रामलीला

ramlila kashi kiकाशी की रामलीला

शिव नगरी काशी आश्विन और कार्तिक मास में राममय हो जाती है। महादेव की आराधना करने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की साधना करने में काशी तल्लीन रहती है। रामचरित मानस से भी प्राचीन काशी में मंचित रामलीला का शुभारम्भ सर्वप्रथम मेघा भगत द्वारा बाल्मीकि रामायण के आधार पर किया गया। मानस की रचना पूर्ण होने के साथ ही यहाँ रामलीला मानस के अनुसार होने लगीं। अध्यात्म, परम्परा और संस्कृति के सामाजिक समन्वय का प्रतीक रामलीला वर्तमान समय में भी काशी के अनेक मुहल्लों में मंचित हो रहे हैं, जो स्वयं में कई ऐतिहासिक घटनाओं को समेटे हुये हैं। प्रस्तुत है, ऐतिहासिकता को समेटे हुए काशी में मंचित प्रमुख रामलीलाओं पर एक नजर-

लाट भैरव की रामलीला – यह काशी की सबसे प्राचीन रामलीला है, अतः इसे आदि रामलीला भी कहते हैं, जो स्वयं में एक सांस्कृतिक विरासत भी है। गोस्वामी तुलसीदास के समय (सन् 1543) में मेघा भगत द्वारा लाट भैरव की रामलीला का शुभारम्भ किया गया। ‘काशीखण्ड’ के अनुसार यहां की लीला बाल्मीकि रामायण पर आधारित होती थी। जो कुछ समय पश्चात् रामचरित मानस के अनुसार होने लगी। यहां की रामलीला अश्विन कृष्ण अष्टमी के ‘मुकुट पूजा’ से आरम्भ होकर कार्तिक पंचमी को कोट विदाई के साथ सम्पन्न होती है। लीला के प्रसंगों के अनुसार इनका स्थान भी नियत है। विश्वेश्वर गंज को अयोध्या, धनेसरा तालाब को सुरसरी, लाट भैरव कों पंचवटी तथा गंगा-वरुणा के संगम के पार को लंका तथा इसी तरह अन्य कई स्थानों को प्रसंगानुसार माना जाता है। यहां की लीला में तिथियों के साथ ही नक्षत्रों का भी ध्यान दिया जाता है। पुनर्वसु नक्षत्र में ही ‘मुकुट पुजा’ किया जाता है तथा विजयादशमी के श्रवण नक्षत्र में ही ‘रावण वध’ के प्रसंग का मंचन किया जाता है। श्रीराम के 14 वर्ष के वनवास लीला का प्रसंग 14 दिन (तिथियों के अनुसार) में पूरा किया जाता है और वनवास के प्रसंग के दौरान मूर्ति स्वरूपों को केवल फलाहार का ही भोग लगाया जाता है। पात्रों का श्रृंगार सादे स्वरूप में किया जाता है। लाट भैरव की रामलीला में पात्रों के श्रृंगार में रामरज, चन्दन तथा तुलसीमाला की प्रधानता रहती है, राज्याभिषेक और राजगद्दी के समय स्वरूपों का विशेष श्रृंगार किया जाता है। मनुष्य रूपी विग्रह के रूप में काशी में होने वाली अन्य रामलीलाओं की अपेक्षा यह सबसे अधिक लम्बी दूरी को तय करने वाली यात्रा होती है, जिसे वनगमन से भरत मिलाप तक की लीलाओं में देखा जा सकता है।

चित्रकूट की रामलीला – यह भी काशी की प्राचीन रामलीला है। इस रामलीला की शुरूआत भी मेघा भगत ने की थी। इस लीला में भी पहले बाल्मिकी रामायण पर आधारित संवाद होते थे रामचरित मानस की रचना हो जाने के पश्चात् यह लीला मानस के अनुसार ही होने लगी। यहां की लीला में श्रीराम जी की मुकुट प्रतिदिन नयी होती है। चित्रकूट रामलीला की एक प्रमुख विशेषता यह भी है कि यहां संवाद बहुत ही कम या नहीं के बराबर होता है, इसके स्थान पर रामचरित मानस का पाठ होता है। रामलीला प्रतिवर्ष आश्विन कृष्ण नवमी को ‘मुकुट पुजा’ के साथ आरम्भ होकर आश्विन शुक्ल पूर्णिमा को ‘दशावतार की झांकी’ के साथ सम्पन्न होती है। ‘मुकुट पुजा’ के पश्चात् यहां की लीला अयोध्याकाण्ड से आरम्भ होता है और दूसरे दिन ‘राज्याभिषेक’ लीला का आयोजन होता है। अट्ठारहवें दिन नाटी इमली के मैदान पर विश्व का सबसे कम समय का सबसे बड़ा मेला ‘भरत मिलाप’ का आयोजन होता है, यह मेला काशी के लख्खा मेले के रूप में जाना जाता है, सुर्यास्त के समय पांच से दस मिनट के इस नयनाभिराम दृश्य के दर्शन हेतु काशी नरेश के साथ ही लाखों लोगों का देश-विदेश से आगमन होता है। भरत मिलाप के समय इसके सम्मान में काशी की अन्य सारी रामलीलाओं को विराम दिया जाता है। भरत मिलाप के दूसरे दिन आत्मविरेश्वर मन्दिर में धनुष-बाण की झांकी का दर्शन होता है। ऐसी मान्यता है कि आयोध्या में स्वयं श्रीराम ने बाल रूप में यह धनुष-बाण मेघा भगत को दी थी। यहां की रामलीला के सम्बन्ध में एक जनश्रुति यह भी प्रचलित है कि सन् 1868 में रामलीला मंचन के समय तत्कालीन पादरी मैकफर्सन ने हनुमान का पात्र बने पं0 टेकराम भट्ट को उकसाया कि- “महाकाव्य के अनुसार हनुमान सौ योजन समुद्र लांघ गये थे। आप यह वरूणा नदी पार कर दो तो हम मानेंगे, नहीं तो लीला बंद कर दी जायेगी”। यह सुन हनुमान बने पात्र ने श्रीराम से आज्ञा लेकर एक छलांग में वरुणा नदी पार कर दिये वरुणा नदी पार करने के पश्चात् उनका स्वर्गवास हो गया, उनका मुखौटा आज भी वरुणा तट पर स्थित हनुमान मन्दिर में सुरक्षित है।

तुलसीघाट की रामलीला – सम्भवतः रामचरित मानस के आधार पर होने वाले रामलीलाओं में यह प्रथम रामलीला है। रामचरित मानस की रचना करने के पश्चात् गोस्वामी तुलसीदास ने मानस के अनुसार ही यहां पर रामलीला आरम्भ किया था। यहां की रामलीला सन् 1580 के आस-पास आरम्भ हुई थी। वर्तमान रामलीला समिति का पंजीकरण सन् 1933 में हुआ था जबकि भानुशंकर मेहता के अनुसार अखाड़ा तुलसीदास (जो आज भी रामलीला का आयोजन करती है) के लगभग 225 वर्ष पुराने वसीयत में यह उल्लेख है कि-‘सदा की भांति इसे चलाते रहना’। अट्ठारह दिवसीय इस रामलीला का शुभारम्भ आश्विन कृष्ण नवमी को ‘मुकुट पूजा’ के पश्चात् राज्याभिषेक और कोपभवन से आरम्भ होकर श्रीराम के अयोध्या लौटने तक के प्रसंग की लीला का मंचन होता है तथा कार्तिक एकादशी को ‘दशावतार की झांकी’ के साथ रामलीला सम्पन्न होती है। इस लीला में भी प्रसंगानुसार स्थान नीयत है। लोलार्क कुण्ड, आनन्द बाग, दुर्गाकुण्ड, लंका (बी0एच0यू0 मुख्य द्वार) संकटमोचन मन्दिर तथा तुलसीघाट सहित अन्य स्थानों पर लीला के प्रसंगों का मंचन किया जाता है। यहां श्रीराम और सीता के लिये दो-दो मुकुटों का प्रयोग अलग-अलग प्रसंगों के अनुसार किया जाता है। तुलसीघाट के लीला के हनुमान का मुखौटा पीतल का है, जिनकी पूजा भी की जाती है, एवं अशोक वाटिका के प्रसंग के में हनुमान के दो स्वरूपों को दो पात्र पूरा करते है एक बालरूप में दूसरे बड़े रूप के बनवास के समय पात्र छोटे मुकुट धारण कर जटायुधारी एवं घुटने तक के वस्त्र में नंगे पैर धनुष-बाण लिये चलते है। ऐसा कहा जाता है कि काशीराज उदितनारायण सिंह यहां नियमित लीला देखने आते थे, लीला के समय एक दिन उनके पुत्र ईश्वरीनारायण सिंह अत्यधिक बीमार थे। इससे महाराज चिंतित थे। रामलीला के राम ने तुलसीदल महाराज को देकर कहा की इसे युवराज को खिला दीजिये। महाराज ने तुलसीदल को युवराज को खिलायी, जिससे वह रातभर में ही स्वस्थ हो गये। उसी समय महाराज ने रामनगर में भी रामलीला कराने का निश्चय किया।

रामनगर की  रामलीला – रामनगर में रामलीला का आरम्भ सन् 1830 के आस-पास काशी नरेश उदित नारायण सिंह ने कराया। काशी की रामलीलाओं में रामनगर की रामलीला सर्वाधिक प्रसिद्ध है। श्रावण कृष्ण चतुर्थी को प्रथम गणेश पूजन के साथ पंच स्वरूपों (राम, सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न) का चयन एवं नामकरण होता है। भादो शुक्ल चतुर्थी को द्वितीय गणेश पूजन के साथ चौक पक्की पर रामचरितमानस के बालकाण्ड के दोहे का पाठ आरम्भ होकर भादो शुक्ल त्रयोदशी तक 175 दोहों का पाठ होता है। भादो  शुक्ल चतुर्दशी को ‘रावण जन्म’ से लीला का मंचन आरम्भ होकर आश्विन शुक्ल पूर्णिमा को ‘श्रीराम उवपन-विहार, सनकादिक-मिलन, पुरजनोपदेश के साथ सम्पन्न होती है। कार्तिक कृष्ण प्रतिपदा को अनूठी जीवन्त लीला ‘कोट विदाई’ का आयोजन होता है। रामलीला के पंच स्वरूप एवं लीला के अन्य मुख्य पात्र काशीराज दुर्ग में पधारते हैं। काशीराज उनका पूजन कर भोग लगाते हैं एवं दक्षिणा प्रदान कर उनकी विदाई करते हैं। रामलीला के संवादों एवं पदों की रचना काष्ठजिह्वा स्वामी एवं महाराज रघुराज ने की है, जो मानस के अनुसार ही है। सैकड़ों वर्ष पूर्व रचे इन संवादों में आज तक कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। आज भी यहां की लीला सूर्यास्त के पश्चात पारम्परिक लैम्प पंचलाइट (पेट्रोमैक्स) की रोशनी में सम्पन्न होता है। पात्रों के वेश-भूषा भी पुराने हैं केवल पंचस्वरूपों का चयन होता है जो रामनगर के बाहर के होते हैं, इन्हें एक माह पूर्व से ही कठिन प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है। शेष पात्र पीढ़ी दर पीढ़ी अपने भूमिका को जीते हैं। यहां पात्रों को संवाद कंठस्थ कराया जाता है बिना ध्वनि विस्तारक यंत्र के ये ऊँची स्वर में संवाद करते हैं। लीला के प्रसंगानुसार ही स्थल नियत हैं, जैसे-अयोध्या, जनकपुर, पम्पासर, चित्रकूट, पंचवटी, लंका आदि। प्रतिदिन लीला संपन्न होने के पष्चात होने वाली आरती भी विषेष है। प्रभु दर्शन के इस नयनाभिराम दृष्य हेतु विषेष रूप से लोग अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। वनवास के समय मूर्ति स्वरूप मुकुट धारण किये रहते हैं परन्तु उस पर काली पट्टी बांध दी जाती है जो मुकुट का प्रतीकात्मक निषेध करती है। धनुष यज्ञ, सूपर्णखा नासिका छेदन व लक्ष्मण शक्ति के दिन तोप से सलामी दी जाती है। लीला ‘काशीराज धर्मार्थ निधि ट्रस्ट’ द्वारा आयोजित होती है, जिसमें राज्य सरकार से भी अनुदान प्राप्त होता है। ट्रस्ट के अध्यक्ष स्वयं काशी नरेश है एवं लीला के प्रधान दर्शक होते हैं। एक माह तक चलने वाले इस विश्व प्रसिद्ध रामलीला में प्रतिदिन हजारें की संख्या में नेमी दर्शकों (रोज आने वाले) के साथ-साथ देश-विदेश से लाखों लोगों का आगमन होता है। यहां की रामलीला दर्शकाभिमुख नहीं होती, पात्र अपनी भूमिका में रहते हैं और दर्शक उनके हाव-भाव से संवाद को समझते हैं। दर्शकों में यह विशेषता होती है अधिकांश लोगों को संवाद स्मरण रहता है। ऐसा कहा जा सकता है कि रामलीला मंचन के समय दर्शक, दर्शक न होकर पात्र की भूमिका में आ जाते हैं, जैसे- राम बारात में बाराती, वनवास के समय वनवासी व युद्ध के समय सैन्य भूमिका में। नेमी दर्शकों का अन्दाज ही अलग होता है। काशी की गहरेबाजी, साफा-पानी, बहरी अलंग, खान-पान व भाँग को यहां के रामलीला के समय देखा जा सकता है। प्रतिदिन रामलीला आरम्भ होने से पूर्व इनमें व्यस्त नेमी दर्शक तिलक-त्रिपुंड लगाये प्रभु श्रीराम के दर्शन में मस्त रहते हैं।

