राजनीतिज्ञ

काशी के प्रमुख राजनीतिक व्यक्तित्व

आचार्य नरेन्द्र देव

आचार्य नरेन्द्र देव- सन् 1890 में उ.प्र. के सीतापुर में जन्मे आचार्य नरेन्द्र देव की कर्मस्थली वाराणसी रही। देश में स्वतंत्रता आन्दोलन के साथ-साथ राष्ट्रीय शिक्षा के विकास में महत्वपूर्ण कार्य किया। सन् 1916 से 1948 तक आल इंडिया कांग्रेस कमेटी के सदस्य तथा प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू की वर्किंग कमेटी के भी सदस्य रहे। 1930 से 1945 के मध्य कई बार स्वतंत्रता आन्दोलन के कारण जेल भी गए। आपके प्रयासों से कांग्रेस पार्टी को समाजवादी विचारधारा का सानिध्य प्राप्त हुआ। आप का.हि.वि.वि. के पहले ऐसे कुलपति रहे जिन्होंने 2000 रू0 मासिक वेतन को अस्वीकार कर। 1200 रू लेकर उसी वेतन से 800 रू विद्यार्थियों की सहायता निधि के लिए रखा, 1954 में अस्वस्थता के कारण साग्रह और विनय हठ के साथ त्याग पत्र दे दिया। आप कुछ समय तक लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे। कुशल राजनीतिक होने के साथ-साथ आप पालि भाषा और साहित्य के भी पुरोधा रहे।

डॉ0 सम्पूर्णानन्द

डॉ0 सम्पूर्णानन्द- 1 जनवरी 1890 ई. को काशी में जन्में डॉ. सम्पूर्णानन्द ‘मर्यादा’ पत्रिका का सम्पादन ‘अन्तरराष्ट्रीय विधान’ शीर्षक महत्वपूर्ण पुस्तक की रचना, ‘आज’ की तरफ से अंग्रेजी पत्रिका ‘इंडिया टुडे’ का सम्पादन किया। 1926 में आप विधान सभा के सदस्य तथा 1937 में प्रदेश के शिक्षामंत्री हुए। 1955 में गोविन्द बल्लभ पंत केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में सम्मिलित हुए, तत्पश्चात् उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनें। 1962 से 1967 तक आप राजस्थान के राज्यपाल रहे। स्वतंत्रता पश्चात् एक आदर्श राजपुरुष के रूप में प्रदेश और प्रदेश के साथ काशी के विकास में आपने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके व्यक्तित्व एवम् कृतित्व के इस ऐतिहासिक पक्ष से वह पक्ष किसी माने में कम महत्वपूर्ण नहीं है। आप राजनीति में ईमानदारी और मानवमूल्यों के अप्रतिम छवि हैं। 10 जनवरी 1969 को आपकी चिर स्मृति शेष रही।

राजर्षि उदय प्रताप सिंह

राजर्षि उदय प्रताप सिंह- राजा कृष्ण दत्त सिंह के पुत्र राजर्षि उदय प्रताप जू देव का जन्म 3 सितम्बर 1850 को हुआ। आप उदय प्रताप कालेज के संस्थापक रहे। बनारसी भिनगा (बहराइच) नरेश राजर्षि उदय प्रताप जू देव को प्रथम पंक्ति मे रखते हैं। वंशानुगत परम्परा के अंतर्गत आपने अंग्रेजों से विद्रोह किया। आप कुशल राजनीतिक एवम् साहित्य प्रिय थे। सन् (1882) में ‘भारतीय शिक्षा कमीशन’ के परामर्शदाता रहे तत्पश्चात स्थानीय स्वराज्य बिल ‘कमेटी’ के सदस्य रहे। 1893 में सरकार ने सी0एस0आई0 की उपाधि प्रदान की 1909 में ‘राजर्षि’ की उपाधि से विभूषित किया गया। सन् 1868 में 18 वर्ष की आयु में गद्दी सम्भालने के पश्चात 26 वर्ष तक राज्य कार्य करने के बाद 45 वर्ष की अवस्था में अपने स्टेट को ‘कोर्ट आफ वार्डस’ के हवाले कर बनारस आ बसे। कूपर बाजार और लायक हाल बहराइच, मेडिकल कॉलेज लखनऊ, आर.बी.एस. कालेज आगरा, बौद्ध मंदिर सरनाथ, कन्यापाठशाला बनारस, भिनगा अनाथालय बनारस का कण-कण राजर्षि की चिर स्मृति को संजोए हैं।

