मठ एवं आश्रम

कबीर-चौरा मठ

कबिरा खड़ा बाजार मेँ, मांगै सबकी खैर । ना काहु से दोस्ती, ना काहु से बैर ॥

182933_197189270431997_1683432472_nकाशी के बाजारोँ के मध्य कबीर चौरा मुहल्ले मेँ (पिपलानी कटरा के पास) कबीर मठ स्थापित है, जिसे मूलगादी पीठ भी कहा जाता है। कबीर दास का जन्म स्थान लहरतारा क्षेत्र (वर्तमान मे कबीर बाग) मे माना गया है, जहाँ इनकी जननी ने किसी कारणवश इन्हे लहरतारा तालाब के पास छोड़ दिया, वहाँ से नीरु – नीमा नामक जुलाहा दम्पत्ति इन्हे अपने निवास स्थान नीरू टीला पर ले आये और कबीर दास का पालन – पोषण किया। नीरु – नीमा का निवास स्थान ही वर्तमान मे कबीर मठ के रुप मेँ जाना जाता है। कबीर दास ने अपना अधिकांश जीवन यहीँ व्यतित किया था। तत्कालीन समय मेँ लोक मानस मे यह धारणा थी कि काशी मेँ प्राण त्यागने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है एवं मगहर में प्राण त्यागने से नर्क मे स्थान मिलता है।Photo0111 इस धारणा को अपवाद सिद्ध करने के लिये कबीर दास जीवन के अंतिम समय मे मगहर चले गये और वहीँ पर अपना प्राण त्याग दिया। मृत्यु के पश्चात जब उनके शव से चादर हटाया गया तो शव के स्थान पर कुछ पुष्प पड़े मिले, जिसमे से कुछ पुष्प का हिन्दुओँ ने प्रतीक स्वरुप दाह संस्कार किया, जबकि मुसलमानोँ ने कुछ पुष्प को कब्र मे दफनाया।

सन 1578 मे इसी पुष्प के कुछ भाग को मठ में लाकर मठ के मध्य मेँ कबीर दास के प्रतीक स्वरुप समाधि का निर्माण कराया गया। कबीर दास के शिष्य विद्वान पंडित सुरुति गोपाल ने कबीर पंथ की स्थापना की एवं पंथ के प्रथम आचार्य बने। सन 1933 मे मालदा के सुखिया दासी तथा फिजी के महंत पिंगल दास, सुखराज दास, रुकमिन दास एवं उदित नारायन कबीरपंथियो ने वर्तमान समाधि स्थल का जिर्णोद्धार कराया था।  मठ में ही गुम्बदाकार विशाल बीजक मन्दिर स्थापित है जहाँ कबीर दास साधना करते एवं उपदेश प्रदान करते थे। बीजक मन्दिर में कबीर दास की चरण पादुका, माला (एक हजार आठ दानोँ की), टोपी, लकड़ी का घड़ा एवं एक त्रिशूल भी रखा हुआ है। त्रिशूल के सन्दर्भ में मान्यता है कि कबीर दास ने अपनी वाणी से किसी गोरखपंथी सन्यासी को पराजित किया था, जिससे प्रभावित होकर गोरखपंथी सन्यासी ने अपना त्रिशूल कबीर दास को भेटं स्वरूप प्रदान कर दिया। मठ परिसर के दीवारों पर कबीर दास से जुड़े किंवदंतियों को चित्रों के माध्यम से उकेरा गया है। विभिन्न सन्दर्भों को आकर्षक आदमकद प्रतिमा के माध्यम से दर्शाया गया है, प्रतिमा इतनी सजीव प्रतीक होती है कि मानों अपनी कहानी स्वयं बयां कर रही हो।

सन 1934 में महात्मा गांधी का आगमन मठ मे हुआ था, मठ मे गांधी जी के दाण्डी स्वरूप की प्रतिमा स्थापित कर उस यादगार पल को संजोया गया है। कबीर चौरा मठ के पांचवें आचार्य द्वारा फारस से मंगायी गयी चक्की (पत्थर से निर्मित एवं कलात्मक) भी परिसर की शोभा को बढ़ा रही है।कबीर दास के पालक माता – पिता नीरू – नीमा की समाधि एवं कई कबीरपंथी आचार्यों की समाधि भी परिसर में स्थित हैं, समाधियों का संगमरमर के पत्थरों से सुन्दर निर्माण कराया गया है। ज्येष्ठ पूर्णिमा से तीन दिवसीय कबीर जयंती का आयोजन प्रमुख रूप से किया जाता है, जिसमें देश – विदेश से लोगों का आगमन होता है। इस अवसर पर विभिन्न प्रदेशों से आने वाले कबीरपंथियों द्वारा अपने अलग – अलग अंदाज, राग – अनुराग के द्वारा कबीर दास के दोहों का गायन किया जाता है। गुरू पुर्णिमा के अवसर पर भी मठ परिसर में कई कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता हैं। मठ प्रतिदिन सुबह छः बजे से रात आठ बजे तक खुला रहता है। मठ में प्रतिदिन सुबह एवं सायंकाल में प्रार्थना सभा होती है तथा नियमित रूप से सायंकाल में सामूहिक कबीरवाणी का पाठ किया जाता है। पाठ में सामान्य व्यक्तियों की भी सहभागिता होती है, व्यवस्थापकों द्वारा सामान्य व्यक्तियों के आगमन को सहज ही स्वीकार एवं सत्कार किया जाता है।

