इस्लाम

काशी में इस्लाम का प्रादुर्भाव

काशी में इस्लाम आज से बहुत अरसे पहले आया। हिन्दुस्तान ही वह स्थान है जहां अल्लाह ने पहले इंसान आजम अली सलाम को भेजा था। अल्लाह ने जब उन्हें बनाया तो स्वर्ग में रहने का निर्देश दिया लेकिन कुछ शैतानों ने आजम अली सलाम को बहकाना चाहा। इस पर अल्लाह ने आजम अली सलाम को जमीं पर DSCN4223भेज दिया। धरती के जिस स्थान पर वे आये वह हिन्दुस्तान ही था। अल्लाह के संदेशों को लेकर नबी हजरत मोहम्मद साहब करीब 15 सौ वर्ष पहले मक्के में आये। मक्के और भारत के बीच शुरू से ही व्यापारिक सम्बंध रहे। भारत से काफी मात्रा में मसाले और यहां की बनी बेहतरीन तलवारों को मक्के में काफी पसंद किया जाता था। एक बार मोहम्मद साहब ने चन्द्रमा की ओर अपनी अंगुली उठा दी तो वह दो टुकड़ों में बंट गया। उस समय भारत के राजा मालीबार थे। राजा मालीबार की एक आदत थी, उन्होंने एक रोजनामचा बनाया था उसमें जो भी खास घटनायें होती थीं उसे लिखते थे। उन्हें जब यह पता चला कि किसी के अंगुली दिखाने मात्र से चन्द्रमा दो टुकड़ों में हो गया तो उन्होंने उसे अपने रोजनामचे में लिख कर मोहम्मद साहब से मिलने के लिए मक्का के लिए चले। हालांकि राजा की मोहम्मद साहब से मुलाकात नहीं हो सकी और रास्ते में ही किसी कारण से उन्हें वापस लौटना पड़ा इस दौरान उनका इंतकाल हो गया। बाद में कुछ लोग उनके रोजनामचे के आधार पर मोहम्मद साहब से मिलने गये और उन्हें उपहार दिया। धीरे-धीरे भारत में इस्लाम की आमद हुई। व्यापारिक सम्बंध और बढ़ती नजदीकियों का असर रहा कि कुछ मुसलमान भारत आये। माना जाता है कि केरल में हिन्दुस्तान की पहली मस्जिद बनी थी। सन् 712 ई0 में मोहम्मद बिन कासिम हिन्दुस्तान के सिन्ध में आये, इस दौरान काफी लोगों ने ईस्लाम कबूला। इसके बाद सन् 1001 से 1026 तक महमूद गजनवी ने भारत पर अपना प्रभुत्व बनाया। गजनवी के समय में भारत में ईस्लाम धर्म खूब फला-फूला। महमूद गजनवी के भांजे सैयद सालार मसूद गाजी थे। उनके निर्देश पर एक काफिला सन् 1022 में इस्लाम धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए मलिक अफजल अल्वी के नेतृत्व में काशी आया। यह काफिला बनारस के उत्तरी क्षेत्र में पहुंचा। मलिक अफजल अल्वी सूफी संत थे, जिनके नाम से अलईपुरा मोहल्ला बसा हैं, सालारपुरा मोहल्ले का नाम सैयद सालार मसूद गाजी के नाम पर पड़ा। इसी मोहल्ले में सैयद सालार मसूद गाजी का मकबरा भी है। वर्तमान में जो अलईपुरा मोहल्ला है वह पहले अल्वीपुरा के नाम से जाना जाता था। इस मोहल्ले का नाम मलिक अफजल अल्वी के नाम पर पड़ा है। इसी मोहल्ले में मलिक अफजल अल्वी का मकबरा भी स्थित है। बनारस में तीन मोहल्ले मदनपुरा, लल्लापुरा एवं अल्वीपुरा में ही इस्लाम की शुरूआत हुई इसलिए ये मोहल्ले खास हैसियत रखते हैं। उस काफिले के साथ सिराजुद्दीन कल्ची भी इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिए बनारस आये थे। इनका मजार औरंगाबाद क्षेत्र के कल्ची सराय मोहल्ले में कल्ची का मजार नाम से है। इसी काफिले में मलिक मोहम्मद बाकिम भी आये थे। सालारपुरा मोहल्ले में इनका मजार है। इन्हीं के नाम पर बाकराबाद मोहल्ले का नाम पड़ा है। इसी काफिले में जलालुद्दीन साहब भी आये हुए थे। इन्होंने भी बनारस में इस्लाम का प्रचार-प्रसार किया। इन्हीं के नाम पर सालारपुरा से सटा जलालुद्दीनपुरा मोहल्ला का नाम पड़ा। काफिले के साथ बटउ शहीद भी आये थे। इनका मजार त्रिलोचन मच्छोदरी के पास है। मजार के उपर एक ही खम्भे पर मस्जिद बनी हुई है। मच्छोदरी और उसके आस-पास के सभी मोहल्ले उसी जमाने के हैं। भार्गव प्रेस के पीछे बटउ शहीद का मजार है। लंका के पास याकूब शहीद का मजार है ये भी उसी काफिले के साथ बनारस आये हुए थे। इस तरह धीरे-धीरे बनारस में मुस्लिमों की तादात बढ़ती गयी। 1119 में ढाई कंगूरे की मस्जिद बनी यह चौहट्टा लाल खां में है। दो नीम कंगूरा यानी दो और नीम यानी आधा इसलिए इस मस्जिद को ढाई कंगूरे की मस्जिद कहा जाता है। इसे बनारस की पहली मस्जिद भी कहा जाये तो बेजा न होगा। इसी तरह काशी स्टेशन के पास की मस्जिद भी उसी जमाने की है। सन् 1193 में मोहम्मद गोरी जब भारत में शासन कर रहा था उसके करीबी बनारस के ही सैयद जमालुद्दीन थे। जमालुद्दीन को बनारस का सूबेदार नियुक्त किया गया। इन्हीं के नाम पर अलईपुरा मोहल्ले के पास स्थित जमालुद्दीनपुरा का नाम पड़ा। इसलिए यह कहना गलत न होगा कि बनारस में उसी जमाने से यानी सन् 1022 में इस्लाम का प्रादुर्भाव हुआ। इस शहर की यही विशिष्टता रही है कि चाहे जैसे भी हालात रहे हों हिन्दू-मुस्लिमों ने गंगा-जमुनी तहजीब को बनाये रखा।

