त्यौहार

काशी के प्रमुख त्यौहार


वैसे तो त्यौहार पूरे विश्व में मनाये जाते हैं लेकिन भारत मे त्यौहार लोगों के लिए खास होते हैं। यहां त्यौहारों में रस होता है, नयापन होता है और एक चीज जो सबसे बढ़कर वह है- त्यौहार यहां दूरियों को कम करते हैं और आपसी मेल मिलाप के सूत्रधार भी बनते हैं। इस मायने में धार्मिक नगरी काशी तो सभी को पीछे छोड़ती है। यहां हर दिन नया और त्यौहारमय होता है। आज एक ओर जहां आधुनिकता लोगों पर हावी हो गयी है वहीं काशी में आज भी परम्परा, संस्कृति और सभ्यता की लौ जल रही है। लोग यहां त्यौहारों को सिर्फ औपचारिकता के साथ नहीं मनाते बल्कि आस्था और सम्मान से उसका स्वागत व अभिनंदन करते हैं। एक ओर विदेशों में उत्सव त्यौहार गिने-गिनाये हैं। वहीं भारत के अन्य स्थानों पर त्यौहार कैलेण्डर की अलग-अलग तिथियों पर होते हैं। इन सबसे इतर शिव की नगरी काशी में त्यौहार तिथियों के दायरे से बढ़कर हैं। तभी तो कहा गया है कि यहां सात वार और 9 त्यौहार पड़ते हैं। काशी में हर दिन कोई न कोई पर्व त्यौहार मनाये जाते हैं। व्यक्ति की आर्थिक स्थिति चाहे जो भी हो वह अपनी सामर्थ्य के हिसाब से व्यवस्था कर हंसी खुशी त्यौहारों को जीता है। काशी पर भी आधुनिकता का रंग चढ़ता जा रहा है फिर भी कुछ मामले में यहां परम्परा और आधुनिकता कंधे से कंधा मिलाकर चलती हैं।

काशी में प्रमुख त्यौहार जैसे होली दशहरा, दीवाली, ईद दुर्गापूजा के अलावा अनगिनत ऐसे त्यौहार हैं जो काशीवासियों की दिनचर्या में शामिल हैं। इन त्यौहारों को मनाने के लिए कोई विशेष तैयारी की भी जरूरत नहीं पड़ती है। हिन्दी पंचांग के अनुसार महीने में दो पक्ष होते हैं। एक कृष्ण पक्ष तो दूसरा शुक्ल पक्ष। हर पक्ष में 15 तिथियाँ रहती हैं। हर तिथि पर काशी में कोई न कोई त्यौहार रहता है। जिसका अपना अलग-अलग धार्मिक महत्व है। तिथियों के तहत त्यौहार इस तरह हैं प्रतिपदा, अशून्य-शयन व्रत, तीज, गणेश चौथ, पचैयां, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, प्रदोष, शिवरात्रि, अमावस्या, पुर्णवासी। इन तिथियों को लोग त्यौहार के रूप में मनाते हैं। खासकर महिलाएं अलग-अलग तिथियों पर व्रत रहती हैं। काशी में तिथियों के बाद संक्रांतियां, जयन्तियां, राष्ट्रीय पर्व, हिन्दू के साथ जैन, बौद्ध, ईसाई, मुस्लिम, सिख त्यौहार भी बड़ी धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ मनाये जाते हैं।

काशी में त्यौहारों को मनाने का लोगों को बस बहाना मिलना चाहिए। फिर चाहे वह किसी की जयंती ही क्यों न हो।

चैत्र नवरात्र – भारतीय हिन्दी नववर्ष की शुरूआत चैत्र महीने के पहले दिन से शुरू होती है। इसी दिन से नौ दिनों तक चलने वाला नवरात्रि त्यौहार शुरू हो जाता है। वैसे तो यह त्यौहार पूरे भारत में मनाया जाता है लेकिन काशी में इसका अलग ही महत्व और आकर्षण रहता है। मंदिरों के शहर के नाम से विख्यात काशी में दुर्गा मंदिरों को विधिवत सजाया जाता है। साथ ही साफ-सफाई भी खूब होती है। इस दौरान कुछ लोग नौ दिन का तो बहुतायत एक दिन व्रत रखते हैं। सुबह-शाम तो छोड़िये दिन भर मंदिरों के घंटे घड़ियालों की ओजमयी आवाज से माहौल गुंजायमान रहता है। वहीं मंदिरों की गुम्बद पर लगे माइक से पारम्परिक देवी गीतों  के अलावा नये जमाने के भक्ति गीत गूंजते रहते हैं। इस दौरान कई धार्मिक और सामाजिक संगठन सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन राजेन्द्र प्रसाद के अलावा अन्य घाटों पर करते हैं।

रामनवमी – चैत्र माह की नवमी तिथि का रामनवमी यानी भगवान राम का जन्मोत्सव मनाया जाता है। इस दौरान मंदिरों में रामचरित मानस के पाठ और सोहरों को गाया जाता है। वहीं शाम के समय रामचरितमानस के कुछ दृश्यों को दिखाने वाली झांकियों को कई नावों से अस्सी घाट से शुरू होकर धीरे-धीरे राजघाट तक ले जाया जाता है। इस दौरान मनोरम दृश्य उभरता है। इस शोभायात्रा को रामकथा मंदाकिनी शोभायात्रा भी कहा जाता है। इसके अलावा लोग अपने घरों में मंदिरों में राम जन्मोत्सव हर्षोल्लाष और श्रद्धाभाव से मनाते हैं। मिठाई बंटती है श्रृंगार होते हैं, ढोल नगाड़े भी बजते हैं।

चैत्र माह में काशी में एकादशी तिथि को कामदा एकादशी, त्रयोदशी को जैन महावीर को जयन्ती अनंग त्रयोदशी, चतुर्दशी को दमनका चतुर्दशी और पूर्णिमा को हनुमज्यन्ती मनायी जाती है। यानी पूरा का पूरा माह काशी में त्यौहार ही रहता है।