राष्ट्ररत्न शिवप्रसाद गुप्त

 राष्ट्ररत्न शिवप्रसाद गुप्त – सम्पन्न जमींदार परिवार में पैदा होने पर भी राष्ट्रीयता के लिए राजसी ठाट-बाट को त्याग स्वतंत्रता आन्दोलन में कूदने वाले राष्ट्ररत्न शिव प्रसाद गुप्त अंग्रेजों के जुल्मों के सामने अडिग रहे। पं. मदन मोहन मालवीय महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, लोकमान्य तिलक के निकट सहयोगी रहे तथा कांग्रेस कार्य समिति के सदस्य एवं कोषाध्यक्ष भी रहे। आपने भारतीय संस्कृति एवं इतिहास का अमूल्य धरोहर भारत माता मंदिर का निर्माण काशी विद्यापीठ में करवाया। 1920 में दैनिक पत्र ‘आज’ का प्रकाशन आरम्भ किया जिसने देश की स्वतंत्रता हेतु पत्रकारिता में एक सेतु का कार्य किया। 1942 में इस पत्र पर कुछ दिनों तक प्रतिबंध लगने पर ‘रणभेरी’ नामक गोपनीय पत्र का नियमित प्रकाशन किया। मालवीय जी के अनन्य सहायक होने के नाते काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना में अक्षुण्ण सहयोग रहा। आपका निवास ‘सेवा उपवन’ एक राष्ट्रीय तुल्य है भारत सरकार ने स्मृति हेतु दस लाख की संख्या में आपके सम्मान हेतु 28-09-1988 को 60 पैसे का डाक-टिकट जारी किया। राष्ट्ररत्न ने काशी विद्यापीठ की स्थापना की थी। इस पीठ के स्वर्ण जयन्ती के अवसर पर भी इनके सम्मान में 30 लाख की संख्या में 20 पैसे का डाक टिकट जारी हुआ। 24 अप्रैल 1999 से स्मृतिशेष राष्ट्र भक्त को उनके अक्षुण्ण योगदान हेतु कोटिशः नमन्।

श्रीमती एनी बेसेन्ट

श्रीमती एनी बेसेन्ट – 1 अक्टूबर 1847 को लन्दन में जन्मी डॉ0 एनी बेसेण्ट के पिता का देहावसान एनी के बाल्यावस्था में ही हो गया था, इनकी आयरिश माता ने इनका पालन-पोषण किया। सन् 1867 में फ्रैंक बेसेण्ट (अंग्रेज पादरी) से विवाह हुआ। अति वैचारिक मतभेद के कारण इनका तलाक हो गया। पूर्व की घटनाओं से उबरते हुए नये विचारों के साथ थिमोसोफिकल सोसायटी से जुड़ीं। सन् 1895 में जब आप वाराणसी आयीं तो यहीं की होकर रह गईं। यहाँ की संस्कृति, धार्मिकता, सहिष्णुता, जिन्दा दिली और वातावरण के प्रभाव से आप इतनी अभिभूत र्हुइं की जीवन का सारा तनाव-अवसाद मिट गया। आपने भारत को ही अपना आध्यात्मिक जन्म भूमि माना। आप पूर्ण रूपेण भारतीय होने के लिए अपना रहन-सहन, वेश-भूषा, भाषा, खान-पान सबका विशुद्ध भारतीयकरण किया यहाँ तक कि आप मेम साहब न कहलवाकर अम्मा कहलवाना पसन्द करती थीं। थियोसोफिकल सोसायटी अडियार मद्रास एवम् थियोसोफिकल सोसायटी का भारतीय केन्द्र कमच्छा वाराणसी में ही थियोसोफिकल कालेज तथा उसका छात्रावास, सेन्ट्रल हिन्दू बालिका विद्यालय की संस्थापिका रही। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना हेतु से.हि.का. सारे साज सामान सहित मालवीय जी की झोली में डाल दिया। अखिल भारतीय कांग्रेस के संस्थापकों में अग्रगण्य, भारत को होमरूल, लीग दिलाने की पक्षधर जिसके लिए अंग्रेजों ने इन्हें नजरबन्द रखा तथा एक वर्ष तक अखिल भारतीय कांग्रेस की वे अध्यक्ष भी रहीं। गांधी जी इनका बड़ा सम्मान करते थे। इन्होने भारत की स्वतंत्रता के साथ-साथ विश्व मानवता के कल्याण के लिए चार दशकों तक वाराणसी को अपना मुख्य केन्द्र बनाया। आप 20 सितम्बर 1933 से चेन्नई में स्मृति शेष हो गई।

