कबीरपंथी

काशी और कबीर

Photo0139काशी में कबीर का जन्म हुआ। काशी में ही उन्हें गुरु मिले। काशी में ही ज्ञान मिला। कहते हैं गंगा के घाट पर रामानन्द के खड़ाऊँ से कबीर कुचल गये थे और गुरु के मुख से बरबस राम नाम का महा मंत्र निकल गया। दीक्षा मिल गयी। यह ज्ञान प्राप्ति की अनूठी शैली थी। ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया में कुचले जाने की क्रिया का पहला उपयोग था। इसकी परिणति काशी से कबीर के निर्वासन या आत्मनिर्वासन में हुई। किंवदन्तियाँ बताती हैं कि काशी में रहते हुए कबीर पर अनेक हमले हुए। इस हमले में राजे महराजे, मुल्ला मौलवी, पण्डे पुरोहित सब एक साथ थे। आखिर वह कौन सी वजह थी कि आपस में लड़ने कटने वाले कबीर के साझा दुश्मन हो गये थे? कबीर ने ऐसा क्या कर दिया या कह दिया कि वह पूरे जमाने को बर्दाश्त नहीं हुआ और सब कबीर के पीछे पड़ गये।

कबीर व्यवसाय से बुनकर थे। उन्होंने देखा कि दुनिया की चादर मैली हो गयी है। परमात्मा की बनायी स्वच्छ और सुन्दर चादर को सुर नर मुनि ने ओढ़ कर मैली कर दी है। उन्होंने यही तो कहा कि नयी चादर बुननी होगी। केवल कहा नहीं वे झीनी झीनी चादर बुनने में लग गये। सुर, नर, मुनि, राजा, मुल्ला पंडा पुरोहित सब के सब परेशान! नयी चादर बुनी गयी, दुनिया नयी तरह से परिभाषित की गई तो उनकी जमी जमाई दूकानों का क्या होगा? उनके विशेषाधिकारों का क्या होगा? कबीर केवल नयी चादर नहीं बुन रहे थे वे वर्ण की श्रेष्ठता, जाति की श्रेष्ठता, धर्म का पाखण्ड सबको चुनौती दे रहे थे। इसलिए सब को खटक रहे थे।

कबीर ने जो ज्ञान प्राप्त किया था वह बाजार से खरीदा हुआ ज्ञान नहीं था – वह कुचले जाने से पैदा हुआ ज्ञान था, ऐसा ज्ञान जो असीम साहस से भर देता है। ऐसा साहस जो दुनिया की प्रचलित नियम नियमावली, रीति रिवाज रूढ़ियों परम्पराओं को अस्वीकार कर सकें। इस अपूर्व साहस के साथ उन्होंने एक नयी चादर बुनी। यह प्रेम की चादर थी। यह चादर किसी विशेषाधिकार से नहीं मिलने वाली थी-

प्रेम न बारी ऊपजै, प्रेम न हाट विकाइ

राजा परजा जेहि रुचै, सीस देइ लै जाइ।

अब विशेषाधिकारों की अभ्यस्त दुनिया मूल्य चुकाने के लिए कहाँ तैयार होती! और मूल्य भी कोई साधारण नहीं – सीस का मूल्य। अहंकार का विसर्जन। फिर वही मुश्किल। अहंकार छोड़ना यानी विशेषाधिकार छोड़ना। कौन तैयार होता यह सब छोड़ने के लिए।

