पत्र-पत्रिकाएं

काशी की प्रमुख पत्र-पत्रिकाएं

भारत में यदि कलकत्ता पत्रकारिता का जन्मस्थली रहा है तो काशी ने इसे पुष्ट किया है। खासकर हिन्दी पत्रकारिता तो काशी में ही पली-बढ़ी और जवां हुई। आदर्श पत्रकारिता के मूल्यों पर कलम के सिपाहियों ने समाज को आईना दिखाया। साथ ही निर्भीक रूप से ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ कलम चलाई और लोगों को पत्रकारिता के जरिये नवजागृत भी किया। इस दौरान सिर्फ गंभीर पत्रकारिता ही नहीं हो रही थी बल्कि उसके सभी आयामों पर कलम चले। जैसे- व्यंग्य, महिलाओं से जुड़ी पत्रिकाएं, बच्चों पर आधारित पत्रिकायें भी लोगों की पहुंच में थी। समाचार पत्रों में दैनिक सूचानाओं के साथ गंभीर लेख, साहित्य से जुड़े लेख, अग्रलेख, संपादकीय छपते थे। भारत में हिन्दी पत्रकारिता की शुरूआत सन् 1826 में कलकत्ता से युगल किशोर शुक्ल ने उदन्त मार्तन्ड साप्ताहिक् पत्र निकालकर किया। वहीं, काशी से निकलने वाला पहला समाचार पत्र बनारस अखबार था, जिसे राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द ने 1845 में निकाला था। पत्रकारिता के मूल्यों से इतर यह समाचार पत्र ब्रिटिश हुकूमत के पक्ष में लिखता था। साथ ही हिन्दी अखबार होते हुए भी इसके लेखों में अरबी तथा फारसी शब्दों का प्रयोग होता था। 1850 में समाचार पत्र सुधाकरका प्रकाशन तारामोहन मित्र के संपादन में शुरू हुआ। इसके बाद के वर्षों में कई पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ लेकिन वे ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पायीं। काशी की पत्रकारिता में अहम योगदान देने वाले कालजयी साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने 1867 में कवि वचन सुधा मासिक पत्रिका निकालना शुरू किया। कुछ ही समय में यह पत्रिका काफी लोकप्रिय हो गयी। इसके बढ़ते प्रसार को देखते हुए इसे साप्ताहिक कर दिया गया। वहीं, पत्रकारिता के हर पहलुओं को छूने के लिए भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने महिलाओं से जुड़ी पत्रिका बालाबोधिनी 1874 में निकाली। इसी बीच संस्कृत पत्रिका पण्डित का भी प्रकाशन भी हुआ; जो काफी लोकप्रिय हुई। 1873 में भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने एक और पत्रिका हरिश्चन्द्र मैगजीन का प्रकाशन शुरू किया। जिसका नाम 1974 में बदलकर ‘हरिश्चंद्र चन्द्रिका’ कर दिया गया। इसके अतिरिक्त भारतेन्दु जी ने भगवत भक्ति तोषिणी और वैष्णव तोषिणी मासिक पत्रों को निकालकर पत्रकारिता के नये आदर्श गढ़े। 1882 में बनारस समाचार और नवजीवन का प्रकाशन हुआ। यह दोनों पत्र साप्ताहिक थे और यूरोपीय व्यवस्था के विरोध में आवाज बुलंद कर रहे थे। 1883 में अम्बिका दत्त व्यास ने वैष्णव का प्रकाशन शुरू किया। यह पत्र मासिक था जो बाद में ‘पीयूष पत्रिका’ हो गया। 1884 में एक और सरकार समर्थित पत्र भारत जीवन का प्रकाशन शुरू हुआ। यह पत्र साप्ताहिक था। धर्म आधारित समाचार पत्र 1888 में सनातन धर्म से प्रेरित मासिक पत्र धर्म प्रचारकको राधाकृष्ण दास और धर्मसुधावर्षण को कुल यशस्वी शास्त्री ने संपादित किया। 1890 में सरस्वतीविलास और 1891 में नौकाजगहित पत्र भी निकाले गये। 1892 और 1893 में ब्राह्मण हितकारी‘ ’व्यापार हितैषी और सरस्वती प्रकाश जैसे पत्रों का प्रकाशन हुआ। इसी दौरान गो सेवा नामक समाचार पत्र भी पाठकों के बीच आया। 1894 में भारत भूषण साप्ताहिक समाचार पत्र रामप्यारी जी के संपादन में निकला। 1895 में पत्रकारिता को समृद्ध करने की कड़ी में प्रश्नोत्तर को भिखारीशरण ने और कुसुमांजलिको बाबू बटुक प्रसाद ने निकाला। 1896 में नागरी प्रचारिणी सभा की ओर से ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ बाबू श्यामसुन्दर दास के संपादन में प्रकाशित हुई। यह पत्रिका वर्तमान में भी प्रकाशित होती है। पण्डित समाज की ओर से 1898 में पण्डित पत्रिका शुरू हुई। 