चेतगंज की रामलीला – सन् 1888 में बाबा फतेराम ने ‘चेतगंज रामलीला समिति’ की स्थापना कर यहां रामलीला का शुभारम्भ किया। उन्होंने अपनी सारी सम्पत्ति ‘रामलीला समिति’ को दान कर दी तथा लीला आयोजन के लिये आवश्यक धन को एकत्र करने का नायाब तरीका भी खोज निकाला कि लीला क्षेत्र के प्रत्येक दुकानदार प्रतिदिन एक पैसा रामलीला समिति को देंगे। यह तरीका तत्कालीन समय में सार्थक हुआ और रामलीला आयोजन के लिये धन इकट्ठा होने लगा। बाद में काशी के रईसों, सेठ, साहूकारों ने इस लीला में स्वेच्छा से सहयोग करने लगे। वर्तमान में रामलीला समीति द्वारा लीला क्षेत्र के घरों एवं दुकानदारों से चन्दे के द्वारा धन एकत्रित किया जाता है। आश्विन अमावस्या को मुकुट पूजा के साथ लीला आरम्भ होकर कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी (धनतेरस) को ‘दशावतार की झांकी’ के साथ लीला सम्पन्न होती है। यहां रामचरितमानस के अनुसार ही सम्पूर्ण रामलीला का मंचन होता है एवं विभिन्न लीला प्रसंगों के अनुसार स्थान नियत है। कार्तिक कृष्ण चतुर्थी (करवाचौथ) को मंचित सूर्पणखा नासिका छेदन (नक्कटैया) विश्व प्रसिद्ध और काशी के लख्खा मेले में शुमार है। चेतगंज के नक्कैटया के प्रति काशी की जनता में एक उत्साह बना हुआ है। सैकड़ों की संख्या में लाग-स्वांग निकाले जाते है, जिसमें अन्य जनपदों एवं प्रदेशों के भी लागो-स्वांगो की सहभागिता होती है, इनमें प्रतिस्पर्धा रहती है। जो लाग-स्वांग सर्वश्रेष्ठ होता है उसे रामलीला समिति द्वारा पुरस्कृत किया जाता है। इस दिन पूरे मेला क्षेत्र को आकर्षक विद्युत झालरों से सजाया जाता है। इस सजावट में भी प्रतिस्पर्धा रहती है। मेला क्षेत्र में इतने श्रद्धालुओं का आगमन होता है कि पैर रखने की भी जगह नहीं मिलती। इस ऐतिहासिक नक्कटैया के जुलूस में आध्यात्मिक प्रवृति के साथ-साथ समसामयिक एवं सामाजिक सरोकार से जुड़ी आकर्षक झांकियों का भी प्रदर्शन होता है। सन् 1857 के असफल विद्रोह के पश्चात काशी की जनता अंग्रेजों के अत्याचार से मर्माहत थी, अपने क्रोध को प्रदर्शित करने के लिये काशी की जनता ने इसी रामलीला के नक्कटैया जुलूस को माध्यम बनाया। सन् 1920 के असहयोग आन्दोलन के समय भी आयोजकों ने इसी जुलूस के माध्यम से लोगों में राजनीतिक चेतना, जनचेतना तथा राष्ट्रभक्ति के संचार का माध्यम बनाया। डॉ0 भगवानदास, डॉ0 सम्पूर्णानन्द, आचार्य नरेन्द्र देव, प्रेमचन्द्र, जयशंकर प्रसाद आदि लोगों ने इस रामलीला के नक्कटैया को नया स्वरूप देने का सार्थक प्रयास किया।

खोजवा की रामलीला – प्राचीन समय में यह रामलीला मानसरोवर, सोनारपुरा और केदारघाट पर होती थी, जिसे महात्मा आपादास जी आयोजित करते थे। महात्मा आपादास जी का स्वर्गवास हो जाने के पश्चात श्री गोकुल साहु ने काशीनाथ साहु तथा जगन्नाथ साहु के सहयोग से इस रामलीला का खोजवा में मंचित करना आरम्भ किया और जीवनपर्यन्त तन-मन-धन से रामलीला में अपना सहयोग प्रदान किया। इसके पश्चात् श्री गोविन्द प्रसाद कपूर, सहदेव प्रसाद गुप्त, नन्हकु माली तथा अन्य लोगों ने रामलीला आयोजन को जारी रखा। तत्कालीन रामलीला कमेटी के द्वारा रामलीला आयोजन के संचालन के लिए एक समिति बनायी गयी, जो 98 वर्ष़ों से क्षेत्रीय लोगों के सहयोग द्वारा रामलीला का आयोजन निरन्तर कर रहा है। भादों की कृष्ण त्रयोदशी को मुकुट पुजा व श्री रामायण जी की आरती होती है। कुवार कृष्ण अष्टमी को ‘पार्वती जी की तपस्या’ के साथ लीला प्रसंग आरम्भ होकर कार्तिक कृष्ण पंचमी को ‘दशावतार की झांकी’ के साथ सम्पन्न होती है। सोनारपुरा चौराहे से दशमी, सरायनन्दन तक लगभग चार किलो मीटर के लीला क्षेत्र में विभिन्न स्थानों का प्रसंगनुसार स्थान नियत है। रामलीला के दौरान मूर्ति स्वरूपों का प्रसंगानुसार श्रं‘गार किया जाता है। प्रतिदिन के लीला स्थान को आकर्षक विद्युत झालरों से सजाया जाता है एवं ध्वनि विस्तारक यंत्र से संवाद को वहां उपस्थित प्रत्येक श्रद्धालुओं के कानों तक पहुंचाने का प्रयास किया जाता है। यहां की रामलीला में शिव व श्रीराम जी की बारात धूमधाम से निकाली जाती है। धनुष यज्ञ, सूपर्णखा नासिका कर्ण छेदन (नक्कटैया) एवं भरत मिलाप का प्रसंग विख्यात है। जिसके आकर्षण लॉग-स्वांग निकाले जाते हैं। इन प्रसंगों के दौरान ज्यादा संख्या में श्रद्धालुओं का आवागमन होता है। जबकि लीला में हजारों लीला प्रेमियों का आगमन होता है।

इसके अतिरिक्त औरंगाबाद, काशीपुरा, दानगंज, गायघाट, नदेसर, आशापुर, लल्लापुरा, लोहता, लहरतारा, चिरईगांव, दारानगर, लक्सा, पाण्डेयपुर, मर्णिकर्णिकाघाट, शिवपुर, रोहनिया, फुलवरिया, बड़ागांव सहित लगभग पचास मुहल्लों के साथ ही वाराणसी के केन्द्रिय कारागार में भी दस दिवसीय रामलीला का मंचन होता है। यहां शारदीय नवरात्र के प्रथम दिन ‘नारदमोह’ से लीला प्रारम्भ होता है। एक माह पूर्व से ही इसकी तैयारी आरम्भ हो जाती है और लगभग 35 पात्र इसमें भूमिका अदा करते हैं दिन में होने वाली इस रामलीला के पात्रों के साज-सज्जा व अन्य सामानों को बाहर से मनाया जाता है जिसका सारा खर्च कारागार प्रशासन वहन करता है।

– धीरज कुमार गुप्ता

रामनगर की विश्वप्रसिद्ध रामलीला

दुनियां की समस्त महत्वपूर्ण वस्तुओं एवं ज्ञान को एक जगह एकत्रित करने की मानव महत्वाकांक्षा ने भले ही अनेकानेक वैज्ञानिक यंत्रों एवं उपकरणों का आविश्कार कर दिया हो, परन्तु इन ज्ञान विज्ञान के विविध उपकरणों एवं सूचनाओं से घिरे अन्तस्तल में कहीं न कहीं एक कोना रिक्त जान पड़ता है और अगर ईमानदारी से स्वयं के भीतर देखा जाय तो यह रिक्तता हर संस्कृति का एक संवेदनशील भाग है। कमोवेश हर युग हर संस्कृति में यह एक उदात्त चरित्र (धार्मिक चरित्र) के रूप में अभिव्यक्त होती रही है। साहित्यों में अभिव्यक्त इस संवेदनशीलता को ग्रहण करने में बौद्धिक क्षमता की आवश्यकता होती है। लेकिन हमारा स्वर्ग, हमारी कल्पना जब हमारे ही जीवन के साक्षात घटना के रूप् में घटित होती है तब हम ऐसे समय में रहते समय से परे चले जाते हैं तथा धरती पर रहते हुए भी स्वर्ग का सुख प्राप्त कर लेते हैं। ऐसा ही कुछ होता है जब हम रामलीला देखते हैं यू तो भारत के कोने-कोने में तथा सुदूर देशों में भी दशहरा की रामलीला स्थानीय लोगों के लिए उत्कंठा का विषय होता है। लेकिन रामनगर की रामलीला को विश्व प्रसिद्ध होने का गौरव क्यों प्राप्त है,प्रस्तुत है इस पर एक रिपोर्ट –

रामलीला का संक्षिप्त इतिहासः रामनगर की रामलीला का इतिहास लगभग दौ सौ साल से भी पुराना है। किंवदन्तियों के अनुसार तुलसीदास जी के एक शिष्य थे, जिनका नाम मेघा भगत था। मेघा भगत ने ही सर्वप्रथम वाराणसी में श्री रामलीला का शुभारंभ किया था। वाराणसी के नाटी इमली नामक मुहल्ले में मेघा भगत ने सर्वप्रथम भरत-मिलाप का मंचन किया था। तभी से लगातार नाटी इमली के भरत मिलाप में तत्कालीन काशी नरेश महाराज उदित नारायण सिंह सम्मिलित हुआ करते थे। एक बार किंचित विलंब हो जाने की वजह से महाराज की उक्त लीला छूट गयी तभी से उन्होंने रामनगर में रामलीला शुरू कराया। एक अन्य किंवदन्ति के अनुसार भोनू और विट्ठल नाम के दो भाई रामनगर से छह किमी दूर छोटा मीरजापुर गांव में प्रतिदिन रामलीला कराते थे। उक्त रामलीला को देखने महाराज उदित नारायण सिंह प्रतिदिन जाते थे। किन्हीं कारणों से एक बार विलंब होने से बिना महाराज का इंतजार किये रामलीला पूर्ण करा लिया गया। इससे महाराज के मन में क्षोभ उत्पन्न हुआ तथा यही क्षोभ आगे चलकर रामनगर की विश्व प्रसिद्ध रामलीला के शुरूआत का मुख्य कारण हुआ।

रामलीला का वैशिष्ट्यः श्री रामलीला के संपादन, शोधन एवं संवाद लेखन में काष्ठजिह्वा स्वामी का महत्वपूर्ण योगदान है। ये महाराज ईश्वरी नारायण सिंह के पूज्य गुरू भी थे। रामलीला का मंचन गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस के अनुसार करने हेतु स्वामी काष्ठजिह्वा, रघुराज सिंह, हरिहर प्रसाद सिंह चौधरी, बंधन पाठक तथा पं रामनिरंजन स्वामी इत्यादि लोगों ने रामलीला के मंचन को संपूर्णता एवं भव्यता का रूप प्रदान किया। रामलीला के इसी भव्यता और सम्पूर्णता से अभिभूत दर्शकों, नेमी, प्रेमी आदि लोगों की ऐसी आस्था और मान्यता है कि गोस्वामी जी से लेकर काष्ठजिह्वा आदि समस्त संतों की आत्मा किसी न किसी रूप में भगवान श्रीराम के दर्शन हेतु इस रामलीला में उपस्थित रहती है। अन्यत्र जब हम कोई भी नाटक या रामलीला देख रहे होते हैं तो वहां आयोजकों द्वारा एक ही मंच पर आयोध्या, जनकपुर, चित्रकूट, लंका आदि का दृश्य कुछ देर के लिए परदे पर प्रस्तुत कर दिया जाता है। इतना ही नहीं मल्टीमीडिया तथा एनीमेशन फिल्मों में तो आज पात्र, पर्दा, ध्वनि सब कुछ कृत्रिम होती जा रही है। वहीं, रामनगर की रामलीला का मंचन लगभग पांच किलोमीटर में फैले प्राकृतिक मंचों पर प्रसंग के अनुरूप किया जाता है, जिससे लीला का मंचन में पूर्णतः यथार्थ और प्रसंगानुरूप् प्रतीत होता है। रामलीला का मंचन नगर के पांच किमी के दायरे में विविध स्थानों पर होता है। रामलीला के संदर्भित सभी स्थलों को देखने से उसके वास्तविक रूप का ही भान होता है। जैसे- अयोध्या, लंका, पंचवटी, अशोकवन, जनकपुर इत्यादि सभी स्थल उसी सरीखे प्रतीत होते हैं जो रामचरित मानस में वर्णित हैं। इस प्रकार रामनगर में ही अयोध्या से लगायत रामेश्वरम् तक के सभी तीर्थ हैं। जिसे उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक के सभी तीर्थों का एक ही नगर में अद्वितीय-संकलन कहा जा सकता है। पूरे विश्व में इतने बड़े प्राकृतिक मंच पर मंचित होने वाली रामलीला की दूसरी बड़ी विशेषता यह है कि यहां संवाद-कथन में ध्वनि विस्तारक का प्रयोग नहीं होता है बावजूद इसके रामलीला-व्यास के तीन शब्दों ‘चुप रहो ! सावधान !’  के अनुशासन में हजारों की भीड़ संवाद का स्पष्ट श्रवण करती है। रामलीला में सभी पुरूष पात्र अभिनय करते हैं। रामायण में उल्लिखित परंपरा के अनुरूप ही सारे पात्र वस्तु और उपकरण धारण करते हैं। परंपरागत कुछ ऐसे पात्र हैं जो पिता-पितामह के क्रम से रामनगर की रामलीला जनक, दशरथ, वशिष्ठ, रावण आदि का अभिनय करते आ रहे हैं। ‘श्रीराम’ के प्रति असीम आस्था ने पात्रों की इस अनूठी पैत्रिक परंपरा को संबल प्रदान किया है। जहां इस प्रकार के परंपरागत पात्र अपने अभिनय का निर्वहन पूरी आस्था से करते है वहीं किसी पात्र की आकस्मिक कमी की पूर्ति हेतु सदैव तत्परता व रामलीला के प्रति अप्रतिम आस्था का ऐसा उदाहरण वास्तव में दुर्लभ है। रामलीला के विभिन्न पात्रों का संवाद कथन खड़ी बोली में किया जाता है तथा रामलीला की घटनाओं का सिलसिलेवार मंचन पूर्णतः ‘गोस्वामी जी’ के रामचरित मानस के आधार पर किया जाता है। समस्त संवाद काष्ठजिह्वा स्वामी लिखित है और ‘संवाद’ की खासियत यह कि उसमें न कुछ जोड़ा जा सके और न कुछ घटाया जा सके। रामलीला का नियमित दर्शन महाराज काशी नरेश द्वारा किये जाने की परंपरा आज भी बनी हुई है। लीला का संपादन समय सायं 5 बजे से रात्रि के 9 बजकर 30 मिनट तक का होता है। दैनिक ‘लीला’ की समाप्ति आरती से होती है। माला-पुष्प, गन्ध-दीप जलाकर आरती की जाती है तथा साथ ही रामायणी लोग आरती गाते हैं। आरती के समय महताबी जलाकर प्रकाश किया जाता है। महताबी के देदीप्यमान प्रकाश में लीलाप्रेमी हाथ जोड़कर ‘स्वरूपों’ का साक्षात दर्शन प्राप्त करते हैं। कुल मिलाकर इस विश्व प्रसिद्ध ‘रामलीला’ में बनारसी मस्ती एवं बनारसी संस्कृति का अद्भुत रूप परिलक्षित होता है। पूरे एक महीने चलने वाली इस ‘रामलीला’ में लीला प्रेमियों एवं नेमियों की मस्ती देखते बनती है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि रामनगर में एक महीने के लिए त्रेता-युग का आगमन हो जाता है। उज्जवल वस्त्रों में इत्र, फुलैल के साथ रामायण का गुटखा रखना नेमियों और कलाप्रेमियों के मस्ती और आस्था का संयोग प्रतीत होता है। वास्तव में बनारसी संस्कृति के साथ आस्था और श्रद्धा-भक्ति का ऐसा संयोग अन्यत्र दुर्लभ है और यही अंदाज देश विदेश के दर्शनार्थियों को लुभाये बिना नहीं छोड़ता। अपनी आस्था को भव्यता, सम्पूर्णता तथा यथार्थ से निकटता प्रदान करने में प्रतिदिन जुटते हैं 10 हजार से अधिक लीला प्रेमी। सबसे बड़ी विशेषता यह कि यहां प्रत्येक लीला प्रेमी के अन्दर पात्र, दर्शक तथा आयोजक का भाव एक साथ होता है। महत्वपूर्ण प्रसंग की लीलाओं के दिन तो दर्शकों व श्रद्धालुओं की संख्या एक लाख से भी अधिक हो जाती है। राम जन्म,धनुष यज्ञ,  और राज्याभिषेक की आरती के प्रति लाखों लीला प्रेमियों की ललक विश्वप्रसिद्ध रामलीला के अनूठेपन एवं रहस्य को समझने के लिए बरबस हीं प्रेरित करते हैं। वैसे रामलीला का मंचन प्राचीन समय से ही उत्तर भारत में होता रहा है। किन्तु रामनगर की रामलीला को ‘राजाश्रय’ प्राप्त होने के कारण ही यह पूरे विश्व के रंगमंच पटल पर अपना सर्वप्रथम स्थान रखती है, जिसका सीधा श्रेय वर्तमान में रामलीला के प्रति समर्पित पात्रों, श्रद्धालुओं और लीलाप्रेमियों को जाता है, जो आज भी अवैतनिक रूप से पूरी श्रद्धा समर्पण एवं निष्ठा के साथ विश्व के सबसे बड़े रंगमंच को गौरवश्री में सहयोगी हैं।

