पुस्तकालय

काशी के पुस्तकालय

काशी धर्म आध्यात्म और तीर्थ के साथ शिक्षा का केन्द्र भी रही है। शुरू से ही यहां लोगों में पढ़ने का शौक रहा है। इसी वजह से काशी में कई पुस्तकालयों की भी स्थापना यहीं के साहित्य सहित अन्य विषयों के प्रेमियों ने की। पुस्तकालयों में लगभग सभी विषय से संबंधित पुस्तकें रहती थी। इन पुस्तकालयांे में बैठकर किताबें पढ़ने वालों की काफी संख्या हुआ करती थी। पढ़ने के शौकीन घंटों इन पुस्तकालयों में किताबों के बीच गुजार दिया करते थे। पुस्तकालयों में धर्म, अर्थ, साहित्य विज्ञान, विधि, गणित, राजनीति, दर्शन समेत काफी संख्या में पत्र-पत्रिकाएं रहती थी। पुस्तकालयों में जाना और अपने रुचियो के अनुसार किताबों को पलटना लोगों का अभिन्न अंग हुआ करता था। इन पुस्कालयों में स्वतंत्रता के दीवाने भी आया करते थे। लेकिन वर्तमान में पुस्कालय अपने हालात पर आंसू बहा रहे हैं। इन पुस्कलायों में रखी दुर्लभ किताबों को दीमक अपना भोजन बना रहे हैं। काशी के इन पुस्तकों के मंदिर में से कुछ तो बंद हो गयी हैं और कुछ बंद होने के कगार पर हैं। हालांकि गिने-गिनाये कुछ पुस्कालयों में अब भी कुछ पढ़ने वालों की आवाजाही रहती है।

श्री खोजवाँ आदर्श पुस्तकालय, काशी

श्री खोजवाँ आदर्श पुस्तकालय, काशी

श्री खोजवाँ आदर्श पुस्तकालय वर्तमान में काशी के पुस्तकालयों का आदर्श है। सामाजिक, शैक्षणिक, आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से क्षेत्र का विकास करते हुये सफलतापूर्वक यह अपने शताब्दी वर्ष की ओर अग्रसर है। इस पुस्तकालय की स्थापना ऐसे समय में हुई, जब सम्पूर्ण राष्ट्र स्वतंत्रता आंदोलन के आग में तप रहा था। प्राचीन समय में खोजवाँ शैक्षणिक रूप में पिछड़ा एवं व्यापार का प्रमुख केन्द्र था, यहाँ शिक्षा एवं शिक्षण संस्थानों का अभाव था, जिसका एक कारण यह भी था कि यहाँ प्रसिद्ध गल्ला मण्डी (अनाज क्रय-विक्रय का केन्द्र) लगती थी, जहाँ प्रातः काल से ही बाजार लगना आरम्भ हो जाता था, क्षेत्रीय लोग इसी में व्यस्त रहते थे एवं दिन ढलते ही लोग मौज-मस्ती में लग जाते थे। सारा परिवार इसी क्रिया-कलापों एवं गृहस्थी में व्यस्त रहता था। यह क्षेत्रीय लोगों की दैनिक दिनचर्या हो गई थी, अतः लोंगों का शिक्षा की ओर रुझान कम था। सन् 1921 में क्षेत्रीय लोगों को शिक्षित करने के उद्देश्य से श्यामाचरण शुक्ल, गोविन्द प्रसाद खत्री, महावीर प्रसाद गुप्ता, एवं सोहन राय जैसे समाज चिंतकों ने गोविन्द प्रसाद कपूर के भवन (मकान सं0 B 22/288) में क्षेत्र के कुछ अशिक्षितों को एकत्र कर सायंकालीन कक्षायें प्रारम्भ की।प्रारम्भ में लोग कभी आते कभी न आते, इस स्थिति से निजात पाने के लिये संचालकों ने एक योजना बनाई और सारे क्षेत्र में पारम्परिक माध्यमों से प्रचार करवा दिया कि जो प्रतिदिन शिक्षा ग्रहण को आयेगा उसे हलवा, चना और घुघुरी मिलेगी। फल स्वरूप लोग प्रतिदिन शिक्षा प्राप्ति को आने लगे। (शायद इस योजना की सफलता को देखते हुये ही वर्तमान में मनमोहन सिंह सरकार ने भी ‘मिड-डे-मिल’ योजना को सरकारी विद्यालयों में आरम्भ कर दिया) इस प्रकार लोग शिक्षा के प्रति जागरूक हुये। लोगों की संख्या इतनी अधिक होने लगी की स्थान छोटा पड़ने लगा, अतः संचालकों ने पास स्थित नेऊर साव के भवन के विशाल छत को आग्रहपूर्वक निःशुल्क प्राप्त कर यहीं पर शिक्षा प्रदान करने लगे। अब लोगों को क्षेत्र में एक पुस्तकालय की आवश्यकता महसूस हुई, क्योंकि पिछड़े मजदूर एवं गरीब वर्ग के लोगों के लिये पुस्तकें खरीदना संभव न था।