लेकिन कबीर के इस नये प्रस्ताव ने राजा और परजा को, ब्राह्मण और शूद्र को, ज्ञानी और मूर्ख को, तपस्वी और गृहस्थ को प्रकारान्तर से विशिष्ट और सामान्य को एक भावभूमि पर खड़ा कर दिया।

kabirकबीर ने दसरथ सुत से अलग रामनाम का नया मर्म अन्वेषित किया। इस नये मर्म में सबके लिए गुंजाइश थी, सबके लिए जगह थी। खास तौर से उनके लिए जो शताब्दियों से तिरस्कृत और बहिस्कृत थे, लांछित और उपेक्षित थे। इस निर्गुण की पूजा में साधन व्यर्थ थे – प्रेम अपरिहार्य था। जिनके पास साधन नहीं थे वे इस प्रेम मार्ग पर चल पड़े। जो साधन सम्पन्न थे उनका चलना मुहाल हो गया। जो चलना राह मुश्किल है हमने सिर बोझ भारी क्या? साधन का बोझ लिए हुए लोग अटके भटके ठिठके रहे- इधर प्रेम का घोड़ा दिग्विजय के लिए निकल पड़ा। ज्ञान की आँधी चल पड़ी। ठिठके और अटके हुए लोग भी आँधी के साथ बह चले। कालान्तर में जब ऑधी का जोर कुछ थमा तो साधन के साथ आये हुए लोगों ने अपनी गठरी सभाली और पुराने टेक पर चल पड़े। कबीर के दुश्मन बाहर से भीतर आ गये। उन्होंने कबीर की बानी के विरूद्ध एक और कबीर को खड़ा कर दिया। कबीर की मूर्तिया बना डाली। प्रेम और ज्ञान के मार्ग को छोड़कर नये कर्म काण्ड विकसित किये। पत्थर पूजने का विरोध करने वाले कबीर की पत्थर की मूर्तिया बनायी गयीं, मंदिर बनाये गये, और कबीर की वाणी को दबाने की कोशिश की गयी। संतो के घर में झगरा भारी होने लगा। एक पंथ में कई पंथ बने।

पर माया को पहचानने वाले कबीर जग की चतुराई समझते थे और जलाने यानी व्यर्थ करने की सामर्थ्य रखते थे। माया ठगिनी है यह जानते थे और माया से उपर उठने की सामर्थ्य रखते थे। इस सामर्थ्य ने ही उन्हें वह आत्म विश्वास दिया जिससे वे कहते रहे –

हम न मरै मरिहै संसारा।

कबीर के जिस निर्वासन या आत्म निर्वासन की चर्चा की गई उसका भी एक खास अर्थ है – काशी का माहात्म्य यह है कि यहाँ मरने वाला अनिवार्यतः मुक्ति प्राप्त करता है। महज काशी में रहने और मरने से मिलने वाली मुक्ति कबीर को नहीं चाहिए थी। उन्हें अपने लिए मुक्ति का नया रास्ता तलाशना था – ऐसा रास्ता जो मगहर में रहने और मरने वाले के लिए भी सुलभ हो।

इस तरह देखें तो कबीर पहले से चले आ रहे विशेषाधिकार को चाहें वह जिस भी आधार पर रचा गया हो, चुनौती देते हैं। वे मनुष्य को विशिष्ट से सामान्य बनाते हैं कहने की जरूरत नहीं कि विशिष्ट होने का बोध हमारी समस्याओं के मूल में है। हम विशिष्ट और श्रेष्ठ हैं। के साथ यह बोध भी सक्रिय होता है कि दूसरा सामान्य और हीन है। हमारी समकालीन दुनिया ने श्रेष्ठता और विशिष्टता के ऐसे -ऐसे आख्यान रच दिए हैं कि दुनिया परायों और परायेपन से पट गई है। समकालीन दुनिया के में जो अशान्ति है, संघर्ष है, घृणा है, उपद्रव है उसके मूल में परायेपन की यह धारणा ही है।

विशेषाधिकार और विशिष्टता को अस्वीकार करने वाली कबीर की वाणी अस्ल में परायेपन की धारणा को खत्म करने वाली है। परायेपन का तर्क दुनिया की समस्याओं का समाधान घृणा में देखता है। इसके विपरीत कबीर विशेषाधिकार और विशिष्टता से मुक्त होकर प्रेम की दुनिया रचने का प्रस्ताव करते हैं। ऐसी दुनिया जिसके सभी निवासी बिना किसी भेद भाव के पुकार सकें –

बालम आउ हमारे गेह रे।

प्रो. सदानन्द शाही

 ( सम्पादक : साखी पत्रिका, प्रोफेसर :हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय.)

