स्वतंत्रता सेनानी

रानी लक्ष्मी बाई

झांसी की रानी लक्ष्मी बाईजब भी बात नारी सशक्तिकरण की होगी तो महिलाओं के लिए आदर्श नाम झांसी की रानी लक्ष्मी बाई का होगा। चाहे वह बहादुर महिला की आदर्श के रूप में हों या किसी कमजोर महिला की प्रेरणा के लिए हर जगह उनके शौर्य की गाथा गायी जाती रहेगी। अपने अदम्य शौर्य, साहस एवं आत्मविश्वास के बल पर रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिये। अपने अप्रतिम कार्य से भारत की यह बहादुर बेटी भारतीय इतिहास में सदा के लिए अमर हो गयी। प्रायः लक्ष्मी बाई का नाम आते ही जेहन में झांसी का ही ध्यान आता है। झांसी के किले से नारी के उस रूप का लक्ष्मीबाई ने प्रदर्शन किया जो खासकर भारत में एक नियम दायरे और रूढ़ियों की बेड़ी में जकड़ी अपने को दीन-हीन दुर्बल अबला समझती थी। लेकिन लक्ष्मीबाई ने भारत में महिलाओं के लिए बनायी गयी पूरी परिभाषा ही बदल कर रख दी। उन्होंने न केवल महिलाओं के लिए बल्कि उन सभी को ऐसी राह दिखायी जिस पर चलकर अपने को शौर्यवान और मजबूत बनाया जा सकता है। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दीपक में अपने बलिदान से लक्ष्मी बाई ने ऐसी लौ जलाई जो भारत को स्वतंत्र कराने तक जलती रही। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी अमिट छाप छोड़ने वाली रानी लक्ष्मी बाई की उम्र बेहद छोटी रही। कहा भी जाता है कि बड़े काम छोटी उम्र में ही किये जाते हैं। इस कहावत को रानी लक्ष्मी बाई ने चरितार्थ कर दिया। मात्र 23 वर्ष की छोटी सी उम्र में उन्होंने वह कर दिखाया जिसे बिरले ही करते हैं। वैसे तो लक्ष्मी बाई का ज्यादातर समय झांसी में ही व्यतीत हुआ। लेकिन उनका घनिष्ट जुड़ाव काशी से रहा। यदि उन्हें झांसी की रानी कहा जाता है तो काशी की बेटी के रूप में भी जाना जाता है। क्योंकि देश की इस वीर पुत्री का जन्म काशी के इस पावन भूमि पर ही हुआ है। इनका जन्म 19 नवम्बर 1835 ई0 को वाराणसी के भदैनी स्थित मराठी परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम मोरोपंत तांबे एवं माता का नाम भागीरथी बाई था। बचपन में इनका नाम मणिकर्णिका था प्यार से इन्हें लोग मनु भी बुलाते थे। छोटी सी मनु आस-पास के सभी लोगों की दुलारी थी। जब मनु मात्र 4 वर्ष की थी तभी उनकी माता भागीरथी बाई का निधन हो गया। जिसके बाद मनु के पिता उन्हें लेकर झांसी चले गये। वाराणसी में जिस स्थान पर मनु का जन्म हुआ और कुछ वर्ष बिताया वह स्थान आज हमारे लिए दर्शनीय स्थल बन चुका है। कुछ वर्ष पहले तक लक्ष्मी बाई की जन्म स्थली सरकारी उपेक्षा की शिकार रही लेकिन पिछले साल 2013 में इस स्थान का कायाकल्प हुआ। प्रदेश सरकार ने सरकारी बजट से लक्ष्मी बाई जन्म स्थली को बेहतरीन रूप दे दिया है। लक्ष्मी बाई के जन्म स्थली के उस पावन स्थान को जहां देश की इस वीरांगना की किलकारियां गूंजी थी बेहद आकर्षक बना दिया है। खुले आसमान के नीचे पूरे परिसर को गुलाबी रंग के पत्थरों से बनाया गया है। जिसके मध्य में रानी लक्ष्मी बाई की घोड़े पर बैठी हाथ में तलवार लिये अंग्रेजों को ललकारती सुनहरे रंग की विशाल एवं आकर्षक प्रतिमा स्थापित है। इस मूर्ति के पीछे पत्थर की दीवार पर लक्ष्मीबाई से जुड़े कई घटनाओं को चित्र के रूप उभारा गया है। जैसे- मनु का बाल गंगाधर राव से विवाह, बाजीराव पेशवा की देख-रेख में प्रशिक्षण लेती मनु, दामोदर राव को गोद में लिये लक्ष्मी बाई, अंग्रेजों द्वारा दामोदर को झांसी का उत्तराधिकारी न स्वीकार किया जाना, गंगाधर राव के देहावसान पर शोकाकुल बैठीं लक्ष्मीबाई के चित्र दीवारों पर उभारे गये हैं। जिन्हें देखने से ऐसा लगता है जैसे उक्त घटनायें सामने घटित हो रही हैं। पार्कनुमा बने इस स्थान के बाहर गेट लगा हुआ है। इस स्थान को देखने काफी संख्या में लोग आते रहते हैं। अस्सी चौराहे से करीब आधा किलोमीटर दूर स्थित यह स्थान भदैनी बी0 1/190-91 में है। इस स्थान से तुलसी घाट एवं अस्सी घाट दोनों नजदीक हैं। अस्सी चौराहे के पास लक्ष्मी बाई जन्म स्थली तक जाने के लिए बोर्ड भी लगा हुआ है।