Photo0162वर्तमान में मठ के आचार्य महंत श्री विवेक दास हैं, जिन्होंने सर्वसम्मति से सन 2000 में चौबीसवें आचार्य के रूप मे पद ग्रहण किया था। मठ के प्रधान व्यवस्थापक गोपाल दास तथा देवशरण दास हैं। दान एवं किराये से प्राप्त धन से मठ की प्रबन्ध व्यवस्था की जाती है। मठ मेँ लगभग चालीस की संख्या मेँ कबीरपंथी अनुयायी स्थायी निवास करते हैं। परिसर स्थित संत निवास मेँ परदेशी कबीरपंथी साधु – सन्यासियों के लिये निवास एवं भोजन की व्यवस्था मठ की ओर से नि:शुल्क प्रदान की जाती है। मठ का अपना एक कबीरवाणी प्रकाशन है, जिसमें कबीर दास से जुड़े साहित्यिक पुस्तकों का प्रकाशन किया जाता है। सन 1980 मेँ परिसर में कबीर पुस्तकालय की स्थापना की गयी, पुस्तकालय में कबीर सहित्य से सम्बन्धित पुस्तकें उपलब्ध रहती हैं। यहाँ सामान्य पाठकोँ के आगमन का भी स्वागत किया जाता है।

श्री सनातन गौड़ीय मठ

    मानव कल्याण एवं समाजसेवा के आदर्श पर स्थापित सोनारपुरा स्थित गौड़ीय मठ काशी के मठों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। सोनारपुरा से भेलूपुर की तरफ आगे बढ़ने पर कुछ ही मीटर पर बायीं ओर यह मठ स्थापित है। इस मठ में हर समय साधू संतो एवं धार्मिक यात्रा पर आये यात्रियों का जमावड़ा लगा रहता है।

मठ का इतिहास गौड़िया मठ का इतिहास चैतन्य महाप्रभु से जुड़ा हुआ है। इनका जन्म 1575 ई0 में पश्चिम बंगाल के नवदीप (नदिया) में हुआ था। इनकी माता का नाम शचि मिश्र एवं पिता का नाम जगन्नाथ मिश्र था। कहा गया है होनहार बिरवान  के होते चीकने पात “चैतन्य महाप्रभु बाल्यकाल से ही अपने हम उम्र बच्चों से अलग थे। इसी अवस्था में इन्होंने कई लीलाएँ की। कट्टर मुस्लिम शासक जब पूरे भारत पर अत्याचार कर रहे थे इससे नदिया भी अछूता नहीं रहा। यहाँ भी खूब अत्याचार हुआ। इस दौरान चैतन्य महाप्रभु ने लोगों के बीच आशा का संचार जमकर किया एवं जनमानस के कल्याण के लिए काफी योगदान दिया। करीब 1880 के दशक में उड़ीसा के पुरी में भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी का जन्म हुआ। gmआगे चलकर गोस्वामी चैतन्य महाप्रभु के विचारों से अत्यधिक प्रेरित हुए। इन्होंने चैतन्य महाप्रभु के विचारों का देश-विदेश में जमकर प्रचार-प्रसार किया। इन्होंने आजादी के पहले सोनारपुरा में किराये के मकान में चैतन्य महाप्रभु, राधा एवं कृष्ण की मूर्ति स्थापित की। इस दौरान लोगों के सहयोग से गौड़ीय मठ की स्थापना हुई। आम लोगों, जिलाधिकारी एवं राज्यपाल के सहयोग से 1982 में जिस किराये के मकान में मठ की स्थापना हुई थी उसी में स्थायी रूप से मंदिर बनाया गया।