1901 में मासिक पत्र मित्र का प्रकाशन बाल मुकुन्द वर्मा और वाणिज्यसुखदाय को जगन्नाथ प्रसाद ने संपादित किया। 1905 में ‘भारतेन्दु इतिहासमाला’ और ‘सनातन धर्म’ पत्रों का प्रकाशन हुआ। ये तीनों पत्र मासिक थे। 1906 में बालप्रभाकर और ‘उपन्यास’ मासिक पत्र को किशोरी लाल गोस्वामी ने निकाला। गंभीर पत्रकारिता से इतर इसी वर्ष हास्य पत्रिका ‘विनोद वाटिका’ भी निकली। 1909 में क्षत्रियमित्रसमाचार पत्र लाल सिंह गाहड़वाल के संपादन में निकला। इन्दु नामक पत्रिका का प्रकाशन भी इसी वर्ष से हुआ। इसके संपादक अम्बिका प्रसाद थे। 1910 में जातीय पत्र त्रिशूल और ‘नवजीवन’ का प्रकाशन शुरू हुआ। इस दौरान बहुत से ऐसे पत्र भी रहे जो ज्यादा दिनों तक प्रकाशित नहीं हो पाये। 1913 में नारायण गर्दे के संपादन में नवनीत का प्रकाशन शुरू हुआ। पत्र-पत्रिकाओं के इस क्रम में 1914 में तिमिरनाशक को कृष्ण राय बिहारी सिंह तथा दामोदर सप्रे ने मित्र साप्ताहिक पत्रों को प्रकाशित किया। इन पत्रों में आम लोगों से जुड़ी हुई कई खबरें प्रकाशित होती थीं। काशी से 1915 से 1920 के मध्य कई समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ। उसमें प्रमुख रूप से ओदुम्बर और कालिन्दी रही। दैनिक समाचार पत्र आज का प्रकाशन 1920 में जन्माष्टमी के दिन शुरू हुआ। इसे शिव प्रसाद गुप्त ने निकला। इस सम्मानित अखबार के पहले संपादक ओम प्रकाश रहे। कुछ समय बाद यशस्वी पत्रकार बाबू विष्णूराव पराड़कर इस समाचार पत्र के संपादक हुए। इस समाचार पत्र की काशी सहित अन्य स्थानों पर बड़ी ख्याति रही। कुछ वर्षों बाद ही अपने प्रकाशन का शताब्दी वर्ष मनाने जा रहे इस समाचार पत्र की वर्तमान में स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। 1942 में स्वतन्त्रता आंदोलन की लड़ाई को बल देने के लिए पराड़कर जी एवं कमलापति त्रिपाठी ने मिलकर खबरमासिक पत्र निकाला। 1943 में पराड़कर जी ने ही संसार दैनिक पत्र का संपादन किया। स्वतन्त्रता के पहले निकले लगभग हर समाचार पत्र आजादी की लड़ाई को गति देने, जनता को जगाने एवं सामाजिक बुराइयों को इंगित करने पर जोर देते थे। काशी से 1921 में मर्यादा पत्र प्रकाशित हुआ। इसके संपादक सम्पूर्णानंद थे। कुछ समाचार पत्र जो ब्रिटिश हुकूमत की खुलकर खिलाफत करते थे वे भूमिगत निकले। इन पत्रों में ‘रणभेरी’,तूफान’ एवं ‘शंखनाद’ समाचार पत्र 1930 में प्रकाशित हुए। इसी दौरान मासिक पत्रिका कमला का प्रकाशन भी शुरू हुआ। यह पत्रिका महिलाओं में काफी लोकप्रिय हुई। 1939 में ‘सरिता’, सुखी बालक’ पत्रिकाएं भी निकाली गईं। ‘नारी’ पत्रिका का प्रकाशन इसी वर्ष हुआ। यह पत्रिका भी महिलाओं पर आधारित थी। इसके बाद कई और समाचार पत्र जैसे- ‘ग्राम संसार’, एशिया’, किसान’, नया जमाना’, गीताधर्म’, चिंगारी’, चित्ररेखा’, धर्मदूत’, धर्मसंदेश’, सात्विक जीवन’, युगधारा’ पत्र-पत्रिकाएं निकाली। 1947 में ‘सन्मार्ग’ साप्ताहिक समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू हुआ। मूर्धन्य साहित्यकार प्रेमचंद्र ने साहित्यिक पत्रिका हंस का प्रकाशन शुरू किया। साहित्य से ओत-प्रोत यह पत्रिका काफी लोकप्रिय हुई। स्वतन्त्रता के बाद काशी में कई समाचार पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ। स्वतन्त्रता के पूर्व जहां पत्रकारिता मिशन थी वहीं, उसके बाद मिशन के साथ प्रोफेसन भी हो गई है। वर्तमान में काशी से सैकड़ों  पत्र-पत्रिकाएं निकल रही हैं। लेकिन प्रमुख रूप से दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान, अमर उजाला, आज, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स दैनिक समाचार पत्र है। वहीं सान्ध्यकालीन पत्रों में गान्डीव एवं सन्मार्ग समाचार पत्र प्रमुख हैं। वर्तमान में काशी से कई अंग्रेजी अखबार भी निकलते हैं उनमें प्रमुख रूप से टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स एवं पॉयनियर है।