स्वतंत्रता संग्राम में काशी

स्वतंत्रता के छः दशकों के बाद वर्तामन में जब हम अपने राष्ट्र के 200 वर्षों के पराधीनता के समय को देखते हैं तो हमें यह अभास होता है कि अंग्रेजी शासन के विरूद्ध भारत के प्रायः हर एक भाग एवं शहरों में जन आन्दोलन एवं विद्रोह हुये थे, इन विद्रोह में कुछ प्रमुख एवं कई स्थानीय स्तर पर अंकित एवं छोटे स्थानीय समूहों के द्वारा किया गया था। बड़े विद्रोहों का तो ऐतिहासिक लेखा जोखा मिल जाता है परन्तु किसी शहर केन्द्रित स्थानीय विद्रोहों का उस स्थान के तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं, सरकारी पत्रावलियों एवं कुछेक का लोक गाथाओं में उल्लेख मिलता है। शहर बनारस में अंग्रेजी शासन के विरूद्ध कई विद्रोह हुये उनका क्रमवार उल्लेख आगे है।

1774 ई0 में अवध के नवाब सुराजुद्दौला के मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र आसफउद्दौला गद्दी पर बैठे एवं ईस्ट इण्डिया कम्पनी से नये बन्दोबस्त के अनुसार राजा चेतसिंह के नाम जो भू-भाग था उन पर मालिकाना हक इस्ट इण्डिया कम्पनी का हो गया एवं 1776 ई0 में राजा चेतसिंह को कम्पनी की तरफ से एक पत्र मिला जिसमें कोई ऐसी शर्त नहीं थी जिससे निश्चित मालगुजारी कभी बढ़ाई जा सके। गर्वनर जनरल वारेन हेस्टिंग्स एवं राजा चेतसिंह के बीच कम्पनी शासन के शुरूआत से ही वैमनस्यता बनी रही एवं विभिन्न कारणों से यह मन-मुटाव बढ़ता ही रहा एवं हेस्टिंग्स ने भी राजा को तंग करने की ठान रखी थी। इन्हीं परिस्थितियों में कटुता अपने चरम पर पहुँच गयी। 15 अगस्त 1781 को वारेन हेस्टिंग्स बनारस आये एवं 16 अगस्त को भकिहम को हुक्म दिया की वे राजा चेत सिंह को शिवाला घाट पर स्थित महल में गिरफ्तार करके रखा जाये एवं राजा की गिरफ्तारी के पश्चात वहाँ लेफ्टिनेंट स्टाकर, स्काट एवं साइक्स रखे गये, स्काट के साथ फौज की दो कम्पनी भी थी।