वर्तमान स्थिति- अपने स्थापना से लेकर वर्तमान तक मठ ने मानव कल्याण के लिए निरंतर कार्य किया है। गरीब एवं असहायों के लिए मठ में निःशुल्क स्वास्थ्य सुविधाएं मिलती है। जिसके तहत सुबह के समय एल्योपैथ एवं शाम को होम्योपैथ के चिकित्सक मरीजों का इलाज करते हैं। मठ की ओर से वृद्धा आश्रम की संचालित होता है। मठ की स्थापना से अब तक लगभग बीस से ज्यादा मठाधीश हो चुके हैं। वर्तमान में मठ के मठाधीश भक्ति चारू गोविन्द महराज हैं। वहीं मठ में 10 से 12 लोग संचालन का कार्य नियमित रहकर करते हैं। उनमें प्रमुख रूप से मालिनी दासी, सनद कुमार दास हैं। गौड़ीय मठ में चैतन्य महाप्रभु की जयन्ती फाल्गुन पूर्णिमा को बड़ा कार्यक्रम होता है। इस दौरान सत्संग एवं प्रवचन भी होते हैं। वहीं, वैशाख माह की अक्षय तृतीया से अगले 21 दिनों तक श्रृंगार कार्यक्रम चलता है। gm01इसके तहत चैतन्य महाप्रभु, राधा कृष्ण का 21 दिन अलग-अलग तरह से श्रृंगार होता है। इस पूरे कार्यक्रम के अन्तिम दिन मठ की तरफ से भण्डारे का आयोजन होता है। जिसमें काफी संख्या में लोग प्रसाद ग्रहण करते हैं। मठ सुबह 5 बजे मंगला आरती होने के साथ खुलता है एवं दोपहर 12 बजे तक खुला रहता है। वहीं शाम 5 बजे से रात 9 बजे तक खुला रहता है। मठ परिसर से ही सटा हुआ इसी का भाग अतिथि गृह भी है जहाँ दूर-दूर से आने वाले यात्री रूकते हैं। गौड़ीय मठ का मुख्य कार्यालय कलकत्ता के बागबाजार में स्थित है। साथ ही मठ के देश-विदेश में मिलाकर 25 से अधिक शाखायें हैं। मानव समाज के उत्थान में लगे गौड़िया मठ के मुख्य द्वार पर आमने-सामने मुखों वाले सिंह स्थापित किये गये हैं। जो देखने में काफी आकर्षक लगते हैं। मुख्य द्वार से अन्दर घुसने पर दाहिनी ओर जाने पर मंदिर एवं बायीं ओर गेस्ट हाउस स्थित है।

विशुद्धानंद कानन आश्रम, मलदहिया

वाराणसी यानी संत, महात्माओं, मनिषियों महापुरूषों की तपस्थली का केन्द्र बिन्दु। यहां ऐसे-ऐसे मनीषी हुए जो ज्ञान के अधिष्ठाता रहे हैं। काशी के इन्हीं योगियों में चमत्कारी योगी विशुद्धानंद महराज भी रहे हैं। जिन्होंने मलदहिया में विशुद्धानंद कानन आश्रम की स्थापना की। योग के विभिन्न आयामों पर सिद्धहस्त परमहंस स्वामी विशुद्धानंद महराज ने सूर्य विज्ञान को ही सृष्टि का मूल तत्व बताया है। इस परम तपस्वी संत ने न केवल सूर्य विज्ञान के रहस्य को बताया बल्कि चन्द्र विज्ञान, वायु-विज्ञान, नक्षत्र विज्ञान, शब्द विज्ञान, क्षण विज्ञान आदि विज्ञानों के रहस्य को खोला। विशुद्धानंद जी महराज कहा करते थे कि सहसा किसी पर विश्वास नहीं करना चाहिए। विश्वास करने पर ठगे जाने की सम्भावना रहती है। कहते थे कि इस जगत में तुम्हारा मित्र एकमात्र तुम हो। अपने शिष्यों को शाश्वत सत्य यानी कर्म को ही ज्ञान का आधार बताते थे। विशुद्धानंद जी को कई सिद्धियां प्राप्त थी। पश्चिम बंगाल के वर्धमान जिले के बण्डुल गांव में अखिलचंद्र चट्टोपाध्याय और उनकी पत्नी राजराजेश्वरी भगवती को 21 मार्च 1856 में पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। माता पिता ने अपने पुत्र का नाम भोलानाथ रखा। बचपन से ही भोलानाथ का मन धार्मिकता की ओर रमता था। भोलानाथ अपनी माता से अति प्रेम करते थे। बचपन में एक बार भोलानाथ को पागल कुत्ते ने काट लिया। जिससे इन्हें भयानक कष्ट झेलना पड़ा। इसी दौरान गंगा तट के हुगली घाट पर एक दिन भोलानाथ को एक संत मिले। उस संत ने भोलानाथ को एक दवा पिलाई जिससे उनका शरीर फिर से स्वस्थ हो गया। भोलानाथ ने दवा देने वाले संत से दीक्षा देने को कहा तब संत ने भोलानाथ को बीज मंत्र सिखाया और उसका जाप करने का सुझाव दिया। कुछ दिनों बाद भोलनाथ अपने एक परिचित के साथ ढाका पहुंचे जहां पुनः प्राणदान देने वाले उस महापुरूष से भेंट हो गयी। महात्मा ने दोनों को अपना शिष्य बनाते हुए साथ ले लिया। उस महापुरूष के साथ दोनों लोग विन्ध्याचल पर्वत पहुंचकर मां अष्टभुजा देवी का दर्शन किया। इसके बाद करीब 12 वर्ष तक घोर साधना के जरिए भोलानाथ ने कई सिद्धियों को प्राप्त किया और तभी से विशुद्धानंद हो गये। विशुद्धानंद जी को काशी से बहुत लगाव था। उन्हें अनुलोम-विलोम सहित अन्य प्रकार के योग में निपुणता हासिल कर थी। इसके बाद विशुद्धानंद अपने शिष्यों को ज्ञान मार्ग की दीक्षा देने लगे। विशुद्धानंद जी ने मलदहिया में अपनी कर्मस्थली बनायी। यहां पर उन्होंने विशुद्धानंद कानन आश्रम की स्थापना की। इस आश्रम में विशुद्धानंद जी अपने शिष्यों को योग, सूर्य विज्ञान, सहित विभिन्न विषयों की दीक्षा देते थे। साथ ही कई चमत्कार भी दिखाते थे। विशुद्धानंद जी द्वारा स्थापित यह आश्रम काफी विशाल है। आश्रम में एक ओर वह कोठरी भी है जहां विशुद्धानंद जी अपनी साधना किया करते थे। मलदहिया जैसे क्षेत्र में जहां वर्तमान में हर समय भीड़ और शोरगुल रहता है वहां इस आश्रम में असीम शांति और शीतलता रहती है। आश्रम के हरे-भरे उद्यान में हर समय चिड़ियों का कलरव मन को ताजा कर देता है। इसके मध्य में विशुद्धानंद जी का मंदिर बनाया गया है। साथ इस आश्रम में विज्ञान मंदिर जिसे सूर्य मंदिर भी कहा जाता है स्थित है। 1931 में इस आश्रम में मां नवमुंडी की भी स्थापना हुई थी। वर्तमान में यह आश्रम विशुद्धानंद जी के शिष्यों की देख-रेख में है। हर वर्ष विशुद्धानंद जी के जन्म दिवस के अवसर पर आश्रम में भण्डारे का आयोजन होता है। इस आश्रम में काफी कम लोग ही पहुंच पाते हैं। क्योंकि सुरक्षा की दृष्टि से यहां पर कई प्रकार के नियम बनाये गये हैं। हालांकि आश्रम में जाने के लिए किसी तरह की रोक-टोक नहीं है। यह आश्रम मलदहिया चौराहे से लहुराबीर की ओर बढ़ने पर दाहिनी ओर है।