कबीर प्राकट्य धाम, लहरतारा

गगन मण्डल से उतरे, सदगुरु सत्य कबीर।

जलज मांहि पौढ़न किये, सब पीरन के पीर।।

DSCN3281 मानवमात्र को सत्य, अहिंसा, एकता तथा विश्वबन्धुत्व का उपदेश देने वाले सदगुरू कबीरदास के जन्म के सम्बन्ध में कई किवदंतियां प्रचलित है। कुछ लोगों का यह कहना है कि संवत 1455 (सन् 1398) की ज्येष्ठ पूर्णिमा, दिन सोमवार को मांगलिक ब्रह्ममुहुर्त में काशी के लहरतारा तालाब के किनारे स्वामी रामानन्द के शिष्य अष्टानन्द ध्यानमग्न थे, अचानक उन्हें कुछ आभास हुआ और उन्होंने अपने आंखे खोली, उन्होंने देखा कि आकाश से एक दिव्य ज्योतिपुंज तालाब में खिले एक कमल पुष्प पर पड़ी और क्षण मात्र में वह ज्योतिपुंज नवजात शिशु के रूप में परिवर्तित हो गया। जबकि कुछ लोगों के मध्य यह मान्यता है कि नीरू-नीमा नामक नवदम्पत्ति लहरतारा तालाब के पास से गुजर रहे थे तभी उनकि दृष्टि तालाब के पास पड़े एक नवजात शिशु पर पड़ी, मोहवश नवदम्पत्ति ने शिशु को अपनाकर उसका पालन-पोषण किया, कालान्तर में यहीं बालक कबीरदास के नाम से संसार में प्रसिद्ध हुआ।DSCN3305

सन् 1948 में पंथ श्री हजुर उदित नाम साहेब (आचार्य कबीर पंथ) के मन में लालसा जगी की कबीरदास के जन्म स्थान का दर्शन हो जाये। उन्होंने लोगों से पूछकर कबीरदास के जन्म स्थान का पता लगाया और दर्शन किया। उस समय यहां दूर-दूर तक जल एवं जलकुम्भी ही दिखाई पड़ रही थी, उन्होंनें कबीरदास का ध्यान कर उस जल को अपने मस्तक से लगाया तभी उनके मन में विचार आया कि इस पवित्र स्थान पर कबीर पंथ का केन्द्र स्थापित किया जाये। 18 वर्ष पश्चात सन् 1967 में ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन श्री हजुर उदित नाम साहेब ने कबीर पंथ के तत्कालीन महन्त, सन्त एवं भक्तो के उपस्थिति में वर्तमान कबीर मन्दिर की नींव रखी। आम जनता एवं पंथ अनुयायियों सहयोग से सन् 2002 में मन्दिर का निर्माण पूर्ण हुआ, मन्दिर निर्माण में लाल पत्थरों का प्रयोग किया गया है। तथा शैली कलात्मक एवं आर्कषक है। जहाँ पर मन्दिर में कबीरदास की कमल पुष्प पर प्रतिमा है वहीं पर कबीरदास नीरू-नीमा को प्राप्त हुये थे। मन्दिर परिसर में ही एक तालाब स्थित है जो कबीर पंथियों में श्रद्धा तीर्थ के रूप में जाना जाता है। प्रत्येक वर्ष दस जून को मन्दिर परिसर में कबीर जयन्ती का उत्सव मनाया जाता है इस अवसर पर तीन दिवसीय विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन होता है, जिसमें कबीर अमृतवाणी एवं सत्संग प्रमुख है। गुरू पूर्णिमा को भी संत्सग एवं कबीर अमृतवाणी जैसे कार्यक्रमों का आयोजन होता है। मन्दिर परिसर में ही प्राणीक हिलींग पद्धति द्वारा लोगों को चिकित्सा सेवा प्रदान किया जाता है। मन्दिर में देश-विदेश के साथ ही स्थानीय भक्तों एवं अनुयायियों का आवागमन होता है। वर्तमान में मन्दिर के मुख्य आचार्य पंथ श्री हजुर अर्धनाम साहेब हैं। मन्दिर अक्टूबर से फरवरी तक सुबह 7 से 12 बजे एवं सायं 3 से 5 बजे तक तथा मार्च से सितम्बर तक सुबह 5.30 से 11 बजे एवं सायं में 4 से 6 बजे तक आम दर्शनार्थियों के लिये खुला रहता है। मंदिर की दूरी कैंट स्टेशन से लगभग दो किलोमीटर है।DSCN3301