भकिहम ने अपने एक चोबदार चेतराम को राजा के पास पत्र लेकर भेजा कि हेस्टिंग्स उनके पत्र से खुश है, परन्तु चेतराम के द्वारा राजा चेत सिंह के साथ बदतमीजी से पेश आता देख कर मनियार सिंह ने चेतराम को ललकारा एवं इसी शोर गुल में बाहर गोलियां चलने लगी एवं चेतराम राजा चेत सिंह से लपट पड़ा। इस पर ननकू सिंह नजीब ने चेतराम के दो टुकड़े कर दिये एवं राजा के आदमी उन दो कम्पनी के सिपाहियों पर टूट पड़े एवं उन्हें अफसरों सहित मार गिराया। शिवाला घाट के लड़ाई में कम्पनी के बयासी आदमी मारे गये एवं तिरानबे सिपाही घायल हुये थे।

राजा चेत सिंह को मनियार सिंह ने सलाह दी की वे तुरंत माधोदास की बाग में जाकर वारेन हेस्टिंग्स को गिरफ्तार करें परन्तु बक्सी मदाक्त के सलाह पर वो रामनगर भाग गये यही वे उस समय हेस्टिंग्स पर हमला कर देते तो शायद भारत का इतिहास और कुछ होता। शिवाला घाट पर चेतसिंह के किले के गेट के सामने सफेद संगमरमर पर एक शिला लेख है जिसमें लिखा है कि – THIS TABLET HAS BEEN ERELTED BY THE GOVT OF THE UNITED PROVINCES TO PRESRVE THE LAST EARTHLY RESTING PLACE OF LIEUTT ARCH SOTT IS ATTALION SEPNS “JARSYMES 2nd” “J STALRER RESD BODY GURRD WHO WERE WILLED WITH 200 SEPOYSAVG 17TH 1781 NEAR THIS SPOT DOING THEIR DUTY” वर्तमान में लहुराबीर में जहाँ I.M.A. भवन है वहीं इन सिपाहियों को दफनाया गया था एवं वर्तमान I.M.A. भवन के निर्माण के समय इन कब्रों को अन्यत्र स्थानान्तरित किया गया था।

आसफउद्दौला के मृत्यु के पश्चात अवध के गद्दी के लिये दो प्रतिस्पर्धी हुये एक वजीर अली एवं दूसरे सआदत अली वजीर अली कुछ दिनों तक अवध के नवाब बने एवं उन्हें उनके खराब चाल-चलन की वजह से पदच्यूत होना पड़ा एवं सआदत अली को गद्दी सौंपी गई एवं वजीर अली को बनारस में डेढ़ लाख सालाना का पेन्शन देकर माधोदास की बगिया में रखा गया। वजीर अली की हैसियत उस समय एक साधारण नागरिक की ही थी। परन्तु अपने ठाट-बाट, हथियार बन्द सिपाहियों को साथ लेकर चलते एवं अधिकारियों की बात न मानने बनारसियों पर यह प्रभाव डालते थे कि वे स्वतंत्र राजा हैं।