 देवरहवा बाबा आश्रम, अस्सी.

devarahaaवाराणसी में संत महात्माओं का मन बरबस ही रम जाता है। मोह माया से मुक्त तमाम संतों ने काशी को ही अपनी तपस्थली बना ली। यहां की आबोहवा के साथ सामन्जस्य बिठाकर अपने आराध्य की भक्ति करते रहे। ऐसे बहुत से संत हुए जिन्होंने दूसरी जगह से यहां आकर अपना निवास स्थान बनाया और तपस्यारत रहे। ऐसे भी अनेकों योगी हुए जो इस पावन नगरी को किन्हीं कारणों से अपना स्थाई निवास नहीं बना सके लेकिन समय-समय पर काशी यात्रा करते रहे। ऐसे ही संतों में से एक थे देवरहवा बाबा। वे अक्सर काशी आने पर गंगा उस पार रेती पर मचान बनाकर रहा करते थे। वहीं अस्सी पर स्थित द्वारिकाधीश मंदिर में भी आकर कुछ समय के लिए रहते थे। अस्सी पर स्थित द्वारिकाधीश का भव्य मंदिर करीब 3 सौ वर्ष प्राचीन है। कथा के अनुसार एक बार दक्षिण भारतीय संत स्वामी कृष्णाचारी महराज को जो की काशी में प्रवास कर रहे थे उन्हें स्वप्न दिखा कि द्वारिकाधीश की प्रतिमा वेणी माधव के पास एक कुंए में है उसे निकाल कर स्थापित करना है। उन्होंने वैसा ही किया और कुंए से द्वारिकाधीश की भव्य प्रतिमा को कुंए से निकाल कर अस्सी पर स्थापित कर दिया। संत महात्मा इस मंदिर में रहकर भजन कीर्तन करते रहे। देवरहवा बाबा भी यहां अक्सर आया करते थे और मंदिर का संचालन किया करते। धीरे-धीरे उनके शिष्यों की संख्या भी बढ़ गयी। बाद में मंदिर के आस-पास रहने के लिए कई कमरे बनवा दिये गये। पहले इस स्थान को द्वारिकाधीश का मंदिर कहा जाता था लेकिन बाद में इसे परिवर्तित करके द्वारिकाधीश मंदिर एवं देवरहवा बाबा आश्रम कर दिया गया। वर्तमान में इस आश्रम में 50 से ज्यादा साधु संत रहकर साधना में लगे हुए हैं। वहीं इस आश्रम में विद्यार्थियों के निशुल्क रहने एवं खाने की व्यवस्था है। तीन मंजिला इस आश्रम में सबसे पहले बड़े से हाल में द्वारिकाधीश का भव्य मंदिर है। इसी के बगल में एक कमरे में देवरहवा बाबा की प्रतिमा स्थापित की गयी है। संतों ने गो सेवा के उद्श्ये से गाय भी पाल रखी है। यहां के संत वैष्णव सम्प्रदाय परम्परा के अनुयायी हैं। वर्तमान में यहां के मुख्य संत श्री देवरहवा हंस बाबा हैं। इस आश्रम में बड़े आयोजन की बात की जाये तो सभी प्रमुख त्यौहारों पर भजन-कीर्तन होने के साथ ही कथा होती रहती है। वहीं, आषाढ़ शुक्ल पक्ष में योगिनी एकादशी को देवरहवा बाबा की पुण्य तिथि मनायी जाती है। इसके लिए इस मास की तृतीया से ही कार्यक्रम शुरू हो जाता है। इस दौरान रोजाना आश्रम में कथा का आयोजन होता है। साथ ही भजन-कीर्तन चलता रहता है। पुण्य तिथि वाले दिन भण्डारे का आयोजन भी किया जाता है। इस दौरान मंदिर परिसर को आकर्षक ढंग से सजाया जाता है। द्वारिकाधीश मंदिर प्रातः 4 बजे ही खुल जाता है लेकिन दर्शन सुबह 8 बजे जब श्रृंगार आरती होती है तब शुरू होता है। मंदिर दोपहर 12 बजे तक खुला रहता है। वहीं शाम को मंदिर पुनः 5 बजे खुलता है जो रात 9 बजे तक खुला रहता है। शायं आरती 8 बजे एवं शयन आरती रात 9 बजे सम्पन्न होती है। अस्सी घाट की ओर बढ़ने पर बायीं ओर मुड़ी गली में यह बड़ा सा आश्रम दाहिनी ओर स्थित है।

