पर द्वितीय महायुद्ध से घिरे विश्व में शान्ति के प्रचार-प्रसार के लिए तैयार मराठी ग्रन्थ के हिन्दी अनुवाद का कार्य रघुनंदन जी को ही सौंपा गया था एवं इस अनुवाद को ‘शान्ति के अग्रदूत’ नाम से जाना जाता है। रघुनंदन जी द्वारा रचित ‘वरंगल की रानी’ (वीर-रस का लघु खण्ड काव्य), ‘शिव संकीर्तन’ (शिव विषयक आख्यानों पर आधारित कविताओं का संग्रह) और श्रीमगवत हिन्दी का पद्यात्मक विशाल काव्य की गणना साहित्य की कालजयी कृतियों में होती है। इसके अतिरिक्त नाट्यशास्त्र, अभिनय कला और संगीत-नृत्य शास्त्र के क्षेत्र में रघुनंदन जी का योगदान सदा स्मरणीय और चिरास्थायी है। अक्टूबर 1965 में गले के कैंसर से अल्पायु में इनकी मृत्यु हो गयी।

मनोरंजन कांजिलाल

     कांजिलाल का जन्म 25 दिसम्बर 1919 को बंगाल के जैसोर (अब बंगला देश) के छोटे से गांव में हुआ था। व्यंग चित्रकार कांजिलाल का पत्रकार जीवन कलकत्ता में निकाले जा रहे बाबू जगदम्बा प्रसाद गुप्त के मासिक पत्र ‘सज्जन’ से शुरू हुआ था। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय कलकत्ता में बम वर्षा होने पर ये काशी आकर बय गये और सिनेमा के बैनर, पोस्टर बनाकर जीवन यापन करना शुरू किया। सन 1943 में दैनिक ‘संसार’ (काशी) के प्रकाशन शुरू होने पर कांजिलाल ने कार्टूननिस्ट के रूप में अपनी पहचान बनाई। ‘दादा’ के नाम से इन्होंने ‘संसार’ के बाद ‘आज’ दैनिक में प्रवेश लिया और इस प्रमुख दैनिक पत्र में लगभग 32 वर्ष तक बने रहे। सन 1981 में काशी से ‘दैनिक जागरण’ के प्रकाशन होने पर कांजिलाल उसमें चले गये और जीवन के अन्त समय तक वही कार्य किया। इन्होंने जीवन्त प्रखर व्यंग चित्रकार के रूप में देशभर में ख्याति अर्जित की। 19 दिसंबर 1985 को 74 वर्ष की उम्र में इनका निधन हो गया।

विद्याभास्कर

     विद्याभास्कर का जन्म 28 जून 1913 को हुआ था। इनके पिता आदिमूर्ति अपने समय के प्रतिष्ठित तमिल कवि व साहित्यकार थे एवम् रंगून में ‘तमित्व दैनिक’ पत्र का प्रकाशन व संपादन किया था। इन्होंने अपने पत्रकार जीवन की शुरूआत 1930-31 में ‘एसोसिसटेड प्रेस’ के संवादाता के रूप में किया जबकि इनका प्रथम लेख 1927 में ‘सरस्वती’ में प्रकाशित हुआ था। तत्पश्चात ये ‘अग्रगामी’ में सहायक संपादक और बाद में संपादक बने। सन 1934 में लगभग एक वर्ष तक पटना से प्रकाशित ‘आर्यावर्त’ के स्थानीय संपादक रहने के बाद पटना से ही निकलने वाले ‘राष्ट्रवाणी’ अखबार के संपादक पद का दायित्व संभाला। सन् 1942 में विद्याभास्कर के संपादकत्व में काशी से ‘आज’ का पुनः प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। सन् 1945 में ‘आज’ से त्याग पत्र देकर वे जबलपुर के ‘जयहिन्द’ दैनिक के संपादन विभाग से जुड़े एवम् 1946 में संयुक्त प्रान्त सरकार के निमंत्रण पर सूचना विभाग में हिन्दी पत्रकारिता विभाग के अधिकारी नियुक्त हुए। सन 1950 में इलाहाबाद से ‘अमृत पत्रिका’ के प्रकाशन होने पर विद्याभास्कर इसके संपादक बनाये गये तथा 1951 में इसके प्रकाशन बन्द होने पर हिन्दी साहित्य सम्मेलन और हिन्दुस्तान आकादमी में कार्य किया। सितम्बर 1966 में वे ‘आज’ वाराणसी से जुड़े और 1983 तक कार्य किया। ‘आज’ में ये ‘राष्ट्रभक्त’ नाम से ‘अपना भारत’ नामक स्तम्भ लिखा करते थे। साथ ही उन्होंने शेरशाह सूरी की जीवनी और ‘राजा भोज’ की कहानियाँ जैसी उल्लेखनीय कृतियां रची। ये उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रहे। 19 दिसम्बर 1984 को इनका निधन हो गया।