वैशाख महीने- में प्रतिपदा को कच्छपावतार अष्टमी को शीतलाष्टमी इस दिन काशीवासी मां शीतला के दर्शन-पूजन करते हैं। एकादशी को महाप्रभु वल्लभाचार्य की जयन्ती मनायी जाती है। वहीं वैशाख की अमावास्या को वैशाखी अमावस्या स्नान और लोग सतुआ का दान करते हैं।

वैशाख शुक्ल पक्ष- की द्वितीया को छत्रपति शिवाजी जयन्ती मनायी जाती है। तृतीया को अक्षय तृतीया का पर्व मनाया जाता हैं काशी वासी इस दिन अपने चिरपरिचित अंदाज में भोर से ही गंगा स्नान तदोपरान्त मंदिरों में दर्शन-पूजन करते हैं। काशी में आम मान्यता रहती है कि इस दिन कोई भी काम करने से उसका क्षय नहीं होता यानी उसका नाश नहीं होता है। इसी दिन परशुराम जयंती भी मनायी जाती है। पंचमी को शंकराचार्य जयन्ती भी लोग मनाते हैं। छठ को रामानुजाचार्य जयन्ती मनायी जाती है। इसी तरह सप्तमी को गंगा सप्तमी के रूप में मनाया जाता था। पहले इस दिन पंचगंगा घाट पर शहनाई दंगल का आयोजन किया जाता था। जिसमें काफी संख्या में लोग मौजूद रहते थे। लेकिन समय के साथ यह परम्परा समाप्त हो गयी है। वैशाख शुक्ल पक्ष की नौमी तिथि को जानकी जयंती, अक्षय नौमी और कुंवर सिंह जयन्ती मनायी जाती है। एकादशी को मोहनी एकादशी के रूप में मनाया जाता है। चतुर्दशी को नरसिंह चतुर्दशी का पर्व होता है। इस दिन बड़ा गणेश के पास एक लीला का आयोजन भी होता है।

पूर्णिमा को वैशाखी पूर्णिमा और बुद्ध जन्मोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। वैशाखी पूर्णिमा पर श्रद्धालु गंगा स्नान कर दान करते हैं। वहीं बौद्ध जन्मोत्सव पर सारनाथ में बड़ा मेला लगता है। दूर-दूर से बौद्ध भिक्षु और अनुयायी सारनाथ पहुंचते हैं। इस दौरान बड़ा मेला भी लगता है।

ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष- माह के इस पक्ष के पहले रविवार को बकरिया कुण्ड पर गाजी मियां का मेला लगता है। मेले में तरह-तरह की दुकानें सजती हैं। साथ ही मनोरंजन के लिए बड़े-बड़े झूले लगते हैं। मेले में काफी संख्या में मुसलमान बंधुओं के अलावा हिन्दू भी भाग लेते हैं। जो गंगा जमुनी तहजीब की बेजोड़ मिशाल पेश करता है। मेले में अद्भुत सजावट के साथ जुलूस निकाला जाता है। रात को तो ऐसा लगता है कि चांद सितारे जमीं पर उतर आये हैं। हर तरफ जगमगाती लाइटिंग बहुत ही खुबसूरत लगती है। मजार पर शहादत वाले गाने भी गाये जाते हैं। अकीदत मंद चादरपोशी भी करते हैं। ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्ठी गणेश चतुर्थी व्रत भी रहता है। यह व्रत महिलाएं रखती हैं। अष्टमी की शीतलाष्टमी व्रत और एकादशी अचला एकादशी व्रत के रूप में मनाया जाता है। तिथियों पर पड़ने वाले इन त्यौहारों का काशी में बड़ा ही महत्व है। आस्थावान लोग तो किसी बड़े काम को भी तिथि त्यौहार पर यहां शुरू करते हैं। तभी तो शिव की नगरी काशी अपने आप में अनूठी और न्यारी है।

ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की अमावास्या को वट सावित्री का त्यौहार मनाया जाता है। महिलाएं अपने पति की लम्बी उम्र के लिए सावित्री व्रत रखती है। विधि-विधान के साथ वट के पेड़ के नीचे पूजा की जाती है। साथ ही पेड़ में महिलाएं कच्चा धागा लपेटती हैं। ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष (मई जून) में प्रतिपदा को करवीर व्रत तृतीया को रम्भातीज और चतुर्थी को उमावतार, भौमवर्ती चतुर्थी वैनायक गणेश, व्रत रखा जाता है। यानी एक ही दिन कई त्यौहार जो काशी के साथ जुड़ी कहावत को चरितार्थ करता है। पंचमी को विन्ध्यवासिनी पूजा की जाती है।

इस पक्ष में बड़ा त्यौहार गंगा दशहरा हैै। ऐसी मान्यता है कि आज के ही दिन गंगा जी पृथ्वी पर उतरी थीं। इस उपलक्ष्य में दशाश्वमेध और पंचगंगा घाट पर बने गंगा मंदिरो में दर्शन-पूजन किया जाता है। गंगा जी को फूल मालाओं से सजाया जाता है। कुंआरी लड़कियों द्वारा गंगा जी में गुड़ियों को प्रवाहित किया जाता है। इस मौके पर तेल के दीपों को जलाकर दशाश्वमेध घाट पर त्रिलोचन घाट तक नदी में तैराया जाता है। जगमग करते दीपों को देखकर ऐसा लगता है जैसे गंगा जी स्वयं इस उत्सव में शामिल हो रही हैं। इस दौरान घाट पर काफी संख्या में लोग मौजूद होकर इस अलौकिक आनंद को लेते हैं। वहीं विदेशी पर्यटक अपने कैमरों में तस्वीरे कैद करते रहते हैं।

एकादशी में निर्जला एकादशी के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन शाम को लोग गंगा किनारे पहुंचकर स्नान करते हैं। वहीं गंगा में तैराकी सीख रहे लोग नदी पार कर अपने प्रशिक्षण की परीक्ष देते हैं। साथ ही गंगा घाट पर गंगोत्सव मनाया जाता है। जिसमें दीप जलाया जाता है। हालांकि पहले की अपेक्षा अब गंगा में तैराकी सीखने वाली की संख्या में कमी आयी है।