श्री विद्या मठ

sri vidya math 4वाराणसी में स्थापित मठ और आश्रम आज भी उस प्राचीन भारतीय गुरू शिष्य परम्परा को जीवित रखे हुए हैं। पहले जहां शिक्षा लेने के लिए बालक अपना घर छोड़कर आश्रम और मठों में जाते और वहीं रहकर गुरू की सेवा के साथ ब्रहृमचर्य का पालन करते हुए वेदों और शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करते उसी प्रकार आज भी काशी के ऐसे कई आश्रम और मठ हैं जहां वर्तमान में उसी परम्परा का निर्वहन किया जा रहा है। इन मठों एवं आश्रमों में न केवल बालकों को वेद, शास्त्र एवं पुराणों का अध्ययन कराया जाता है बल्कि बाकायदा प्रत्येक सप्ताह मूर्धन्य विद्वानों के मध्य शास्त्रार्थ भी कराया जाता है। काशी में इस परम्परा को संजीवनी देने में श्री विद्या मठ का योगदान सराहनीय है। इस मठ की स्थापना के बाद से ही इसमें बालकों को वेद, शास्त्र एवं पुराणों की निशुल्क शिक्षा देने के साथ ही उनके रहने खाने की व्यवस्था की गयी है। इस मठ में बच्चों की वह नर्सरी तैयार की जाती है जिनके कंधों पर आगे चलकर भारतीय अध्ययन पद्धति बचाने का बीड़ा होगा। काशी के वर्तमान मठों में श्री विद्या मठ काफी चर्चित रहा है। इस मठ के प्रमुख पीठाधीश्वर हैं जगदगुरू शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती जी। मठ के सभी कार्यक्रम उनके शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के निर्देशन में संपादित होता है। इस मठ में प्रायः ज्योतिष, शास्त्र, वेद पुराण पर तरह-तरह के कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं। वर्तमान में इस मठ में करीब 200 विद्यार्थी वेद एवं शास्त्रों की पढ़ाई स्थायी रूप से रहकर कर रहे हैं। इनके रहने खाने की व्यवस्था मठ की ओर से निशुल्क की जाती है। इन विद्यार्थियों के भीतर वेदों, शास्त्रों के प्रति जिज्ञासा भरने के उद्देश्य से प्रत्येक माह की त्रयोदशी को शास्त्रार्थ सभा का आयोजन किया जाता है। इस सभा में बड़े-बड़े विद्वान भाग लेते हैं और वेदों शास्त्रों से जुड़े विभिन्न विषयों पर अपनी-अपनी राय रखते हैं। वहीं हर माह शुक्ल पक्ष की एकादशी से 5 दिवसीय कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। इस दौरान भी काफी संख्या में विद्वान मठ में पहुंचते हैं। वहीं धर्म शास्त्र वेद से जुड़े किसी भी मुद्दे को लेकर होने वाली बहस या ऐसे किसी विषय में होने वाले तर्क-वितर्क के समाधान के लिए मठ में अक्सर विद्वानों की सभा आयोजित की जाती है। मठ परिसर में ही हनुमान जी एंव राजराजेश्वरी माता का मंदिर है। शुक्रवार को काफी संख्या में महिलाएं मंदिर में आकर मां का दर्शन-पूजन करती हैं। श्री विद्यामठ केदारघाट मोहल्ले में स्थित है। मठ के विशाल मुख्य द्वार से प्रवेश करने पर काफी चौड़ी एवं लम्बी गैलरी है, जिसके दोनों ओर कमरे बने हुए हैं। गैलरी में एक कोने से मठ के उपरी तल पर जाने के लिए सीढ़ी बनी हुई है। मठ से प्रायः विद्यार्थियों के वेद पाठ करने की आवाज सुनाई देती है। इस मठ की खासियत यह है कि यहां रहने वाले सभी लोग ब्रह्मचारी हैं। वहीं इस मठ में अनुशासन का बहुत ध्यान रखा जाता है। मठ में अध्ययनरत सभी विद्यार्थियों की वेश-भूषा पारम्परिक धोती कुर्ते में होती है। साथ ही सभी विद्यार्थी जनेउ भी धारण किये रहते हैं। मठ में अनुशासन का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि विद्यार्थी प्रातःकाल उठकर सूर्य नमस्कार अवश्य करते हैं। वहीं, सायंकाल में भी वंदना करना नहीं भूलते। कैन्ट स्टेशन से करीब 5 किलोमीटर दूर इस मठ तक सोनारपुरा होते हुए पहुंचा जा सकता है।