– अब्दुल बातिन नोमानी

काशी की मस्जिदें

विभिन्न संस्कृतियों, सभ्यताओं और धर्मों की नगरी के रूप में काशी विख्यात रही है। मंदिरों के इस शहर में मस्जिदों, गुरूद्वारों और चर्चों की मौजूदगी सर्व धर्म की नगरी के रूप में इसे श्रेष्ठ बनाती है। यही कारण है कि यहां की शुद्ध एवं पवित्र हवा में मंत्रों की ध्वनि के साथ अजान और गुरूवाणी साथ-साथ तैरती रहती हैं। काशी में बहुत सी मस्जिदें भी हैं जिनकी स्थापत्य शैली बेहतरीन रही है।

आलमगीर की मस्जिद– आलमगीर की मस्जिद अपनी भव्यता एवं विशालता के लिए प्रसिद्ध रही है। मस्जिद की दो मीनारे तो 3 सौ फुट ऊँची थी जिसे काफी दूर से भी देखा जा सकता था। बाद में ये दोनों मीनारें क्षतिग्रस्त होकर गंगा में समा गयीं। यह बेहतरीन मस्जिद पंच गंगा घाट पर स्थित है। इस मस्जिद का निर्माण 1626 ई0 में किया गया। हर शुक्रवार को मस्जिद में नमाज अदा करने वालों की भीड़ तो होती ही है ईद, बकरीद के मौके पर तो नमाजियों की संख्या बहुत अधिक होती है।