इसके बाद द्वादशी को कूर्मजयन्ती गौतमेश्वर दर्शन, त्रिविक्रम पूजा, चम्पक द्वादशी भी काशी के त्यौहारों की फेहरिस्त में शामिल है। पूर्णिमा को संत कबीर की जयंती हर्षोल्लास के साथ मनायी जाती है। काशी में मानसून का भी स्वागत किया जाता है।

आषाढ़ शुक्ल पक्ष (जून-जुलाई) में सबसे बड़ा त्यौहार भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकाली जाती है। भारत में भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा उड़ीसा में निकाली जाती है। लेकिन काशी में भी यह यात्रा धूमधाम से निकाली जाती है। तीन दिन तक चलने वाले इस महोत्सव को काशी वासी जोशो-खरोश से मनाते हैं। अस्सी जगन्नाथ मंदिर से लकड़ी के बने जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को रथयात्रा वाले रास्ते पर लाया जाता है। सजे रथों को श्रद्धालुओं को हुजूम खींचता है। जिसे देखकर ऐसा लगता है कि रथ को भीड़ नहीं खींच रही है बल्कि स्वयं आगे बढ़ रहा है। आषाढ़ की षष्ठी को कुमार षष्ठी, सप्तमी को वैवश्वत सप्तमी, दशमी को पड़ता है- गिरिजा पूजा का त्यौहार इसी महीने में कर्क संक्रान्ति भी पड़ती है। साथ ही शंकुधारा का मेला भी लगता है। जिसमें गीत संगीत का कार्यक्रम और कजरी गायी जाती है, जिसका काशी के रसगामी श्रोता लुत्फ उठाते हैं। आषाढ़ पूर्णिमा को देश भर में गुरू पूर्णिमा के रूप में भी मनाया जाता है। गुरू पूर्णिमा पर शिष्य अपने गुरू का अभिनंदन करते है। काशी मंे सबसे बेहतर ढंग से मनायी जाती है। मठ, मंदिर, विद्यालय, कालेज और विश्वविद्यालयों में शिष्य अपने गुरू का चरण रज लेकर उनके माथे पर तिलक लगाते हैं। इस दौरान गुरूओं के गुरू वेदव्यास का दर्शन-पूजन भी किया जाता है। विश्वनाथ मंदिर में शिवशयनोत्सव भी किया जाता है। सावन (जुलाई-अगस्त) का तो काशीवासी बेसब्री से इंतजार करते हैं। देवाधिदेव महादेव की नगरी में सावन का खास महत्व है। इस पूरे महीने में हर दिन त्यौहार, उल्लास, मनोरंजन इस शहर में रहता है। शहर तो गेरूआ रंग के कपड़े पहने कावंरियों से पट जाता है। कभी रिमझिम तो कभी तेज फुहारों के बीच लोग शिवालयों में बाबा को जल चढ़ाते हैं। सोमवार को तो पूरा माहौल उत्सवमय हो जाता है। इस दिन ज्यादातर महिलाएं उपवास रख शिव मंदिरों में जाकर दर्शन-पूजन करती हैं। मंदिर घंट घड़ियालों से गुंजित होता रहता है। लोग बाबा पर भांग धतूरा चढ़ाते हैं। सावन में मंगलवार को काशी वासी दुर्गाजी और संकटमोचन का दर्शन-पूजन कर धन्य होते हैं। इस मौके पर दोनों मंदिरों को बहुरंगी झालरों से सजाया जाता है। इस दौरान दुर्गाकुण्ड स्थित दुर्गा मंदिर में गायन और नृत्य की सुर सरिता बहती है। जिसका लोग भरपूर आनन्द उठाते हैं। सावन कृष्ण पक्ष में द्वितीया को अशून्य शयन, व्रत, चतुर्थी को संकष्ठी श्री गणेश व्रत एकादशी को कामदा एकादशी व्रत, त्रयोदशी को शिवरात्रि व्रत और फिर अमावस्या रहती है।

सावन शुक्ल पक्ष में तृतीय को मधुश्रवा तृतीया और ठकुराइन तीज पड़ती है। चतुर्थी को वैनायकी गणेश, पंचमी को नागपंचमी विधिवत ढंग से मनायी जाती है। इस दिन नाग की पूजा की जाती है। लोग घरों के दरवाजे पर नाग के चित्रों को चिपकाते हैं। घरों में कई तरह के पकवान बनाते हैं। नागों को दूध चढ़ाया जाता है। कुछ लोग असली नागों को लाकर उसका दर्शन कराते हैं। काशी में हर त्यौहारों पर कुछ विशेष होता है। नाग पंचमी पर अखाड़ों की साफ-सफाई दो-तीन दिन पहले से शुरू हो जाती है। नाग पंचमी के दिन अखाड़ों में रियाज करने वाले पहलवान जमकर दांव पेंच लगाते हैं। कई अखाड़ों पर तो दंगल की प्रतियोगिता भी आयोजित की जाती है। जिसमें काफी संख्या में पहलवान भाग लेते हैं। प्रतियोगिता जीतने पर पहलवानों को ईनाम भी दिया जाता है। नागपंचमी के दिन पहलवानों के शरीर पर लगी अखाड़े की मिट्टी को साफ नहीं किया जाता है बल्कि मिट्टी अपने आप ही झड़ने के लिए छोड़ दी जाती है। काशी में पहले काफी झूले भी इस दिन पड़ते थे लेकिन आधुनिकता के साथ अब झूले कम ही पड़ते हैं। सावन महीने के अन्तिम पांच दिन झूलनोत्सव का आयोजन किया जाता है। इस दौरान काशी के सभी मंदिरों में श्रृंगार किया जाता है। साथ ही झूलनोत्सव का कार्यक्रम भी होता है। मंदिरों में काफी आकर्षक झांकियां सजायी जाती है; जिसे देखने के लिए काफी संख्या में लोग मंदिरों में पहुंचते हैं। दुर्गाकुण्ड स्थित मानस मंदिर में तो यह भव्यता के साथ मनाया जाता है। दर्शनार्थी कभी ऊँचे स्वर मंे तो कभी धीमें स्वर में पाठ करते हैं, जिससे पूरा मंदिर परिसर एक अलौकिक ध्वनि से सराबोर हो जाता है।

