गंगा आरती

शिव नगरी काशी को आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक समृद्धि प्रदान करने वाली जीवनदायिनी-मोक्षदायिनी पतित पावनी माँ गंगा की आराधना काशीवासी अपने अनोखे अंदाज में करते हैं। यह आराधना पूरे विश्व में ‘गगा आरती’ के रूप में विख्यात है प्रतिदिन सूर्यास्त के पश्चात गोधुलि बेला में काशी के अधिकतर घाटों पर ‘गंगा आरती’ का आयोजन होता है, परन्तु दशाश्वमेघ घाट पर होने वाली गंगा आरती अद्भुत है। आरती के लिये घाट की सिढ़ियों पर विशेष तौर से चबूतरो का निर्माण कराया गया है। चबूतरों पर पाँच-सात-ग्याहर की संख्या में प्रशिक्षित पण्डों द्वारा घण्टा-घड़ियाल एवं शंखों के ध्वनि के साथ गंगा की आरती एक साथ सम्पन्न की जाती है। इन पण्डों की समयबद्धता इतनी सटीक होती है कि झाल आरती पात्र (हर पात्र में 108 दीप होते हैं), से आरती, पुष्प वर्षा एवं अन्य क्रिया एक समय में एक साथ होता है।

इस मनोरम दृश्य का आनन्द लेने एवं आरती में सहभागी बनने के लिये देशी-विदेशी सैलानी एवं स्थानीय लोगों का आगमन घाट पर होता है। दर्शक घाट की सिढ़ियों एवं नौकाओं से इस आराधना का साक्षी बनने के लिये उत्सुक रहते हैं। आरती के समय दर्शक भाव विभोर होकर माँ गंगा की वन्दना की धारा में प्रवाहमान होते हैं।

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