 

कबीर-चौरा मठ

कबिरा खड़ा बाजार मेँ, मांगै सबकी खैर । ना काहु से दोस्ती, ना काहु से बैर ॥

काशी के बाजारोँ के मध्य कबीर चौरा मुहल्ले मेँ (पिपलानी कटरा के पास) कबीर मठ स्थापित है, जिसे मूलगादी पीठ भी कहा जाता है। कबीर दास का जन्म स्थान लहरतारा क्षेत्र (वर्तमान मे कबीर बाग) मे माना गया है, जहाँ इनकी जननी ने किसी कारणवश इन्हे लहरतारा तालाब के पास छोड़ दिया, वहाँ से नीरु – नीमा नामक जुलाहा दम्पत्ति इन्हे अपने निवास स्थान नीरू टीला पर ले आये और कबीर दास का पालन – पोषण किया। नीरु – नीमा का निवास स्थान ही वर्तमान मे कबीर मठ के रुप मेँ जाना जाता है। कबीर दास ने अपना अधिकांश जीवन यहीँ व्यतित किया था। तत्कालीन समय मेँ लोक मानस मे यह धारणा थी कि काशी मेँ प्राण त्यागने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है एवं मगहर में प्राण त्यागने से नर्क मे स्थान मिलता है। इस धारणा को अपवाद सिद्ध करने के लिये कबीर दास जीवन के अंतिम समय मे मगहर चले गये और वहीँ पर अपना प्राण त्याग दिया। मृत्यु के पश्चात जब उनके शव से चादर हटाया गया तो शव के स्थान पर कुछ पुष्प पड़े मिले, जिसमे से कुछ पुष्प का हिन्दुओँ ने प्रतीक स्वरुप दाह संस्कार किया, जबकि मुसलमानोँ ने कुछ पुष्प को कब्र मे दफनाया।

Photo0145सन 1578 मे इसी पुष्प के कुछ भाग को मठ में लाकर मठ के मध्य मेँ कबीर दास के प्रतीक स्वरुप समाधि का निर्माण कराया गया। कबीर दास के शिष्य विद्वान पंडित सुरुति गोपाल ने कबीर पंथ की स्थापना की एवं पंथ के प्रथम आचार्य बने। सन 1933 मे मालदा के सुखिया दासी तथा फिजी के महंत पिंगल दास, सुखराज दास, रुकमिन दास एवं उदित नारायन कबीरपंथियो ने वर्तमान समाधि स्थल का जिर्णोद्धार कराया था।  मठ में ही गुम्बदाकार विशाल बीजक मन्दिर स्थापित है जहाँ कबीर दास साधना करते एवं उपदेश प्रदान करते थे। बीजक मन्दिर में कबीर दास की चरण पादुका, माला (एक हजार आठ दानोँ की), टोपी, लकड़ी का घड़ा एवं एक त्रिशूल भी रखा हुआ है। त्रिशूल के सन्दर्भ में मान्यता है कि कबीर दास ने अपनी वाणी से किसी गोरखपंथी सन्यासी को पराजित किया था, जिससे प्रभावित होकर गोरखपंथी सन्यासी ने अपना त्रिशूल कबीर दास को भेटं स्वरूप प्रदान कर दिया। मठ परिसर के दीवारों पर कबीर दास से जुड़े किंवदंतियों को चित्रों के माध्यम से उकेरा गया है। विभिन्न सन्दर्भों को आकर्षक आदमकद प्रतिमा के माध्यम से दर्शाया गया है, प्रतिमा इतनी सजीव प्रतीक होती है कि मानों अपनी कहानी स्वयं बयां कर रही हो।