रक्षाबंधन- हिन्दुओं का एक प्रमुख त्यौहार है। बहन अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं तो भाई बदले में कुछ नेक सहित अपनी बहन की रक्षा का वादा करते हैं। काशी में तो इस त्यौहार की सुगबुगाहट रक्षाबंधन से कई दिन पहले ही शुरू हो जाती है। गली-मोहल्ले चौक-चौराहों पर नये-नये किस्म की राखियां बिकने लगती हैं। महिलाएं इन राखियों को खरीदकर अपने भाइयों को बांधने के लिए संजोती है। रक्षाबंधन वाले दिन महिलाएं राखी को थाली में रोरी, अक्षत (चावल) दीया और मिठाई लेकर भाई की आरती उतारती हैं। वही इस दिन ब्राह्मण गंाग घाट पर जाकर जनेऊ पहनते हैं। रक्षा बंधन सावन महीने की पूर्णिमा को पड़ता है।

भाद्र कृष्ण पक्ष (अगस्त-सितम्बर) की द्वितीया को विन्ध्याचली देवी की जयन्ती मनायी जाती है। काशी में लोग भीमचंडी मनाते हैं। काशी में लोग भीमचंडी का दर्शन-पूजन भी करते हैं। महिलाएं व्रत भी रखती हैं। साथ ही ढोलक की थाप पर कजरी भी गाया जाता है। जिसमें महिलाएं बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं। काशी में चतुर्थी को बहुला गणेश चतुर्थी के रूप में भी मनाया जाता है। इसके बाद ललही छठ आता है। महिलाएं इस दिन व्रत रखती हैं। इस त्यौहार की खास बात यह है कि इसमें महिलाएं सिर्फ भैंस का दूध-दही का ही प्रयोग करती हैं। फिर घर से थाली सजाकर कुण्ड-तालाब, मंदिर या किसी धार्मिक स्थान पर एकत्र होकर पूजा करती हैं। गोलाई में बैठी महिलाएं इस दौरान कहानियां भी बारी-बारी कहती हैं। इस पूरे त्यौहार में बड़ा ही विहंगम दृश्य उभरता है। मंगल गीतों के साथ झुण्ड में महिलाओं को पूजा करते हुए देखना शानदार लगता है। हालांकि आधुनिकता के साथ अब नये दौर की महिलाएं इसे कम ही करती हैं।

कृष्ण जन्माष्टमी – वैसे तो कृष्ण जन्माष्टमी पूरे भारत में बड़े ही धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। मथुरा वृन्दावन को छोड़ दिया जाय तो यह पर्व काशी में भी जन-जन का त्यौहार बना हुआ है। बड़े-बड़े मंदिरों में तो छोड़िये लोग अपने घरों में ही इस तरह की सजावट करते हैं जैसे-वृन्दावन मथुरा उन्हीं के घरों में उतर आया है और भगवान कृष्ण अपनी लीला दिखा रहे हैं। कृष्ण जन्माष्टमी को यहां महाव्रत मानकर काफी संख्या में लोग व्रत भी रखते हैं। मंदिरों में भव्य रूप से नटखट कृष्ण की बाल रूप की झांकी सजायी जाती है। लोग दिन से ही भजन-कीर्तन में जुट जाते हैं। शाम होते-होते तो पूरा शहर जैसे कृष्णमय हो जाता है। रात बारह बजे भगवान का जन्म होता है। महिलाएं सोहर गाती हैं। भगवान को झूले पर झुलाया जाता है। इस दौरान लोग ढोलक के थाप पर ‘‘भये प्रकट कृपाला दीन दयाला’’ भी गाते हैं। इस मौके पर धनियां से बनी खास पन्जीरी और चरणामृत प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। वहीं कई मंदिरों में संगीत की सुर सरिता भी बहती है। कलाकार श्रीकृष्ण के जन्म से भाव विभोर होकर सुमधुर संगीत प्रस्तुत कर लोगों को भाव-विभोर कर देते हैं। इसके बाद एकादशी को जया एकादशी के रूप में मनाया जाता है। चतुर्दशी को अघोरा चतुर्दशी रहती है। भाद्र कृष्ण पक्ष की अमावस्या को कुशोत्पाटनी अमावास्या रहती है। इस दिन जानकार ब्राह्मण कुश उखाड़ कर रख लेते हैं और साल भर उसी कुश का प्रयोग धार्मिक या मांगलिक कार्यों में करते हैं।

भाद्र शुक्ल पक्ष- भादों की तृतीया को हरितालिका तीज का त्यौहार पड़ता है। यह पर्व महिलाओं के लिए खास होता है। इस दिन महिलाएं बड़ा ही कठिन व्रत रखती हैं। पहले महिलाएं घर में ही हाथ पर मेंहदी रचाती थी। लेकिन अब कुछ स्थानों पर कृत्रिम मेंहदी रचायी जाती है। जहां जाकर महिलाएं कुछ पैसे वहन कर कुछ ही मिनटों में हाथ पर खूबसूरत मेंहदी रचा लेती हैं। इस व्रत में सुहागिने सुहाग के सामान जैसे सिन्दूर, बिन्दी आईना, कंघी एक दूसरे को भेंट करती हैं। वहीं रात को गीत गाते हुए कुछ महिलाएं रतजगा भी करती हैं। अगले दिन भोर में ही स्वादिष्ट मिठाईयों से व्रत का पारण करती हैं। भादों की चौथ को ढेला चौथ के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन लोग आकाश में चन्द्रमा को देखने से बचते हैं। माना जाता है कि चन्द्रमा को देखने से बिना कारण ही कलंक लगता है। ऐसे में जो गलती से चन्द्रमा को देख लेता है। वह उस दोष को दूर करने के लिए दूसरे पर पत्थर मारता है जिससे यदि सामने वाला गाली देगा जिससे माना जाता है कि दोष दूर हो जाता है।