शिव नगरी काशी में भगवान शिव को साक्षी बनाते हुये शिवरात्रि के शुभ दिन सन् 1922 में संस्थापक द्वय महावीर प्रसाद गुप्ता एवं गोविन्द प्रसाद कपूर ने गोविन्द प्रसाद कपूर के भवन में नाटक, एकांकी, कथा, उपन्यास एवं हास्य व्यंग्य के लगभग 250 पुस्तकों की साथ पुस्तकालय की स्थापना की। शैक्षिक जागरूकता के कारण पाठकों के संख्या में लगातार वृद्धि होती गई, जिसके कारण पुस्तकालय को नेऊर साव के भवन में स्थानान्तिर कर दिया गया। संस्थापकों को जब पास के ही एक भूमि (जहाँ वर्तमान में पुस्तकालय स्थित है) के विक्रय की जानकारी हुई तो उन्होंने श्री प्रकाश, यज्ञनारायण उपाध्याय एवं क्षेत्रीय लोगों के सहयोग से भूमि मालिक वृद्ध दम्पत्ति से सामाजिक कार्य के लिये सस्ते मूल्य पर भूमि प्राप्त कर ली और पुस्तकालय को यहीं पर स्थानान्तरित कर दिया। सर्वप्रथम 6 मार्च 1922 को पुस्तकालय की प्रबन्ध समिति का गठन किया गया। जिसमें श्यामाचरण शुक्ल को अध्यक्ष एवं महावीर प्रसाद गुप्ता को प्रधानमंत्री का दायित्व सौपा गया। सन् 1926 में पुस्तकालय संचालन हेतु एक नियमावली बनाई गई, जिसके अनुसार प्रबन्ध समिति के द्वारा एक पुस्तकालयाध्यक्ष की नियुक्ति की गई तथा महिलाओं एवं बच्चों को निःशुल्क सदस्य बनाने का कार्य आरम्भ किया गया। प्रारम्भ में महिला एवं बाल सदस्यों के लिये सचल पुस्तकालय का भी संचालन किया गया समिति द्वारा नियुक्त व्यक्ति महिला एवं बाल सदस्यों को उनके घर पर ही पुस्तकें उपलब्ध कराता था।

यह काशी का एकमात्र ऐसा पुस्तकालय है जिसमें शिक्षा के साथ-साथ शारीरिक उन्नति का भी ध्यान रखा गया। सन् 1931 में बसंत पंचमी के दिन पुस्तकालय भवन परिसर में ही ‘आदर्श नवयुवक व्यायामशाला’ की स्थापना की गई। जिसमें समय-समय पर कुश्ती, गदा, जोड़ी आदि अनेक प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता रहा। परन्तु यह दुर्भाग्य है कि वर्तमान में आधुनिकता की दौड़ में शामिल होते नवयुवकों के कारण इस व्यायामशाला ने दम तोड़ दिया। पुस्तकालय को आर्थिक सहायता पहुँचाने के लिये ‘श्री आदर्श नवयुवक नाटक मंडली’ द्वारा जगह-जगह पर नाटकों का मंचन किया जाता था। नाटकों द्वारा प्राप्त आय से पुस्तकालय के व्ययों की भरपाई की जाती थी। नाटकों के माध्यम से जहाँ सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार होता था, वहीं राष्ट्र भक्ति की धारा भी प्रवाहमान होती थी, जिससे सामाजिक रूप से स्वतंत्रता आंदोलन को धार मिलता था। स्वतंत्रता आंदोलन के समय इस पुस्तकालय ने महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया था। स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े क्षेत्रीय लोगों का यह केन्द्र था। यहां क्षेत्रीय नागरिकों एवं क्रान्तिकारियों के मध्य विचारों का मंथन होता था। अनेक क्रान्तिकारी पुस्तकालय भवन में ही अपना सारा दिन व्यतीत करते थे। ‘रणभेणी’ जो अंग्रेज शासकों के आंखो से ओझल होकर गुप्त रूप से प्रकाशित होता था, जिसके पढ़ने पर भी उस समय सजा मिलती थी, का वितरण क्षेत्रीय जनता में इसी पुस्तकालय के माध्यम से होता था। खोजवाँ के प्रथम क्रान्तिकारी शहीद गुलाबदास की शहादत भी इसी ‘रणभेरी’ के कारण हुई। भेलूपुर थाना के दीवारों पर ‘रणभेरी’ के अंक को चिपकाते वक्त पुलिस ने उनको देख लिया और तत्काल उन पर कठोर दण्डात्मक कार्यवाही की गई और वह वहीं पर अपने प्राण त्याग कर शहीद हो गये।स्वतंत्रता पूर्व एक बार प्रशासन द्वारा पुस्तकालय भवन पर झण्डा फहराने की अनुमति न मिलने के पश्चात् भी सत्याग्रही गोपाल राम ने पुस्तकालय भवन पर शान से झण्डा फहरा कर देश भक्ति की धारा को प्रवाहित किया।