बांसफाटक की मस्जिद – बांसफाटक क्षेत्र में कारमाइकेल पुस्तकालय के ठीक सामने यह मस्जिद स्थित है। इस मस्जिद का निर्माण काफी पहले सन् 1137 ई0 में शहाबुद्धीन ने कराया था। मस्जिद की बाहरी दीवारें पर पठानी शैली का प्रभाव है जिससे इसकी सुन्दरता और बढ़ जाती हैं इस मस्जिद की खासियत यह है कि यह जमीन से काफी ऊँचाई पर है। मस्जिद में प्रतिदिन काफी संख्या में नमाज अदा करने वाले पहुंचते है।

चौखम्भा की मस्जिद – यह मस्जिद अपनी आकर्षक स्थापत्य शैली के लिए जानी जाती है। इस मस्जिद का प्रवेश द्वार 13 फीट ऊँचा एवं 4 फीट चौड़ा है जो पत्थर से निर्मित किया गया है। वहीं, इसके खम्भों पर घंटे खुदे हैं। यह मस्जिद पक्के महाल में रंगीन दास फाटक के बगल में एक सकरी गली में स्थित है।

बकरिया कुण्ड की मस्जिद – बकरिया कुण्ड क्षेत्र में मौलवी फकरूद्धीन की दरगाह के पूर्व यह मस्जिद स्थित है। इस मस्जिद की लंबाई 37 फुट एवं चौड़ाई 90 फुट है। इस मस्जिद के निर्माण काल का प्रमाण इसकी छत पर फारसी में लिखे एक लेख सक मिलता है। यह लेख फिरोजशाह के समय का है। लेख के अनुसार सन् 777 हिज्री तथा सन् 1326 ई0 में जिया अहमद ने इस मस्जिद का निर्माण करवाया था। मुस्लिम त्यौहारों के दौरान काफी संख्या में नमाज अदा करने वाले मस्जिद में पहुंचते हैं।

लाट भैरव की मस्जिद – इस मस्जिद का निर्माण मुगल बादशाह औरंगजेब ने करवाया था। इस मस्जिद के पास एक चबूतरे एवं कब्रिस्तान में काफी संख्या में नक्काशीदार पत्थर लगे हुए है। उन पत्थरों पर तांबे की परत चढ़ाई गई है।

 लाल खाँ का रौजा (मकबरा)

लाल खाँ का रौजा (मकबरा)
लाल खाँ का रौजा (मकबरा)

लाल खाँ का मकबरा काशी में मुगल काल के दौरान बनाई गयी मकबरों में से एक है। इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (IGNCA) के अनुसार लाल खाँ मुगलकाल में फर्रूखसियर के शासन काल में काशी के स्थानीय शासक थे। संभवतः जिनका महल राजघाट के समीप गंगा के तट पर था, जो अब लाल घाट के नाम से प्रचलित है। जबकि कुछ लोगों का मानना है कि लाल खाँ, काशी नरेश बलंवत सिंह के सिपहसालार थे, और उन्होंने काशी राज के सामने यह इच्छा जाहिर की थी कि मरने के बाद भी वह रामनगर स्थित किले का दीदार कर सकें, अतः राजा बलवंत सिंह ने उन्हें यह जगह प्रदान कर दी। सन् 1770 में बलवंत सिंह का स्वर्गवास हो गया। तत्कालीन काशी नरेश ने 1773 में पूर्वजों के सम्मान के लिये इस मकबरें का निर्माण कराया। इनका मकबरा राजघाट पुल (मालवीय ब्रिज) के पास आज भी है। मुगलकालीन स्थापत्य एवं वस्तु कला का सुन्दर स्वरूप इस मकबरे पर स्पष्ट दिखलाई पड़ता है। एक आयताकार भूभाग पर स्थित इस गुम्बदाकार रौजे (मकबरा) के चारों ओर समान दूरी पर चार बुर्ज बने हुए हैं, जिसमें से एक बुर्ज शेरशाह सूरी राजमार्ग बन जाने के कारण सड़क के दूसरी ओर चला गया। रौजा परिसर की बुर्ज तो ठीक-ठाक है पर सड़क के दूसरी ओर स्थित बुर्ज को मरम्मत की आवश्यकता है। गुम्बदाकार विशाल मकबरे को रंगीन ग्लेज्ड टाइल्सों से सजाया गया है तथा रौजे के प्रवेश द्वार पर उर्दू में कुछ लेखांकन भी है। वर्तमान में यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के संरक्षण में है। कुछ समय पूर्व खुदाई के दौरान यहां काशी के प्राचीन समय के कुछ अवशेष प्राप्त हुए थे। कैण्ट स्टेशन से लगभग 6 किलो मीटर की दूरी पर यह मकबरा स्थित है। सूर्योदय से सूर्यास्त तक यह आम लोगों के लिए खुला रहता है तथा रविवार को बन्द रहता है।