पंचमी तिथि को भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जयंती मनायी जाती है। काशी के मूर्धन्य साहित्यकार और निज भाषा उन्नति अहे लिखने वाले भारतेन्दु जी के जयन्ती पर कई गोष्ठियां व साहित्यिक कार्यक्रम का आयोजन काशी में किया जाता है।

षष्ठी को लोलार्क छठ के रूप में मनाया जाता है। इस दिन सूर्य देव की पूजा होती है। महिलाएं पुत्र प्राप्ति की इच्छा लेकर भदैनी स्थित लोलार्क कुण्ड पर जाकर स्नान करती हैं। इस दौरान लोलार्क कुण्ड पर मेला भी लगता है। इस मौके पर कजरी का भी आयोजन होता है। आज ही के दिन क्रींकुण्ड पर भी एक मेला लगता है। इस स्थान पर बाबा कीनाराम की समाधि है। जहां काफी दूर-दूर से अवधूत सम्प्रदाय के साधू आते हैं। काशी में अष्टमी से 16 दिन तक सोरहिया मेला रहता है, इस दौरान महिलाएं प्रतिदिन लक्ष्मीकुण्ड में स्नान कर महालक्ष्मी का पूजन-अर्चन करती हैं, लक्ष्मीकुण्ड के आस-पास काफी संख्या में दुकानदार महालक्ष्मी की मिट्टी की मूर्ति बेचते हैं, जिसे महिलाएं पूजन करने के लिए खरीदती हैं। वहीं नवमी तिथि को श्री चन्द्र जयन्ती और दशमी को दशावतार व्रत रखा जाता है। यह काशी ही है जहां त्यौहार मनाने के लिए बस कुछ मिलना चाहिए। यहां के मस्तमौला लोग उसका भरपूर आनंद उठाते हैं।

एकादशी को भगवान विश्वकर्मा की पूजा होती है। दुकानों और उद्योगों में विश्वकर्मा भगवान की प्रतिमा स्थापित की जाती है। दुकानदार और उद्यमी व उनके कर्मचारी अपनी फर्म को बेहतरीन ढंग से सजाते हैं। दुकानों के दरवाजे पर केले और आम की पत्तियों का तोड़न लगाया जाता है। सब मिलकर दुकान फर्म में पूजा पाठ करते हैं। मिठाईयाँ बंटती हैं। इस दिन दुकानों और फर्मों में काम बंद रहता है। अगले दिन लोग धूम-धाम से विश्वकर्मा भगवान की स्थापित मूर्ति प्रवाहित करने के लिए ले जाते हैं। इस दौरान लोग डीजे की तेज आवाज में रंग-बिरेगे गुलाल को उड़ाते हुए झूमते-नाचते हैं, जिसकी वजह से काशी की सकरी सड़कों पर जाम लग जाता है। मूर्ति गंगा नदी में प्रवाहित की जाती है। कुछ लोग आस-पास के तालाबों में भी मूर्ति प्रवाहित कर देते हैं। द्वादशी को वामनावतार मनाया जाता है। इसी दिन भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया था। अनन्त चतुर्दशी को अनन्त भगवान की पूजा की जाती है। श्रद्धालु अपनी बाहों पर सूत पर 14 गांठ देकर बांधते हैं। इस दिन कई रामलीला मंडलियां मुकुट पूजन कर रामलीला का शुभारंभ करती हैं। पूर्णिमा को महालया मनाया जाता है। इसी दिन नान्दी-मातामह श्राद्ध, लोकपाल पूजा व उमा महेश्वर का व्रत भी रखा जाता है।

अश्विन कृष्ण (सितम्बर-अक्टूबर) पक्ष हिन्दुओं के लिए खास होता है। इस पक्ष में हिन्दू अपने पूर्वजों को याद करते हैं। उन्हें जल तर्पण करते हैं। उनका श्राद्ध करते हैं। लगभग हर घर में बड़े बुजुर्ग सुबह नहाकर कुशा हाथ में लेकर जल देते हैं। काशी में दूसरे जिलों से भी लोग गया जाने से पहले पिशाचमोचन में पिण्डदान करते हैं। गंगा घाटों पर भी लोग की भीड़ लगी रहती है। इसे पितृ पक्ष भी कहा जाता है। इस दौरान मान्यताओं के मानने वाले बाल दाढ़ी नहीं बनवाते हैं।

अन्तिम दिन पितृ विसर्जन किया जाता है। इस दिन कई प्रकार के व्यंजन बनाये जाते हैं। ब्राह्मणों को भोजन भी लोग कराते हैं। ऐसी मान्यता है कि इन सब विधानों को करने से पूर्वजों की आत्मा को मुक्ति मिलेगी।

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अश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी को जीवित्पुत्रिका का त्यौहार रहता है। इस दिन महिलाएं अपने बच्चों की सलामती और रक्षा के लिए कठिन व्रत रखती हैं। इस व्रत में महिलाएं झुंड में तालाब के किनारे एक साथ, बैठकर (जीउतिया) का पूजन करती हैं। इस दौरान तालाबों के आस-पास तिल फेंकने की जगह तक नहीं बचती है। महिलाएं बारी-बारी से धार्मिक कहानियाँ भी सुनाती हैं। इस पूजन में खिलौना, फल, लड्डू और गले में पहनने वाला धागा भी चढ़ाया जाता है। इस पूजन में चढ़ाया गया प्रसाद लोग अगले दिन सुबह खाते हैं। काशी के लक्ष्मी कुण्ड समेत कई तालाबों पर व्रती महिलाओं का जमावड़ा होता है।