सन् 1937 में पुस्तकालय भवन में वाचनालय की स्थापना की गई। पुस्तकालय भवन के विस्तार एवं नव निर्माण के पश्चात सन् 1955 में उत्तर प्रदेश का प्रथम बाल पुस्तकालय इसी भवन में खोला गया, जिसमें सोलह वर्ष तक के बालकों को दस रूपया प्रतिभूति धन पर पुस्तकें उपलब्ध करायी जाती थी। पुस्तकालय द्वारा ‘श्री खोजवां आदर्श व्याख्यान समिति’ के माध्यम से समय-समय पर विद्वान विचारकों के विचारों को क्षेत्रीय जनता से साक्षात्कार करने के लिये आमंत्रित किया जाता रहा जिनमें पं0 मदन मोहन मालवीय, राष्ट्ररत्न बाबू शिव प्रसाद गुप्त, आचार्य नरेन्द्र देव, विनोवा भावे, लाल बहादुर शास्त्री, डॉ0 सम्पूर्णानन्द, कमलापति त्रिपाठी, आचार्य युगुल किशोर, चन्द्र शेखर आजाद, जयप्रकाश नारायन, महाराजा विभूति नारायण सिंह, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, श्याम सुन्दरदास, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, बेढब बनारसी, राहुल सांकृत्यायन, विष्णु राव पराड़कर, नरेन्द्र मोहन गुप्त और डॉ0 भगवान दास अरोड़ा जैसे विद्वानों की गरिमामयी उपस्थिति प्रमुख है। यह एक ऐतिहासिक घटना है जब आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी पुस्तकालय प्रबन्ध समिति के चुनाव में पराजित हुये थे। वाराणसी के वर्तमान सांसद डॉ0 मुरली मनोहर जोशी को सन् 1997 में ही पुस्तकालय प्रबन्ध समिति द्वारा उनके उत्कृष्ट राष्ट्र सेवा के लिये ‘भारत सेवा रत्न’ से सम्मानित किया गया था।

पुस्तकालय स्थापना के कुछ समय पश्चात पुस्तकालय द्वारा हस्तलिखित साप्ताहिक पत्रिका ‘आदर्श’ निकाला गया, जिसके सम्पादक पं0 श्यामाचरण मिश्र थे, तत्कालीन समय में ‘आदर्श’ ने सामाजिक एवं राजनैतिक परिवर्तनों में महत्वपूर्ण योगदान रहा। कालान्तर में इसका नाम बदलकर ‘किरण’ कर दिया गया, परन्तु कुछ समय के बाद यह पुनः ‘आदर्श’ नाम से निकलने लगा। ‘आदर्श’ के मुख्य पृष्ठ पर ध्येय मुख्य सूत्र होता था-

आत्म संयम, वीरता, आदर्श बुद्धि विचार हो। आदर्श नर हो, देश भक्ति, देश प्रेम सुधार हो।

जबकि ‘किरण’ का मुख्य सूत्र होता था- …… ‘आगे हमें पढ़ावेगी, राष्ट्र भाषा हिन्दी का पाठ हमे पढ़ावेगी’ सूत्र के पश्चात पृष्ठ के निचले हिस्से में कलात्मक चित्रकारी होती थी, जिसे आकर्षक बनाने के लिये रंगों का प्रयोग किया जाता था। इस हस्तलिखित पत्रिका में सम-सामयिक, सामाजिक, राजनैतिक, राष्ट्रीयता से सम्बन्धित लेख एवं कवितायें स्थान पाती थी। पत्रकारिता जगत से अनजान इस अमूल्य धरोहर की कुछ प्रतियां आज भी पुस्तकालय में सुरक्षित है।