1755 के जनवरी में वजीर अली को बनारस छोड़ कर कलकत्ता जाने का आदेश दिया गया, उस समय बनारस में प्रमुख अफसर थे मि0 चेशी जो गर्वनर जनरल के प्रतिनिधि एवं मि0 डेविस बनारस के जज और मजिस्ट्रेट, वजीर अली ने मि0 चेरी के घर पर जा कर उन पर आक्रमण कर चेरी इनके सेक्रेटरी मि0 इवांस एवं कैप्टन कानवें को भार डाला। इसके बाद वे मि0 डेविस के घर पर हमला बोले परन्तु मि0 डेविस बच गये इसी बीच शहर में विद्रोह शुरू हो गया कुछ अंग्रेज सिपाहियों को मार डाला गया एवं बनारस के कुछ अंग्रेजों के घर पर आग लगा दी गयी परन्तु शाम होने तक शहर में पुनः अंग्रेजों का अधिकार हो गया था, वजीर अली के साथी फौज का मुकाबला करते हुये मारे गये एवम् वजीर अली आजमगढ़ होते हुये बेतौल की ओर भाग गये, वजीर अली के प्रमुख सहयोगी के रूप में जगतगंज के जगत सिंह भवानी शंकर, शिवदेह चितईपुर के एवं शिवनाथ सिंह ब्रह्मनाल में रहते थे। जगत सिंह एवं भवनी शंकर को मृत्युदण्ड दिया गया, परन्तु शिवनाथ सिंह ने अपने सहयोगी बहादुर सिंह, के साथ अपने मकान को अंग्रेज सिपाहियों द्वारा घेरे जाने को देखकर चौबीस घण्टे तक अपने को एक कमरे में बन्द रखा एवं उसके बाद अपने साथियों सहित निकलकर कई सिपाहियों को मारने एवं घायल करने के पश्चात् लड़ते हुये अपने प्राण त्यागे। ब्रह्मनाल में सब्जी मंडी के पीछे, तारा मन्दिर के सामने इनके याद में एक चौरा बना है, वर्तमान में लोग इनका नाम तो भूल गये हैं परन्तु यह याद करते हैं कि इसी जगह पर किसी वीर ने अंग्रेज सिपाहियों से लोहा लिया था, इनका श्रृंगार होली के दिन शाम को होता है।

पुनः 1810 ई0 में कम्पनी सरकार ने बनारस में गृहकर (भवन कर) लगाया, बनारसवासी गृहकर का कभी नाम नहीं सुने थे अतः उन्हेंने इस कर के विरूद्ध सामूहिक धरना देने का मन बनाया एवं इसके लिये बड़ी तैयारियाँ की गयी। बनारस के तीन लाख लोग आग जलाने की शपथ लेकर अपना काम-काज छोड़कर अपने मकानों को बन्दकर के मैदान में बैठ गये। सरकारी अधिकारी जनता को मनाने के लिए अनेक प्रयास किये एवं अन्त में सरकार को झुकना पड़ा एवं बनारस की जनता को फाटक बन्दी, चौकीदारी और फाटकों के मरम्मत के खर्च को कर के रूप में लेने के खर्च से मुक्त कर दिया गया, धार्मिक स्थलों एवं निर्धनों को भी इस कर से मुक्त कर दिया गया। इसी क्रम में भंगर भिक्षुक जो कम्पनी के कानून को ढेंगे पर रखते थे, इनके गिरफ्तारी पर कम्पनी ने पाँच सौ रूपये का इनाम रखा था, एक बार भंगर भिक्षुक के कटेसर से लौटते समय गिरफ्तार करने की नियत में सिपाहियों ने जब इन्हें घेरा तो भिक्षुक भागकर अपने त्रिलोचन घाट पर स्थित मंढ़ी में जा छुपे जो भी सिपाही इन्हें पकड़ने जाता वह जिन्दा नहीं बचता अंत में लकड़ी मंगवा कर उस मंढ़ी के मुँह में एवं चारो तरफ लकड़ी रख कर आग जलवा दी गयी जिसमें भंगर भिक्षुक जल कर भष्म हो गये।

1852 ई0 में शहर बनारस में पुनः गड़बड़ी फैली पहला आफवाह यह फैला कि जेल में हिंदू कैदियों के भोजन में परिवर्तन से उनका धर्म भ्रष्ट हो जायेगा, एवं बनारस की फाटक बन्दी तोड़ना एवं साँड़ो को पकड़वाकर कानीहौद में बन्द करना था, जिसका विरोध ‘गगर बन्धु’ कर रहे थे यही दोनों कारणों से शहर में आफवाह का बाजार गर्म हो गया एवं बनारस के सभी दुकान, बजार बन्द हो गये। नाटी इमली में बनारस के कलक्टर मि0 गाबिस एवं कोतवाल पं0 गोकुलचंद ने सभी को इकट्ठा कर समझाना चाहा परन्तु लोग इन पर गौरेथ्या (यहीं का चिलम) फेकना शुरू किया एवं धीरे-धीरे बलवा बढ़ता गया, तीन दिनों तक बजार बन्द रहे एवं अलग-अलग स्थानों पर काशी की जनता इकठ्ठा हो कर विरोध प्रदर्शन करती रही एवं चार दिन के बाद बिना किसी विशेष नुकसान के यह झगड़ा समाप्त हो गया, बनारस के इतिहास में इस विद्रोह को ‘गौरेय्याशाही’ के नाम से जाना जाता है।