अश्विन शुक्ल पक्ष ऐसा मास है जिसमें खूब त्यौहार पड़ते हैं। इस पक्ष में त्यौहार की शुरूआत शारदीय नवरात्र से होती है। नवरात्र के पहले दिन हिन्दुओं के घरों में बड़ी ही श्रद्धा भाव से पूजा अर्चना शुरू हो जाती है। दुर्गा मंदिरों में घंटा घड़ियाल गूंजने लगते हैं। घरों में अखण्ड कलश स्थापना और ज्योति जलायी जाती है। श्रद्धा से लोग दुर्गा आरती और सप्तशती पाठ भी करते हैं। इस दौरान कुछ लोग नौ दिन का व्रत रखते हैं। पूरे नौ दिन पूरा माहौल भक्तिमय हो जाता है। सार्वजनिक स्थानों पर दुर्गा मूर्ति स्थापित तो होती ही है। इसके साथ ही लोग अपने घरों में भी मूर्ति स्थापित करते हैं। खासकर बंगाली समाज जैसे जंगमबाड़ी बंगाली टोला मोहल्ले में यह त्यौहार काफी हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। शाम होते ही महिलाएं, बच्चे व पुरुष नये कपड़े पहनकर दुर्गापूजा पंडालों में जाते हैं। पंडालों को इतनी भव्यता के साथ बनाया जाता है कि देखने मंे बेहतरीन लगता है। लहुराबीर स्थित हथुआ मार्केट पांडेयपुर, मच्छोदरी में काफी प्रसिद्ध दुर्गा पंडाल लगते हैं। इन पंडालों को किसी प्रसिद्ध मंदिर या भवन के जैसा बनाया जाता है। पूरे काशी में बड़े-छोटे मिलाकर सैकड़ों दुर्गापूजा पंडाल लगते हैं। इन पंडालों में कई तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन होता है। साथ ही शाम को संगीतमय दुर्गा आरती होती है। महानवमी को दुर्गा पूजा समाप्त होती है।

दशमी को विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है। इसे दशहरा भी कहा जाता है। यह त्यौहार भारत का महत्वपूर्ण और बड़ा त्यौहार है। आज ही के दिन मर्यादापुरूषोत्तम श्रीराम ने रावण का वध कर असत्य पर सत्य की विजय पायी थी। काशी में कई स्थानों पर रावण की बड़ी सी प्रतिमा का शाम को वध होता है। जिसे देखने के लिए हजारों की संख्या में लोग मौजूद रहते हैं। इस दौरान मेला भी लगता है। जिसमें तरह-तरह के झूले, खेल, दुकाने चाट पकौड़े के ठेले लगते हैं। लोग धक्का-मुक्की करते हुए इन सब का आनन्द उठाते हैं। इसी समय स्थापित दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन भी किया जाता है। धूमधाम से लोग झांकीनुमा सजाकर डीजे की धुनों पर दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन नदी में करते हैं। अबीर गुलाल उड़ाते हुए लोगों की टोलियाँ गंगा वरूणा के किनारे जाती हैं। इस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए काफी संख्या में लोग सड़क किनारे मौजूद रहते हैं। दशहरा को बौद्धावतार और माधवाचार्य जयंती भी मनाई जाती है। एकादशी को पापांकुश एकादशी के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन काशी का विश्व प्रसिद्ध भरत-मिलाप का आयोजन होता है। नाटी इमली के मैदान में लाखों की भीड़ उमड़ती है। इस दौरान राम-भरत मिलाप का बड़ी ही मार्मिक लीला सम्पन्न होती है। क्षण भर के इस कार्यक्रम को देखकर लोग भाव-विभोर हो उठते हैं। इस मौके पर काशी नरेश भी मौजूद रहते हैं। द्वादशी को पद्यनाभ रहता है। वहीं, अश्विन की पूर्णिमा को कोजागरी भी कहा जाता है। इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने वृन्दावन में महारास रचाया था। इस अवसर पर लोग व्रत रखते हैं। रात में धन वृद्धि के लिए लक्ष्मी कुबेर की पूजा होती है। अन्य कई तरह के साहित्यिक ओर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन होता है।

कार्तिक कृष्ण पक्ष- इस मास में पड़ने वाला पहला व महत्वपूर्ण त्यौहार करवाचौथ होता है। अमूमन करवाचौथ का त्यौहार पंजाब और पंजाबियों में ज्यादा मनाया जाता है। लेकिन हाल के कुछ वर्षों में टीवी सीरियलों व फिल्मों के जरिये यह त्यौहार काशी में भी बड़ी तेजी से मनाया जाने लगा है। महिलाएं व्रत रखती है और शाम होने पर चन्द्रमा देखकर अपने पति के हाथों से जल ग्रहण करती हैं। इसी दिन चेतगंज में नक्कटैया का भी आयोजन होता है। जिसमें लाखों की भीड़ जुटती है। पूरा चेतगंज रात को जगमगाती हुई रोशनी से नहा उठता है। कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी को राधा जयन्ती के रूप में मनाया जाता है। इस दिन सन्तान पाने की इच्छा से महिलाएं व्रत रखती है। वहीं आज के ही दिन से तुलसी घाट पर कृष्ण लीला का शुभारम्भ भी होता है। एकादशी को रम्भा एकादशी मनाया जाता है। इस दिन भी काशी में लोग व्रत रखते हैं। इसी लिए यहां कहा गया है कि सात वार 13 त्यौहार। द्वादशी को गोवत्स द्वादशी के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं व्रत भी रखती हैं। त्रयोदशी को धनतेरस रहता है। इस दिन लोग नये सामान वाहन बर्तन आदि खरीदते हैं। दुकानों में ग्राहकों की जमकर भीड़ लगी रहती है। इस दिन आभूषणों की खरीदारी भी जोरों पर होती है।

त्रयोदशी को ही धनवन्तरी और कामेश्वरी जयंती भी धूमधाम से मनाई जाती है। चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने घरों के सामने दीया जलाकर रखते हैं। इसी दिन हनुमान जयंती और केदार गौरी का व्रत भी रहता है।