जंगमबाड़ी मठ

वाराणसी शहर की पहचान विश्व में मंदिरों, मठों, आश्रमों के लिए रही है। वैसे तो यहां मठों की बात की जाये तो कई ऐतिहासिक मठ रहे हैं। जिनसे काफी समृद्ध इतिहास जुड़ा हुआ है लेकिन सबसे प्रचीन मठ की बात की जाये तो यह गौरव जंगमबाड़ी मठ को प्राप्त है। पहले इस मठ को हरिकेश आनंदवन नाम से जाना जाता था। जंगमबाड़ी अर्थात शिव को जानने वालों के रहने का स्थान। मठ के सभी पीठाधिपति शैव सम्प्रदाय के अनुयायी और उसके ज्ञाता होते हैं। काशी का यह अति प्रचीन मठ अपने आप में इतिहास के कुछ उस हिस्से को समेटे हुए है जिसकी तस्वीर अमूमन लोगों को देखने के लिए नहीं मिलती है। इस मठ को भारतीय राजाओं के अलावा कट्टर मुस्लिम शासकों ने भी काफी कुछ दान किया। दान की गयी कुछ वस्तुओं को आज भी मठ में जीर्ण-शीर्ण अवस्था में संरक्षित किया गया है। इस ऐतिहासिक एवं प्राचीन मठ की स्थापना छ्ठवीं शताब्दी में हुई। हालांकि कहा जाता है कि यह इससे भी पुराना रहा है। यह मठ शैव सम्प्रदाय का प्रमुख केन्द्र रहा है। इस सम्प्रदाय में विश्वास रखने वाले साधु-संतों का यहां आना-जाना लगा रहता है साथ ही बहुत से महात्मा स्थायी निवास करते हैं। वीरशैवमत के संस्थापक पंचाचार्यों में से एक विश्वाराध्य जी ने इस मठ की स्थापना की। इतिहास के पन्नों में झांक कर देखें तो इस मठ को मुस्लिम शासक हुमायूं, अकबर, जहांगीर, शाहजहां, औरंगजेब एवं मुहम्मद शाह समेत अन्य शासकों ने दान दिया। हुमायूं ने मठ में रह रहे साधुओं के लिए तीन सौ बीघा जमीन दान दी। इसी तरह अकबर ने 480 बीघा जमीन मठ को दान किया। जिसका उल्लेख दानपत्र में है। वहीं कट्टर मुस्लिम शासक औरंगजेब ने भी मठ को दान किया। आज भी औरंगजेब का हस्ताक्षर किया हुआ पत्र मठ में संरक्षित करके रखा गया है। वहीं काशी के राजा जयनन्ददेव ने भी इस मठ को दान किया। जिसका विवरण महाराजा प्रभुनारायण सिंह ने एक ताम्रपात्र पर लिखवाया था जो आज भी मठ में सुरक्षित रखा गया है। कहा जाता है कि पहले काशी विश्वनाथ मंदिर जंगमबाड़ी मठ के ही अधीन था। बाद में मठ से यह अधिकार ले लिया गया। हालांकि आज भी मठ में विश्वनाथ जी के श्रृंगार वाले दिन सजने वाली चांदी की पंचमुखी शिवमूर्ति रखी हुई है। इस मठ की ऐतिहासिक महत्ता इसलिए भी बढ़ जाती है कि यहां बैठकर इसके प्रथम आचार्य ने उपदेश दिया था। मठ में पुस्तकालय भी है। इस पुस्तकालय में प्राचीन संस्कृति सभ्यता एवं इतिहास से जुड़े दुर्लभ संग्रह मौजूद हैं। साथ ही यहां संग्रहित उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद्र का ‘गबन’ ‘गोदान’ और ताड़ पत्रों पर लिखे प्राचीन हस्तलिखित ग्रन्थ एवं ताम्रपत्र एवं ताइपत्र पर लिखने के साधन सहज ही लोगों को आकर्षित करते हैं। जंगमबाड़ी के बारे में कहा जाता है कि इस मठ में भगवान विश्वाराध्य जी का ज्ञानपीठ स्थापित है। वीर शैवमत के संस्थापक जगतगुरू पंचाचार्य पृथ्वी पर शिवलिंगों से अवतार लेकर शिवसिद्धांत तथा शिवभक्ति का प्रचार करते हैं। इस मठ से दक्षिण भारतीयों का अधिक जुड़ाव रहा है। काशी आने वाले अधिकतर दक्षिण भारतीय इस मठ में आते हैं। वर्तमान में यह मठ 50 हजार वर्गफुट में स्थापित है। इस मठ का मुख्य द्वार सोनारपुरा से गोदौलिया जाने वाले मार्ग पर स्थित है। मुख्य द्वार के बाद धर्मरत्न कल्याणी महाद्वार है। इसके बाद शिव मंदिर है। इसके आगे बढ़ने पर कैलाश मंडप मठ के संस्थापक जगतगुरू विश्वराध्य का मूल पीठ है। परिसर में जगतगुरू का दरबार हाल, हरिश्वर मंदिर, जनमंदिर, पुस्तकालय भक्त निवास, शोभा मंडप आदि स्थापित हैं। मठ में परम्परा रही है कि यहां के महन्त की गद्दी खाली होने पर नये महन्त को गद्दी दी जाती है। केवल उसी दिन नये महन्त को जहां प्रथम आचार्य ने उपदेश दिया था वहां बैठाया जाता है बाकी दिन उस पीठ पर पूजा होती है। यह मठ केवल धार्मिकता एवं पूजा-पाठ संतों साधुओं तक ही सीमित नहीं है बल्कि सामाजिक दायित्व का भी निर्वहन कर रहा है। मठ में विद्यार्थियों के रहने एवं खाने की व्यवस्था निशुल्क है। वहीं गरीब छात्रों को मेडिकल एवं इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए मठ की ओर से छात्रवृत्ति भी प्रदान की जाती है। साथ ही काशी दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं के लिए चिकित्सा सुविधा भी की जाती है एवं विधि विधान से पूजा पाठ की व्यवस्था की जाती है। मठ की ओर से समय-समय पर कई मंदिरों का जीर्णोद्धार भी किया गया है। इतना कुछ समेटे यह ऐतिहासिक मठ वर्तमान में काशी का धरोहर बन चुका है। जिसके अतीत से जुड़ा हुआ है बेहतरीन इतिहास। जो हमारी समृद्ध सांस्कृतिक एवं धार्मिक सम्पदा का दर्शन कराता है।