विश्वप्रसिद्ध रामलीला – ईश्वर का साक्षात दर्शन

काशी भारत की धार्मिक राजधानी रही है। यहां पर भाद्रपद के चतुर्दशी से लेकर अश्विन तक रामलीलाओं का मंचन किया जाता है और लगभग बीस रामलीला कमेटियों द्वारा इसका आयोजन किया जाता है। विद्वानों का मानना है कि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा ही रामलीला अभियान की परम्परा शुरू की गयी और समूचे उत्तर भारत में प्रतिवर्ष मंचित की जाती है। उत्तर भारत में भी सर्वाधिक महत्वपूर्ण रामलीला रामनगर की होती है और एक माह तक मुक्ताकाशीय मंच पर चलने वाले इस महा आयोजन की पूरे विश्व में अलग साख है। रामनगर की रामलीला का संकल्प वाक्य है ‘यत् कृत्वा चाथ दृष्टवा हि मुच्यतृ पात कैर्नरेः’ इसका तात्पर्य है कि इसके करने और देखने से मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है। रामलीला में साक्षात् दर्शन अथवा ईश्वर के साकार रूप की झांकी का दर्शन सर्वाधिक महत्वपूर्ण है और प्रचलित किंवदंतियों पर विश्वास करे तो कहा जाता है कि जब रामलीला के पांच मुख्य स्वरूप मुकुट पहनते हैं उस क्षण से उनके अंदर ईश्वर का वास हो जाता है। यानि वह भी राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और सीता का रूप हो जाते हैं। साक्षात् भगवान का साक्षात्कार करने की अभिलाषी लोग श्रद्धावनत जनता के रूप में रामनगर की रामलीला के नित्यावलोकन को बाध्य करती है। कोई भी नवागंतुक जिसको यहां की लीला के बारे में जानकारी नहीं है वह यहां एकत्र जनसमूह के चरण स्पर्श तथा आरती के लिए पहुंचने की कोशिशें देखकर आश्चर्यचकित हो सकता है।

रामलीला का इतिहास :- रामनगर की रामलीला का इतिहास लगभग दो सौ साल से भी पुराना है। हालांकि इस रामलीला का कोई क्रमबद्ध-इतिहास नहीं है फिर भी प्रचलित दंत कथाओं के आधार पर कहा जाता है कि उन्नीसवी सदी के पूर्वार्द्ध में यह रामलीला रामनगर से थोड़ी दूर पर स्थित बरईपुर में होती थी जिसे मानस उपासक मेधा भगत कराते थे। उन्होंने जीवन भर इस लीला का श्रद्धा के साथ निर्वहन किया। वृद्धावस्था के चलते मेधा भगत ने तत्कालीन काशी नरेश महाराजा उदित नारायण सिंह जी से रामलीला को संरक्षण प्रदान करने एवं उसे रामनगर स्थानांतरित करने का अनुरोध किया। उस समय युवराज बीमार चल रहे थे और महाराज की मनः स्थिति ठीक नहीं थी। महाराज लीला के बारे में बारे में फैसला नहीं कर पा रहे थे। तब मेघा भगत ने कहा कि आप रामलीला को संरक्षण देंगे तो युवराज स्वस्थ हो जायेंगे। अंततः महाराज ने स्वीकृति दे दी और युवराज भी स्वस्थ हो गये। मेघा भगत की बात सच निकली और रामलीला की शुरूआत हो गयी। इस प्रकार कहा जा सकता है कि रामनगर की रामलीला काशी नरेश महाराजा उदित नारायण सिंह जी के समय में शुरू हुई। इनका जन्म सन् 1783 में हुआ था तथा शासन काल सन् 1835 ई0 तक था। अतः रामलीला की शुरूआत उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध से मानी जा सकती है। महाराज उदित नारायण के समय तथा कुछ समय तक ईश्वरी नारायण सिंह के शासन काल में कुछ लीलाएं रामनगर किले में तथा कुछ लीलाएं वहां के अयोध्या नामक स्थान पर होती थी। बाद में ईश्वरी नारायण सिंह जी ने इस लीला को वर्तमान स्वरूप में परिवर्तित किया। वे सन् 1835 ई0 में राजा बने थे और 1898 ई0 तक उनका शासन काल चला। ऐसा अनुभव किया जाता है कि रामलीला का वर्तमान स्वरूप 1860-65 के बीच विकसित हुआ। महाराजा ईश्वरी नारायण सिंह जी एक धर्मप्रिय राजा थे तथा मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम में इनकी अगाध श्रद्धा थी। रामलीला के गोस्वामी तुलसी कृत रामायण के अनुसार करने के लिए इन्होंने अपने गुरूदेव-

स्वामी काष्ठ जिह्वा, रीवां नरेश रघुराज सिंह, नागौर नरेश, बगौरा के बाऊ साहब, हरिहर प्रसाद सिंह आदि के सहायता से रामचरित मानस का शोध करवाया तथा इसके पश्चात् लीला स्थल और संवादों का शोधन किया गया और संवाद लिखे गये।

रामलीला के स्थल- रामनगर की रामलीला मीलों की दूरी में चक्कर काटते हुए अनेक स्थलों में घूम-घूम कर होती है रामनगर की नित्य लीला प्रेमी दर्शक ‘देवी भूत्वा देवं अजेत’ की भावना से ओत-प्रोत होकर भगवान की दर्शन आराधना के लिए पहुंचते हैं। रामनगर की रामलीला का मंचन स्थल रामनगर से लेकर 4 किलो मीटर दूर लंका तक फैला हुआ है। जगह-जगह पर अयोध्या, जनकपुर, पंचवटी, लंका, चित्रकूट, निषादराज आश्रम, अशोक वाटिका, सनक सनन्दन, रामबाग नामक आदि स्थान है जहां रामचरित मानस में वर्णित घटनाक्रम के अनुसार लीलाएं सम्पादित की जाती हैं रामलीला के सभी स्थल शोधित किये गये हैं। रामलीला के सभी स्थलों का शोधन एक सत्पर्षि मण्डल विद्वान ने किया था। जिसमें महादेवाअन गायघाट के स्वामी जी, काष्ठ जिह्वा, स्वामी, तुलसी दत्त झा, पं0 मथुरानाथ, महाराज ईश्वरी प्रसाद नारायण सिंह, बाबू हरिहर सिंह, उमाराव पण्डित आदि प्रमुख थे।

रामलीला का स्वरूप- पारम्परिक रूप से ही लीला के समस्त प्रक्रियाओं को आज दो सौ साल बाद भी दोहराया जा रहा है जैसे पात्रों का चयन प्रथम गणेश पूजन, द्वितीय गणेश पूजन, रामलीला पक्की पर रामचरितमानस का पाठ, पात्रों की वेशभूषा, साज-सज्जा, पात्रों का खान-पान, आचरण, प्रशिक्षण सब कुछ एक निश्चित परम्परानुसार चल रहा है रामलीला के दौरान राजसी परम्पराओं, सामाजिक प्रचलित मान्यताओं का पूरा ख्याल रखा जाता है। जैसे-श्रीराम जन्म के समय गवनहरियों द्वारा सोहर गाना, श्रीराम और उनके भाईयों की शादी पर बारात का जाना, वहां खिचड़ी खाना आदि। इस प्रकार रामनगर की रामलीला, में लीलाप्रेमियों का श्रीराम से तादात्म्य स्थापित हो जाता है। एक महीने तक लोगों में राम का जीवन घुल-मिल जाता है।

रामलीला की बड़ी विशेषता में नित्यप्रति होने वाली आरती है। ऐसी मान्यता है कि आरती में स्वयं साक्षात् विष्णु भगवान का वास इन स्वरूपों में हो जाता है इसलिए वह सर्वाधिक तौर पर यह बात की देखने में आई है कि बाहर से आने वाले दर्शनार्थी और विशेषकर बनारसी ज्यादातर सिर्फ आरती के लिए रामनगर की रामलीला में आते है।

जीवनशैली- एक माह के महा अनुष्ठान के दौरान लोगों की जीवनशैली राममय हो जाती है। नित्य रामलीला देखने और आरती के लिए जो भागम-भाग होती है वह अवर्णनीय और अकल्पनीय है। लीला स्थल पर जाने के लिए दोपहर दो बजे से ही श्रद्धालुओं का आगमन तथा रामनगर स्थित, रामबाग पोखरे, रतनबाग पोखरे सगरा और गंगा नदी पर साफा पानी लगाना और भांग-बूटी छनना शुरू हो जाता है। पूरे एक महीने बहरी अलंग का मजा लिया जाता है दो बजे से तैयारी 5 बजते-बजते पूर्ण हो जाती है। सब लोग लीला स्थल पहुंचने लगते हैं और जिनकों सम्पूर्ण लीला देखनी होती है वह तो देखते हैं लेकिन जिनको आरती लेनी होती है वह भी लीला स्थल के पास ही रहते हैं।

इस दौरान सभी लीला स्थलों पर खान-पान के सामान ठेलों-खोमचों तथा अन्य दुकानों पर बिकते है जिसमें मुख्य रूप से रेवड़ी-चूड़ा, चाट, मूंगफली की दुकानों पर भारी भीड़ जुटती है। साथ ही बच्चों के लिए मेले का लुफ्त लेने के लिए गुब्बारे, खिलौने आदि बिकते हैं। इस प्रकार माह भर का आयोजन पुण्य के साथ-साथ कई लोगों के आजीविका का भी साधन बनता है।

रामनगर रामलीला की सबसे बड़ी विशेषता यह है, यह दर्शकाभिमुख नहीं है, प्रभुलीला की घटनाएं घटित होती है। पात्र अपनी भूमिकाएं जीते हैं। जिसे देखना हो देख ले। यहां न तो दर्शक दीर्घा ना तो किसी के लिए कोई खास व्यवस्था। दो सो साल से चली आ रही परम्पराएं ज्यों की त्यों है। शास्त्रोक्त फलों के अनुसार मोक्ष की प्राप्ति भी रामलीला से हो सकती है। मानस के पठन श्रवण लीला दर्शन से हमें यह शिक्षा भी मिलती है कि हमें राम जैसे आदर्श पुरुष के समान समाज में व्यवहार करना चाहिए। श्री रामलीला का मंचन भी यही अभीष्ट सामने रखता है। एक मंच पर ना होकर चार वर्ग मील के क्षेत्र में होने के कारण रामनगर की रामलीला अन्य जगहों की रामलीलाओं से विशिष्ट हो गयी है। जितनी पुरानी रामनगर की रामलीला है और जिस तरह से इसको काशीराज परिवार संरक्षण देता चला आ रहा है, जिस तरह अन्य जगहों की रामलीलाएं आधुनिकता की भेंट चढ़ रही है उसका देखते हुए यह कहा जा सकता है कि रामनगर की रामलीला अपने पारम्परिक स्वरूप में सिमटी हुई अपनी अति विशिष्ट वर्ग श्रेणी को सुशोभित कर रही हैं।