Photo0160सन 1934 में महात्मा गांधी का आगमन मठ मे हुआ था, मठ मे गांधी जी के दाण्डी स्वरूप की प्रतिमा स्थापित कर उस यादगार पल को संजोया गया है। कबीर चौरा मठ के पांचवें आचार्य द्वारा फारस से मंगायी गयी चक्की (पत्थर से निर्मित एवं कलात्मक) भी परिसर की शोभा को बढ़ा रही है।कबीर दास के पालक माता – पिता नीरू – नीमा की समाधि एवं कई कबीरपंथी आचार्यों की समाधि भी परिसर में स्थित हैं, समाधियों का संगमरमर के पत्थरों से सुन्दर निर्माण कराया गया है। ज्येष्ठ पूर्णिमा से तीन दिवसीय कबीर जयंती का आयोजन प्रमुख रूप से किया जाता है, जिसमें देश – विदेश से लोगों का आगमन होता है। इस अवसर पर विभिन्न प्रदेशों से आने वाले कबीरपंथियों द्वारा अपने अलग – अलग अंदाज, राग – अनुराग के द्वारा कबीर दास के दोहों का गायन किया जाता है। गुरू पुर्णिमा के अवसर पर भी मठ परिसर में कई कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता हैं। मठ प्रतिदिन सुबह छः बजे से रात आठ बजे तक खुला रहता है। मठ में प्रतिदिन सुबह एवं सायंकाल में प्रार्थना सभा होती है तथा नियमित रूप से सायंकाल में सामूहिक कबीरवाणी का पाठ किया जाता है। पाठ में सामान्य व्यक्तियों की भी सहभागिता होती है, व्यवस्थापकों द्वारा सामान्य व्यक्तियों के आगमन को सहज ही स्वीकार एवं सत्कार किया जाता है।

photवर्तमान में मठ के आचार्य महंत श्री विवेक दास हैं, जिन्होंने सर्वसम्मति से सन 2000 में चौबीसवें आचार्य के रूप मे पद ग्रहण किया था। मठ के प्रधान व्यवस्थापक गोपाल दास तथा देवशरण दास हैं। दान एवं किराये से प्राप्त धन से मठ की प्रबन्ध व्यवस्था की जाती है। मठ मेँ लगभग चालीस की संख्या मेँ कबीरपंथी अनुयायी स्थायी निवास करते हैं। परिसर स्थित संत निवास मेँ परदेशी कबीरपंथी साधु – सन्यासियों के लिये निवास एवं भोजन की व्यवस्था मठ की ओर से नि:शुल्क प्रदान की जाती है। मठ का अपना एक कबीरवाणी प्रकाशन है, जिसमें कबीर दास से जुड़े साहित्यिक पुस्तकों का प्रकाशन किया जाता है। सन 1980 मेँ परिसर में कबीर पुस्तकालय की स्थापना की गयी, पुस्तकालय में कबीर सहित्य से सम्बन्धित पुस्तकें उपलब्ध रहती हैं। यहाँ सामान्य पाठकोँ के आगमन का भी स्वागत किया जाता है।

धीरज कुमार गुप्ता

 

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