 कविवचन सुधा

    भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र ने इस पत्रिका का सम्पादन 5 अगस्त 1867 (संवत् 1924 आश्विन शुक्ल 15) में आरम्भ किया था। काशी में प्रकाशित यह पत्रिका आरम्भ में मासिक थी, बाद में यह पाक्षिक रूप में प्रकाशित होने लगी। 1875 से यह पत्रिका साप्ताहिक पत्रिका के रूप में प्रकाशित होने लगी। इसकी केवल 250 प्रतियाँ मुद्रित होती थी। प्रत्येक अंक में 22 पृष्ठ होते थे। कहने को तो यह विशुद्ध साहित्यिक पत्रिका थी, परन्तु अपने पहले अंक से ही इसने जो दिशा निर्देश दिया उसके परिणामस्वरूप हिन्दी जगत् में ऐसी पत्रकारिता का प्रचलन हुआ, जो किसी सामाजिक सुधार, जाति या मत विशेष के समर्थन में नहीं चल रही थी, बल्कि उसका उद्देश्य समूचे पाठकों को चाहे वे किसी भी क्षेत्र, धर्म या जाति के हो देश की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक समस्याओं से परिचित कराना था। इसमें विविध विषयक निबन्ध और समाचार प्रकाशित होते थे। इसकी प्रकाशन नीति इन पंक्तियों में स्पष्ट की गयी है-

खल जनन सों सज्जन दुखी मत हों हि हरि पद मति रहै।

अपधर्म छूटैं सत्त्व निज भारत गहैं कर दुःख बहैं।।

बुध तजहिं मल्सर नारिनर सम होंहि जग आनंद लहैं।

तजि ग्रामकविता सुकविजन की अमृत बानी सब कहैं।।

      आरम्भ में इस पत्र को सरकारी सहायता भी प्राप्त होती थी परन्तु भारतेन्दु जी जनता के शोषण तथा उनके उत्पीड़न की व्यथा को अपनी पत्रिका के माध्यम से उद्घाटित करना शुरू कर दिये। उन्होंने ‘लेवी प्राणलेवी’ तथा ‘मर्सिया’ नामक लेख लिखकर किसानों और मजदूरों की शोषण पर करारा प्रहार किया। इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप तत्कालीन लेफ्टिनेन्ट गवर्नर विलियम म्योर के आदेश से सरकार द्वारा खरीदी जा रही इस पत्रिका की खरीद बन्द कर दी गयी। बाद में सन् 1885 में प्रकाशन बन्द हो गया। भारतेन्दु बाबू स्वदेशी के समर्थन और प्रचारक थे। उनके द्वारा 23 मार्च 1874 की कविवचन सुधा में स्वदेशी के व्यवहार हेतु जो प्रतिज्ञा पत्र प्रकाशित किया गया, उसका अंश द्रष्टव्य है-

      “हम लोग  सर्वान्तर्थामी, सब स्थल में वर्तमान स्वद्रष्टा और नित्य परमेश्वर को साक्षी देकर यह नियम मानते हैं और लिखते हैं कि हम लोग आज के दिन से कोई विलायती कपड़ा नहीं पहिनेंगे और जो कपड़ा पहिले से मोल ले चुके हैं और आज की मिती तक हमारे पास है। उनको तो उनके जीर्ण हो जाने तक काम में लावेंगे पर नवीन मोल नहीं पहिरेंगे, हिन्दुस्तान ही का बना कपड़ा पहिरेंगे।” (डॉ0 राम विलास शर्मा, भारतेन्दु युग पृ0-33)