रामनगर की रामलीला का आयोजन महाराजा काशी नरेश की अध्यक्षता वाले “महाराज धर्म कार्य निधि ट्रस्ट” द्वारा किया जाता है वर्तमान में यह जिम्मेदारी काशी नरेश महाराज अनंत नारायण सिंह जी के ऊपर है। वर्ष 2014 की रामलीला दिनांक 7 सितम्बर से प्रारम्भ होगी।

 – आशुतोष पाण्डेय

क्षीर सागर की झांकी से शुरू हुई रामनगर की विश्वप्रसिद्ध रामलीला

विश्वप्रसिद्ध् रामलीला के प्रथम दिवस की शुरुआत क्षीर सागर की झांकी के साथ हुई। मुक्ताकाशीय मंच पर होने वले इस महा अनुष्ठान की शुरुआत श्री राम चरित मानस के बालकाण्ड -175-1 ”काल पाइ मुनि सुनु सोई राजा” से ”अब सो सुनहु जो बीचहिं राखा” बालकाण्ड के 187-6 तक सम्पन्न हुई। जिसमें क्रमशः रावण जन्म दिग्विजय क्षीर सागर की झांकी देव स्तुति आकाशवाणी की लीला का मंचन हुआ। लीला के क्रम में रावण, कुम्भकरण, विभिषण तीनों भाईयो द्वारा कठोर तप किया जाता है। जिससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा एवं शंकर द्वारा मन वांछित वर का आशीर्वाद दिया जाता है। जिसमें रावण द्वारा ” हम किसी के मारे ना मरे वानर और मनुष्य को छोड़” कुम्भकरण द्वारा ” हम छः महिना सुते और जागे”, विभिषण द्वारा – भगवंत के चरण में अनुराग मांगा गया। जाते-जाते ब्रह्मा जी ने लंकिनी को देखकर कहा की लंका में राक्षसो का राजा रावण बहुत काल राज करेगा किंतु रात्रि के समय वानर के मारने से तू विकल होगी तब समझना कि राक्षसों का संहार भया। तदोपरांत माल्यवंत द्वारा समुद्र के बीच में बने त्रिकुट नामक पर्वत पर विश्वकर्मा का बनाया बड़ा दुर्गम स्थान है जो इन्द्रपुरी से भी रमणीय है लंका करिके विख्यात है कुबेर के रक्षक कोटिक यक्षगण वहां रहते है। रावण यक्ष गणों को मार कुबेर पर चढ़ाई कर विजय प्राप्त करता है। रावण द्वारा राक्षसों का ब्राह्मणों के भजन होम यज्ञ रोकने के लिये कहता है और इन्द्र को बन्दी बना लेता है। फिर वहां ब्रह्मा जी का आना और रावण को यह बताना कि ‘ मेरे कहे से इन्द्र को छोड़ दो अब यह तुम्हारी आज्ञा में रहेंगे और तुम्हारे बेटे का नाम इन्द्रजीत करके प्रसिद्ध होगा।’ रावण से भयभीत होकर गऊ (गाय) द्वारा देवताओं के पास जाकर विनती की जाती है। इस प्रकार सभी देवगण स्तुति करते है ब्रह्मवाणी द्वारा उदघोष होता है कि ‘ तुम लोग तनिक भी डेराव मत, हम मनुष्य के तन को धारण करेंगे अपने अंशन के समेत परमोदार जो सूर्य वंश है तेहि वंश में अवतार लेंगे। कश्यप और अदीति ने महा तप करके पुर्व मे ही हमसे वरदान ले चुके है तेहि कश्यप और अदीति कौशल पुरी में दशरथ और कौशल्या नाम से विख्यात है। तेहि के गृह में रघुकुल वंश के तिलक चारों भाइ समेत अवतार लेंगे।’ ब्रह्मा जी द्वारा यह बताना कि ‘अब तुम सब देवता डराव मत नारद जी का यह सब वचन सत्य होगा। हे देवता तुम लोग भी सहायक के लिये वानरों का तन धरके परमेश्वर की चरण कमल की सेवा करों मै भी जामवंत के तन को धारण करूंगा।’ इस प्रकार इन्द्र ने बाली का, सूर्य ने सुग्रीव का, विश्वकर्मा नें नल, अग्नि ने नील, वायु द्वारा रूद्र से हनुमान, वरूण ने सुषेन, कुबेर ने गंधमादन के रूप को धारण किया। इसके पश्चात ”राम आरती होन लगी है, जगमग-जगमग ज्योति जगी है” के साथ आरती होकर लीला का समापन होता है।

श्री राम जन्म से हर्षित हुई अयोध्या नगरी

आखिरकार वह शुभ समय आ ही गया जिसका लीला प्रेमियों को वर्ष भर इन्तजार रहता है; प्रभु श्रीराम के जन्म का। श्रीराम जन्म के साथ ही अयोध्या में खड़े हजारों लीला प्रेमी ‘बोल दे राजा रामचन्द्र की जय’ व ‘हर-हर महादेव’ का उद्घोष करते भाव विभोर हो गये। रामनगर की विश्व प्रसिद्ध रामलीला के दूसरे दिन अवध में श्रृंगी श्रृषि कृत यज्ञ, अद्भुत झांकी, श्रीराम जी का विराट दर्शन, बाललीला, यज्ञोपवीत. मृगया के प्रसंग का मंचन हुआ। द्वितीय दिवस में श्रीरामचरित मानस के दोहा 187-7 ‘अवधपुरी रघुकुलमनि राऊ….’ से दोहा संख्या 205-1 ‘आगिलि कथा सुनहु मन लाई’ तक के प्रसंग का मंचन हुआ। दशरथ का गुरु वशिष्ठ के पास आगमन के साथ लीला का प्रारम्भ होता है। दशरथ वशिष्ठ के प्रणाम कर कहते हैं- ‘ए नाथ आप की कृपा से सब प्रकार का सुख है परन्तु प़ुत्र नहीं हैं एही बड़ा दुख हैं।’ यह सुन श्री वशिष्ठ उन्हें श्री राम के अवतार के बारे में बताते हैं तथा श्रृंगी ऋषि बुलाकर पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाते हैं। यज्ञ से प्रसन्न होकर अग्निदेव दशरथ को हव्य प्रदान करते हैं। श्री दशरथ द्वारा हव्य का आधा भाग कौशल्या को, उभय भाग का आधा कैकयी और सुमित्रा को दिया जाता है। इस तरह रानियां गर्भवती हुईं। चैत्र मास और नवमी तिथि को अभिजीत मुहूर्त भगवान के प्रकट होने का अवसर जान देवगण पुष्पवर्षा करते हैं और सबके सुखदाता श्रीराम प्रकट होते हैं और चतुर्भुज रुप में दर्शन देते हैं। प्रभु श्रीराम के चतुर्भुज रूप को देख माता कौशल्या कहती हैं कि- ‘ए तात अब इस रूप को छोड़ि अत्यन्त प्रियशील लीला करिये यह सुख परम अनूप है।’ दासी द्वारा यह समाचार मिलते ही कि महाराज महल में महारानी कौशल्या जी को पुत्र भया है, नगर ध्वज पताका से छा गया। नर-नारी हर्षित होते हैं, सोने के कलश और थालों में मंगल द्रव्य, मंगल गीत गाती हुई राजद्वार में प्रवेश करती हैं, वे आरती करके निछावर बांटती हैं, वन्दी जन व गवैया गीत गाते हैं-

‘आजु अवधपुर मंगल बाजनि बाजहिं हो।

ललना प्रकटे हैं दीनदयाल कौशल्या जी के काजहिं हो।।’

इसके पश्चात श्री वशिष्ठ द्वारा चारों भाइयों का राम, भरत, शत्रुघ्न, लक्ष्मण के रूप में नामकरण किया जाता है। प्रभु श्रीराम अनेक बाल लीला एवं स्वरूपों का दर्शन माता कौशल्या को कराते हैं। जिसमें विराट रूप देख कैशल्या भयभीत हो जाती हैं। यह स्थिति देख श्रीराम माता कौशल्या से कहते हैं- ‘इस लीला की बात कहीं मत कहना।’

गुरू वशिष्ठ द्वारा चारो भाइयों का यज्ञोपवीत संस्कार कर विद्या आरम्भ होता है जिसमें कुमार लघुसिद्धांत कौमुदी सीखते हैं। श्रीराम अपने मित्रों को बुलाकर शिकार खेलने जाते हैं। दशरथ को मृग दिखाते हुए बोलते हैं- ‘महाराज यह मृगा हमने मारा है।’

इतने प्रसंग के उपरांत श्रीराम जी की आरती होती है। ‘जगमग-जगमग ज्योति जगी है’ की आरती गायन के साथ द्वितीय दिन की लीला समाप्त होती है।

ताड़का, सुबाहु का वध कर जनकपुर पहुँचे श्री राम

विश्वामित्र द्वारा अयोध्या में आगमन और राजा दशरथ से श्री राम लक्ष्मण को अपनी सुरक्षा में मांगते ही अयोध्या में निराशा की लहर दौड़ गयी। परन्तु देवगण व मुनी लोग हर्षित हो उठे और श्रीराम के अवतार का उद्देश्य सार्थक होता देखे।

विश्वप्रसिद्ध रामलीला के तीसरे दिन “विश्वामित्र आगमन, ताड़का वध, सुबाहु वध, मारिच निरसन, अहिल्या तरण, गंगा दर्शन, मिथिला प्रवेश, श्री जनक मिलन के प्रसंग का मंचन हुआ।

तीसरे दिन के लीला के क्रम में विश्वामित्र जी ब्राह्मण मण्डल के साथ दशरथ जी से मिलने आते है। दशरथ द्वारा उनका बहुत प्रकार से सम्मान किया जाता है। विश्वामित्र अपने आने का कारण बताते है कि- ‘ए महाराज! असुर समूह हमको बहुत सतावतें हैं, मैं आप से जाचने आया हौ कि भाई समेत श्री राम जी को दीजिए निसाचरों के बध से मैं सनाथ होऊंगा, हे महाराज मोह अज्ञान को छोड़ि हर्षित मन से दीजिए आपका धर्म और सुजस होगा इससे कल्याण होगा।’

यह सुनते ही राजा दशरथ दुःखी हो उठे। श्री वशिष्ठ के समझाने पर दशरथ पुत्रों को आशीर्वाद देकर विदा करते है। मार्ग में श्रीराम ताड़का नामक राक्षसी का वध करते हैं। मारिच और सुबाहू को मारकर मुनिगणों की यज्ञ की रक्षा करते हैं। जिससे प्रसन्न होकर देवतागण श्रीराम की स्तुति करते हैं।

विश्वामित्र श्रीराम से राजा जनक के धनुस यज्ञ की बात को बताते हैं कि- “ए रामचन्द्र ! एक आश्चर्य कौतुक है कि श्री विदेह महाराज धनुस यज्ञ ठाना है तहा देश-देश के राजा आए हैं जो शिव धनुस को तोड़ेगा तिसको अपनी कन्या जानकी को देयेंगे सो यज्ञ देखने चलो।’

मार्ग में भी श्रीराम पूछते हैं’- ‘ए महराज यह आश्रम किसका है जिसमें जीवजन्तु खग मृग कोई नहीं औ यह शिला राह में कैसी पड़ी है।’

तब विश्वामित्र सब कथा सुनाते है कि गौतम मुनि ने अहिल्या को श्राप दिया है। तब श्रीराम अपने चरण कमल से शिला को स्पर्श करते हैं और अहिल्या प्रकट हो जाती है और श्रीराम की स्तुति करती है।दोनो भाई विश्वामित्र के साथ गंगा किनारे जाते हैं। वही विश्वामित्र उन्हें गंगा के स्वर्ग लोक से भूमि पर आने की कथा सुनाते है।

सभी लोग स्नान कर जनकपुर के निकट पहुँचते हैं। विश्वामित्र के आगमन की सूचना पाकर जनक मिलने आते हैं और दोनों भाइयों के तेज और रूप की प्रशंसा करते हुए परिचय पूछते हैं। विश्वामित्र कहते हैं- ‘रघुकुलमणि जो महाराज दशरथ हैं उनके यह बालक है। हमारे हित के लिए राजा ने भेजा है संग्राम में असुरों को जीत यज्ञ की रक्षा किया, यह सब जगत साक्षी है।’

जनक जी विश्वामित्र के चरणों में शीश नवाये उन्हे नगर में लिवा जाते हैं। ऐक सुन्दर महल में ठहराकर सब भांति सेवा कर विदा लेते हैं। श्रीराम-लक्षमण मुनि के संग भोजन कर विश्राम करते हैं। इसी के साथ “राम आरती होने लगी है। जगमग -जगमग ज्योती जगी है’ लीला आरती के साथ ही आज की लीला समाप्त होती है।

गुरू की आज्ञा से श्रीराम ने किया जनकपुर भ्रमण एवं फुलवारी दर्शन

विश्व प्रसिद्ध रामलीला के चतुर्थ दिवस श्री जनकपुर दर्शन, अष्ट सखी संवाद फुलवारी के प्रसंग का मंचन हुआ। बालकाण्ड के दोहा 217 – 1 ‘लषन हृदय लालसा विसेषी’ से दोहा संख्या 238 – 8 ‘चरन सुरोज सुभम सिर नाए’ तक के प्रसंग आज की लीला में मंचित हुआ।

लक्ष्मण की लालसा जनकपुर देखने को होती है परन्तु संकोचवश कह नहीं पाते। श्रीराम इस बात को समझ मुस्काते हैं और विश्वामित्र से कहते हैं- ‘ए नाथ लक्ष्मण जनकपुर देखा चाहते हैं परन्तु आप के डर औ संकोच से प्रकट नहीं करते जो मैं आप की आज्ञा पाउं तो नगर को देखाय जल्दी ऐ ले आवौं।’