काशी में हनुमान जयंती बड़े ही अच्छे ढंग से मनाई जाती है। आज ही के दिन हनुमान अयोध्या में श्रीराम के आने का संदेश लेकर आये थे। लोग सुबह से ही पवनपुत्र हनुमान का मंदिरों में दर्शन-पूजन करते हैं। सबसे अधिक भीड़ संकट मोचन मंदिर में रहती है। इस दौरान लोग सुन्दरकाण्ड पाठ और हनुमान चालीसा भी कहते हैं। धनवन्तरी जयन्ती को वैद्य काफी श्रद्धाभव से मनाते हैं। घरों में धनवन्तरी की प्रतिमा स्थापित कर पूजन-अर्चन करते हैं। कार्तिक की अमावस्या को एक ओर हिन्दुओं का बड़ा त्यौहार रोशनी का त्यौहार दीपावली पड़ती है। लोग बड़े ही हर्षोल्लास और उत्साह के साथ इस त्यौहार को मनाते हैं। रात को पूरा शहर रोशनी से नहा उठता है। नये कपड़े पहनकर लोग पटाखे बजाते हैं। जिसके तेज आवाज ध्वनि से पूरा माहौल गुंजायमान रहता है। शहर में अब अधिकतर तो तेल से बने दीपों को जलाने की बजाय इलेक्ट्रानिक झालरों से घरों को सजा देते हैं। कई रंगों के ये झालर जब जलते-बुझते हैं तो एक अलग तरीके की ही छटा बिखेरते हैं। रात को लोग बड़े ही विधि-विधान से लक्ष्मी गणेश का पूजन करते हैं। हाँ एक बात और त्यौहारों पर अब लोग मोबाइल और फेसबुक के जरिये एक दूसरे को बधाई भी खूब भेजते हैं। घरों में दीपावली की तैयारी काफी पहले से ही शुरू हो जाती है। दीपावली को बेहतरीन अंदाज में मनाने के लिए महिलाएं बेसन का लड्डू बर्फी समेत अन्य मिठाईयाँ घरों में ही बनाते हैं। वहीं दीपावली वाली रात को जुआरी जमकर जुआ खेलते हैं और चोर भी काफी सक्रिय रहते हैं।

कार्तिक शुक्ल पक्ष-  वैष्णव मंदिरों व माँ अन्नपूर्णा के मंदिर में अन्नकूट का आयोजन होता हैं विश्वनाथ मंदिर में लड्डुओं को इस तरह से सजाया जाता है जैसे लगता है कि लड्डुओं का ही मंदिर है। चतुर्दशी को तुलसी घाट पर नाग नथैया का वृहत आयोजन होता है। जिसे देखने के लिए भी लाखों लोगों की भीड़ जुटती है। षष्ठी को बिहार का महत्वपूर्ण त्यौहार डाला छठ मनाया जाता है। अब काशी में भी इस त्यौहार को बड़ी धूम-धाम से लोग मनाते हैं। महिलाएं भोर से ही नदी तालाब में कमर तक पानी में खड़ी होकर भगवान सूर्य को अर्ध्य देती हैं। इस दौरान कुण्ड तालाबों पर मेले जैसे माहौल रहता है। अष्टमी को गोपाष्टमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन लोग श्रद्धाभाव से गाय का पूजन करते हैं। गो माता को तिलक लगाते हैं। उन्हें कुछ न कुछ खिलाया भी जाता है। नवमी को अक्षय नवमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन लोग कोहड़ा दान करते हैं। काशी में एकादशी से पूर्णिमा तक देव दीपावली मनाया जाता है। काशी में हाल के वर्षों में इस त्यौहार का महत्व काफी बढ़ गया है। इस पांच दिनों में पंचगंगा घाट सहित अन्य घाटों की सीढ़ियाँ हजारों टिमटिमाते दीपों से सराबोर रहती हैं। इन दीपों की परछाई गंगा की हिलोरें लेती लहरों में बड़ी ही अद्भुत दिखाई पड़ती है। इस पूरे पांच दिन तक घाट किनारे कई संगीत कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। जिसमें देश के प्रसिद्ध कलाकार अपनी कला की प्रस्तुति देते हैं। वहीं, प्रबोधनी एकादशी को महिलाएं घरों में तुलसी के पौधे के पास एक छोटा सा मंडप बनाकर तुलसी और भगवान विष्णु का विवाह रचाती हैं। इस विवाह में सिंघाड़े और आंवले का भोग लगता है। चतुर्दशी को बैकुण्ठ  चतुर्दशी के रूपमें भी मनाया जाता है। इस दिन महाविष्णु पूजन भी होता है।  पूर्णिमा वाली रात तो काशी के पंचगंगा घाट सहित अन्य घाटों पर ऐसा लगता है जैसे स्वर्ग लोक से देवता भी देवदीपावली पर्व में शामिल होने के लिए आये हैं और जिनका स्वागत स्वयं गंगा जी कर रही हैं। घाट पर सजाये असंख्य दीपों के अलावा लम्बे-लम्बे बाँसों की टहनियों पर आकाश दीप मनोरम दृश्य प्रस्तुत करते हैं। इस मौके पर काफी संख्या में लोग घाट पर जुटते हैं। कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को वैकुण्ठ चतुर्दशी के रूप में भी मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन शिव व विष्णु एक दूसरे को वंदन करते हैं। परंपरानुसार विश्वनाथ मंदिर के गर्भगृह में विष्णु जी को स्थापित किया जाता है। वहीं परंपरा के उलट विष्णु भगवान पर बेल पत्र और शिव के ऊपर तुलसी की पत्ती चढ़ाई जाती है। लोग बड़े ही भक्ति भाव से इस त्यौहार को मनाते हैं।