कविवचन सुधा हिंदी साहित्य और हिन्दी पत्रकारिता के लिए अपने नाम को सार्थक करती हुई साक्षात् अमृतवाणी सिद्ध हुई। इसके माध्यम से हिंदी गद्य-पद्य दोनों का ही विकास हुआ और जो बातें उस समय हिन्दी जानने वाले को ज्ञात भी नहीं थी वे ज्ञात हुई। साथ ही भारतेन्दु ने इस पत्रिका के माध्यम से ऐसे लेखक मंडल और पत्रकार मंडल का निर्माण किया, जिससे विभिन्न हिन्दी भाषी प्रदेशों में हिन्दी पत्र-पत्रिकाएँ निकालने तथा उनमें लिखने की इच्छा लोगों में जाग्रत की।

मर्यादा

      पण्डित मदन मोहन मालवीय ने मर्यादा का प्रकाशन सन् 1910 ई0 में अय्यूवया कार्यालय प्रयाग से शुरू किया था। जो एक मासिक पत्रिका थी। इसके सम्पादक पण्डित कृष्णकांत मालवीय थे जो बाद में केन्द्रीय विधान सभा के सदस्य बने। 10 वर्ष के पश्चात सन् 1921 में इसका प्रकाशन काशी के ज्ञान मंडल को सौंप दिया गया। इसका संचालन बाबू शिव प्रसाद गुप्त ने किया तथा श्री सम्पूर्णानंद इसके सम्पादक बने जब असहयोग आन्दोलन में सम्पूर्णानंद जेल में थे तो श्री धनपतराय (प्रेमचन्द) ने भी इसके कई अंको का संपादन किया था। सन् 1923 में इसका प्रकाशन बन्द हो गया। परंतु इसने अल्पकाल में अपने विद्वत्तापूर्ण लेखों और पैनी राजनीतिक दृष्टि के कारण इस पत्रिका ने हिंदी जगत में अपना स्थान बना लिया था। श्री बनारसीदास चतुर्वेदी ने लिखा है कि ‘जिस समय वे छात्र थे उस समय ‘सरस्वती’ के बाद मर्यादा ही सबसे प्रतिष्ठित पत्रिका मानी जाती थी। जब उनका लेख ‘मर्यादा’ में छप गया तो उसकी बड़ी प्रशंसा हुई। तत्कालीन हिन्दी पत्रकारिता में ‘मर्यादा’ का योगदान महत्वपूर्ण था।

      ‘मर्यादा’ का मुख्य उद्देश्य यद्यपि हिन्दी साहित्य का उन्नयन करना था तथापि राष्ट्रीय विचारधारा का प्रबल समर्थक होने के कारण इसका स्वर प्रायः सरकार विरोधी रहा। इसके राजनीतिक स्वरूप का प्रमाण रौलट बिल के सम्बन्ध में प्रकाशित इसकी सम्पादकीय टिप्पणी में देखा जा सकता है- “अनेक में एक का युम प्रतिप्रादित करने को रौलट बिलों का जन्म हुआ है। भारतवासियों को कमर कसकर आन्दोलन के लिए खड़ा हो जाना चाहिए। शहर-शहर में ग्राम-ग्राम में सभाएँ होनी चाहिए, मानवीय स्वत्वों की पुकार झोपड़ी से उठनी चाहिए। हमारी जय होगी, विजय होगी और हमारे सामने संसार सिर झुकाएगा।” (‘मर्यादा’ जनवरी 1919, भाग-17, सं01, पृ0-7)

‘मर्यादा’ में प्रकाशित अधिसंख्य रचनाओं में राजनीति का यही मुख्य स्वर दृष्टिगोचर होता है। इसमें महात्मा गाँधी, लाला लाजपत राय, सरोजनी नायडू, यदुनाथ सरकार, एनी बेसेन्ट, राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन आदि प्रमुख राजनीतिज्ञों के राजनीतिक लेख प्रकाशित होते रहते थे।

काशी में बजी थी ‘रणभेरी’

