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तीर्थंकर पार्श्वनाथ जैन मन्दिर, भेलूपुर तीर्थ

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j m 04j m 02सर्वधर्म सदभाव की नगरी है काशी। विभिन्न धर्मो के धार्मिक सरोकार से जुड़ी है यह पावन नगरी। भारतवर्ष के अन्दर जिसे लघु भारत के नाम से भी जाना जाता है। ऐतिहासिक अवलोकन से स्पष्ट होता है कि जैन धर्म का प्रभाव भी इस नगरी पर रहा है। ‘संयम’ और ‘सहनशीलता’ के प्रतिमूर्ति जैन धर्म के तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ का जन्म काशी के पवित्र भूमि पर हुआ था। लगभग 2800 वर्ष पुर्व पौष कृष्ण एकादशी के दिन इक्ष्वाकु वंशीय राजा विश्वसेन (अश्वसेन) एवं रानी वामादेवी (उत्तर पुराण में इनका नाम ब्राह्मी बताया गया है) के भेलूपुर स्थित राजमहल में पुत्र पार्श्वकुमार का जन्म हुआ; जहाँ पर वर्तमान में विशाल मन्दिर स्थित है। पार्श्वनाथ की ‘दीक्षा’, ‘च्यवन’ एवं ‘कैवल्य ज्ञान’ संस्कार भी भेलूपुर तीर्थ में ही हुआ। तीर्थंकर पार्श्वनाथ विवाह बन्धन से दूर रहे। लगभग तीस वर्ष की उम्र में एक दिन राजसभा में भगवान ऋषभदेव की कथा सुनते-सुनते उनका ध्यान वैराग्य की ओर आकर्षित हुआ, तत्पश्चात उन्होनें अश्ववन में जाकर जैनेश्वरी दीक्षा को ग्रहण कर लिया। तपस्या में लीन पार्श्वनाथ ने शंबर नामक असुर के दारूण कष्टों को सहनकर कैवल्य को प्राप्त किया। झारखण्ड के गिरिडीह जिले में स्थित सम्मेदशिखर पर्वत पर श्रावण शुक्ल सप्तमी को पार्श्वनाथ को मोक्ष प्राप्त हुआ; जिसे मोक्ष कल्याणक शिखर भी कहते हैं। वर्तमान में यह पर्वत ‘पारस नाथ हिल’ के नाम से प्रसिद्ध है। पार्श्वनाथ के जन्म स्थल भेलूपुर मुहल्ले में विशाल, कलात्मक एवं मनोरम मन्दिर का निर्माण हुआ है। मन्दिर में काले पत्थरों से निर्मित मूलतः चार फिट उंची पार्श्वनाथ की प्रतिमा विराजमान है।j m 03 6273 वर्ग फिट क्षेत्रफल में फैले इस मन्दिर परिसर के मध्य सन 2000 में भगवान पार्श्वनाथ के मन्दिर का नवनिर्माण हुआ। राजस्थानी कारीगरों द्वारा राजस्थानी पत्थरों से निर्मित राजस्थानी शैली का यह मन्दिर अदभुत एवं अद्वितीय है। मन्दिर की दीवारों पर शिल्पकारों द्वारा सुन्दर ढंग से कलात्मक चित्रों को दर्शाया गया है। इस मन्दिर की उचाई 61 फिट है, मन्दिर निर्माण में बंशी पहाड़पुर का गुलाबी पत्थर 19500 घन फिट एवं 12000 वर्ग फिट मकराना मार्बल (सफेद) का प्रयोग हुआ तथा मन्दिर निर्माण में 12 वर्ष में 817600 मानव घण्टा का समय लगा। मन्दिर में लगा पीतल का दरवाजा काशी के ही शिल्पकारों द्वारा तैयार किया गया है। ईसा से 300 वर्ष पूर्व में मगध में 12 वर्षो तक भीषण अकाल पड़ा जिसके कारण जैन अनुयायी भद्रबाहु कुछ शिष्यों के साथ कर्नाटक चले गये, किंतु कुछ अनुयायी स्थूलभद्र के साथ मगध में ही रहें। भद्रबाहु जब वापस लौटे तो मगध के अनुयायीओं से उनका गहरा मतभेद हो गया, जिसके परिणाम स्वरूप जैन धर्म श्वेताम्बर तथा दिगम्बर नामक दो सम्प्रदायों मे बँट गया। स्थूलभद्र के शिष्य श्वेताम्बर (श्वेत वस्त्र धारण करने वाले) एवं भद्रबाहु के शिष्य दिगम्बर (नग्न रहने वाले) कहलायें। दिगम्बर मन्दिर के बाहरी ओर दीवारों पर जैन धर्म के सभी तीर्थंकरों का संक्षिप्त परिचय अंकित है। मन्दिर में प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में देशी-विदेशी पर्यटकों का आगमन होता है, विभिन्न स्थानों से आये अनुयायी मन्दिर परिसर मे ही स्थित धर्मशाला में निवास करते हैं। मन्दिर प्रबन्धन द्वारा जीव-दया से सम्बन्धित कार्यक्रमों का आयोजन होता रहता है। दिगम्बर सम्प्रदाय द्वारा श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन चिकित्सालय के माध्यम से निःशुल्क चिकित्सा सेवा भी प्रदान किया जाता है।

  • धीरज कुमार गुप्ता

 

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