प्रमुख यात्री

 काशी में प्रमुख यात्री

प्राचीन जीवंत नगरी काशी हमेशा से ही लोगों को प्रभावित करती रही है। इस आकर्षण के पीछे बहुत से कारण रहे हैं। एक तो सबसे बड़ा और प्रमुख कारण है यह सबसे पुरानी नगरी है, जो हर युग में अपनी सभ्यता, संस्कृति को बचाये आधुनिकता से कदमताल करती रही है। वहीं, यहां धर्म और उसके विविध स्वरूपों ने भी लोगों के मन में इसे जानने के लिए विवश किया। काशी की अदभुत् जीवनशैली, धर्म का समग्र रूप, जीवनदायिनी मां गंगा का काशी से अनूठा मिलन, विश्वप्रसिद्ध घाट लोगों के लिए खास आकर्षण का केन्द्र प्रचीन काल से ही रहे हैं। इन सभी को निकट से जानने की उत्कंठा ने देश-विदेश के कई यात्रियों को इस पावन नगरी तक खींच लाया। इस दौरान काशी में बिताये गये समय को यात्रियों ने जिस ढंग में महसूस किया उसे इतिहास के पन्नों पर दर्ज कर दिया। काशी में बहुत से देशी-विदेशी यात्री आये जिन्होंने काशी को अपने-अपने ढंग से परिभाषित किया।

ह्वेनसांग – इस चीनी यात्री का जन्म 603 ई0 में चीन के होनाम प्रांत में हुआ था। शुरू से ही जिज्ञासु प्रवृत्ति का ह्वेनसांग नये-नये स्थानों पर घूमने का शौकीन था। साथ ही वह बौद्ध भिक्षु था। अपनी प्रवृत्ति के अनुकूल और बौद्ध धर्म ग्रन्थों की खोज में ह्वेनसांग 629 ई0 में भारत आया। काफी कठिन मार्गों से होकर अफगानिस्तान के रास्ते ह्वेनसांग भारत पहुंचा। देश के कई स्थानों का भ्रमण करते हुए अन्ततः मथुरा, आयोध्या, प्रयाग, कौशांबी, कुशीनगर होता हुआ यह चीनी यात्री काशी पहुंचा। ह्वेनसांग काशी आया था बौद्ध धर्म ग्रन्थों की खोज में लेकिन यहां आने के बाद काशी के सौन्दर्य, धर्म के विविध आयाम सहित जीवनशैली को देखकर वह मंत्रमुग्ध हो गया। काशी प्रवास के दौरान ज्यादातर समय उसने सारनाथ में ही गुजारा। बावजूद इसके वह काशी के कई स्थानों पर गया और जहां जैसा देखा उसे लिपिबद्ध कर दिया। यहां की भौगोलिक स्थिति, धर्म के प्रति लोगों की आस्था, मंदिर, रहन-सहन पर भी प्रकाश डाला। उसने काशी के क्षेत्रफल, मंदिरों, गंगा, कुण्ड तालाबों का विस्तृत वर्णन किया। काशी में रहकर उसने बौद्ध साहित्य का अध्ययन, संग्रह और अनुवाद करने के साथ ही अध्यापन का कार्य भी किया। काफी समय काशी में गुजारने के बाद वह जिस रास्ते से काशी में आया था उसी से वापस चीन चला गया। इस दौरान उसने काशी को खूब जिया।

मार्क ट्वेन – अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन का जन्म 1835 में अमेरिका के फ्लोरिडा शहर में हुआ था। मार्क ट्वेन बहुमुखी प्रतिभा का धनी व्यक्तित्व था। उसने साहित्य की हर विधाओं पर अपनी कलम चलायी। मार्क ट्वेन लिखने के साथ ही दूसरे देश की यात्राओं का शौक रखता था। इसी वजह से उसने कई देशों की यात्राएं की और उन यात्राओं का रोमांचक विवरण दिया। यात्रा करने के क्रम में मार्क ट्वेन 1896 में श्रीलंका रास्ते होते हुए भारत पहुंचा। सर्वप्रथम वह मुंबई गया। इसके बाद लेखकीय मन की जिज्ञासा और काशी का आकर्षण उसे इस प्राचीन नगरी तक खींच लाया। काशी पहुंचने पर जिस चीज मार्क ट्वेन को सबसे ज्यादा प्रभावित किया वह था- धर्म, लेकिन विकट यह भी था कि धर्म को ही लेकर वह उलझा भी रहा। उसने एक जगह काशी के बारे में लिखा कि ‘ काशी में उतने लोग नहीं हैं जितने कि यहां शिवलिंग हैं।’ वह खुद इस बात को स्वीकार करता है कि यहां धर्म को समझना बड़ा कठिन है। उसने लिखा कि यहां तीन प्रमुख देव हैं- ब्रह्मा, विष्णु और शिव। उनकी पत्नियां भी हैं जिनके कई नाम और उनके पुत्रों के भी कई नाम हैं। इस तरह यहां इतने देवी-देवता हैं कि उन्हें गिनना मुश्किल है। मार्क ट्वेन काशी में निवास के दौरान प्राचीन मंदिरों, घाटों, गलियों सहित हर जगह घूमा। गंगा के बारे में उसने लिखा कि ‘इस नदी की हर बूंद एक मंदिर है।’ उसने घाटों, घाटों पर मौजूद पण्डों के क्रिया-कलापों, मंत्र पढ़ते पंडितों, उन पंडितों से पूजा कराते यजमानों के बारे में भी लिखा। उस काल की काशी को मार्क ट्वेन ने खूबसूरती से चित्रित किया।

राल्फ फिच मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में अंग्रेज यात्री राल्फ फिच काशी आया था। इतिहास के पन्नों में मिले साक्ष्यों के अनुसार फिच का 1583 ई0 के करीब धर्म और संस्कृति की इस नगरी में पर्दापण  हुआ। फिच ने अपनी काशीयात्रा के दौरान हर पहलू पर प्रकाश डाला। काशी में जितने यात्री आये सभी ने धर्म पर ज्यादा लिखा। इस विषय पर राल्फ फिच ने भी खूब लिखा। फिच ने यात्रा वृत्तांत में काशी में उस समय की धार्मिक स्थिति, लोगों के रहन-सहन का वर्णन किया। उसके लेखों से पता चलता है कि कट्टर मुगल शासकों के दमन से धर्म को हुए आघात से काशी उबर चुकी थी। इस अंग्रेज यात्री ने काशी में उस समय प्रमुख कपड़ा व्यवसाय का भी वर्णन किया। साथ ही यहां की मूर्तियों, घाटों, मंदिरों का वर्णन भी रोचक ढंग से किया। हिन्दुओं की धार्मिक आस्था और उस आस्था के निमित्त किये जाने वाले अनुष्ठानों का भी चित्रण किया। फिच ने काशी के जनजीवन को भी अपनी लेखनी के जरिये उकेरा। जैसे- उस समय विवाह के बाद नवविवाहित जोड़े गंगा किनारे आते थे और उनके साथ ब्राह्मण, गाय, बछड़ा आदि रहते थे। सभी पानी में जाकर अनुष्ठान करते थे। फिच ने उस समय के लोगों के पहनावे का भी जिक्र किया। अधिकतर लोग सूती धोती पहनते थे। महिलाएं गले में माला हाथों और कानों में चांदी सहित अन्य धातुओं से बने आभूषण पहनती थी। उस समय चूड़ियां हाथी दांत की बनी होती थी। काफी दिन गुजारने के बाद 1591 ई0 में फिच वापस लौट गया।

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