रमापति राय शर्मा 

     रमापति राय शर्मा का जन्म सन 1907 में हुआ था। इनके पिता का नाम यमुना राय था। सिकन्दरपुर (बलिया) के करमौता गांव के मूल निवासी शर्मा जी की शिक्षा-दीक्षा बंगाल में हुई। इनके पत्रकार जीवन की शुरूआत कलकत्ता से प्रकाशित होने वाले पत्र ‘विश्वमित्र’ से हुई। हिन्दी, अंग्रेजी के प्रकाण्ड विद्वान रमापति राय शर्मा वाराणसी से प्रकाशित होने वाले ‘आज’, ‘गांडीव’ और लखनऊ के नवजीवन में भी कार्यरत रहे। इनका निधन 19 जुलाई 1974 को हुआ।

पं0 कमला प्रसाद अवस्थी अशोक 

     पं0 कमला प्रसाद अवस्थी का जन्म 1 दिसम्बर 1914 को काशी के टेढ़ीनीम मुहल्ले में हुआ था। इनके माता-पिता का नाम और सिद्धेश्वरी देवी था। सन 1936 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से बी0ए0 और बी0टी0 की उपाधि प्राप्त करने के पश्चात इन्होंने ‘गीताधर्म’ (मासिक) काशी से सहायक संपादक का कार्य आरंभ किया। सन 1938 में साप्ताहिक ‘स्वदेश’ (गोरखपुर) के प्रबंध संपादक के बाद 1939 में दैनिक ‘अग्रगामी’ (वाराणसी) के सम्पादक मण्डल में शामिल हुए जहां 1940 तक कार्य किया। सन 1943 में आज में वरिष्ठ उपसम्पादक और 1944-45 में दैनिक ‘संसार’ में वरिष्ठ संपादक का कार्यभार संभाला। अवस्थी जी ‘सन्मार्ग’ दैनिक में संयुक्त संपादक रहे। बंगाली टोला हाईस्कूल में अध्यापक अवस्थी जी 1941-43 तक गोमती विद्यालय फूलपुर (इलाहाबाद) में प्रधानाध्यापक भी रहे। तत्पश्चात् प्रयाग से प्रकाशित ‘अमृत पत्रिका’ और भारत में 1950-60 तक मुख्य सहायक सम्पादक का कार्यभार संभाला। सन 1961 से पुनः दैनिक ‘आज’ में सहायक सम्पादक के रूप में कार्य किया एवं 1978 से दैनिक ‘गांडीव’ में अनुबन्धित समाचार सम्पादक बने। इन्हेंने संस्कृत निष्ठ हिन्दी पर अच्छी पकड़ रखते हुए 1972 में ‘दुर्गा सप्तमी’ का पद्यानुवाद किया। इनकी अन्य प्रमुख कृतियाँ कविता संग्रह ‘अशोक मंजरी, राग-विराग एवम् निबन्ध संग्रह ‘काव्यदी’ है। पत्र-पत्रिकाओं में उल्लेखनीय लेखन के योगदान हेतु अवस्थी जी को सन 1992 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा एवम् ‘जनमाध्यम’ संस्थाओं सहित अन्य संस्थाओं ने सम्मानित किया। इनकी मृत्यु 5 मई 1998 को हुई।

पं0 कमलापति त्रिपाठी

     पण्डित कमलापति त्रिपाठी का जन्म 3 सितम्बर 1905 को काशी में हुआ था। इन्होंने अपने सम्पादकीय जीवन की शुरूआत सन 1934 में ‘आज’ से दैनिक से की। सन् 1943 में ‘आज’ छोड़ने के बाद ‘संसार’ के प्रधान सम्पादक बने। तत्पश्चात् 1943 से 1952 तक काशी से प्रकाशित होने वाले पत्रों ‘ग्रामसंसार’ ‘आंधी’ ‘युगधारा’ आदि के संपादन का कार्य करने वाले त्रिपाठी जी की रूचि पत्रकारिता की रूचि पत्रकारिता के साथ राजनीतिक में भी रही और उत्तर प्रदेश के मंत्री, मुख्यमंत्री, रेलवे मंत्री, सहित देश के अन्य कई महत्वपूर्ण पदों को इन्होने सुशोभित किया। इन्होने राजनीति, पत्रकारिता आदि विषयों पर विभिन्न विचारोत्तेजक लेखों के साथ कई पुस्तके भी लिखी हैं।