प्रारम्भ में जो समाचार पत्र भारत में स्थापित हुए, उनको अंग्रेजों ने अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित किया इन समाचार-पत्रों का उद्देश्य केवल मनोरंजन और सूचना देना था और आम तौर पर ये समाचार पत्र गैर-राजनीतिक होते थे। 1818 में पहला भारतीय भाषा में ‘दिग्दर्शन’ बंगाली भाषा में प्रकाशित हुआ। उसके बाद 1822 में ‘समाचार चंडिका’ प्रकाशित की गयी। धीरे-धीरे भारतीय समाचार-पत्रों की संख्या बढ़ती गयी 1857 के विद्रोह के पश्चात् अंग्रेज सरकार ने भारत का शासन-प्रबंध ईस्ट इंडिया कंपनी से अपने हाथों में ले लिया। यद्यपि समाचार-पत्रों की स्वतंत्रता को वे अत्यंत वांछनीय मानते थे किन्तु अंग्रेज सरकार ने शीघ्र ही स्वतंत्र समाचार-पत्रों से होने वाले खतरों का अनुमान कर लिया। इसलिए अंग्रेज सरकार ने 1857 में ‘दि प्रेस एंड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट’ पास किया। 1857 के बाद भारतीय-पत्रों में तेजी से वृद्धि हुई। हमारे देश में समाचार पत्रों और सरकार के बीच संघर्ष इसके जन्म से ही प्रारम्भ हो गया पहला समाचार पत्र ‘बंगाल गजट’ ने ही सत्ता विरोधी अभियान चलाया और इसे बन्द होने का दंश सहना पड़ा। जैसे-जैसे सरकार भारत में अपनी सत्ता को विस्तारित करती गयी वैसे-वैसे वह प्रेस के ऊपर अपना नियंत्रण करने का प्रयास करने लगी। अंग्रेज सरकार अपने कई अधिनियम तथा प्रेस एक्ट के द्वारा प्रेस पर अपना नियंत्रण करने तथा सेन्सर करने में लग गयी और जैसे-जैसे फिरंगियों की ज्यादती बढ़ती गयी समाचार पत्रों का विरोध भी उतना खुल कर सामने आने लग गया।

जब बात अभिव्यक्ति और समाज तथा राज्य को मार्ग दिखाने का हो तो ऐसे में काशी कहाँ पीछे रहने वालों में से थी। 1843 में प्रकाशित ‘बनारस समाचार’ पहला समाचार पत्र था जो बनारस से प्रकाशित हुआ। उसके बाद तो वाराणसी आजादी के लिए समाचार पत्रों के माध्यम से जागरण में तेजी से आगे बढ़ने लगा सरस्वती, आज ने जो मोर्चा सम्हाल रखा था। उसी समय 1930 में महात्मा गांधी के नमक आन्दोलन के दौरान जब सम्पूर्ण भारत में जनजागरण तथा समाचार पत्रों के उग्र होते विचारों को देख कर तत्कालीन गवर्नर जनरल ने प्रेस के दमन के लिए एक आर्डिनेन्स जारी कर पत्रों पर कड़ी कार्रवाई कर दी जिसमें काशी से प्रकाशित ‘आज’ समाचार पत्र भी बन्द हो गया और लगातार दूसरे माह में भी दूसरा आर्डिनेन्स पास कर अंग्रेज शासन सभी अखबारों को बन्द करा दिया। अब समाचार पत्र तथा पत्रकारिता के नये स्वरूप या कलेवर का समय था बाबू विष्णुराव पराड़कर जी के संचालन में भूमिगत प्रेस का आगाज हुआ और रण भेरी बज उठी और सन् 1930 में काशी से साइक्लोस्टाइल रूप में ‘रणभेरी’ नामक भूमिगत समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू हुआ। यह ‘रणभेरी’ प्रकाशित होने लगी तो स्थानीय अंग्रेज प्रशासन की नींद उड़ गयी। इस पत्र के संचालन एवं लेखक मण्डल में पराड़कर जी के अतिरिक्त सर्वश्री रामचन्द्र वर्मा, विश्वनाथ शर्मा, दुर्गा प्रसाद खत्री, दिनेश दत्त झा, उमाशंकर, आचार्य नरेन्द्र देव और कालिका प्रसाद जी थे। यह पत्र सम्पादक सीताराम और प्रकाशक पुलिस सुपरिटेन्डेन्ट कोतवाली, बनारस के नाम से प्रकाशित होता था। रणभेरी के तत्कालीन संचालन मण्डल के सदस्य स्व0 विश्वनाथ शर्मा के अनुसार रणभेरी के सम्पादक सीताराम एक छद्म नाम था और प्रकाशक ‘पुलिस सुपरिटेन्डेन्ट’ का नाम मात्र पुलिस को परेशान करने के निमित्त प्रकाशित किया जाता था। पुलिस को कितना त्रस्त कर रखा था। रणभेरी ने, इसका उदाहरण 16 अगस्त 1930 की प्रकाशित अंक में देखा जा सकता है जिसमें ‘रणभेरी और पुलिस’ नाम शीर्षक में प्रकाशित हुआ था- “हमसे पुलिस परेशान है गुरूवार को उसने स्वयं सेवकों से रणभेरी की सैकड़ों प्रतियाँ छीन ली। एक स्वयं सेवक को पकड़कर थाने में बन्द भी कर रखा और बहुत धमकाने-डराने के बाद रात 8 बजे छोड़ दिया। पुलिस की धमकियों से हम डरते नहीं। ‘रणभेरी’ उसके सर पर बजेगी और तब तक बजती रहेगी जब तक काले कानून रहेंगे और काशी में देश भक्ति रहेगी। डरा-धमकाकर लोगों को देश द्रोही बनाने का जमाना गया।”