 काशी में मजार (कब्र)

काशी सर्वधर्म सद्भाव की नगरी है, जहाँ सभी धर्मो को समान सम्मान मिलता है| पूरे शहर में विभिन्न सूफी-संतो, पीर-फकीरों व शहीदों का मजार है। शहर के चारों दिशाओं में चार मजार ऐसे हैं जो शहर को आफतों, बलाओं एवं परेशानियों से सुरक्षित रखते हैं। पूर्व कि ओर हजरत चंदन शहीद, पश्चिम में शहीद तैयब बनारसी (मण्डुआडीह), उत्तर में हजरत बहादुर शहीद (कैण्ट) तथा दक्षिण में हजरत याकुब शहीद (नगवा), जो अपनी पाक निगाह समाज पर बनायें रखते है।

चन्दन शहीदचन्दन शहीद ग्यारहवीं शताब्दी में सैयद सालार मस़ऊद गाजी ने अपने शासन काल में वाराणसी का दायित्व अपने प्रतिनिधि के तौर पर मलीक अफजल अल्वी को सौपा, मलीक अफजल ने अपने कुछ साथियों के साथ वाराणसी तथा आस-पास के जिलों में इस्लाम का प्रचार और तत्कालीन हालात से शासन को अवगत कराते, जिनमें से चंदन शहीद भी एक थे। जो रिश्ते में मलीक अफजल के भाई लगते थे। चन्दन शहीद का जन्म काबुल में हुआ था। वाराणसी में ये राजघाट के पास गंगा और वरूणा के संगम के तट पर निवास करते थे और इलाके के हालत से स्थानीय शासक मलीक अल्वी को अवगत कराते थें। ऐसा माना जाता है कि राजघाट पर स्थित राजा बनार का किला इन्हीं के वजह से फतह हुआ था, और इसी लड़ाई में चन्दन शहीद शहादत को प्राप्त हुये थे। मौलाना सलीमुल्लाह की ‘बनारस के तारीखी मकबरे’ के अनुसार सन् 1194 को ये शहादत को प्राप्त हुये थे। वाराणसी में शहादत स्थल पर इनका मजार बना हुआ है, जहाँ प्रतिदिन चन्दन शहीद मस्जिदअकीदतमदों का आना होता है, जुमेरात(गुरूवार) को अकीदतमंद विशेष रूप से हाजिरी लगाते हैं, जिसमें हिन्दू-मुस्लिम समान रूप से शरीक होते है। पूरे इलाके में कई कब्रे देखने को मिलती हैं, मजार से सटा हुआ एक मस्जीद भी है। हर साल सब-ए-बारात के सोलह तारीख को बाबा के उर्स का आयोजन होता है, जिसमें दूर-दूर से लोग आते है, यह मजार साम्प्रदायिक सौहार्द का भी एक प्रतीक है जहां हिन्दू व मुसलमान समान रूप से दर्शन को आते हैं। सन् 1984 में मजार वाले स्थान का जिर्णोद्धार हुआ था। वर्तमान में मजार की देख-रेख मौलाना जलालुद्दिन कर रहे हैं। वह बताते है कि उनकी पिछली तीन पीढ़ी भी बाबा के सेवा में लगे हुये थे और आने वाली पीढ़ी से भी वह अपेक्षा रखते हैं कि यह परम्परा ऐसी ही चलती रहे।