1857 के गदर में जब पूरा उत्तर भारत जल रहा था तो बनारस में इस आग के कुछ चिनगारियां ही गिरी, देसी सिपाहियों ने एक जून को खाली की गयी बैरकों में आग लगा दी एवं चार जून को जब देसी सिपाहियों से हथियार ले लेने के इरादे से इन्हें परेड पर बुलवाया गया तब अंग्रेजों को अपनी तरफ बन्दूक लेकर आता देख सिपाही भड़क गये एवं अपने अफसरों पर गोलियां चलानी शुरू कर दी इसी की देखा-देखी 13 जून पल्टन में भी विद्रोह हो गया, परन्तु जल्दी ही कनेल नाइल के अगुवाई में इस विद्रोह को ठंडा कर दिया गया, छावनी में गोलियों की आवाज सुनकर शहर में गड़बड़ी फैल गयी, कुछ अंग्रेज अफसर कचहरी के छत पर इकट्ठा होकर अपना बचाव करना चाह रहे थे। उसी समय इस अफसरों पर सिकरत सिपाही हमला करने वाले थे, परन्तु शहर में राजनैतिक शरणार्थी सरदार सुरजीत सिंह ने सिक्ख सिपाहियों को एक आक्रमण को करने से रोक लिया इस कार्य में इनके साथी जजी के नजीर पं0 गोकुलचंद भी थे।

बनारस शहर में फिर शान्ति बनी रही इस कार्य में मि0 लिड ने राजपूतों की सहायता को थी एवं बनारस के सिपाही विद्रोह से बचाने के श्रेय मुख्यतः महाराज बनारस एवं देवनारायण सिंह को जाता है। गदर के दौरान तरह-तरह के आफवाह फैलने एवं अलग-अलग तरफ से आक्रमण की सूचना को देखते हुये शहर में जून से फौजी कानून लागू किया गया एवं राजघाट तक किलेबन्दी कर दी गयी थी इसका प्रमाण हमें आदिकेशव घाट पर लगे एक शिलालेख से लगता है जिसमें लिखा है कि जून आदिकेशव मन्दिर में पूजा आरम्भ 1863 से शुरू हुआ इसके पहले सुरक्षा कारणों से यह बन्द था।