‘रणभेरी’ एक विशुद्ध राजनीतिक दैनिक था। इसका दैनिक पत्र दो पृष्ठों का छपता था। तथा साप्ताहिक अंक आठ पृष्ठों प्रकाशित होता था। इसकी प्रसार संख्या 201 मेरी के अनुसार इस सप्ताह हम इस अंक को अधिक उपयोगी बनायेंगे और पांच हजार प्रतियां छापने का यत्न करेंगे। इससे यह ज्ञात होता है कि यह पत्र नियमित लगभग 5 हजार प्रतियां छापने का प्रयास रहा होगा। तथा यह पत्र शुरूआत तौर में एक दिन मंगलवार को नहीं छपता था इसकी पुष्टि इसमें छपे लेख ‘हमारा विशेषांक से होता है जिसमें कहा गया है कि हर सप्ताह मंगलवार को ‘रणभेरी बन्द रहा करता था पर इस बार चौगुने उत्साह से बज रही है।”इस भूमिगत पत्र के प्रथम पृष्ठ के ऊपर ‘रणभेरी’ तथा उसके नीचे सम्पादक का नाम होता था। ‘रणभेरी’ के दैनिक अंक के प्रथम पृष्ठ पर राजनीतिक समाचार-विचार तथा दूसरे पृष्ठ पर टिप्पणीयां और लेख प्रकाशित किये जाते थे। नियमित प्रकाशित होने वाले का मूल्य 1 पैसा तथा साप्ताहिक का 1 आना था। इस पत्र में ओजस्वी समाचारों तथा विद्रोही लेखों का प्रकाशन होता था। यह पत्र सरकार ही नहीं बनाई स्वदेशी द्वारा निकाले गये अखबारों तथा कार्यों का भी जमकर विरोध करता है। उसने अपने एक अंक में प्रयाग से प्रकाशित ‘लीडर’ की कड़े शब्दों में निंदा की। हम लोग एक स्थान पर अधिक दिन नहीं रहा करते थे और न ही एक आदमी एक कार्य बराबर करता था। सदा अपने-अपने कार्य को बदलते रहते थे। नगर से अधिक जानकारी और जान-पहचान होने के कारण दूसरे मकान में बदलने का कार्य भी मेरे ही जिम्मे रहता था। रिश्तेदारों और मित्रों के मकान झूठ सच बोलकर मुझे मिल जाया करते थे। किराया भी बहुत कम और कहीं-कहीं तो नहीं भी देना पड़ता था। लेखकों के यहां कागज और रोशनाई क्रय करके पहुंचाने वाले कार्यकर्ताओं के प्रतिष्ठानों पर भी निगरानी और जांच की जाती रही। इसलिये लेखकों से सीधे सम्पर्क न करके किसी विश्वस्त माध्यम से किया जाता रहा। कभी-कभी तो ऐसी परिस्थिति भी आ जाती थी कि किस लेखक से कब लेख प्राप्त होगा। कब उससे किसी का मिलना सम्भव होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता था। ‘रणभेरी’ काशी की संगीर्ण गलियों में भुतहे बहु प्रवेश द्वार वाले मकानों में छपने के अतिरिक्त गंगा जी में पड़ी नौकाओं पर भी छपती थी, जहां मस्त लंगोटधारी कार्यकर्ता भांग रगड़ते तथा पिकनिक मनाते थे। यह कार्य इसलिये किया जाता था कि पुलिस यह समझे की छपाई नहीं भांग छन रही है। राउण्ड टेबल कांग्रेस के अवसर पर ‘रणभेरी’ का प्रकाशन बन्द हो गया। पुनः 1932 में इसे प्रकाशित करने की योजना बनाई गयी ‘काशी के प्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट के कुण्ड के ठीक नीचे ‘रणभेरी’ प्रेस की स्थापना हुई। इस मकान में प्रसिद्ध क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आजाद के दल के के0एन0 रमन्ना रहते थे। इस मकान में सजग होकर कार्य करने के बारे में श्री विश्वनाथ शर्मा का कथन है कि-आदमियों की पहचान के लिये इस मकान के दरवाजे में छिद्र बनाया गया था। एक व्यक्ति अपने तथा पराये व्यक्तियों को हमेशा देखा करता था। कार्यकर्ताओं के नाम जेल कैदियों के समान थे। जैसे नं0 1 विश्वनाथ (चपरासी), 2 रामसूरत, 3. विश्वनाथ शर्मा, 4. सरयू प्रसाद (फोरमैन), नं0 5 बीरबल। यह क्रम चल ही रहा था कि एक दिन ‘रणभेरी’ प्रेस में चेतवानी देते हुए कोई व्यक्ति द्वार पर एक पुरजा छोड़ गया। इसमें लिखा था-‘तुम लोगों का सारा हाल मालूम हो गया’ यह चेतावनी मिलते ही ‘रणभेरी’ प्रेस का सारा सामान-मशीन कम्पोजिंग मैटर तथा टाइप श्री सरयू महाराज के घर लाया गया। बाद में यह प्रेस नन्दन साहू की गली स्थित एक भुतहे मकान में ले जाया गया। यहां ‘रणभेरी’ तथा कांग्रेस के गुप्त पर्चें सोलह महीने तक छपते रहे। यहां एक बार पुलिस की तलाशी आयी, पर अंधेरी कोठरी में मिट्टी में गाड़ा हुआ न तो हैण्डप्रेस कहीं दिखायी पड़ा और न बगल के कार्यालय में छपी हुई ‘रणभेरी’ की प्रतियां ही पुलिस बरामद कर सकी। जब पुलिस विफल मनोरथ होकर लौटी तो गली में उसी समय ऊपर से ‘रणभेरी’ की प्रतियां गिरायी गयीं। इस प्रकार ‘रणभेरी’ कई महीने तक छपती रही।