पं0 देवनारायण द्विवेदी

     द्विवेदी जी का जन्म सन 1886 में उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के ग्राम भईंसा में हुआ था। इनके पिता पं0 रामप्रसाद द्विवेदी संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान थे। द्विवेदी जी का प्रारंभिक कार्य क्षेत्र कोलकाता था। जहां इन्होंने प्रसिद्ध नाट्य संस्था ‘हिन्दी नाट्य परिषद’ की स्थापना की। ‘काशी समाचार’ के प्रधान संपादक की भूमिका के अतिरिक्त द्विवेदी जी ने ‘कर्तव्याधात’ ‘प्रणय’, ‘पश्चाताप’, ‘दहेज’ आदि अनेक मौलिक हिन्दी उपन्यासों की रचना की। साथ ही बंगला भाषा पर अच्छी पकड़ होने के कारण प्रसिद्ध बंगाल विद्वानों रवीन्द्रनाथ टैगोर के ‘गोरा’, ‘मिलन मंदिर’ एवम् योगीराज अरविन्द घोष की ‘धर्म और जातीयता’, ‘गीता की भूमिका’, ‘अरविन्द मन्दिर’ तथा ‘शरत साहित्य’ का हिन्दी में भावात्मक अनुवाद किया है। रवीन्द्रनाथ टैगोर की ‘गीतांजलि’ का हिन्दी रूपान्तरण इनकी काव्य प्रतिभा का अद्भुत प्रमाण है। द्विवेदी जी ने इसके अतिरिक्त रामचरित मानस, विनय पत्रिका, कवितावली, हनुमानबाहुक की व्याख्या टीका सहित की।

      पं0 देवनारायण द्विवेदी अपनी पुस्तकों ‘देश की बात'(1923), ‘किसान सुख साधन’ के कारण अंग्रेजी सरकार के आंख की किरकिरी बन गये और इन पुस्तकों को जब्त कर ली गयी। यही नहीं, इनके संपादकत्व में वाराणसी से प्रकाशित होने वाले ‘काशी समाचार’ पत्र को पराधीनता युग का निष्पक्ष राष्ट्रीय पत्र होने से कागज का कोटा नहीं दिया गया था। ज्ञानमंडल लिमिटेड वाराणसी में अपने अध्यक्षता काल में द्विवेदी जी ने हिन्दी कोश, वांग्मार्जन (संस्कृत कोश), हिन्दी साहित्य कोश (दो भागों में), भाषा, विज्ञान कोश, अशोक के अभिलेख आदि अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थ प्रकाशित कराये।

      पं0 देवनारायण द्विवेदी को बैरिस्टर युसुफ इमाम, मतवाला संपादक महादेव प्रसाद सेठ तथा जे0एन0 विल्सन के बाद कांग्रेस का चौथा मार्गदर्शक (डिक्टेटर) चुना गया था। स्वाधीनता संग्राम में बनाई गई बार कौंसिल में भी इन्हें स्थान मिला। ये अखिल भारतीय प्रकाशक एवं लेखक संघ के दो बार अध्यक्ष चुने गये थे। 28 नवम्बर 1989 में इनकी निधन हो गयी।

आचार्य पं0 सीताराम चतुर्वेदी 

     पण्डित सीताराम चतुर्वेदी का जन्म 27 फरवरी 1907 को छोटी पियरी (वाराणसी) में हुआ था। इनके पिता पं0 भीमसेन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राच्य विद्या एवं पौरोहित्य विभाग के अध्यक्ष थे। इन्हेंने मुजफ्फरनगर से प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से हिन्दी, संस्कृत, पालि तथा प्राचीन भारतीय इतिहास एवं संस्कृति में स्नातकोत्तर तथा बीटी0, एल0एल0बी0, साहित्याचार्य की उपाधि हासिल की। ये हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, उर्दू, फारसी, पालि, प्राकृत तथा अपभंश भाषा एवं ब्राह्मी, खरोष्ठी आदि प्राचीन भारतीय लिपियों के जानकार थे।