श्रीयुत पं. कमलापति त्रिपाठी

श्रीयुत पं. कमलापति त्रिपाठी – काशी राजनीति के पुरोधा महान विचारक, राजनेता, पत्रकार, लेखक पं. कमलापति त्रिपाठी का जन्म सन् 1905 में हुआ। 15 वर्ष की अवस्था से ही कांग्रेस पार्टी से जुड़े 1925-26 में आपकी पुस्तक ‘मौर्यकालीन भारत’ छपी। इसी वर्ष आपको उ.प्र. कांग्रेस का संयुक्त मंत्री बनाया गया। सन् 1935 में कांग्रेस समाजवादी दल के संस्थापक सदस्य, 1937 में संयुक्त प्रांत विधान सभा के सदस्य हुए। 1940-1945 के बीच कई बार जेल जाना पड़ा। इसी समय के दौरान पत्र और पत्रकार बापू और मानवता, बापू और भारत तथा बंदी का चेतना जैसी पुस्तकों की रचना की। 1945 के पश्चात् जेल से छूटने पर ‘संसार’ पत्रिका का सम्पादन किया, 1947 में आपको उ0प्र0 से संविधान सभा के 54 सदस्यों के समूह में सम्मिलित होने का गौरव प्राप्त हुआ। 1952 से 1969 के चुनावों में आप चंदौली से विधानसभा के सदस्य तथा विभिन्न विभागों में मंत्री के रूप में प्रदेश के सर्वतोन्मुखी विकास में स्मरणीय भूमिका निभाई। केन्द्र सरकार में रेल मंत्री जहाजरानी और परिवहन मंत्री, सिंचाई मंत्री के रूप में अपना अप्रतिम योगदान दिया। 1978 में राज्यसभा में विरोधी दल के नेता के रूप में लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन किया। पं. कमलापति त्रिपाठी लोकतंत्र की परिभाषा को चरितार्थ करने वाले राजनेता विकास पुरुष व आवाम के हमदर्द थे। 1990 में इनका देहावसान होना, सम्पूर्ण लोकतंत्र के लिए भारी क्षति है।

श्री लाल बहादुर शास्त्री

श्री लाल बहादुर शास्त्री – 2 अक्टूबर 1904 को काशी में जन्में श्री लाल बहादुर शास्त्री का आरम्भिक जीवन दुःख और यातनाओं में बीता। मुश्किलों का डटकर सामना करते हुए आप छात्र जीवन से ही राजनीति में सक्रिय हो गये। राजनीतिक जीवन के दौरान कई बार जेल-यात्राएं करनी पड़ी, इसी समय पुरुषोत्तमदास टण्डन, श्री जवाहरलाल नेहरू आदि नेताओं संग कंधे से कंधे मिलाकर कार्य किया।

‘कुमार आश्रम मेरठ’ लाला लाजपतराय द्वारा संचालित आश्रम के व्यवस्थापक रहे। राष्ट्रीय कांग्रेेस के कार्यालयी सचिव रहे। उ.प्र. शासन में पुलिस मंत्री रहे केन्द्रीय रेल मंत्री का पद मामूली चूक पर छोड़ दिया, जिसकी सादगी के लिए आपकी यशोवृद्धि हुई। आप नेहरू जी के साथ गृह मंत्रालय के कार्य को जीवंतता से निभाते रहे। पं. जवाहर लाल नेहरू के असामयिक मृत्यु पर सर्व स्वीकार्य छवि के रूप में उभर कर प्रधान मंत्री पद की गरिमा बढ़ाई। समुचित संसाधनों का समुचित प्रयोग किया। अकाल गरीबी, भुखमरी के दौर में आपके आह्वान पर जनता ने सोना गिरवी रख दिया और इसी आह्वान पर लोगों ने उपवास की परम्परा भी डाल ली। भारत-पाक संघर्ष की संकटपूर्ण घड़ी में पाकिस्तानी शासकों के हौसले पस्त कर दिये। आप भारत के समस्त भाषाओं के विकास के साथ हिन्दी को राष्ट्र भाषा बनाये जाने के पुरजोर समर्थकों में थे। अपने राजनीतिक अभियान की शुरूआत आपने हिन्दी में ‘मादाम बसूरी’ नामक पुस्तक लिखकर की। जिसका प्रकाशन साहित्य भवन लिमिटेड, प्रयाग से हुआ। आप आकस्मिक रूप से 11 जनवरी 1966 को रूस में स्मृति शेष रह गये।

भारतरत्न डॉ0 भगवानदास

भारतरत्न डॉ0 भगवानदास – 12 जनवरी 1869 ई0 में वाराणसी में जन्मे डॉ. भगवानदास 1899 से 1914 तक सेण्ट्रल हिन्दू कालेज के संस्थापक सदस्य एवं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भी संस्थापक सदस्य रहे। सन् 1921 में काशी विद्यापीठ के स्थापना से लेकर 1940 तक इसके कुलपति थे। सन् 1935 में उत्तर-प्रदेश के सात शहरों से वे भारत के केन्द्रीय व्यवस्थापिका सभा के सदस्य चुने गये। सन् 1955 में इन्हें भारत रत्न से नवाजा गया। 1958 में आपकी स्मृति शेष रह गयी।

अभिनव पाण्डेय

 

One thought on “राजनीतिज्ञ

  1. bhai awdesh ji
    kashi ke rajnitigyo me ek malviyaji bhi hua karte the unke bare me bhi agar vebsite kuch batati to accha rahta.

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