रामनगर

रामनगर किला

काशी में दर्शनीय स्थल के रूप में रामनगर किला अपनी ऐतिहासिकता के लिए प्रसिद्ध है। गंगा उस पार किला गंगा के किनारे ही है। इस किले का निर्माण महाराजा बलवंत सिंह ने कराया था। इसी स्थान पर भव्य महल का भी निर्माण कराया गया जिसमें आज भी काशी नरेश के वंशज रहते हैं। किले में एक संग्रहालय भी है। जहां हाथी दांत से बनी कलात्मक वस्तुएं सुरक्षित हैं। साथ ही पुराने हथियार के अलावा अन्य दुर्लभ चीजें हैं। किले में कई मंदिर भी हैं। संग्रहालय में एक खगोल घड़ी भी है। किला अपनी इन्हीं विरासतों के कारण पर्यटकों को खूब आकर्षित करता है।

रामनगर किला, वाराणसी

दुर्गा मन्दिर (रामनगर)

       रामनगर किले से लगभग दो किमी की दूरी पर स्थित दुर्गा मंदिर काशी नरेश महाराज बलवन्त सिंह के शासनकाल में निर्मित अद्भुत कृति है। विविध शैलीगत विशेषताओं के इस मंदिर में राजस्थान उड़ीसा मुगल क्षेत्रीय आदि शिल्प गत विशेषताओं के साथ ही शिल्प के कुछ अनूठे प्रयोग भी देखे जा सकते हैं। इसे सुमेरू मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर का निर्माण काशी राज परिवार के द्वितीय राजा बलवंत सिह (1740-1760) के द्वारा प्रारम्भ कराया गया परन्तु उनके जीवन काल में यह पूर्ण न हो सका। कालान्तर में महाराजा चेतसिंह ने मन्दिर के कलश आदि भाग का निर्माण कार्य कराया। यह मंदिर एक परकोटे के मध्य स्थित है। परकोटे के चारों ओर बुर्जनुमा कक्ष बने हैं। मन्दिर के सम्मुख एक तालाब है। मुख्य प्रवेश द्वार के दोनों ओर बंगाल शैली के झोपड़ीनुमा गृह बने है जो वर्तमान में आवास हेतु उपयोग होते हैं। प्रवेश द्वार के सामने ही एक ऊँची जगति पर दुर्गा मंदिर बना है। मंदिर की जगति पर दो भागों में विभिन्न सोपानों द्वारा प्रवेश किया जाता है। इस मंदिर की तल छन्द योजना में केवल वर्गाकार गर्भगृह है जिसमें चारों दिशाओ से प्रवेश द्वार बने है। उत्तर-दक्षिण एवं पश्चिम दिशा में बने द्वारों का उपयोग प्रवेश हेतु होता हैं परन्तु पूर्व दिशा में निर्मित द्वार पाषाण निर्मित है, जो अलंकरण व संयोजन के संतुलन हेतु निर्मित हैं। मुख्य प्रवेश द्वार पश्चिमाभिमुख है। चारों प्रवेश द्वारों के आगे मुखमण्डप का निर्माण हुआ है जो अलंकृत स्तंभों पर आधारित हैं प्रवेश द्वार के तोरण स्तंभो पर नृत्यरत मयूर की आकृतियां है। मंदिर का तोरण भाग इस्लामिक वास्तु से प्रभावित मेहराबनुमा अलंकरण युक्त है। पश्चिम द्वार पर गणेश, रिद्धि और सिद्धि देवियों के साथ अंकित किये गये हैं। चारों प्रवेश द्वार पर गणेश की पद्मासीन मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। मंदिर के पूर्वी भित्ति पर जगन्नाथ सुभद्रा और बलभद्र की मूर्ति उत्कीर्ण है। दुर्गा मन्दिर के इस मूर्ति का उदाहरण पुरी के जगन्नाथ मूर्ति की आधार पर बना है। ऐसे भी उल्लेख और अनुभुतियाँ है कि यह मन्दिर एक वैष्णव मंदिर है। यहीं से रामनगर की रथयात्रा की प्रारम्भ होती है। मंदिर की वर्गाकार संरचना और उड़ीसा शैली