1932 की पत्रकारिता का ‘शंखनाद’

       देश में जब-जब समाचार पत्रों की आजादी छिनी गयी, तब-तब स्वाभिमानी पत्रकारों, लेखकों ने भूमिगत पत्रों का प्रकाशन कर संघर्ष का बिगुल बजाया। इन भूमिगत समाचार पत्रों ने सरकारों की जड़े हिला दी और यह आभास कराया कि जनता की आवाज बन्द करने का परिणाम संघर्ष की आग में घी जैसा होता है। भूमिगत पत्रों के प्रकाशन में काशी सर्वदा अग्रणी रही। काशी में ब्रिटिश शासनकाल में 1930 ई0 में नमक आन्दोलन के समय सर्वप्रथम भूमिगत पत्र निकाले गये। इसके बाद 1932, 1942 ई0 में जब-जब समाचार पत्रों पर कुठारघात हुआ, तब-तब भूमिगत पत्रों का प्रकाशन हुआ।

सन् 1932 में लागू प्रेस कानुनों के कारण जब ‘आज’ और ‘हंस’ जैसे समाचार पत्रों से जमानत जमा करने के बाद रणनीति के कारण अपनी लेखन की मुखरता तथा अंग्रेजी शासन के विरोध के भाव को नरम करना पड़ा तब उस समय में प्रकाशित पत्रों से ही काशी के वीर क्रांतिकारी युवकों की इच्छापूर्ति नहीं हो पाती थी। तो उस समय विरोध के स्वर को मुखर करने के लिए भूमिगत पत्रों का प्रकाशन हुआ। काशी से प्रकाशित भूमिगत पत्रों में शंखनाद का विशेष स्थान है।