वर्तमान में पुस्तकालय का संचालन प्रबन्ध समिति के द्वारा होता है। आय का स्रोत सदस्यता शुल्क, पुस्तकालय भवन परिसर में स्थित दुकानों से प्राप्त किराया है एवं कई दानदाताओं का भी सहयोग प्राप्त होता रहता है। सदस्यता के लिये वार्षिक शुल्क मात्र एक सौ पचास रूपये है, जबकि आजीवन सदस्यता शुल्क 1500 रू0 है। सोलह वर्ष तक के बालकों से सदस्यता हेतु प्रतिभूति धन के तौर पर मात्र पचास रूपये लिया जाता है। पुस्तकालय सुबह आठ से ग्यारह बजे तक एवं सायं में छः से नौ बजे तक पाठकों के लिये खुला रहता है। पुस्तकालय भवन में ही ‘धीरेन्द्र वाचनालय’ स्थापित है, जहाँ प्रतिदिन स्थानीय लोगों का ज्ञान अर्जन के लिये आगमन होता है। पुस्तकालय में लगभग 21000 पुस्तकों का संग्रह है। वेद, पुराण, उपनिषद, रामायण, महाभारत जैसे धार्मिक पुस्तकों के साथ ही भाषा विज्ञान, हिन्दी साहित्य, अंग्रेजी साहित्य, उर्दू साहित्य, संस्कृत साहित्य, बाल-साहित्य, चिकित्सा शास्त्र राजनीति शास्त्र, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, आदि विषयों से सम्बन्धित पुस्तकें यहाँ उपलब्ध है। इसके अतिरिक्त कई महत्वपूर्ण पुरानी पत्रिकायें जैसे सरस्वती, चांद, नागरी प्रचारणी, अखण्ड ज्योति, हिन्दी महाभारत, संदेश की प्रतियां भी पुस्तकालय में सुरक्षित हैं। हिन्दी एवं अंग्रेजी के दैनिक समाचार पत्रों के अतिरिक्त यहाँ प्रतियोगिता दर्पण, प्रतियोगिता किरण, क्रानिकल विज्ञान प्रगति, रोजगार समाचार, योजना, गृहशोभा, सरिता, कादम्बिनी, नन्दन, चम्पक, क्रिकेट सम्राट, पाँचजन्य, कल्याण विवेक ज्योति, अह्रा! जिन्दगी, राष्ट्रधर्म, वन्देमातरम एवं अन्य पत्रिकायें भी यहाँ सर्वसुलभ रहती है।

भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में रूचि रखने वाले एवं क्षेत्र के निर्धन छात्र-छात्राओं के लिये सम- सामयिकी एवं प्रतियोगी प्रतियोगिता की दृष्टि से ये पत्रिकायें काफी महत्वपूर्ण हैं। पूर्व में उत्तर प्रदेश भाषा नीधि द्वारा पुस्तकालय को पुस्तकीय अनुदान प्राप्त होता था, लेकिन पिछले कई वर्षों से यह अनुदान भी मिलना बन्द हो गया, इस सम्बन्ध में समिति द्वारा कई बार पत्राचार किया गया परन्तु निराशा ही हाथ लगी। पुस्तकालय द्वारा विभिन्न अवसरों पर साहित्यिक गोष्ठियाँ, परिचर्चा का आयोजन किया जाता है एवं क्षेत्र के आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की बालिकाओं के लिए निःशुल्क सिलाई प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चलाया जाता है।

सदस्यों द्वारा किसी विशेष पुस्तक की मांग को समिति द्वारा उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है समय-समय पर विभिन्न जगहों पर लगने वाले पुस्तक मेलों में से भी पाठकों के रूचि अनुसार पुस्तकें मंगायी जाती हैं। कई महाविद्यालय, विश्वविद्यालय के शोधछात्र भी शोध सहायता प्राप्त करने के लिये पुस्तकालय में आते रहते हैं। पुस्तकालय में पाठकों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रहा है। सामाजिक, शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक रूप से क्षेत्रों को विकास की ओर अग्रसर करने वाले एवं राष्ट्र निर्माण में सहायक यह पुस्तकालय सरकारी उपेक्षा का शिकार है। वर्तमान में कोई भी सरकारी सहायता पुस्तकालय को प्राप्त नहीं होती है। पुस्तकालय प्रबन्ध समिति के वर्तमान अध्यक्ष डॉ0 उदित नारायण मालवीय एवं महामंत्री सरोज कुमार जायसवाल हैं, समिति सदस्य डॉ0 हंस नारायण सिंह राही, डॉ0 उत्तम ओझा, डॉ0 विरेन्द्र जायसवाल एवं पुस्तकालयाध्यक्ष बृजेश चन्द्र जायसवाल सकारात्मक रूप से पुस्तकालय संचालन के कार्य में सक्रिय है।