विश्वामित्र की आज्ञा पाकर दोनों भाई नगर देखने जाते हैं। पुरवासियों ने सुना कि सुन्दर बालक नगर देखने आये हैं तो सारा काम-धाम छोड़ दौड़ पड़े और दर्शन कर सुखी होते हैं। युवतियाँ अपने घरों के झरोखे से झांककर देखती हैं और दोनो भ्राताओं के रूप स्वरूप का बखान करती हैं कि- ‘करोड़ो कामदेव इन पर न्यौछावर हैं, कौन तनधरी होगा जो इस रूप को देख मोहित ना हो।’

सखियों मे एक कहती है- ‘ये दोनों दशरथ के पुत्र हैं हंस के समान इन बालकों ने ना जीते जाने योग्य निशाचरों मारिच, सुबाहु को मारा है। जो श्यामल शरीर के हैं वो कौशल्या पुत्र श्री राम हैं तथा उनके पीछे गौर वर्ण वाले लक्ष्मण हैं।’ सखियां कहती हैं कि ‘अगर विधाता भला है और सबको उचित फल देता है तो जानकी जी को यही सुन्दर वर मिलेगा। इस विवाह में सबका भला है। जिसके चरण कमल के धूल से बड़े पाप से अहिल्या तर गई वे क्या बिना शिव धनुष तोड़े रहेंगे।’ सभी स्त्रियां पुष्प वर्षा करते हुए ‘ऐसा ही होय’ कहती हैं। पुरबालक दोनों भाइयों को रंगभूमि की रचना दिखाते हैं। दोनों भाई गुरू के पास लौटते हैं।

प्रातःकाल सबसे पहले लक्ष्मण उठते हैं फिर राम नित्य क्रिया कर के गुरू को प्रणाम कर के पूजा के लिए पुष्प लेने जाते हैं, जहां मालिन कहती है कि –’आप फुलवारी से मनमाने फूल लीजिए और हमारी आंखों को सुख दे कर हमारे जन्म सुफल कीजिए।’ उसी समय साखियों सहित गिरिजा पूजन के लिए जानकी जी का आगमन होता है।

सीता जी ‘जै-जै जगमगित ज्योति श्रुति पुरान गाई’ की स्तुति के साथ योग्य वर मांगती हैं। सखियां सीता जी को दोनों राजकुमारों के रूप सौन्दर्य की प्रशंसा करते हुए बताती हैं और कहती है। कि वो देखने योग्य हैं। सीता जी आश्चर्य चकित हो चारों ओर देखती हैं। उनके पायलों गहनों की धुन सुनकर श्री राम लक्ष्मण से बोले- ‘हे भाई लक्ष्मण ! देखो यह जो मीठे-मीठे गहनों की ध्वनि आय रही है सो मानो कामदेव ने दुंदुभी दिया है, मानहु विश्व विजय जीतने का संकल्प किया हो।’

श्री राम बताते हैं कि यह वही जनक पुत्री हैं जिनके लिए धनुष यज्ञ हो रहा है। श्री राम जी का मन सीता जी के मन में लुभाया हुआ है। सखी श्री राम जी की प्रशंसा करते हुए कहती हैं ‘सावरे गोरे शरीर सिर पर मोर पंख माथे पर तिलक कानों में कुण्डल टेढ़ी भौव और घुघुराले बाल, लाल नेत्र, ठोड़ी नाक औ गाल सुन्दर है वक्षस्थल पर मणियों की माला, शंख की तरह गर्दन, कोमल भुजाएं, बाएं हाथ में फूल से मुक्त दोना है। हे सखी सो सावर कुंवर बहुत सलोना है।’

तब सीता जी दोनों राजकुमारों को देखती हैं। सीता जी संकोच पूर्वक श्रीराम को देखती हैं। सीता जी पुनः गिरिजा पूजन करने मंदिर में जाती हैं और विधवत पूजन कर बोलती हैं- ‘हे देवी यही वर मांगत हौं कि मेरे मनोरथ को अच्छि तरह जानत हैं। आपके पदकमल की सेवा ऋषि मुनी देव आदि करत हैं। आप धन्य हैं। आप की जय होय, जय होय, जय हो।’ इसी समय आकाशवाणी होती है- हे जानकी जी ! हमारी सत्य आशीष सुनों तुम्हारी मन की कामना पूरी हो गयी। ए जानकी ! जिसपर तुम्हारा मन लगा है सोई सहज ही सुन्दर सांवर वर मिलेगा।

दोनों भाई मुनि के चरणों में प्रणाम कर विश्राम करते हैं। प्रातः काल श्री राम कहते हैं- ‘ए भाई लछिमन कमल चकई चकवा औ जग के सुख देन हारे सूर्य उदय भये हैं’, सो देखो। लक्ष्मण जी कहते है – ऐ नाथ ! सूर्य के उदय से कोई सकुच भई औ तारों की ज्योति ऐसी मलीन भई जैसे आप का आगमन सुनि सब राजों के बल हीन हो गये। दोनों भाई नित्य कर्म करने के बाद गुरू के समीप आय गुरू को प्रणाम करते हैं।

इसी के साथ श्रीराम की आरती होती है। फुलवारी के इस प्रसग को देखने के लिए लीला स्थल पर महिलाओं की भारी भीड़ रही।यह लीला महिलाओं के लिए काफी लोकप्रिय है साथ ही जनकपुर परिसर व पीएसी परिसर में भारी संख्या में लीला प्रेमी मौजूद रहे।

धनुष यज्ञ एवं परशुराम-लक्ष्मण संवाद

समूचा जनकपुर परिसर लीला प्रेमियों से भरा हुआ, क्या नर क्या नारी, बड़े-बूढ़े, बच्चे सभी बस लीला स्थली की ओर बढ़ चले। सब की बस एक ही इच्छा धनुष तोड़ते श्रीराम का दर्शन। विश्वप्रसिद्ध रामनगर की रामलीला के पांचवे दिवस धनुष यज्ञ और परशुराम संवाद की लीला का मंचन हुआ, जिसमें बालकाण्ड के दोहा सं0 238-9 ”सतानन्दु तब जनक बोलाए” से लेकर दो0 सं0 289 के ”तेहिहि पुर के सोभा कहत सकुचहि सारद सेसु” तक के प्रसंग का पाठ हुआ।

लीला के क्रम में जनक जी की कठोर प्रतिज्ञा कि जो महादेव के इस कठोर धनुष को तोड़ेगा वो जानकी जी को ब्याहेगा। इस निमित्त जनक जी के निमत्रण पर सभी राजे-महाराजे जनकपुर पहुचते हैं।

महाराज जनक सदानंद को बुलाकर यह संदेश विश्वामित्र मुनि को भेजते हैं। विश्वामित्र के साथ श्रीराम लक्ष्मण जनक पुर में पधारते हैं। जनक पुर वासी दोनो भाई को देखने के लिए उमड़ पड़ते हैं तथा सभी अपने भाव से उन्हें देखते हैं। सब मंचो से ऊंचा मंच जो है उस पर मुनि सहित दोनों भाई बैठते हैं तथा सब राजा अपने-अपने हाथी-घोंड़ो पर आते हैं सुमति और बिमति उनका परिचय देते हैं। सब सेवक मिलकर सबको यथायोग्य आसन पर बैठाते हैं। इस महास्वयंवर में वाणासुर और रावण भी आते हैं जो महादेव के कठोर धनुष को देख प्रणाम कर वापस लौट जाते हैं।

समस्त राजा यज्ञ शाला में जाकर अपने बाहुबल का प्रदर्शन करते है परन्तु धनुष को हिला भी नहीं पाते हैं। सभी राजाओं को असफल होता देख जनकपुर में लोगों को निराशा होती है। जनक जी व्याकुल होकर क्रोध से बोलते हैं कि – देवता, दैत्य,मनुष्य का रूप धर कर सब रणधीर वीर आये परन्तु महादेव के धनुष को चढ़ाना तो दूर हैं, तिल भर भूमि से कोई उठा भी नहीं पाया – ‘अब हमें जानि पड़ता हैं कि भूमि बिन वीरों के रही। अब आप लोग अपने घर जा सकते हैं। ब्रहमा ने सीता का विवाह नहीं लिखा हैं। जो यह प्रतिज्ञा छोड़ूंगा तो पुण्य जायेगा भले ही कन्या कुंवारी रहें। जो जानता हैं कि बिना वीर की भूमि हैं तो प्रतिज्ञा कर उपहास नहीं करावते।

जनक जी के कठोर वचन सुन लक्ष्मण क्रोधित होकर बोलते हैं कि – ‘ए महाराज! रघुवंशियों में जहाँ कोई होता हैं तेहि समाज में ऐसी बात कोई नहीं करता जैसी महाराज जनक ने की।

आपकी आज्ञा हो तो इस ब्रह्माण्ड को गेंद सा उठाल्यों, कच्चे घड़े की भांति फोड़ डाल्यों, जो ऐसा ना करू तो प्रभु पद की सपथ आज से धनुष को हाथ न धरू।’ विश्वामित्र की आज्ञा पाकर श्री राम धनुष भंजन के लिए जाते हैं। सुनैना उनके कोमल शरीर को देख सशंकित होती हैं। धनुष भंजन से पहले लक्ष्मण जी ब्रहांण्ड को चरण से दबाते हैं और कहते हैं की – ”ए दिसों के कुंजर और कच्छप, हे शेष, वाराह तुम सब कोई धरती को धरि-धरि धरौ। डोलने ना पावैं।

”गुरू प्रनाम मनहि मनु कीन्हा

अति लाघवं उठाइ धनु लीन्हा।

इसी के साथ श्री राम जी ने महादेव का धनुष उठाया और प्रत्यंचा चढ़ाते ही धनुष टूट गया। सखियों द्वारा मंगल गीत गाते हुए जयमाल के लिए श्री जानकी जी आती हैं और श्री राम के गले में सुहावनी जयमाल पहनाती हैं।

उसी छण धनुष टुटने की आवाज सुन परशुराम का आगमन होता हैं। पूछने पर जनक जी द्वारा सीता स्वयंम्बर का प्रसंग बताया जाता है। परशुराम भंजित धनुष देख क्रेाधित होते हैं और कहते हैं जिसने यह तोड़ा हैं शत्रु सहस्त्रबाहु के समान हैं। इस पर लक्ष्मण जी कहते हैं कि ‘बहुत सी धनुई लरिकाई में तोड़ी पर आप कभी ऐसी रिस नहीं किया तो इस धनुष पर ममता आपकी केहि हेतु।’ परशुराम द्वारा अपने बल पौरूष को बताया जाता हैं वहीं लक्ष्मण व्यंगबाण छोड़ कर उनके क्रोध को बढ़ाते हैं।

श्रीराम परशुराम से स्वयं को अपराधी बताते हुए लक्ष्मण को माफ करने को कहते हैं एवं स्वयं भी क्षमा याचना करते हैं। श्री राम के बल प्रताप को देख परशुराम जी अपना धनुष दे बहुत विनती कर जंगल को चले गये। विश्वामित्र की आज्ञा से जनक निमंत्रण के साथ एक दूत को सतानंद के साथ अयोध्या भेजते हैं और विवाह के लिए मण्डप, महल, हवेलियां सजाई जाती हैं। आरती गायन के साथ इस प्रसंग की लीला को विराम दिया जाता है।

श्री राम सहित चारो भाईयों का विवाह सम्पन्न, अयोध्या में उत्सव, जनकपुर में हर्ष

विश्वप्रसिद्ध रामलीला के छठे दिन श्री अवध से बारात का प्रस्थान एवं जनक पुर में विवाह के प्रसंग का मंचन होता हैं। लीला के कम्र में जनक दूत अयोध्या आते हैं और महाराज दशरथ को प्रणाम कर पत्रिका देते है। राजा प्रसन्न हो कर पत्रिका पढ़ते हैं। दशरथ पत्रिका पढ़ सब कथा जान प्रसन्न हो दूतो को न्योछावर देते है। दूत भेज गुरू वशिष्ठ को बुलाकर कहते हैं ”यह पत्रिका मिथिला नगर से महाराज विदेह ने भेजा हैं उन्होंने अपनी पुत्री सीता का स्वयम्बर किया जिसमें देश विदेश के राजा आए उसमें विश्वामित्र के साथ राम और लक्ष्मण भी आए। राजा जनक के प्रण को सुनि कोई राजा उस धनुष को नहीं तोड़ पाये श्री रामचन्द्र जी ने बिना परिश्रम ही धनुष तोड़ा।”

वशिष्ठ जी श्रीराम की प्रशंसा करते हैं और बारात ले चलने का आदेश देते है। सब तरह से बारात सजा कर घोड़े, हाथी, रथ सब सुन्दर रूप से सजाए जाते है। सब राजकुमार सुन्दर वस्त्र आभूषण पहने हुए महल से आते है। बैण्ड बाजा के साथ पूरा नगर बारात में जाना चाहता है। एक रथ पर राजा दशरथ बैठते हैं और दूसरे पर गुरू वशिष्ठ जी।

बारात आगमन सुन राजा जनक स्वर्ण कलश में जल भर कर तथा विभिन्न प्रकार के पकवानों को थाली में सजाकर भेजते हैं। उधर राम-लक्ष्मण, विश्वामित्र खबर सुनकर दशरथ के पास जनवासे में जाते है दोनो भाई सबसे गले मिलते हैं। दशरथ जी विश्वामित्र को प्रणाम करते है। दोनो भाई दशरथ जी को प्रणाम कर, वशिष्ठ जी का चरण स्पर्श करते हैं। पुरवासी बहुत प्रकार से प्रशंसा करते हैं।

शतानंद कहते हैं ”ए महाराज! अब विवाह का समय हुआ, मंडप में पांव धरिए।” गुरू वशिष्ठ सबकों साथ ले चलते हैं। रास्ते में देवतागण मिलते है, शिव जी डमरू बजाते है। चारों ओर हरहर महादेव का उद्घोष होता हैं। शिव जी पार्वती के साथ बैल पर सवार हो जाते हैं।देवतागण महाराज दशरथ के भाग्य एवं श्रीराम विवाह की प्रशंसा करते हैं।