शंखनाद का प्रकाशन मार्च माह में 1932 ई0 में हुआ था। यह साइक्लोस्टाइल प्रारूप में प्रकाशित होता था। इस पत्र के लेखकों में प्रमुख थे- श्री संतशरण मेहरोत्रा, श्री नन्द किशोर बहल, श्री हीरालाल पहाड़ी, श्री रामचन्द्र वर्मा, श्री दुर्गा प्रसाद खत्री, दिनेश दत्त झा, मुंशी प्रेमचन्द्र गंगा शंकर दीक्षित। यह लोग गुप्त स्थानों से छापने की सामाग्रियों की व्यवस्था तो करते ही थे, इसका वितरण भी गुप्त व्यक्तियों द्वारा गुप्त स्थानों से होता था। इसकी गोपनीयता के विषय में हम श्री गंगा शंकर दीक्षित के कहे गये शब्दों से जान सकते हैं “पत्र के छप जाने पर, जैसे कारीगर साड़ी के रेजे ले जाते है उसी तरह से बनाकर मैं हाथ में लेकर एक पौसरे (प्याऊ) पर जाता थ। जो कुंजगली में ही था। वहां श्री मातादीन जी पौसरे पर पानी पिलाते थे वहां से कुंज गली के लोग शीतल जल प्राप्त करते थे। मैं भी वहां हाथ से अपने ‘शंखनाद’ पत्र के रेजे को जो साड़ी के रेजे की तरह बनाया जाता था। रख देता और पानी पीकर चल देता इसके पश्चात मेरे बनाये गये दस-दस पत्र की पुण्डीका वितरण कैसे होता था यह मुझे नहीं मालूम था। यह कार्य वितरण सम्बन्धी दूसरे लोगों का था।” छापने का कार्य जिस मकान में होता था उसके बारे में दीक्षित जी का कथन है- ‘जिसमें शंखनाद पत्र छपता था उसे किराये पर यह कहकर लिया जाता था कि इसमें श्री केदार सेठ जी के सोड़ावाटर फैक्ट्री को लेबुल छपता था। उपरोक्त वाक्यों से यह स्पष्ट होता है कि ‘शंखनाद’ के प्रकाशन व वितरण ने जनता को ही नहीं, सरकारे भी आश्चर्यचकित कर दिया था। यह अपने आप में ही विचारणीय बिन्दु है कि जो व्यक्ति प्रकाशन से लेकर पत्र को पहुंचाने का कार्य करता था उसे भी वितरण सम्बन्धी कोई जानकारी ही नहीं मिल पाती थी। इससे पता चलता है कि शंखनाद की व्यवस्था कितनी चुस्त रही होगी? इसकी ऐसी अभेद्य गोपनिय व्यवस्था ने ही इस पत्र के बारे में ज्यादा कुछ कहने से रोकते हैं। तभी से इस पत्र पकड़ने के लिए अंग्रेज सरकार ने उस समय दस हजार रूपये का भारी इनाम घोषित किया था। किन्तु अफसोस वे तमाम जद्दो-जहद के बाद भी इस पत्र को पकड़ नहीं पाये।

       शंखनाद का दैनिक तथा साप्ताहिक अंक क्रमशः दो तथा चार पेजों का प्रकाशित होता था। परन्तु इन दोनों संस्मरण का मूल्य समान था जो 1 पैसा प्रति पत्र था। दैनिक अंक में छोटे-छोटे समाचार तथा टिप्पणियाँ प्रकाशित होती थी और साप्ताहिक अंक में समाचारों के अतिरिक्त प्रभावशाली लेख व भाषण प्रकाशित किये जाते थे। शंखनाद में प्रकाशित लेख का अंश-

       ‘मेढ़को को जुकाम

       बौने बिहारी लाल चांद पकड़ेंगे

कल बिहारी लाल ने जो नीचता की स्वयं सेविकाओं को जिस बुरी तरह से पीटा। वह जनता को विदित हो चुका है। आज सबेरे से फिर उसके यहां पिकेटिंग शुरू हो गयी है और दो स्वयं सेविकाओं और चार स्वयं सेवक उसकी दुकान से गिरफ्तार हो चुके हैं। अब तक बिहारी लाल की दुकान से 140 गिरफ्तारियां हो चुकी हैं। बिहारी लाल का कहना है कि उसके पास सात किता मकान है, उन्हें बेचकर वह कांग्रेस की बर्बाद कर देगा। मालूम होता है कि बिहारी लाल गवर्नमेन्ट से भी अधिक शक्तिशाली है। जो काम ब्रिटिश गवर्नमेन्ट अपनी सारी फौज, पुलिस और आर्डिनेन्सों के जरिये न कर सकी, वह काम बिहारी लाल करने पर उतारू हो गये है। मूर्खता की भी हद होती है। इसको अगर पालयन कहें तो और का है।’

       भारत की आजादी में पत्र पत्रिकाओं का विशेष योगदान है। उनमें भी काशी की पत्रकारिता ने अपना पूर्ण सहयोग किया लेकिन जब मुख्य धारा की पत्रकारिता शासन की नीतियों के कारण अपना रूप एवं कलेवर बदलने लगी तो उसके मुखर तेजस्विता, बेबाकीपन, सरलता तथा स्वराज की भावना को इन भूमिगत पत्रों ने धारण राष्ट्र को नव चेतना दी।

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