रामहल्ला

हिन्दू भाइयों रामजी का मन्दिर खोदा जा रहा है, आप लोग चलिये “टन-टन, टन-टन, टन-टन………..” पण्डित विजयानन्द तिवारी घण्टा बजाते हुये, हिन्दूओं को ललकारते हुये भदैनी की ओर चल पड़े। यह घटना थी 15 अप्रैल 1851 ई0 की बनारस में पानी कल के स्थापना के समय की यह घटना है। पहले पानी कल का पम्पिंग स्टेशन राजघाट के मैदान में बनने वाला था परन्तु फिर इरादा बदल कर भदैनी मुहल्ले में बनाना स्थिर हुआ। जो स्थान भदैनी में चुना गया वहां भगवान रामचन्द्र जी का एक मन्दिर पड़ता था जिसे 1820 ई0 में बाबू गोबर्द्धन दास गुजराती ने बनवाया था। मयूनिसिपल बोर्ड का विचार था मन्दिर को अन्यत्र स्थानान्तरित कर दिया जाये इस के विरोध में रामहल्ला हुआ था। हजारों लोगों की भीड़ इकट्ठी थी भीड़ आवेग में आकर नयी बनी दीवार तोड़ दी, गड्ढे पाट दिये गये, बहुत सी पाइपों को तोड़ दिया गया, एक बड़ा सा पम्पिंग इंजन खड़ा था उसे तोड़कर गंगा जी में फेंक दिया गया, काली बाबू बंगाली एवं बाबू बैजनाथ दास मशीन को अधिक से अधिक क्षति पहुंचाने की जुगत लगा रहे थे। बाबू गोबर्धन दास, बाबू गोपाल दास, बाबू रघुनाथ दास, बाबू लक्ष्मन दास, पं0 सुखनन्दन उपाध्याय, पं0 रामेश्वर दत्त ज्योतिषी मुंशी गिरजा प्रसाद भीड़ का नेतृत्व करने लगे। इसके पश्चात् शहर भर में बलवा फैल गया कई घरों में लूटपाट करती हुई भीड़ रियुनिरूपत्ती के लालटेनों को तोड़ती हुई विश्वेश्वरगंज के बड़ा तार घर में पहुँचकर तोड़-फोड़ लूटपाट किया। राजघाट रेलवे स्टेशन पर भी एक बड़ी भीड़ ने हमला कर स्टेशन के खिड़की, दरवाजे, फर्नीचर, तार, सिगनल आदि की मशीनों को नष्ट कर दिया, पसिलों एवं दूसरे अरूबाब लूट लिये गये। परन्तु फिर शाम ढलने तक सेना का शहर पर कब्जा हो गया। बहुत दिनों तक बलवे का मुकदमा चला कुछ की 10-20 वर्ष की उम्र कैद कुछ को 30 बेत की मार, बाबू गोबर्धन दास को 3 साल सपरिश्रम कैद 25000 रू0 जुर्माना, बाबू गोपाल दास 3 वर्ष कैद 10000 रू0 जुर्माना, मुंशी गिरजा प्रसाद को 3 वर्ष सख्त कैद 3000 रू0 जुर्माना, बाबू लक्ष्मण दास को 3 वर्ष 3 महीने की कैद 5000 रू0 जुर्माना, पण्डित रामेश्वर दत्त ज्योतिषी एवं पं0 सुखनन्दन उपाध्याय को 3 वर्ष कैद 3 महीने टनदाई एवं 1000 रू0 जुर्माना, बाबू रघुनाथ दास को 3 वर्ष कैद 3 माह टनहाई की सजा जिला जज के यहाँ हुई। रामहल्ला के पश्चात् बनारस में करीब 15-20 वर्षों तक कोई स्वदेशी आन्दोलन नहीं हुआ था। 109 दिसम्बर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 20वाँ अधिवेशन बनारस में होता है। बनारस कांग्रेस की अध्यक्षता गोपाल कृष्ण गोखले करते हैं एवं इसी मंच से पहली बार ‘स्वदेशी’ एवं ‘बहिष्कार’ का वकालत करते हैं एवं इसे कलकत्ता कांग्रेस 1506 में स्वीकृत किया जाता है।

पुनः 1908 में बंगाली टोला स्कूल के छात्र शचीन्द्रनाथ सान्याल ने अनुशीलन नामक एक संस्था का गठन किया था। बाद में इसका नाम बदलकर ‘यूवसंघ’ था। Youngmens Association रखा गया। इसी बीच 1914 में लार्ड होर्डिग्स पर बम फेकने के मुख्य आरोपी रास बिहारी बोस बनारस के गणेश मुहल्ले में अज्ञातवास में रहे। बनारस में अज्ञातवास के दौरान ही रास बिहारी बोस से शचिन्द्र नाथ सान्याल ने अमेरिका के गदर दल के नेता विष्णुगणेश पिंले से परिचय करवाये थे। इस समय प्रायः सारे उत्तर भारत में गुप्त सभायें, बम बनाने, बंदूक चलाने आदि की शिक्षा गुप्त रूप से दी जा रही थी।