सीता जी को दो सखियां विवाह मंडप की ओर लेकर चलती हैं। यह वह अवसर है जब माया और ब्रह्म दोनो राम और सीता के रूप में राजा जनक के आंगन में विराज मान हो रहे हैं। सब इसे देख आनंद ले रहे है। मंगलाचरण प्रारम्भ होता हैं मंडप में राजा दशरथ, जनक, विश्वामित्र, गुरू वशिष्ठ तमाम लोंग आसन पर बैठें हैं। पुरा विवाह कर्म हो रहा हैं। इसके बाद वर कन्या का हाथ थमाते है और शाखोच्चार होता हैं। फिर कन्यादान एवं सिंदूर वंदन इत्यादि कर्म होता हैं।

वशिष्ठ की आज्ञा से माण्डवी, श्रुतकिर्ति, उर्मिला तीनों कुवारियां बुलाई जाती हैं उनका विवाह भरत, शत्रुध्न, लक्ष्मण से सम्पन होता हैं। दशरथ बहुओं को देख प्रसन्न होते हैं।

राजा दशरथ सकल समाज सहित जनवासे जाते हैं तथा सखियां मंगलगान करती हुई दुल्हा-दुल्हन को कोहबर में ले जाती है। सीता जी बार-बार राम जी को देखकर सकुचाती हैं। कोहबर में सब सखियां राम की आरती उतारती है और अंत में वर को जनवासे भेजती हैं।

देवतागण चारों सुंदर जोड़ी की प्रशसा करते है और आरती गाते हैं। इसी के साथ लीला को विराम दिया जाता है और सुनैना आठों स्वरूपों की आरती उतारती हैं। आज की लीला में सीता जी भी साथ रहती हैं इसलिए लीला में दूसरी आरती- “आरती करिये सियवर की।नख सिख छविधर की” गायी जाती हैं।

कौशल्या ने किया परिछन, अयोध्या में उत्सव

राजा जनक शतानंद से कहते हैं- ‘हे शतानंद ! जाइके महाराज दशरथ को जेवनार हेतु बुलाय ल्यावों।’ सबके आते ही पांव धुलाय, उचित आसन पर बैठा कर भोजन परोसा गया। सब लोग पंचकौर (प्राणाय स्वाहा, अपानाय स्वाहा, व्यानाय स्वाहा, उदानाय स्वाहा और समानाय स्वाहा) कर के भोजन करते हैं। तभी सब नारियां गारी गाती हैं। ‘खा लो-खा लो खिचड़ी मेरे लाल’ गारी सुनकर दशरथ जी बड़े प्रसन्न हुए। हाथ-मुँह धोने के बाद वे पान खाकर जनवासे जाते हैं।

दशरथ जी जनक जी से विदा मांगते हैं, जनक जी जाने की अनुमति नहीं देते। तब विश्वामित्र और शतानंद जी समझाते हैं। पुरवासी सब बारात जाने की बात सुन व्याकुल हो जाते हैं। सब हाथी,घोड़े सजाये गए, दहेज सामग्री सब जनवासे पहुँचा दी गयी। सखियां सीता को समझाती है- ‘ए राजकुमारी ! तुम नित्य पिया की प्यारी होव, सुहाग अचल होय, अपने सास-ससुर की सेवा करना औ पति के रूख को देखि उनकी आज्ञा में रहना।’ श्री राम जी सुनैना से विदाई की आज्ञा लेते हैं। सभी माताऐं पुत्रियों को बुलाकर बारम्बार भेंटती हैं, बारात विदा लेती है। महाराज दशरथ जी प्रतिष्ठित व्यक्तियों को विनती कर के लौटते हैं। जनक जी सब भाइयों से गले मिलते हैं।

जगह- जगह पड़ाव देते बारात अयोध्या के निकट पहुंचती हैं। बारात आगमन सुन सब नर-नारी प्रसन्न हो जाते हैं। माताऐं थाल सजाकर प्रतीक्षा करती हैं पूरा नगर सजा हुआ रहता है। शुभ मुहूर्त में वशिष्ठ अयोध्या में प्रवेश की अनुमति देते हैं। महल द्वार पर माताऐ आरती उतारती है। पालकी का पट खुलता है चारों तरफ जयघोष होता है। सम्पूर्ण अयोध्या राममय हो जाता है। सभी माताऐं आशीर्वाद देती हैं। दशरथ रानियों को बुलाकर कहते हैं- ‘पतोहु अबही लरिका हैं और तिस्पर अपने घर से पराये घर आई हैं, आंख की पलक की भांति सब कोई रखना राह चले से लरिका सब थके हैं और नींद के वश में हैं अब जाय शयन कराओ।’

श्रीराम जी आदि महल में आते हैं। कौशल्या श्री राम जी से सब प्रसंग पूछती हैं। श्री राम कहते हैं- ‘ए माता ! जो आपका चरण हैं तेहि के प्रताप से ही सब भया औ होगा।’

विश्वामित्र जी दशरथ जी से विदा लेते है। भाई समेत श्री राम जी उन्हें पहुंचाकर लौटते हैं। विवाह आनंद कुछ दिन बीतता हैं। इसी प्रसंग के साथ आज की लीला को यहीं विराम दिया जाता है और् ‘आरती करिये सियवर की। नख सिख छविधर की।।’ आरती का गायन होता है|

भरत के राज्याभिषेक की आस, श्रीराम को वनवास

विश्वप्रसिद्ध रामलीला के आठवें दिन राज्याभिषेक की तैयारी एवं कोपभवन के प्रसंग का मंचन हुआ। जिसमें अयोध्या काण्ड के प्रथम श्लोक ”यस्यांके च विभति भूधर सुता देवपगा मस्तके ” से दो. सं. 57-1 ”अति सुकुमारि देखि अकुलानी” का पाठ हुआ।

लीला के क्रम मे नारद जी श्री राम जी से कहते हैं – ”यद्यपि प्रभु अंतर्यामी हैं। सब जानत हैं तथापि हे स्वामी यह विनती है कि जेहि के हेतु मनूष्य का अवतार लिया है तिसको वेगि सम्भार किया चाहिए।” श्रीराम कहते है- ”हे मुनिराज ब्रह्मा जी अबौ भय मानते हैं” हे तात ब्रह्मा जी सो बहुत समझाय के कहना कि कुछ दिन गये आयके देखिएगा।

राजा दशरथ गुरू वशिष्ठ से आज्ञा लेकर श्रीराम के राजतिलक की तैयारी करते है। नगर में उत्सव का माहौल बन जाता हैं।

यह सब देखकर इन्द्र सरस्वती से कहते हैं – ”हे माता हमारी विपत्ति देखि आज आप ऐसा करिये कि राज को छोड़ि राम वन जायें जेहि से सब देवतों का काज होय, हे माता आप को थोरी भी खोर नहीं काहें कि श्रीराम जी हर्ष और विषाद से रहित हैं आप राम जी के स्वभाव को भली भांति जानति है। जीव कर्मानुसार सुख – दुख का भागी है अतएव ऐसा बूझि देवतों के लिए आप अवध को जाइयें।”

सरस्वती अयोध्या जाकर कैकयी की दासी मंथरा की बुद्धि फेरती है। मंथरा कैकयी को राजा दशरथ के खिलाफ भड़काती है और कौशल्या को भला बुरा कहती है और कैकयी को दो वरदान मांगने की याद दिलाती है जिसमें भरत के लिए राज्य और राम को चौदह वर्ष वनवास भोगने को कहती हैं। कैकेयी मंथरा को आदर देकर कोपभवन में चली जाती है।

दशरथ कोपभवन में प्रवेश करते हैं। कैकयी को मंगल बेला में उदास होने का कारण पूछते हैं। कैकयी राजा को वरदान देने की याद दिलाती है और भरत के लिए राज्याभिषेक और राम को चौदह वर्ष का वनवास मांगती है।

यह सुनते ही मानो दशरथ पर वज्रपात हो गया, वह अत्यंत व्याकुल हो उठते हैं और कहते हैं- ”हाय मेरा मनोरथ का कल्पवृक्ष फूल गया पर कैकेयी रूपी हथिनी ने उसे जड़ सहित उखाड़ दिया औ विपत्ति को अचल किया। स्त्री का विश्वास करि मारा गया।” राजा दशरथ बहुत विलाप करते हैं।

कैकेयी श्रीराम को बुलाकर सब प्रसंग बताती हैं। श्रीराम हर्ष पूर्वक पिता की आज्ञा मानने को तैयार होते हैं। श्रीराम दशरथ जी से मिलकर वन जाने की आज्ञा लेते है। दशरथ दुःख में कुछ कह नहीं पाते। पुरवासी स्त्री-पुरूष कैकेयी के इस कृत्य की निंदा करते हैं। माता कौशल्या दुःखी होकर कहती हैं- ”भरत, महाराज और पुरजनों को बड़ा क्लेश होगा। चौथापन में वनवास राजा को शोभा देता पर तुम्हारी अवस्था देख दुःख हो रहा। वन बड़ा भाग्यवान है और अयोध्या अभागिन हैं।” श्री राम माता कौशल्या को समझाते हैं ऐसे समय विषाद करना उचित नहीं। उसी समय यह समाचार सुन सीता जी सासु के पास जाकर चरण प्रणान करती हैं। कौशल्या आशीर्वाद देती हैं।

 ”आरती करिये सियवर की। नख सिख छविधर की।’’ आरती गायन के साथ लीला समाप्त होती हैं।

अयोध्या हुई वीरान, लक्ष्मण से मिला निषादराज को ज्ञान

अभी तक जो अयोध्या श्री राम विवाह और राज्याभिषेक की खुशियों से सराबोर थी वही श्रीराम के वन गमन पर मरघट सी वीरान हो गयी, मानो अयोध्या पर वज्रपात हो गया हो। सभी नर-नारी व्याकुल हो उठे। विश्वप्रसिद्ध रामलीला में नौवें दिन वन गमन, निषाद मिलन, लक्ष्मणकृत गीता उपदेश के प्रसंग का मंचन हुआ जिसमें अयोध्या काण्ड के 57-2 से ”बैठि नमित मुख सोचति सीता से” लेकर अयोध्या काण्ड के 93-1 स़े ”सिय रघुवर चरन रत हो हू” तक का पाठ हुआ।

सीता जी श्रीराम के साथ वन को जाना चाहती हैं, माता कौशल्या उन्हें पतिव्रत धर्म और नीति की शिक्षा और आशीर्वाद देती हैं। यह समाचार सुनकर लक्ष्मण जी आते हैं और श्रीराम के साथ वन जाने को कहते हैं। लक्ष्मण माता सुमित्रा से विदा मांगते हैं। सुमित्रा उन्हें नीति सिखाय आशिर्वाद देकर विदा करती हैं।

सीता समेत दोनो भाई पिता के पास जाकर विदा लेते हैं। दशरथ दुखी मन से कहते है- ”यह विधि का कैसा विधान है कि करे कोई और भरे कोई” तभी कैकेयी मुनियों के वस्त्र लाकर देती है और कठोर वचन सुनाती हैं। यह सब देख दशरथ अचेत हो जाते हैं। श्रीराम जी मुनिवेष धर माता-पिता का प्रणाम कर वन को चल देते हैं। वशिष्ठ तथा अन्य कहते हैं कि सबको रथ पर लेकर जाओ और तीन चार दिन बाद वापस ले आना, उनसे हाथ जोड़ विनती करना। तब सुमंत रथ लेकर श्रीराम के पास जाते है व ब्राह्णों को बुलाकर विदा लेते हैं।

         सभी नगरवासी भी श्रीराम के साथ चल देते हैं, प्रथम दिन पर कोई लौटने को तैयार नहीं होता। रात बीतने पर श्रीराम की आज्ञा से सुमन्त रथ लेकर चल देते हैं, सुबह होते ही सब लोग जागे तो बड़ा कोलाहल मच गया। दुखी अयोध्या वासी वापस जाते हैं। उधर श्री राम-सीता लक्ष्मण श्रंगवेरपुर जाते हैं। गंगा जी को देख प्रणाम करते हैं, स्नान व जल ग्रहण कर थकान दूर करते हैं।

         उसी समय निषादराज को खबर मिलती है, वे झटपट कन्दमूल एकत्र करके श्रीराम के दर्शन को दौड़ आते हैं और दण्डवत करते हैं। श्रीराम सब कुशल क्षेम पूछ वन गमन का प्रसंग बताते हैं। निषाद श्रीराम को सुन्दर आसन पर बैठाते हैं और भोजन कराते हैं। श्रीराम और सीता शयन करते हैं, लक्ष्मण जी स्वयं वीरासन पर धनुष बाण लिए बैठते हैं निषाद राज भी धनुष बाण़ ले लक्ष्मण के पास जा बैठे। यह दृश्य देख निषादराज विलाप करते हैं कि ”महल में रहने वाले श्रीराम-जानकी कुश के चटाई पे सो रहे हैं। कैकेयी मन्दमति ने बड़ा गलत किया जो सीता-राम के सुख के समय दुख दिया। कुमति ने सबको दुखी किया।”

यह सुन लक्ष्मण जी निषाद राज को गीता उपदेश देते हैं, संयोग-वियोग, भला-बुरा, निष्काम-भोग सब कर्म का फल है। जिनको वेद नेति-नेति कहके निरूपित करते है। भक्त, भूमि, ब्राह्मण, गउ देवता इन सबके हितकारी श्रीराम कृपा करके मनुष्य रूप धारण किये हैं। इसलिए विषाद छोड़ सीता राम के चरण कमल में अनुराग करो। इस प्रकार रामगुन कहते सुबह होती है, श्रीराम जी जागते हैं। आज की लीला में श्रीराम व जानकी की आरती इसी प्रसंग पर होती है।