      पण्डित सीताराम जी ने सेन्ट्रल हिन्दू स्कूल, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में 1932-38 तक अध्यापन किया और प्राध्यापक भी रहे। 1932-34 तथा 1952-53 तक भगवानदीन साहित्य विद्यालय काशी के आचार्य, टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज काशी हिन्दू विश्वविद्यालय काशी के संस्थापक अध्यक्ष (1942-44), सतीशचन्द्र कालेज बलिया के प्राचार्य (1948-1949 ), टाउन डिग्री कॉलेज बलिया के प्राचार्य (1957 से 1968) तथा बिनानी विद्या मन्दिर कलकत्ता के निदेशक (1962-1964) भी रहे।

      पण्डित जी ने 1927-28 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से प्रकाशित ‘डान’ (अंग्रेजी) पत्र का सम्पादन किया। तत्पश्चात् 1930-32 में भूमिगत समाचार पत्र ‘रणभेरी’, ‘शंखनाद’ के संपादन व लेखन, एवम् काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से प्रकाशित साप्ताहिक ‘सनातन धर्म’ का संपादन (1933-38) किया। सन 1947-1949 तक बम्बई से ‘भारत विद्या’, 1948 में प्रतिभा (मासिक), 1949 में ‘संग्राम’ (साप्ताहिक) एवं काशी से मासिक पत्र वासंती (1955-1959) तथा कलकत्ता के संकल्प का 1962-63 में सम्पादन किया।

      पण्डित जी ने शिक्षा, साहित्य, दर्शन, इतिहास योग, राजनीति आदि लगभग सभी क्षेत्रों में 214 ग्रंथ एवं 85 नाटक-नाटिकाओं का लेखन व मंचन किया। मालवीय जीवन चरित, अभिनव नाट्य शास्त्र, समीक्षा शास्त्र, साहित्यानुशासन तन्त्र विज्ञान और साधना, वाग्विज्ञान, भारतीय और पाश्चात्य रंगमंच, कालिदास ग्रन्थावली (सटीक), तुलसी ग्रन्थावली (टीका सहित), सूर ग्रन्थावली (सटीक), वाल्मीकीय रामायण (सटीक), इनकी प्रमुख कृतियाँ है। ठेठ टकसाली नागरी के एकमात्र लेखक पण्डित सीताराम जी ने हिन्दी साहित्य के एकमात्र चम्पू ‘श्रीराम विजय’ की रचना की। पण्डित जी को हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा 2003 में साहित्य वाचस्पति, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा 1999 में हिन्दी गौरव तथा कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा 2003 ई0 में मानद डी0 लिट् की उपाधि मिली। 17 फरवरी 2005 को इनका निधन हो गया।

पं0 दिनेशदत्त झा 

     दिनेशदत्त जी का जन्म 13 अक्टूबर 1883 को भागलपुर (बिहार) के बरारी मुहल्ले में मातुल के घर हुआ था। एवम् उनका पितृस्थान पूर्णिया जिले के सदर थाने का जाफरपुर गांव (वर्तमान रायपुर) था। सन 1911-17 तक बिहार में रेलवे की नौकरी करने के पश्चात् इन्होंने कलकत्ता के दैकिन ‘समाचार’ में काम शुरू किया लेकिन पश्चिम बंगाल सचिवालय में काम मिल जाने के ‘समाचार’ छोड़ दिया। कुछ समय बाद ही ये रामपुर लौट आए और भागलपुर से सन 1921 में ‘शांति’ नामक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। दो माह की बाद ही यह पत्रिका बंद हो गयी और पण्डित जी काशी आकर 16 अगस्त 1921 से ‘आज’ में संपादकीय विभाग में नौकरी शुरू की। पारिवारिक कारणों से कुछ माह की अनुपलब्धता के बाद इन्होंने 10 अप्रैल 1923 को ‘आज’ में पुनः प्रवेश लिया और सन 1940 तक संपादकीय विभाग में रिपोर्टर। डाक संपादक और प्रबंध संपादक का कार्य करते रहे। 14 मार्च 1940 से अप्रैल 1944 तक बिहार के दैनिक ‘आर्यावर्त’ के संपादक पद पर कार्य करने के बाद विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन प्रारंभ किया। शुद्धता के प्रबल समर्थक थे। संस्कृति निष्ठ हिन्दी व व्याकरण के बहुत बड़े कायल झा जी को प्रूफ संशोधन में मामूली त्रूटि भी खटकती थी। ‘आर्यावर्त’ के माध्यम से हिन्दुस्तानी भाषा के विरोध करते हुए उन्होंने बिहार सरकार को इस भाषानीति को छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। हिन्दी के ऐसे प्रबल पक्षधर विद्वान झा जी का निधन 8 दिसंबर 1961 ई0 को काशी में हुआ।

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