 मछली बंदर मठ

 मछली बंदर मठमंदिर मठों की नगरी के रूप में प्रचलित काशी में मठों की अपनी एक परम्परा एवं ऐतिहासिकता रही है। वाराणसी के मठों में मछली बंदर मठ का अपना महत्व रहा है। यह मठ जितना प्रचीन है उतना ही ऐतिहासिक भी है। इस मठ की पूरे देश भर में कई स्थानों पर शाखायें हैं लेकिन प्रधान गद्दी काशी में है। मान्यता के अनुसार इस मठ का नाम मछली बंदर इसलिए पड़ा कि जब इस मठ की स्थापना की गयी उस समय इस स्थान पर जंगल था जिसमें काफी संख्या में बंदर रहते थे वहीं मठ के सामने गंगा और बगल में अस्सी नदी बहती थी। जिसकी वजह से इसका नाम मछली बंदर मठ पड़ा। इस मठ में रहने वाले सभी संत दण्डी सन्यासी होते हैं। कहा जाता है कि यह मठ बहुत प्राचीन है। इस मठ से जाने-माने संतों का सम्बंध रहा है। मठ के भीतर ही एक मंदिर है। इस मठ का परिसर बहुत बड़ा है। मठ में एक बहुत बड़ी सी यज्ञशाला भी है। साथ ही इस मठ में गो सेवा भी की जाती है। मठ में काफी संख्या में गायें हैं। यह मठ अस्सी घाट से नगवां की ओर बढ़ने पर दाहिनी ओर स्थित है। मठ की ओर से समय-समय पर यज्ञ अनुष्ठान आयोजित किये जाते हैं। वहीं, गुरू पूर्णिमा के अवसर पर संत सम्मेलन, यज्ञ एवं भण्डारे का आयोजन किया जाता है। यह मठ एक सिद्ध तंत्र पीठ भी है। वर्तमान में इसके महंत दण्डी स्वामी विमल देव महराज जी हैं।