वनवास में किया चित्रकूट पर निवास

सुमंत श्रीराम व सीता से लौटने के लिए कहते हैं। श्री राम कहते हैं- आप जैसे पण्डित जानि का विकल होना ठीक  नहीं है। सभी प्रश्नों का समुचित उत्तर पाकर सबको प्रणाम कर सुमंत लौटते है। श्रीराम सीता, लक्ष्मण सहित गंगा तट पहुचते हैं। श्री राम केवट से नाव लाने के लिए कहते है। केवट कहते है- ’मैं आप के भेद को जानत हो, आपका चरण कमल रज जो हैं तेहि में बनाइबे हेतु को जड़ी हैं,7 जेहि को छूते ही पत्थर भी तिरिया होय, मेरी नाव काठ की हैं, सोई कहीं नारी न बनि जाय, यदि ऐसा भया तो मेंरा परिवार, लरिका जो हैं सब बिना खाये ही रहैगें। काहे की ऐहि सहारे मै सबै परिवार को पालत हैं, हे स्वामी बिना चरण कमल को धोए पार नहीं ले जाउंगा।

इस प्रकार केवट पैर धोकर धन्य होते हैं और श्री राम को नदी पार कराते हैं। श्रीराम जी गंगा पार शिवलिंग की  स्थापना करते हैं। सीता जी गंगा जी से प्रार्थना करती हैं। तब श्री राम वन को चलते हैं, रास्ते में वृक्ष के नीचे निवास करते है। प्रातःकाल प्रयागराज पहुंचते है तब प्रभु त्रिवेणी में ध्यान करते है और सबको तीर्थराज का प्रभाव बताते है। श्रीराम, सीता, लक्ष्मण भारद्वाज मुनि के पास पहुंच प्रणाम करते है भारद्वाज जी से मार्ग पुंछ आशीर्वाद लेकर आगे बढ़ते है। श्रीराम जी यमुना स्नानकर नाव से पार जाते है, जहाँ सब ग्रामवासी खबर सुनकर दौड़े आते है और श्रीराम, सीता, लक्ष्मण से मिलते है सब अपने-अपने भाग्य और श्रीराम, सीता, लक्ष्मण की प्रशंसा करते है। तभी तापसकपि हनुमान जी श्रीराम को प्रणाम करते है, श्रीराम उनको गले लगाते है। श्रीराम निषादराज को विदा हेतु जाने की आज्ञा देते है। मार्ग में गावांरिन सीता जी से राम, लक्ष्मण के बारे में पुछती है और आनन्दित होती है। श्रीराम समस्त ग्रामवासियों को संतुष्ट कर लौटते है। श्रीराम, सीता, लक्ष्मण बाल्मीकि आश्रम की ओर बढ़ते है। श्रीराम आगमन सुनि बाल्मीकि उन्हें लेने आते है। श्रीराम सब कथा-प्रसंग बताकर रहने के लिए उचित स्थान पुछते है। बाल्मीकि श्रीराम की बहुत प्रशंसा करते है, कहते है कि प्रभु जहां आप ना हो पहले वह जगह बता दें। फिर कहूं कि आप वही जाकर रहे बाल्मीकि श्रीराम को चित्रकूट का वर्णन कर बताते है कि वह रहने योग्य स्थान है। जहाँ वन में सुरसरि मंदाकिनी की धारा है, वन में हाथी, मृगा, सिंह, पंक्षी आदि का विहार है इस प्रकार श्रीराम का चित्रकूट पर प्रस्थान होता है। सीता सहित दोनो भाई मंदाकिनी में स्नान करते है। श्रीराम लक्ष्मण से कहते है घाट तो अच्छा है अब कहीं ठहरने का प्रबंध करो। लक्ष्मण स्थान दिखाते है देवता लोग प्रधान थवई विश्वकर्मा को लेकर चित्रकूट में आते है, सब देवता कोल-भिल के रूप में आते है सब मिलकर सुन्दर कुटिया बनाते है जहां देव, नाग, किन्नर और दिग्पाल आते है सबको श्रीराम प्रणाम करते है। जंगल के कोल-भिल आकर श्रीराम की शोभा की प्रशंसा करते है और अपने भाग्य को सराहते है। श्रीराम सबको विदा करते है। सब कोल-भील अपने-अपने घर को जाते है

       दशरथ मरण का दृश्य रामनगर की रामलीला में मंचित नहीं होता अतः उस अंश का पाठ लीला समय में न पढ़कर प्रधान रामायणी द्वारा अयोध्या में पढ़ा जाता है। आरती गायन के साथ ही लीला को विराम दिया जाता है।

श्रीराम को मनाने भरत गये चित्रकूट

विश्व प्रसिद्ध रामलीला के ग्यारहवें दिन ‘श्री अवध में भरतागमन सभा, भरत का चित्रकूट प्रयाण, निषाद मिलन, गंगावतरण, भारद्वाज आश्रम निवास’ के प्रसंग का मंचन हुआ| जिसमें रामचरित मानस के अयोध्या काण्ड दोहा संख्या 158-2 “आवत सुत सुनि कैकयनंदिनी” से लेकर दोहा संख्या 215 तक ”तेहि निसि आश्रम पिंजरां राखे भा भिनुसार” तक के प्रसंग का मंचन हुआ।

       भरत जी ननिहाल से अयोध्या लौटते हैं और महल में श्रीराम लक्ष्मण को न पाकर पूछते हैं। कैकेयी उत्साहपूर्वक सब प्रसंग बताती है कि “ए तात सब बात को संवारि राखी है बिचारि मंथरा सहाय भई कछु एक काज विधाता ने बीच में बिगार दिया कि महाराज सुरधाम को चले गये”। यह सुन भरत जी विलाप करते हैं और कैकेयी को फटकारते हैं। शत्रुध्न मंथरा की चोटी पकड़-पकड़ घसीटते हैं, भरत को दया आती है तो उसे छुड़ा देते हैं। दोनों भाई माता कौशल्या के पास जाकर प्रणाम करते है। जहाँ माता कौशल्या मलिन वस्त्र पहनकर बैठी थी, भरत को देखकर दौड़ती है पर मूर्छित हो जाती है, भरत व्याकुल हो माता की गोद में बैठते हैं और रुदन करने लगते हैं।

       गुरु वशिष्ठ जी भरत जी को धीरज बंधाते है। भरत जी राजतिलक की सामग्री लेकर माताओं और गुरु सहित श्रीराम से मिलने वन को जाते हैं और श्रीरामचन्द्र जी के लिए गोमती के तट पर नियम व्रत करते हैं। रात भर सई के किनारे रहकर प्रातः ऋंगवेरपुर पहुंचते हैं।

       निषाद दूत निषाद राज को भरत के आने की सूचना देते हैं। अनहोनी की आशंका से निषाद राज सेना को तैयार होने की आज्ञा देते हैं। एक सेवक भरत की गुण स्वभाव की प्रशंसा करता है। जिसे सुन निषाद राज भेंट का सामान लेकर भरत से मिलते हैं। श्रीराम सखा जान भरत जी निषाद को गले लगा लेते हैं। देवतागण निषाद के भाग्य की प्रशंसा करते हैं। निषाद राज क्रमशः सभी से मिलते है। निषादराज सबको लिवाकर गंगा दर्शन कराते है और सेवकों से प्रबन्ध के लिए कहते है। भरत गंगा जी को प्रणाम कर श्रीराम के चरण कमल में अनुराग मांगते हैं, मार्ग में जिन-जिन स्थलों पर श्रीराम सीता ने विश्राम किया था भरत जी उसे प्रणाम करते हैं। भरत जी त्रिवेणी को प्रणाम करते हैं जहां आकाशवाणी होती है कि- हे तात भरत! आप सब प्रकार से साधु हो और श्रीरामचन्द्र जी के चरण कमल में आपका अनुराग अगाध है। देवगण भरत की जय-जयकार करते हैं।

       भरत जी भारद्वाज के पास जाकर प्रणाम करते हैं। भारद्वाज जो भरत को श्रीराम की अनन्य भक्ति का आशीर्वाद देते हैं और श्रीराम के चरण कमल तथा भरत के प्रति उनके प्रेम की प्रशंसा करते हैं। इसके साथ भरत के लिए कन्दमूल मंगा, विश्राम की व्यवस्था करते है। यहीं पर ‘आरती करिये सियवर की। नख सिख छबिधर की।’ आरती के साथ लीला को विराम दिया जाता है।

भरत का यमुनावतरण, ग्रामवासी मिलन, श्रीरामचन्द्र दर्शन

विश्वप्रसिद्ध रामलीला के बारहवें दिन भरत का यमुनावतरण, ग्रामवासी मिलन, श्रीरामचन्द्र दर्शन के प्रसंग का मंचन हुआ। जिसमें रामचरित मानस के अयोध्याकाण्ड दोहा संख्या 215-1 से “कीन्ह निमज्जनु तीरथ राजा” से लेकर दोहा संख्या 252-7 ”सोचते भरतहि रैगि बिहानी” तक के प्रसंग का मंचन हुआ।

भरत जी भारद्वाज मुनि से आज्ञा लेकर चित्रकूट के लिए चलते हैं, देवराज इन्द्र भयपूर्वक वृहस्पति से कहते है कि- ऐसा उपाय करिये कि भरत की भेंट श्रीराम से ना हो, ऐसा ना हो कि बना हुआ काम बिगड़ जाये। बृहस्पति इन्द्र को समझाते हैं- आप भरत जी से मत डरिये श्रीराम जी सत्य प्रतिज्ञ और देवों के हितकारी हैं, आप जो स्वारथ के बस विकल होते हैं इसमें आपकी अज्ञानता है। भरत जी यमुना तीर आते हैं निषादराज नाव लेकर आते हैं, सभी लोग पार उतर स्नानकर आगे बढ़ते हैं तभी वहां ग्रामवासी आ जाते हैं और भरत के रूप और स्वभाव की प्रशंसा करते हैं।

      निषादराज भरत जी को बताते है कि- हे महाराज! देखो चित्रकूट में पयस्विनी नदी के किनारे “कामदगिरी” के निकट जानकी लखन समेत श्रीराम जी कुशल से वास कर रहे हैं।

      कोल-भील श्रीराम को बताते हैं कि आपके दोनों भाई आवत हैं। लक्ष्मण जी इस आशंका से कि भरत श्रीराम से सेना लेकर युद्ध के लिए आ रहे, क्रोध करते है और भरत को रण में मारने के लिए कहते हैं। श्रीराम लक्ष्मण को समझाते है और भरत का स्वभाव कहते हैं। यह सब देख देवतागण प्रशंसा करते हैं।

      गुरु की आज्ञा लेकर भरत जी निषादराज को लेकर श्रीराम से मिलने जाते हैं। भरत आदि के पेड़ो के ओट में होने से भी राम जी नहीं देखते हैं, श्रीराम जी बगल में खड़े लक्ष्मण से कुछ कह रहे हैं, शीश पर जटा, मुकुट, मुनिवेश धरे धनुषबाण धारी भरत उसी क्षण दण्डवत प्रणाम करने लगे।

      ‘षाहिनाथ पाहि गोसाई’ कह कर भरत शत्रुघ्न पृथ्वी पर साष्टांग दण्डवत करने लगते हैं। श्रीराम जी यह सुनकर उठे और तीर धनुष फेंकते दौड़ते जाते हैं। तन की सुधि नहीं पीछे-पीछे लक्ष्मण भी अनुसरण करते दौड़ रहे है, चारों तरफ प्रसन्नता की लहर छा जाती है। नंगे पांव भगवान को दौड़ता देख सब हर्षित होते हैं यह दृश्य देवता लोग जयकार करते हैं। फिर श्रीराम जी शत्रुघ्न और निषादराज से मिलते हैं। लक्ष्मण जी भरत से मिलते हैं। इस प्रकार सब लोग एक दूसरे से मिलते हैं। सीता जी को पास खड़ी देख दोनों भाई चरण पर गिर प्रणाम करते है। सीता जी सिर पर हाथ रखकर उठाती हैं और आशीष देती है। इस प्रकार सीता जी माताओं से मिलती है और आशीर्वाद प्राप्त करती है। पुरजन आकर इनके प्रेम की प्रशंसा करते है।

”आरती करिये सियवर की। नखसिख छविधर की।” आरती गायन के साथ लीला का विराम होता है।

श्री वशिष्ठ सभा, चित्रकूट में जनकागमन तथा सभा

विश्व प्रसिद्ध रामलीला के तेरहवें दिन “श्री वशिष्ठ सभा, चित्रकूट में जनकागमन तथा सभा” के प्रसंग का मंथन हुआ, जिसमें रामचरित मानस के अयोध्या काण्ड के दोहा संख्या 252-9 से दोहा संख्या 306-4 तक ”प्रातः नहाइ प्रभुहि सिरनाई” तथा ”भा जनु गूँगहि गिरा प्रसादू” तक का पाठ हुआ।

मुनि वशिष्ठ भरत को बुलाकर कहते है कि किस प्रकार रामजी अयोध्या को वापस चलें आये कहो! भरत कहते है- आप हमसे पूछते हैं यह सब हमारा दुर्भाग्य है। भरत के वचन सुन सब लोग भी राम के पास जाते हैं। वशिष्ठ जी भरत को संकोच छोड़ अपनी बात कहने के लिए कहते हैं। भरत जी विलाप करते हुए माता के करनी को फटकारते हुए श्रीराम-वियोग को कहते हैं जिसे सब सुन शोकाकुल हो जाते हैं। वशिष्ठ जी भरत को समझाते है। श्रीराम जी भरत को बहुत समझाते है और कहते हैं “संकोचि को छोड़ि मन को प्रसन्न करि जो कहो सो आजु करौं। सब काम बिगड़ता देख इन्द्र घबराते है तब बृहस्पति उन्हें समझाते है और श्रीराम के स्वभाव की प्रशंसा करते हैं। भरत जी श्रीराम के राजतिलक की सामग्री दिखाय कहते हैं कि यह सजाकर लाया हुँ जो मन में आवे सो करिये। नहीं तो लक्ष्मण-शत्रुघ्न को लौटकर मैं आपके साथ वन में चलूं या आप और सीता जी लौट जाइये हम तीनों भाई वन को जायें। वही कीजिए जिसमें आप प्रसन्न हो। देवतागण भरत की जय-जयकार करते हैं।