इन कार्यों के लिये स्वतंत्रता सेनानियों को धन की आवश्यकता हुई, जिसके परिणाम स्वरूप इन डाउन सहारनपुर लखनऊ पैसेंजर ट्रेन को काकोरी स्टेशन से कुछ दूर अलार्म चेन खींचकर रोका गया एवं रेलवे के टिकट बिक्री के चार हजार रूपये आन्दोलनकारियों ने लूट लिये। इसके पश्चात् पूरे संयुक्त प्रदेश में पुलिस ने जबर्दस्त अभियान चला कर चालीस से ऊपर लोगों को गिरफ्तार किया था जिसमें काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र राजकुमार सिंह के गिरफ्तारी के समय उनके कमरे से एक राइफल एवं “दि रिव्योलेशनरी’ पुस्तकों का बन्डल मिला। बनारस से जो लोग गिरफ्तार हुये उनके नाम एवं सजा निम्नलिखित है।

1.  शचीन्द्र नाथ सान्याल        –      कालापानी

2.  राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी        –      मृत्युदंड

3.  शचीन्द्र नाथ बख्शी          –      कालापानी

4.  मन्यथ नाथ गुप्त           –      कारावास

5.  डि0डि0 महाचार्या           –     कारावास

6.  चन्द्रशेखर आजाद           –     पुलिस गिरफ्तार नहीं कर पायी इलाहाबाद में शहीद

7.  मुकन्दलाल                –      कारावास

8.  इन्द्र विक्रम सिंह           –      कारावास

9.  राम नाथ पाण्डे             –      कारावास

10. से0 दामोदर स्वरूप         –      कारावास

इन्हीं राजनैतिक कारणों से बंगाली टोला स्कूल के जिन अध्यापक एवं छात्रों को जो सजा मिली उनके नाम का फलक डॉ0 सम्पूर्णानन्द जी ने 1954 ई0 में अनावरण किये थे।

1.  सुशील कुमार लाहिड़ी        –      अध्यापक – मृत्युदंड

2.  शचीन्द्र नाथ सान्याल        –      छात्र – कालापानी

3.  सुरेश चन्द्र महाचार्या         –      छात्र – कारावास

4.  जितेन्द्र नाथ सान्याल        –      छात्र – कारावास

5.  प्रियनाथ महाचार्य           –      छात्र – कारावास

6.  सुरेन्द्र नाथ मुखर्जी          –      छात्र – कारावास

7.  रविन्द्र नाथ मुखर्जी          –      छात्र – कारावास

8.  विभूति भूषण गांगुली        –      छात्र – कारावास

9.  विजय नाथ चक्रवर्ती         –      अध्यापक – बनारस से निर्वासन

10. रमेश चन्द्र जोआरदार        –      अध्यापक – बनारस से निर्वासन

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मणिन्द्र नाथ बनर्जी

इस राजनैतिक अत्याचार के फलस्वरूप पाण्डे घाट निवासी बिप्लवी मणिन्द्र नाथ बनर्जी ने, राय बहादुर जितेन्द्र नाथ बनर्जी जो की वाराणसी के पुलिस सुपरिंडेंह थे, पर जंगमबाड़ी के पास गोली चलाई थी, परन्तु वे बच गये एवं मणिन्द्र नाथ बनर्जी पकड़े गये इनको फतेगढ़ जेल में रखा गया जहाँ संयुक्त प्रदेश के राजनैतिक कैदियों से दुर्व्यवहार के विरूद्ध अनशन करके इन्होंने अपने प्राण मातृभूमि को समर्पित किये थे।

1928 ई0 में साइमन कमिशन के वाराणसी आगमन को गुप्त रखा गया था एवं उनके आने की तिथि शिवरात्रि के दिन रखा गया था, कार्यक्रम यह था कि साइमन राजघाट स्टेशन पर उतर कर नाव से बनारस भ्रमण करेंगे, परंतु जैसे ही वे काशी स्टेशन पर उतरे गोविन्द मालवीय के नेतृत्व में एक जुलूस साइमन कमीशन वापस जाओ के नारे लगाते हुये उन्हे काले झण्डे दिखलाये, बाद में उन्हें किसी तरह चौक थाने में लाकर भीड़ से बचाया गया था।