के पीढ़ादेउल प्रकार के शिखर इसकी विशिष्टता है। इसका उदाहरण परशुरामेश्वर मंदिर भुवनेश्वर (उड़ीसा) से ले सकते हैं। जहाँ एक ओर मंदिर के प्रत्येक द्वार राजाओं पर दो-दो द्वारपालों के हाथ में दण्ड कमण्ड, कमल, शंख का अंकन इसे वैष्णव सम्प्रदाय से जोड़ता है वहीं पश्चिमी द्वार के सामने सिंह, उत्तरी द्वार के सामने गरूड़, एवं दक्षिणी द्वार के सामने नन्दी का अंकन इसे एक साथ शाक्त, वैष्णव, एवं शैव धर्म के प्रभाव को स्पष्ट करता है। प्रवेश द्वार के सिरदलों पर बने मेहराब तथा उनमें लगी अलंकृत घुड़ियां मुगल वास्तु से प्रभावित हैं तो पश्चिमी द्वार राजाओं तथा सिरदल एवं पटों पर बनी मयूर की सर्पहारी तथा नृत्यरत आकृतियां गुजरात एवं राजस्थान की शिल्प अलंकरण शैली दर्शाती है। प्रवेश द्वारों पर बछड़ा सहित गाय का अंकन विशेष है जो कुषाण काल से लेकर गुप्तकाल तक अधिक प्रचलित रहा। मन्दिर के मण्डोवर पर उत्कीर्ण गजारूढ़ सिंह की आकृतियां अस्वाभाविक एवं काल्पनिक हैं। पंखधारी अस्वाभाविक सिंह आकृतियां शासकों के साम्राज्य विस्तार व शक्ति की सूचक है। ऐसा अंकन खजुराहों के मंदिरो पर बने गजधर एवं सिंह ब्याल आकृतियों को प्रतिबिम्बित करता है। प्राचीन भारतीय मंदिरों में प्रवेश द्वार पर गंगा व यमुना देवियों का अंकन गुप्त काल से मध्यकला के बीच देखा जाता है। इसमें मकरारूढ़ देवी गंगा एवं कच्छपारूढ़ देवी यमुना की मूर्तियां बनती है परन्तु रामनगर में प्रवेश द्वार के सिरदल पर देवियों को वाहनों पर बैठे दिखाया गया है। साथ ही देवी सरस्वती की उपस्थिती भी शैलीगत भिन्नता है। तीनो देवियों की एक साथ उपस्थिती का उदाहरण ऐलोरा में देखा जा सकता है। इसी प्रकार दक्षिणी भित्ति पर उत्कीर्ण नर-नारायण की चतुर्भुजी मूर्ति काशी में अद्वितीय है। ऐसी मूर्ति का प्रारम्भिक अंकन देवगढ़ के दशावतार मंदिर पर मिलता है। दक्षिणी भित्ति पर ही मल्लयुद्ध का एक सुन्दर दृश्य है। जो काशी के मनोरंजन के लोकप्रिय अंश को प्रस्तुत करती है। मंदिर के वरण्ड भाग पर उत्कीर्ण अप्सरा मूर्तियां संगीत विद्या का प्रतीक है। इनके हाथों में वीणा, सितार, सारंगी, शहनाई, संतूर, वायलिन, मृदंग, सरोद, तबला, ढ़ोलक, बासुरी आदि वाद्ययंत्र काशी के संगीत महत्व को दर्शाते है। वहीं वेशभूषा में लम्बा चोंगा, सिलवरों वाला पायजामा, ओढ़नी के साथ माथे पर बिंदी, मस्तक पर मुकुट के साथ पंखधारी राजस्थानी प्रभाव वाली आकृतियां सम्भवतः मणिकर्णिका के शिव मंदिर पर बनी आकृतियों से प्रभावित है जिन्हें जोधपुर के शिल्पियों द्वारा बनाया गया।

      मंदिर के उत्तर पूर्वी कोना (ईशान कोण) पर स्थित माता छिन्न मस्तिका देवी का मन्दिर इस अद्भुत मंदिर को और भी भव्यता प्रदान करता है। वर्तमान में प्रतिदिन सुबह-शाम होने वाली आरती तथा शंख घण्टा, घड़ियाल की ध्वनि के साथ मातारानी की जय का उद्घोष सम्पूर्ण वातावरण को द्विव्यता प्रदान करता है।

  • अरविन्द कुमार मिश्र

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