साहित्यिक संस्थाएं

नागरी प्रचारिणी सभा काशी की साहित्यिक संस्था की बात की जाय तो पहला नाम काशी नागरी प्रचारिणी सभा का आता है। हिन्दी साहित्य और भाषा को पुष्ट करने में इस संस्था ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। साहित्य की यह संस्था हिन्दी के विकास में मील का पत्थर साबित हुई। इस संस्था ने न केवल हिन्दी को पुष्ट किया बल्कि उसे जन-जन के बीच लोकप्रिय कर हिन्दी को नया मुकाम दिया। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी के ‘निज भाषा उन्नति अहै…..’ के आदर्श बोध को गांठ बांध कर जन्मीं यह साहित्यिक संस्था एक शताब्दी से ज्यादा समय से हिन्दी की सेवा में लगी हुई है। हालांकि वर्तमान में संस्था के इतिहास पर ही गर्व किया जा सकता है। इस संस्था का उदभव उस समय हुआ जब हिन्दी हाशिये पर थी। सरकारी कार्यालयों सहित अन्य जगहों पर अरबी फारसी भाषाओं का प्रयोग बढ़-चढ़ कर होता था। हिन्दी के साथ भेदभाव किया जा रहा था। हिन्दुस्तान में ही हिन्दी की इस दुर्दशा से सच्चे भारतवासियों के दिल में टीस रहती थी। हिन्दी को सबल बनाने की राह में अग्रदूत बनकर उभरे भारतेन्दु हरिश्चन्द्र। हिन्दी के इस महान सेवक ने जीवनपर्यन्त हिन्दी को मजबूत और उसके उत्थान के लिए कार्य किया। लेकिन नियति ने इस अग्रपुरूष को जल्द अपने पास बुला लिया। उनके असमय काल के गाल में समा जाने के बाद हिन्दी साहित्य और भाषा को आगे बढ़ाने के क्रम में एक खालीपन सा आ गया। हिन्दी के विकास में इस खालीपन को भरने और हिन्दी को स्थापित करने के उदेश्य ने जन्म दिया नागरी प्रचारिणी सभा को। जैसा की हर बड़ा कार्य पहले किसी छोटे जगह, स्थान और व्यक्ति से शुरू होता है कुछ यही हाल नागरी प्रचारिणी सभा के शुरू होने का भी रहा। इस संस्था की रूपरेखा 3 मार्च 1893 में ही बन गयी थी। क्वींस कालेज के छात्रावास के एक कक्ष में सभा की संस्थापना 12 लोगों ने मिलकर की। हालांकि इस दौरान संस्था का नाम नहीं रखा गया। जिन 12 लोगों ने सभा की शुरूआत की उनमें से कोई उच्चशिक्षित नहीं था और न ही साहित्यकार। संस्थापक सदस्यों में गोपाल प्रसाद, कन्हैया सहाय, रामकृष्ण दास, जय कृष्णदास, रघुनाथ प्रसाद, श्यामसुंदरदास, रामनारायण मिश्र, शिवकुमार सिंह, उमराव सिंह, बाबा गंडा सिंह, भगतराम और शंकरनाथ थे। अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति और हिन्दी के उद्धार के लिए इन 12 उत्साही लोगों ने संस्था को मूर्त रूप दिया। शुरू में कुछ दिन नागरी प्रचारिणी सभा की गतिविधियां छात्रावास के ही छोटे से कमरे से संचालित होती रही लेकिन गोष्ठियों के आयोजन में लोगों की उपस्थिति अपेक्षा की सीमाओं को पार कर जाती थी। जिससे छात्रावास में जगह कम पड़ने लगी और लोगों की भीड़ से कालेज प्रबंधन को भी दिक्कत होने लगी। परिणाम स्वरूप छात्रावास में इस तरह के आयोजनों पर रोक लगा दी गयी। बावजूद इसके सभा की साहित्यिक गतिविधियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उत्साही लोगों की बैठकों और गोष्ठियों का नया ठौर मिला बड़ी पियरी के बागबरियार सिंह स्थित मथुरा प्रसाद के बगीचे में कुछ दिन यहीं से नागरी प्रचारिणी सभा का संचालन होता रहा। इसके बाद स्थाई स्थान की गरज सभा को बुलानाला ले गयी। इसी स्थान पर 16 जुलाई 1893 को विधिवत रूप से संस्था का नाम, स्वरूप और उदेश्य तय किया गया। इसी दिन को नागरी प्रचारिणी सभा का स्थापना दिवस मनाया जाता है। इस दौरान श्यामसुंदर दास ने सभा के मंत्री पद को ग्रहण किया। कुछ समय बाद संस्थापक सदस्यों में से श्यामसुंदर दास, रामनारायण मिश्र और शिवकुमार सिंह को छोड़ अन्य सदस्यों की सक्रियता बेहद कम हो गयी । इन तीनों संस्थापक सदस्यों ने संस्था को हिन्दी का खेवनहार बना दिया। संस्था के कार्यों से प्रभावित होकर पंडित मदन मोहन मालवीय भी इससे जुड़ गये। विश्वेश्वरगंज स्थित वर्तमान समय में जहां नागरी प्रचारिणी सभा है उस भूमि की रजिस्ट्री 22 नवम्बर 1902 को हुई। जबकि नवनिर्मित भवन में संस्था का गृह प्रवेश 21 दिसम्बर 1902 को हुआ। इस दौरान बड़े कार्यक्रम का आयोजन भी किया गया। हिन्दी साहित्य और भाषा के पोषण में लगी नागरी प्रचारिणी सभा से हिन्दी शब्द सागर, हिन्दी विश्व कोश, हिन्दी साहित्य का वृहद इतिहास, पृथ्वीराज रासो, पद्यमावत, सूरसागर और तुलसी ग्रन्थावली सहित न जाने कितने ग्रन्थों और किताबों का प्रकाशन किया गया। जिससे हिन्दी भाषा और साहित्य को नयी उर्जा और शक्ति मिली। यह संस्था सिर्फ हिन्दी के उत्थान में ही नहीं लगी रही बल्कि स्वतन्त्रता आंदोलन की लड़ाई को गति देने में वैचारिकी भूमिका भी निभायी। संस्था से श्यामसुंदर दास द्वारा संपादित ‘सरस्वती’ मासिक पत्रिका का भी प्रकाशन होता था। नागरी प्रचारिणी सभा की बगिया में ‘आर्य भाषा’ पुस्तकालय भी अपने में बहुत कुछ समेटे हुए है। इस पुस्तकालय में हिन्दी की दुर्लभ पुस्तकों का नायाब संग्रह है। अक्सर शोध छात्र इस पुस्तकालय में रखी किताबों की मदद लेते हैं। इस तरह हिन्दी साहित्य और भाषा को सबल बनाने के अपने गौरवमयी इतिहास के साथ आज भी यह संस्था आगे बढ़ रही है लेकिन अपने पहले वाले रसूख को खोकर।

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