सरस्वती सदन वाचनालय एवं पुस्तकालय

सरस्वती सदन वाचनालय एवं पुस्तकालय

सरस्वती सदन वाचनालय एवं पुस्तकालय स्वतंत्रता के पहले अस्तित्व में आया। 1929 में सेन्ट्रल हिन्दू स्कूल के अध्यापक स्व0 श्याम सुन्दर पाण्डेय ने इस पुस्तकालय की स्थापना चंदे के जरिये धन और पुस्तकों को जुटाकर चेतगंज में की। पुस्तकालय के लिए जमीन गिरधारी लाल (एम0एल0ए0 सेन्ट्रल) ने दी। पुस्तकालय के लिए श्याम सुन्दर ने लोगों से सहयोग लेकर कठिन परिश्रम से पुस्तकों का संग्रह किया। पुस्तकालय शुरू होने के बाद पुस्तक प्रेमियों का आना जाना भी शुरू हो गया। हालत यह हो गई कि पुस्तकालय में पढ़ने वाले 300 से ज्यादा स्थाई सदस्य हो गये। लोग नियमित रूप से पुस्तकालय में आकर अपने पढ़ने की प्यास बुझाते थे। पुस्तकालय के पहले अध्यक्ष इन्द्रदेव शास्त्री हुए। पुस्तकालय में भाषा, विज्ञान, साहित्य, बाल साहित्य, अर्थ, राजनीति, दर्शन, समाजशास्त्र गणित, विज्ञान स्वास्थ्य समेत अन्य विषयों की 15 हजार से ज्यादा पुस्तकें थीं। पुस्तकालय की खासियत यह थी कि इसमें 15 भाषाओं की किताबों का संग्रह था। जिसकी वजह से इस पुस्तकालय की काफी लोकप्रियता थी। इस पुस्तकालय के विकास के लिए सिन्नी फैन के मालिक राजकुमार शाह ने भी काफी योगदान दिया। पुस्तकालय का 1945 में पुनः निर्माण कराया गया। जिसके तहत प्रथम तल पर बड़ा हाल और द्वितीय तल पर भी वाचनालय बनाया गया। जिसमें बैठने की समुचित व्यवस्था, लाइट पंखा लगाया गया। जिससे पढ़ने वालों को कोई परेशानी न आये। राजकुमार शाह ने पुस्तकालय की देख-रेख के लिए दो कर्मचारियों को भी नियुक्त कर दिया। इस पुस्तकालय में उस समय के क्रान्तिकारी भी आते थे। वहीं साहित्यकार बेढब बनारसी, भैयाजी बनारसी, चकाचक बनारसी, कैस बनारसी चकाचौंध बनारसी, नवगीतकार पंडित श्री कृष्ण तिवारी समेत अन्य लोग भी यहां किताबें पढ़ने आते थे। खास बात यह थी कि पुस्तकालय में अच्छी खासी तादात में महिलाएं भी अध्ययन के लिए आती थीं। उस समय पुस्तकालय काफी समृद्ध था। लेकिन जब राजकुमार शाह की मृत्यु हो गयी उसी के बाद से पुस्तकालय की दुर्दशा शुरू हो गई। पुस्तकालय जो धरोहर था उसे धन समझकर राजकुमार शाह के नियुक्त कर्मचारियों के साथ मिलकर कुछ अराजक तत्वों ने उस पर बुरी नजर गड़ा दी। धीरे-धीरे धनलोलुप इन लोगों ने बड़ी ही चालाकी से पुस्तकालय को कब्जे में ले लिया। पुस्तकालय के भवन पर व्यावसायिक दुकानें सजा दी गई। जिसके बाद पुस्तकालय में पढ़ने आने वालों की संख्या भी घटती गयी। अन्ततः साल 1995 में पुस्तकालय नाम का यह मंदिर जो अपने आप में स्वर्ण इतिहास समेटे हुए था हमेशा-हमेशा के लिए बंद हो गया। इस दौरान पुस्तकालय में रखी दुर्लभ किताबें उपेक्षा का शिकार हो गयीं। आम लोग भी पुस्तकालय की इस दशा पर कुछ करने के बजाय उदासीन रहे। लेकिन चेतगंज व्यापार मंडल के लोगों ने फिर से जीवित करने के लिए प्रयास शुरू किया। न्यायालय में अवैध कब्जा धारकों पर मुकदमा कर दिया गया। मुकदमें का नतीजा व्यापार मंडल के पक्ष में रहा। हालांकि अभी भी पुस्तकालय भवन के बाहर दुकानें चल रही हैं। व्यापार मंडल के सदस्यों ने पुस्तकालय के उद्धार के लिए कार्य शुरू कर दिया है। वर्तमान में पुस्तकालय में 7 हजार विविध विषयों की किताबें मौजूद हैं। दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से करीब 8 हजार किताबें नष्ट हो गई हैं। अभी भी ज्यादातर किताबें जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं। जिन्हें छूने मात्र से वे फट जाने की स्थिति में हैं। आलमारियों में रखी किताबें धूल फांक रही हैं। पुस्तकालय में 1954 में प्रकाशित पत्रिका कल्याण सहित संगीताजलि, भावांजली, सेनापति, हिस्ट्री ऑफ इंग्लैल सेक्सपीयर समेत ढेरों किताबें अपनी दशा पर आंसू बहा रही हैं। वर्तमान में पुस्तकालय के अध्यक्ष राजेश कुमार जायसवाल उर्फ लाल बाबू हैं। जबकि उपाध्यक्ष विकास साहनी, प्रधानमंत्री श्याम जी जायसवाल समेत अन्य पदाधिकारी हैं। पुस्तकालय की देखभाल के लिए देवीचरण साव को रखा गया है। लीलाराम सचदेवा पुस्तकालय के संरक्षक हैं। पुस्तकालय सुबह 9 बजे से शाम 7 बजे तक खुला रहता है। संरक्षक लीलाराम सचदेवा बताते हैं कि पुस्तकालय के जीर्णोद्धार के लिए अभी काफी काम करना बाकी है। कहते हैं कि अब पुस्तकालयों में बैठकर किताबों से जान पहचान करने की रूचि लोगों में बहुत कम हो गयी है। निराशा के साथ कहते है कि इस पुस्तकालय में पढ़ने के लिए लोगों को बुलाना पड़ता है। इस समय करीब 10 से 15 लोग पुस्तकालय में पढ़ने आते हैं। पुस्तकालय में नियमित रूप से 4 दैनिक अखबार और एक मासिक पत्रिका आती है।