1930 ई0 के 6 अप्रैल को बनारस में हुजूम सोनिया तालाब पर इकठ्ठा हुआ था, इस आन्दोलन में एक दल में डॉ, सम्पूर्णानन्द जी, स्वामी सत्यानन्द, धर्मदेउ शास्त्री, बैजनाथ सिंह एवं विश्वनाथ सिंह एवं दूसरे जुलूस में जगन्नाथ गिरी, हीरालाल, डॉ0 अमर नाथ बनर्जी एवं अभिमन्यू दल के बनारसी लाल आदि थे।

1931 ई0 नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का प्रथम वाराणसी आगमन हुआ था नेताजी का स्वागत चितंरजन पार्क में अभिमन्यु दल ने एवं उग्रदल में नौजवान भारत सभा ने एक सभा का आयोजन किया था। गांधी आरउइन गोल मेज बैठक के असफल होने पर गांधी जी को गिरफ्तार किया गया जिसके फलस्वरूप बनारस में हड़ताल का आह्वान किया गया, प्रशासन ने वरिष्ठ कांग्रेसी शिव प्रसाद गुप्त, डॉ0 सम्पूर्णानन्द एवं बैजनाथ सिंह को गिरफ्तार किया गया फलस्वरूप शहर में तनाव बढ़ता गया एवं चितरंजन पार्क से एक जूलुस के रूप में नागरिक टाउन हाल की ओर जाने लगे जहाँ पहले से ही अंग्रेज सैनिक एवं पुलिस तैयार खड़ी थी, टाउन हाल में प्रवेश करते समय पुलिस ने गोली चलाई जिससे श्याम मनोहर वहीं पर शहीद हो गये, रामानन्द टिगड़ राय दूसरे दिन गोली लगने से शहीद हुये, बनारसी लाल पाण्डे आर्य एवं रामगती गांगुली के पैर में छर्रे लगे थे।

महात्मा गांधी 2 अक्टूबर 1936 को भारत माता मन्दिर के उद्घाटन के लिये वाराणसी आये थे। इसी समय 1937 में रेणुका मन्दिर से अनुशीलन समिति के विशिष्ठ नेता सीतानाथ डे को वाराणसी पुलिस ने गिरफ्तार किया था। 8 अगस्त 1942 “अंग्रेजो भारत छोड़ो” आन्दोलन के लिये बनारस में एक जुलूस दशाश्मेध से निकल कर डी0एम आवास की ओर बढ़ने लगता हैं। इस जुलूस को रोकने के लिये सैनिक गोली चलाते हैं फलस्वरूप सारे शहर में अफवाह का बाजार गर्म हो जाता है एवं पूरे शहर के सरकारी आफिसों आदि में आग लगा दिया जाता है एवं कुछ सरकारी भवनों पर राष्ट्रीय ध्वज फहरा दिया जाता है।

10 अगस्त को अंग्रेजी सरकार यह तय करती है कि इस आंदोलन में जो भी नुकसान सरकारी तंत्र का हुआ है। वह नागरिकों से वसूला जायेगा, इसका कड़ाई से पालन करने के विरोध स्वरूप पुनः 13 अगस्त 1942 को एक विशाल जुलूस दशाश्वमेध से निकलता है इसको रोकने के लिये जिला मजिस्ट्रेट किनले सैनिकों सहित आ डटते हैं, पुलिस द्वारा लाठी चार्ज के फलस्वरूप इस जुलूस में अव्यवस्था फैल जाती है एवं भगदड़ के दौरान सैनिकों द्वारा गोली चलाये जाने से हीरालाल, बैजनाथ प्रसाद एवं एक बालक शहीद हो जाते है। इसी खबर के परिणाम स्वरूप धानापुर गाँव में जबर्दस्त प्रतिक्रिया होती है एवं धानापुर के वासिन्दे अपने गाँव को कुछ दिनों के लिये अंग्रेजी शासन से मुक्त करवा लेते हैं। इसी बीच आजाद हिन्द फौज से वाराणसी में रामगती गांगुली एवं उनके सहयोगी बसन्त बनर्जी पाण्डे घाट के ट्रांसमिटर के द्वारा सम्पर्क बनाये हुये थे। पूरे देश में इन अलग-अलग आन्दोलन के फलस्वरूप हमें 15 अगस्त 1947 को आजादी प्राप्त होती है।

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