हज़रत बहादुर शहीद का मजार – हजरत बहादुर शहीद सच्चे नेकदिल इंसान थे, वे अल्लाह में निहायत ही विश्वास रखते थे। बहादुर सहीद मलीक अफजल अलवी के भाई थे तथा अफजल अल्वी ने इन्हें वर्तमान में सदर बाजार के इलाका का दायित्व सौंपा था। इनका मजार भी सदर बाजार में स्थित है। सामाजिक न्याय के समन्वय को इन्होंने बखूबी अंजाम दिया। मुस्लिम एवं गैर मुस्लिम दोनों में इनके करिश्में एवं करामात मशहूर थे जिसके कारण इनके यहां अकीदतमंदों की जियारत के लिए भीड़ लगती थी। वर्तमान में उनके मजार पर भी यह सिलसिला चालू है। लोगों का विश्वास है कि यहां मांगी गयी मुरादें, मन्नतें जरूर पूरी होती है। रबि-उल-अव्वल (अरबी महीना) की नौवी तारीख को मजार पर सालाना उर्स मनाया जाता है। उर्स के दौरान तीन दिनों तक यहां मेले का आयोजन होता है मेले में इतनी भीड़ होती है कि यहां पैर रखने का जगह मिलना भी मुश्किल होता है। दूर-दूर के पीड़ित, मुसीबत के मारे परेशान लोग यहां अपने दुःखों से छुटकारा के लिये मन्नते एवं दुआ करने आते हैं जिसमें मुस्लिम एवं गैर मुस्लिम दोनां होते हैं। उर्स के दौरान अकीदतमंदो द्वारा कुरान शरीफ का पाठ, चादर चढ़ाना एवं महफीलों में कव्वालियों आदि कार्यक्रम चलता रहता है।

हज़रत याकूब का मजार – मलिक अफजल अल्वी ने तत्कालीन समय में वाराणसी में अपने जिन सिपहसालारों को जिम्मेदारी दी थी उनमें से एक थे- हज़रत याकूब शहीद। रिश्ते में यह भी अफजल अलबी के भाई लगते थे। इन्हें भी इलाके की पहरेदारी एवं इस्लाम धर्म के प्रचार की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी। इनका मजार लंका स्थित नगवा मुहल्ले में है। ऐसा माना जाता है कि शिवाला से लेकर मदनपुरा तक जो मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र आबाद है वह इनकी ही देन है। यह मजार इसलिए भी अन्य मजारों से अलग है कि यहां आस-पास दूर तक गैर मुस्लिम इलाका है। मजार से सटा हुआ एक मस्जिद है जहां सुफी-संतों, मल्लंगों की मजारे सांप्रदायिक सौहार्द की प्रतीक होती है। वही यह मस्जिद विभिन्न मुस्लिम उपसंप्रदायों जैसे-हनफी, मलिकों, हम्बली, शाफई एवं अन्य के आपसी सौहार्द का सुन्दर उदाहरण है। यहां काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में कार्यरत मुस्लिम कर्मचारी एवं छात्र नमाज अदा करने आते हैं। हजरत याकूब के जो भी करिश्में रहे हो परन्तु अल्लाह ने उन्हें आपसी सौहार्द का जरिया बनाया है।

 – धीरज कुमार गुप्ता

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