      तभी जनकदूत आकर सूचना देता है कि महाराज जनक आये हैं। जनक आगमन सुनकर श्रीराम समाज सहित चलते हैं, उन्हें आदर सहित आश्रम लाते हैं। जनक जी की दशा देख सबको दुःख होता है। सब परस्पर एक दूसरे से मिलते हैं। श्रीराम वशिष्ठ जी से कहते हैं- ”एक नाथ! भरत औ पुर के लोग सोक से विह्वल औ बनवास से सब दुःखी है औ समाज सहित मिथिलेश महाराज को भी बहुत दिन तक क्लेश सहते भया सो नाथ जो उचित होए सो कीजिए, सबका हित आप ही के हाथ है।”  वशिष्ठ श्रीराम से कहते हैं- आप भले जानते है और सबकी हाल आपको विदित है, आपकी आज्ञा सबके सिर है, आप आश्रम को पधारै। सभा में भरत जी अधीर हो जाते है और कहते हैं- स्वामी की सेवा आज्ञा पालने में है ए देव! अब आज्ञा रूपी प्रसाद सेवक को दीजिए।

भरत का विनय सुन सब व्याकुल हो जाते है, इन्द्र भी घबराते है परन्तु श्रीराम और भरत का अगाध प्रेम कम ना होकर बढ़ता ही जाता है। श्रीराम देखते हैं कि सबके ऊपर माया लगी है और ऐसे समय भरत की महिमा बताना कठिन है, तब राम सुअवसर तथा समाज को देखकर चन्द्रमा के रसभरे वचन कहते हैं और भरत स्वभाव की प्रशंसा करते है। ऐसी प्रेम-वाणी सुनकर समस्त देवगण-मुग्ध हो गये, सरस्वती चुप्पी लगा लेती हैं सबके संकट दूर हो जाते है।

‘आरती करिये सियाबर की। नख सिख छबिधर की।।’ आरती गायन के साथ लीला को विराम दिया जाता है।

भरत का अयोध्यागमन, नन्दीग्राम निवास

विश्वप्रसिद्ध रामलीला के चौदहवें दिवस “भरत जी का चित्रकूट से विदा होकर अयोध्यागमन, नन्दीग्राम निवास” के प्रसंग का मंचन हुआ, जिसमें रामचरितमानस के दोहा संख्या 306-3 “कीन्ह सप्रेम प्रनामु बहोरी’ से दोहा संख्या 326 ‘‘सीय राम पद पेगु, अवसि होइ भव रस बिरति” तक का पाठ हुआ।

भरत जी श्रीराम से आज्ञा लेकर पावन स्थल को देखने जाते हैं। वही दूसरी ओर देवता जनक, कौशल्या भरत और श्रीराम के प्रेम व स्वभाव की जय-जयकार करते है। मुनि राजतिलक के लिए लाये जल को एक कूप के पास रख देने को कहते हैं, उसे भरत कूप की संज्ञा देते हैं। इस प्रकार भरतकूप की महिमा कह सब लोग राम के पास जाते है श्रीराम को भरत कूप की महिमा सुनाते हैं। श्रीराम भरत को चित्रकूट देखने के लिए कहते हैं। आगे मुनि परिक्रमा के लिए कहते है। (भरत-शत्रुघ्न चित्रकूट की पद प्रदक्षिणा करते है जिनके साथ दर्शकगण भी घूमते हैं) भरत जी श्रीराम से वापस जाने की आज्ञा मांगते हैं। श्रीराम जी भरत को बहुत प्रकार समझाकर अपना खड़ाऊँ देते हैं। भरत उठाकर सिर पर बांध लेते है और आनंदित हो विदा मांगते है। दोनों भाई प्रणाम कर सीता का चरण स्पर्शकर समाज-सहित चल देते हैं।

श्रीराम लक्ष्मण, माताओं को प्रणाम कर सबको विदा करते है। सब अवध के प्रस्थान करते हैं। श्रीराम जी कुटी में लौटकर निषादराज को भी विदा करते है, सभी कोल-भील जोहार-जोहार करते हैं। देवगण राम की जय-जयकार करते हैं और लीला को यहीं विराम दिया जाता है। आरती करिये सिरबर की।नख सिख छबिधर की।।

इधर अयोध्या में भरत सेवकों को उचित कार्य के लिए समझाते है और शत्रुघ्न से कहते हैं कि- तुम सब माताओं की सेवा करना। हे भाई सावधानी से रहना और सबको समान और भली भांति से ध्यान करना। दोनों भाई गुरु वशिष्ठ को प्रणाम करते हैं। भरत आशीर्वाद पाय ज्योतिषी लोगों के साथ सिंहासन पर चरण पादुका रखने जाते हैं। भरत जी सिंहासन पर चरण पादुका मंत्रोच्चारण के साथ स्थापित कर देते है। श्री भरत जी माताओं से आज्ञा पाकर नन्दीग्राम में जाकर 14 वर्ष तक पर्णकुटी बनाय वास करते है। जगमग-जगमग ज्योति जली है। आरती के साथ आज के लीला को यहीं विराम दिया जाता है।

मुनि मिलन, विराध वध कर श्रीराम ने किया पंचवटी पर निवास

विश्व प्रसिद्ध रामलीला के पन्द्रहवें दिवस ‘जयंत नेत्र भंग, अत्रिमुनि मिलन, विराध वध, इन्द्र दर्शन, शरभंग, सुतीक्ष्ण, अगस्त्य, गिद्धराज समागम-पंचवटी निवास, गीता-उपदेश’ के प्रसंग का मंचन हुआ। जिसमें अरण्य काण्ड के प्रथम श्लोक “मूलं धर्मतरोविवेकजलधेः पूर्णेन्दुसदानन्ददं” से लेकर दोहा संख्या 16-2 तक ”कहत विराग ग्यान गुन नीती” तक का पाठ हुआ।

श्रीराम जी वनमाला का आभूषण बनाकर सीता जी को पहना रहे हैं उसी समय इन्द्र का पुत्र जयंत कौए का रूप धर श्रीराम के बल को देखने आता है। जयन्त सीता जी के चरण में चोंच मारकर भागता है, सीता के चरण से खून बहता देख श्रीराम जी सींक का बाण मारते हैं जयंत डर के मारे देवताओं के पास जाता है कोई उसे शरण नहीं देता। नारद जी के सलाह पर वह राम से क्षमा प्रार्थना करता है। श्रीराम उसकी एक आंख फोड़ देते हैं। इसके पश्चात सीता समेत दोनो भाई अत्रिमुनि के आश्रम पहुँचते है। सब लोग अनुसूइया से मिलते है, अनुसूइया सीता जी को सुन्दर वस्त्र आभूषण पहना स्त्री धर्म सिखाती है। अत्रिमुनि को प्रणाम कर सभी आगे बढ़ते है। मतंग ऋषि श्रीराम का अपने आश्रम में स्वागत करते है। मार्ग में बिराध नाम का असुर मिलता है जो क्रोध से गर्जन करते हुए सर्प की तरह झपट कर सीता को चुरा लेता है। श्रीराम सात बाणों से बिराध का वधकर सीता जी को लाते हैं। विराध नया रूप धारण कर सुरधाम चला जाता है। श्रीराम शरभंग ऋषि से मिलते हैं; मार्ग में हड्डियों का ढ़ेर देख मुनियों से पूछते हैं, तब मुनिगण बताते हैं राक्षसों ने मुनियों को खाया है वही हाड़ है।

मुनि अगस्त के शिष्य सुतीक्ष्ण मिलते है जिनके साथ श्रीराम अगस्त्य मुनि से मिलने जाते है। अगस्त मुनि श्रीराम की स्वभाव की प्रशंसा करते हैं और गोदावरी के तट पर पंचवटी नामक जगह पर वास करने को कहते हैं। मुनि की आज्ञा पाकर श्रीराम चलते हैं। वहां पर्णकुटी बनाकर विश्राम करते है। लक्ष्मण जी श्रीराम जी से ज्ञान-विराम, माया-भक्ति और ईश्वर के भेद की व्याख्या कर शोक-मोह-भ्रम मिटाने को कहते है। श्रीराम उन्हें नवधा भक्ति की व्याख्या करते है, जो मन-वचन कर्म से मेरा भजन करता है उसके हृदय-स्थल में मैं निरन्तर वास करता हुँ। यह सुनकर लक्ष्मण श्रीराम के चरण पर गिर प्रणाम करते है और कहते हैं- “ए नाथ मेरा संदेह दूर हो गया ज्ञान औ नेह भया।”

यहीं पर ”आरती करिये सियावर की। नख सिख छबिधर की।।”आरती के साथ लीला को विराम दिया जाता है।

सूर्पणखा नासिका छेदन, खरदूषण वध, सीताहरण, रावण- गृद्धराज युद्ध

विश्वप्रसिद्ध रामलीला के सोलहवे दिन ‘सूर्पणखा नासिका छेदन, खरदूषण वध, सीताहरण, रावण- गृद्धराज युद्ध’ के प्रसंग का मंचन हुआ। जिसमे अरण्य काण्ड के दोहा संख्या 16-3 ‘सूपनखा रावन कै बहिनी’ से लेकर दोहा संख्या 29-4 ‘कहेउ नाथ कछु मोहि न खोरी’ तक का पाठ हुआ।

     पंचवटी में श्रीराम-लक्ष्मण को देख रावण की बहन सूर्पणखा उन पर मोहित हो जाती है और सून्दर स्त्री का रूप धर उनके समीप जाकर कहती है- ”यहि जग में तुम्हारे समान न कोई पुरूष औ मेरे समान न कोइ तिरिया है सो यह संयोग विधाता ने बहुत विचारिके रचा है तीन लोक मे मैं खोजी मेरे जोग कोई पुरूष न मिला तेहिसे अब तक कुमारी रह गयी तुमको देख अब कुछ मन माना।” श्रीराम उसे लक्ष्मण के पास भेजते है, लक्ष्मण द्वारा मना कर देने पर पूनः क्रोध से अपने वास्तविक रूप में श्रीराम के पास आती है, उसके रूप को देख सीता जी भयभीत हो जाती है, श्रीराम लक्ष्मण को इशारा करते है, लक्ष्मण सूर्पणखा का नाक-कान काट देते है।

   इसके पश्चात सूर्पणखा अपने भाई खरदूषण के पास जाकर सारे घटित घटना को बताती है। खरदूषण अपनी सेना के साथ श्रीराम से युद्ध के लिये आता है। श्रीराम खरदूषण का वध कर देते है। यह सब देख सूर्पणखा रावण के पास जाकर सारा प्रकरण बताकर उसे भड़काती है और विलाप करने लगती है। यह सब सुनकर रावण मारीच के पास जाकर युद्ध के लिये उसे साथ लेता है। इधर श्री राम सीता जी से कहते है- ” ए प्रिया!  सुन्दर व्रत सुशीलवाली सुनौ मैं सुन्दर नरलीला कुछ करौंगा तुम अग्नि में निवास करौ जब तक राक्षसों का नाश न करौं।” लक्ष्मण वन से फल-फूल लेने गये होते है और सीता जी अग्नि में समाकर अपनी प्रतिमूर्ति वहीं छोड़ देती है अतः इस मर्म को लक्ष्मण भी नही समझ पाते है। मारीच स्वर्ण मृग का रूप धारण कर वन में विचरण करने लगता है।

  सीता जी दृष्टि स्वर्ण मृग पर पड़ती है और श्रीराम से उस मृग की मांग करती है। श्रीराम लक्ष्मण से सीता जी की रक्षा करने को कहकर स्वर्ण मृग का आखेट करने चल पड़ते है। श्रीराम धनुष-बाण लेकर मारीच के पिछे दूर वन में निकल जाते है, एक बाण मारीच को लगता है और वह ‘हाय लक्ष्मण, हाय राम’ कह चिल्लाता हुआ मृत्यु को प्राप्त होता है। सीता जी ‘हाय लक्ष्मण’ सुन घबड़ायी हुई लक्ष्मण से श्रीराम के रक्षा के लिये जाने को कहती है। लक्ष्मण सीता जी को समझाते है कि- ” जाके भृकुटी के फिरने से संसार का नाश होवै ताको सपने में भी संकट पड़ सकता है, रामजी हमैं थाती सौंपि गये जो छोड़ि जाऊँ तो संतोष नहीं होता। ए माता एहै समझिए कि पूछने पर कया कहौंगा।” सीता जी के न मानने पर लक्ष्मण एक रेखा उनके चारो ओर खीच श्रीराम की सहायता करने वन में जाते है।

  सीता जी को अकेला देख रावण भिखारी के रूप में पास आता है और भिक्षा मांगता है। सीता जी रेखा के अन्दर से भिक्षा देने आती है, रावण बँधी हुई भिक्षा लेने से इंकार कर देता है और रेखा से बाहर आकर भिक्षा देने को कहता है। सीता जी रेखा के बाहर आती है, रावण अपना असली रूप दिखाकर कहता है- ”तुम मुझे नहीं जानती मेरा नाम रावण है हम लंका के राजा है।” रावण क्रोधित हो सीता जी को रथ पर बैठाकर आकाश मार्ग से ले जाता है, सीता जी विलाप करती हुई मदद के लिये पुकारती है। गृद्धराज जटायु सीता जी की करूण पुकार सुन पास जाकर रावण से युद्ध करते है, जटायु रावण को मूर्छित कर देते है। मूर्छा हटने पर रावण अपनी तलवार से जटायु का पंख काट देता है, जटायु श्रीराम का स्मरण कर धरती पर जा गिरते है। रावण उन्हे अशोक वाटिका में ले जाता है और उनके चारो ओर राक्षसियों का पहरा लगा देता है।

वन में श्री राम लक्षमण को आता देख चिंतित होते है, लक्ष्मण कहते है इसमें मेरा कुछ दोष नहीं है। इसी के साथ आज की लीला ‘राम आरती होन लगी है’ आरती के साथ सम्पन्न होती है

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