काशी का प्राचीन पुस्तकालय- ‘कारमाइकल’

कारमाइकल लाईब्रेरी

काशी की प्रथम सार्वजनिक पुस्तकालय का गौरव कारमाइकल पुस्तकालय को प्राप्त है। बाँसफाटक, ज्ञानवापी पर स्थित इस पुस्तकालय की स्थापना सन् 1872 में संकठा प्रसाद खत्री द्वारा बनारस के तत्कालीन कमिश्नर सी. पी. कारमाइकल के नाम पर किया गया था। सी. पी.कारमाइकल के बारे में कहा जाता था कि वे प्रशासनिक अधिकारी कम और साहित्य, दर्शन व संस्कृति में गहराई से रूचि रखने वाले व्यक्तित्व के थे। उन्होंने इस पुस्तकालय को किताबों से समृद्ध करने में अप्रतिम योगदान दिया। पुस्तकालय को बनाने के लिए भूमि का प्रबन्ध महाराजा विजयानगरम तथा काशी के कुछ धनी वर्ग (जो पढ़ने-लिखने का शौक रखते थे) के लोगों ने किया। सभी के सहयोग और लगन से काशी में किताबों का अद्भुत संगम कारमाइकल पुस्तकालय के रूप में सामने आया। पुस्तकालय का पंजीकरण होने के बाद इसके पहले अध्यक्ष साहित्यकार राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द हुए। साथ ही पंडित जानकी प्रसाद मेहता पुस्तकालयाध्यक्ष बनाये गये। इसके बाद तो इस लाइब्रेरी में आम पाठकों के अलावा तत्कालीन समय के विद्वानों की नियमित जुटान होने लगा। जिसमें प्रसिद्ध साहित्यकार मुंशी प्रेमचन्द्रए भारतेन्दु हरिश्चन्द्रए आचार्य रामचन्द्र शुक्लए हजारी प्रसाद द्विवेदी भी पुस्तकालय में बैठकर किताबें पढ़ते और अपनी लेखनी से समाज को सहयोग प्रदान किया करते थे। पुस्तकालय में आकर अध्ययन करने की कड़ी में सिर्फ यहीं के विद्वान नहीं थे बल्कि यह दायरा और भी बड़ा था, क्योंकि पुस्तकालय में उस समय में कई अंग्रेज विद्वान भी आते थे। जिसमें से मैक्समूलर, विल्सन मुख्य रूप से थे। जो अपनी ज्ञान पिपासा को शांत करने के लिए नियमित रूप से पुस्तकालय की ड्योढ़ी को लांघते थे। पुस्तकालय में भारतीय साहित्यए दर्शनशाóए इतिहासए स्वास्थ्य समेत अन्य दुर्लभ व प्राचीन पुस्तकों के अलावा इग्लैण्ड से भी काफी पुस्तकें उस जमाने के रईसों ने मंगाया था। जिससे पुस्तकालय काफी समृद्ध हो गया। इसमें अंग्रेजी, संस्कृत की दुर्लभ पुस्तकों के अलावा 17वीं व 18वीं शताब्दी की भी कई महत्वपूर्ण किताबें पुस्तकालय की गरिमा में चार चांद लगाती रही हैं। पुस्तकालय के बहुत सारे स्थायी सदस्य भी थे। जो नियमित किताबें पढ़ने आते थे। पुस्तकालय में उस दौर के दैनिक समाचार पत्र समेत कई पत्रिकाएं भी नियमित रूप से आती थीं। इस पुस्तकालय से और भी प्रसिद्ध लोग जुड़े हुए थे उनमें डॉ0 सम्पूर्णानंद और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री पंडित कमला पति त्रिपाठी भी रहे। पंडित कमला पति त्रिपाठी तो लगभग 30 वर्ष़ों तक इसके अध्यक्ष पद पर काबिज रहे। लेकिन आजादी के बाद सन् 1950 से पुस्तकालय की हालत दिन प्रतिदिन बदतर होती गई। वर्तमान में एक ओर पुस्तकालय है तो दूसरी ओर कपड़े का बड़ा शोरूम। एक तरफ शिक्षा का मंदिर