राम जानकी मठ, अस्सी

Ram janki mathकाशी में मठों की श्रृंखला में अस्सी स्थित राम जानकी मठ भी काफी प्राचीन रहा है। इस मठ की खासियत यह है कि यहां भगवत नाम यानी सत्संग हर समय चलता रहता है। बहुत बड़े परिसर में स्थापित इस मठ में साधु महात्माओं का आना जाना प्रायः लगा रहता है। सन् 1984 में यह मठ पंजाबी भगवान जी महराज को प्राप्त हुआ जो कि चित्रकूट धाम में रहते थे। बाबा लाल दयाल संत थे जिनकी मूलगादी पंजाब के ध्यानपुर है। राम जानकी मठ उन्हीं की गद्दी है। इसके पहले महंत रामकृष्ण दास आयुर्वेदज्ञ थे। सन् 1984 के पहले इस मठ की हालत बहुत खराब थी। जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पंजाबी महराज ने इस मठ का जीर्णोद्धार कराया। सन् 2002 में इस मठ में राम दरबार एवं हनुमान जी की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की गयी। इसी दौरान मठ में राम चरित मानस का पाठ एवं अखण्ड राम-नाम संकीर्तन शुरू हुआ जो अनवरत चलता रहता है। मठ की ओर से साधु महात्माओं को रहने एवं उनके भोजन की भी व्यवस्था की जाती है। चार मंजिला इस मठ में पहले तल पर बड़ा सा हाल है जिसमें बैठकर साधु-संत ढोल मजीरे के साथ हर समय भजन कीर्तन करते रहते हैं। इसी हाल में राम दरबार का मंदिर भी स्थापित है। मठ परिसर में एक प्राचीन कुआं भी है कहा जाता है कि पहले लोग इस कुएं के जल से स्नान करते थे। मान्यता थी की इस कुएं के जल से स्नान करने से सभी प्रकार के रोग दूर हो जाते हैं। हालांकि वर्तमान में इस कुंए के जल लोग स्नान नहीं करते हैं। मठ की ओर से विद्यार्थियों के रहने एवं भोजन की भी निशुल्क सुविधा प्रदान की जाती है। साथ मठ में गोशाला भी है जिसमें वर्तमान में 20 गायों की सेवा की जा रही है। वैसे तो मठ में साल भर प्रवचन, शास्त्र, वेद एवं पुराणों का पाठ तो होता ही है वहीं, अन्य बड़े आयोजन किये जाते हैं। साथ ही समय-समय पर मठ की ओर से पौराणिक कथाओं पर आधारित लीलाएं भी होती रहती हैं। जबकि बड़े त्यौहारों, पर भी मंदिर में भण्डारे एवं भजन कीर्तन का आयोजन किया जाता है। वर्तमान में मठ के महंत रामलोचन दास जी हैं।

 हरिहर बाबा आश्रम, अस्सी

hariharवाराणसी में संत-महात्माओं की मौजूदगी आदिकाल से रही है। यह देवभूमि बड़े-बड़े संतों को सदैव ही लुभाती रही है। यही कारण है कि हिमालय पर ध्यान योग में लगे संत भी कभी न कभी काशी जरूर आये और यहां प्रवास किया। इसी तरह के एक पहुंचे संत थे हरिहर बाबा। इनकी एक विशिष्टता यह थी कि ये कभी जमीन पर नहीं आते थे। हरिहर बाबा हमेशा गंगा जी की गोद में बजड़े पर निर्वस्त्र ही रहते थे। बाबा की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। अस्सी घाट पर किनारे बजड़े पर रहने वाले बाबा से मिलने के लिए लोग वहीं जाकर उनसे अशीर्वाद लिया करते थे। हरिहर बाबा के ही शिष्य हुए विश्वनाथ बाबा। इन्होंने हरिहर बाबा की खूब सेवा की। बाबा नें उसी बजड़े पर ही अपना शरीर त्याग दिया। इसके बाद विश्वनाथ बाबा ने हरिहरबाबा की स्मृति में अस्सी क्षेत्र में उन्हीं के नाम पर एक आश्रम की स्थापना की। इस आश्रम में हरिहर बाबा जिस बजड़े पर रहा करते थे उसका एक हिस्सा एवं उनके बजड़े पर टंगा रहने वाला घण्टा सुरक्षित करके रखा गया जो आज भी आश्रम में रखा हुआ है। अस्सी घाट से उपर सीढ़ियां चढ़ने अस्सी संगमेश्वर मंदिर के बगल में स्थित यह आश्रम बनावट की दृष्टि से सामान्य है। बीच में बड़ा सा खुला हुआ आंगन, चारो तरफ बरामदे एवं उसके बाद कमरे बने हुए हैं। आश्रम में घुसते ही दाहिनी ओर पहले कमरे में हरिहर बाबा से जुड़ी हुई वस्तुएं एवं उनका चित्र, बजड़े का एक हिस्सा रखा गया है। इसी कक्ष में हरिहर बाबा के शिष्य विश्वनाथ बाबा एवं रवि बाबा की मूर्तियां एवं चित्र रखे हुए हैं। वर्तमान में आश्रम की देखभाल हरिहर बाबा की शिष्या दीप्ति मुखर्जी कर रही हैं। वर्ष में तीन बार आश्रम में भण्डारे का आयोजन किया जाता है। प्रत्येक वर्ष आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को हरिहर बाबा की याद में भण्डारे का आयोजन किया जाता है, इस दिन आश्रम में भजन कीर्तन होता है साथ ही काफी संख्या में संत-महात्माओं का आश्रम में आगमन होता है। इसी तरह प्रत्येक वर्ष 15 मार्च को विश्वनाथ बाबा एवं 12 दिसम्बर को रवि बाबा की याद में भण्डारा किया जाता है। भण्डारे की खास बात यह होती है कि इसमें हरिहर बाबा का पीतल का ड्रम प्रयोग किया जाता है। इस आश्रम में ज्यादातर बंगाल के भक्त आते हैं। अस्सी चौराहे से थोड़े ही दूर पर घाट की ओर यह आश्रम स्थित है|

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