तो दूसरी तरफ उसी परिसर में विशुद्ध रूप से संचालित हो रहा व्यवसाय। शोरूम में कपड़ा खरीदने आने वाले अधिकतर ग्राहक टाइम पास करने के लिए बेधड़क पुस्तकालय में पहुंच जाते हैं। इसकी वजह से पुस्तकालय की निजता बाधित होती है। इस पुस्तकालय की एक और बात जो आश्चर्यजनक है। वह यह कि पुस्तकालय में रखी कुछ दुर्लभ किताबों की पिछले 100 साल से किसी ने छुआ तक नहीं। ऐसी किताबें अब भी अपने किसी पाठक मित्र का इंतजार कर रही हैं। पुस्तकालय में इस समय विभिन्न विषयों से सम्बन्धित लगभग एक लाख से ज्यादा पुस्तकें आलमारियों की शोभा बढ़ा रहीं है। पुस्तकालय में नियमित रूप से अंग्रेजी और हिन्दी के हिन्दुस्तानए दैनिक जागरणए अमर उजालाए आजए राष्ट्रीय सहाराए जनसंदेश टाइम्स अंग्रेजी के अखबारों में टाइम्स ऑफ इंडियाए द हिन्दूए हिन्दुस्तान टाइम्सए पायनियर समेत अन्य अखबार और मासिक पत्रिकाएं आती हैं। वहीं हर वर्ष राजा राममोहन राय फाउंडेशन कोलकता की ओर से इस पुस्तकालय के लिए किताबें आती हैं। इस समय पुस्तकालय के अध्यक्ष पद का कार्यभार वयोवृद्ध धर्मचन्द्र जैन निभा रहे हैं। जबकि सचिव कपिल नारायण पाण्डेय हैं। अध्यक्ष धर्मचन्द्र जैन बताते हैं कि इस पुस्तकालय का गौरवमयी इतिहास रहा है। यहां कई बड़े विद्वान किताबें पढ़ने के लिए नियमित दस्तक दिया करते थे। लेकिन अफसोस जताते हुए कहते हैं कि अब पढ़ने आने वालों की संख्या काफी कम हो गयी है। वर्तमान में पुस्तकालय में नियमित रूप से 20 से 25 लोग अध्ययन के लिये आते हैं। उनमें से अधिकतर सेवानिवृत्त कर्मचारी हैं। साथ ही शोध छात्र-छात्राएं भी पुस्तकालय में अपने शोध के लिये पुस्तकों का अध्ययन करने आते रहते हैं। नियमित रूप से पुस्तकालय सुबह दस बजे से शाम छः बजे तक खुला रहता है। यहां सौ रूपये वार्षिक सदस्यता शुल्क के साथ सदस्यता लिया जा सकता है।

आर्य भाषा पुस्तकालय

आर्य भाषा पुस्तकालय

कहा जाता है कि किताबंे हमारी सबसे अच्छी मित्र होती हैं। ये कभी भी हमारा साथ नहीं छोड़ती भले ही हम इनसे दूर हो जायें। लेकिन वर्तमान में किताबों से नजदीकी बढ़ाने वालों की संख्या लगातार घट रही है। ऐसा हो भी क्यों न जब किताबों की कद्र उसी के घर यानी पुस्तकालयों में करने वाला कोई नहीं तो दूसरे क्यों करेंगे। हम बात कर रहे हैं काशी के साहित्यिक पटल पर कभी सूरज की तरह चमकती संस्था काशी नागरी प्रचारिणी सभा विशेषरगंज के आर्य भाषा पुस्तकालय की। अपने अतीत में समृद्ध रहा यह पुस्तकालय आज अपनों की उपेक्षा का शिकार हो गया है। कहावत है कि घर की मूली साग बराबर कुछ यही हाल इस पुस्तकालय का भी है। पुस्तकालय की आलमारियों में रखी हिन्दी, दर्शन, अर्थ, समाज, राजनीति शास्त्र, समेत अन्य कई भाषाओं की दुर्लभ किताबों को पलटने वाला कोई नहीं है। यह पुस्तकालय वर्तमान में अपनी दीन-हीन दशा पर आंसू बहा रहा है। पुस्तकालय में आकर पढ़ने वालों की संख्या बहुत कम है।

इस ऐतिहासिक पुस्तकालय की स्थापना 1893 में शिवकुमार सिंह, रामनारायण मिश्र श्यामसुन्दर दास ने मिलकर किया। इसे पहले नागरिक भण्डार भी कहा जाता था। 1903-04 में वर्तमान में स्थित भव्य भवन जो विशेषरगंज में मुख्य डाकघर के सामने है में पुस्तकालय स्थापित किया गया। इस पुस्तकालय में उस समय हिन्दी से जुड़ी लगभग समस्त किताबों का संग्रह किया गया। यह पुस्तकालय उस समय के साहित्यकारों समेत पढ़ने लिखने वालों के शौकीनों का गढ़ बन गया। लोकप्रियता इतनी हो गई कि पुस्तकालय में आकर किताब पढ़ने वालों की भीड़ लगने लगी। भीड़ के बावजूद पुस्तकालय में पढ़ने वालों में अनुशासन इतना कि सूई भी फर्श पर गिरे तो आवाज सुनाई दे जाये। इसकी परिधि में बैठकर महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रतापनारायण मिश्र, श्रीधर पाठक, चन्द्रधर शर्मा समेत अन्य कई बड़े साहित्यकार अपनी लेखनी को धार दिया करते थे। यहां आठ हजार से ज्यादा हस्तलिखित पुस्तकें और डेढ़ लाख से अधिक किताबें थी। इसके विकास के लिए सरकार कुछ अनुदान देती थी। जिससे यह पुस्तकालय लगातार समृद्ध हुआ। लेकिन धीरे-धीरे पुस्तकालय के कर्ताधर्ताओं की उदासीनता से पुस्तकालय अपने गरिमामयी महत्व को खोता गया। रखरखाव के अभाव में कई दुर्लभ पुस्तकें समाप्त हो गयीं और कुछ नष्ट होने के करीब भी हैं।

नागरी प्राचारिणी सभा के प्रधानमंत्री सुधाकर पाण्डेय जब तक रहे उन्होंने इस पुस्तकालय के उन्नयन के लिए कार्य किया सरकारी अनुदान के जरिए इन्होंने पुस्तकालय के लिए किताब भी छपवाई। लेकिन सन् 2000 में उनका देहान्त हो गया। उसके बाद उनके पुत्र पद्यमाकर पाण्डेय सभा व पुस्तकालय दोनों के प्रधानमंत्री बन गये। चूंकि वे दिल्ली में कार्यरत हैं। इसकी वजह से पुस्तकालय पर कम ही ध्यान देते हैं। हालत यह है कि वह एक दो सालों बाद पुस्तकालय में आते हैं। ऐसे में पुस्तकालय को पूछने वाला कोई नहीं है। बीच मंे यह पुस्तकालय शोध छात्रों के अध्ययन के लिए ही खुला रहता था। आम पाठकों के लिए सिर्फ 2 दिन ही पुस्तकालय खुला रहता था। लेकिन अब शोध छा़त्रों की कमी की वजह से आम पाठकों के लिए भी पुस्तकालय सभी दिन खुलने लगा है। बावजूद इसके वर्तमान में पुस्तकालय में आकर पढ़ने वाले शोधछात्रों व आम पाठकों की संख्या प्रतिदिन 10 से 15 के करीब ही रहती है। पढ़ने वालों की घटती संख्या की एक वजह यह भी है कि पुस्तकालय के आसपास का माहौल काफी शोरगुलयुक्त है। संस्था की ओर से पुस्तकालय के अगल बगल के भवनों को व्यापारिक प्रतिष्ठानों को किराये पर दिया गया है। शोध छात्रों के लिए सदस्यता शुल्क 20 रूपये वार्षिक एवं आजीवन शुल्क 1 हजार रूपये है। हालांकि इस समय पुस्तकालय में सदस्य नहीं बनाया जा रहा है। इस समय पुस्तकालय में 5 हजार हस्तलिखित पुस्तकें व 1 लाख से अधिक किताबें हैं। पुस्तकालय के पुरसाहाली का पता इसी से लगता है कि यहां वाचनालय भी है लेकिन वह हफ्ते में महज एक दिन ही खुलता है। इस पुस्तकालय के खुलने का समय सुबह 11 बजे से शाम पांच बजे तक है। पुस्तकालय में प्रतिदिन हिन्दी व अंग्रेजी के प्रमुख समाचार पत्र और पत्रिकायें आती हैं।

2 thoughts on “पुस्तकालय

  1. Good attempt.
    Libraries are our heritage. So, it might be moderate by learned people of Kashi. It is our responsibility too.

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