मार्गशीष कृष्ण पक्ष – इस पक्ष में कई त्यौहार पड़ते हैं जो काशीवासी मनाते हैं; लेकिन सबसे महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध त्यौहार है- कालभैरवाष्टमी। काशी के कोतवाल कालभैरव की प्रतिमा का राम में विरल निवारण दर्शन होता है। इस पक्ष की एकादशी को उत्पन्ना एकादशी का व्रत महिलाएं रखती हैं। साथ ही पूजा-पाठ भी करती है। इस पक्ष की अमावस्या को लोग सुबह उठकर मां गंगा की गोद में जाकर अमावस्या का स्नान करते हैं। साथ ही मंदिरों मंे दर्शन-पूजन करते हैं और यथा शक्ति दान दक्षिणा करते हैं। मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की पंचमी को राम विवाह का त्यौहार मनाया जाता है। द्वितीया को गुरू तेगबहादुर का शहीद दिवस मनाया जाता है। काशी में इस तरह की जयंतियों पर कुछ न कुछ कार्यक्रम निश्चित होते हैं, जो शायद अपने आप में पूरे भारत में यहीं पर होता है। मार्गशीर्ष शुक्ल की षष्ठी को स्कंद षष्ठी और चम्प षष्ठी मनाई जाती है। सप्तमी को भी काशी में खाली नहीं जाने दिया जाता है। इस दिन भी सूर्य सप्तमी के रूप में मनाया जाता है। नवमी पर भी काशी अपनी उत्सवमयी परम्परा को छोड़ती नहीं। इस दिन कल्पादि नवमी के रूप में मनाया जाता है। नन्दानवम मोक्षदा एकादशी को पड़ता है। इस दिन भी काशी में कई कार्यक्रम होते हैं। वहीं इसी दिन गीता जयन्ती भी मनाई जाती है। इसके बाद अखण्ड द्वादशी रहती है। तिथियों पर पड़ने वाले ये त्यौहार ऐसे हैं जिनके बारे में काशी को छोड़कर शायद ही भारत में अन्यत्र किसी जगह के लोगों को कुछ पता हो। चतुर्दशी तिथि को पिशाचमोचन तीर्थ स्थल पर लोटा भण्टा का मेला लगता था। हालांकि समय के साथ मेले का स्वरूप भी बदल गया। अब पहले की तरह मेले का आयोजन नहीं होता है। वर्तमान में मिट्टी की हांडी भण्टा कुण्ड में स्नान करने के बाद चढ़ाया जाता है। इस दौरान कुछ लोग पिशाचमोचन कुण्ड पर श्राद्ध कर्म भी करते हैं। वहीं पूर्णिमा को गुरूदत्तात्रेय की जयंती भी मनायी जाती है। काशी में पहले इस दिन नगर प्रदक्षिण भी होता था। लेकिन अब यह परम्परा समाप्त सी हो गयी है। पौष महीने में और माहों की अपेक्षा त्यौहार कम ही पड़ते है। फिर भी काशी में यह माह त्यौहारों से खाली नहीं जाता है। इस महीने की दशमी को पार्श्वनाथ जयन्ती मनायी जाती है। इस मौके पर पार्श्वनाथ जन्म स्थली भेलूपुर में विविध कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। जिसमें काफी संख्या में जैन धर्मावलंबी मौजूद रहते हैं। एकादशी को सफला एकादशी के रूप मंे मनाया जाता है। इस दिन भी महिलाएं व्रत रखती है। साथ ही पूजा-पाठ भी करती हैं। पौष शुक्ल पक्ष की सप्तमी को गुरूगोविन्द सिंह की जयंती मनाई जाती है। इस माह की अष्टमी को काशीवासी महाभद्राष्टमी के रूप में मनाते हैं। एकादशी को यहां पुत्रदा के रूप में मनाया जाता है। वहीं द्वादशी को कूर्म और पूर्णिमा के दिन शाकम्भरी जयन्ती मनाई जाती है। त्यौहारों से समृद्ध काशी में हर समय उत्सवमयी माहौल रहता ही है। माघ कृष्ण पक्ष (जनवरी-फरवरी) इस माह में लोग भोर में गंगा की तरफ बढ़ते हैं और ठंडे पानी में उतर कर गंगा स्नान करते हैं।

इस पक्ष की चतुर्थी को मैदागिन स्थित बड़ा गणेश में सुबह से ही दर्शनार्थियों का तांता दर्शन के लिए लगा रहता है। सप्तमी तिथि को रामानुजाचार्य जयन्ती मनाई जाती है। साथ ही काशी में विख्यात स्वामी विवेकानन्द की भी जयंती काफी गंभीरता से मनाई जाती है। इस मास की एकादशी को षट्तिला एकादशी के रूप में मनाया जाता है। इस माह का बड़ा त्यौहार मोनी अमावस्या के रूप में आता है। अमावस्या को पड़ने वाला मौनी अमावस्या के दिन कई लोग मौन व्रत रखते हैं। साथ ही सुबह-सुबह गंगा स्नान कर दर्शन-पूजन करने के बाद दान भी लोग करते हैं। जो लोग गंगा में स्नान करने नहीं पहुंच पाते वे अपने घरों में ही पानी में थोड़ा सा गंगा जल मिलाकर स्नान करते हैं। वही माघ महीने के प्रत्येक सोमवार को काशी में वेदव्यास का मेला भी लगता है।

माघ शुक्ल पक्ष – इस मास की पंचमी को बसंत पंचमी का त्यौहार काशी में धूम-धाम से मनाया जाता है। इस दिन शिक्षा की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती माँ की शिक्षण संस्थाओं में हर्षोल्लास के साथ पूजा सम्पन्न होती है। शहर के सभी विश्वविद्यालयों में छात्र माँ सरस्वती की अनुपम प्रतिमा स्थापित करते हैं। पूरे दिन उनकी पूजा-अर्चना छात्र करते हैं। जहाँ पर मूर्ति सजाई जाती है वहाँ खूब आकर्षक ढंग से सजावट भी होती है। इस दौरान भक्ति गानों से पूरा परिसर गंूजता रहता है। अगले दिन काफी संख्या में जुटकर छात्र बहुत उत्साह एवं धूमधाम से माता सरस्वती की स्थापित मूर्ति को डीजे की धुनों पर नदी में प्रवाहित करते हैं। छात्रों के उत्साह और जोशों-खरोश का अंदाजा इसी से लगाया जाता सकता है कि प्रतिमा प्रवाहित करने के दौरान पूरे मस्ती में नाचते गाते-आगे बढ़ते हैं। पंचमी के ही दिन बाबा विश्वनाथ को पीत पट आम का बौर और पीले गेंदे का फूल चढ़ाया जाता है। इस मास में हर तिथि पर कई महत्वपूर्ण त्यौहार पड़ते हैं। ये त्यौहार भले ही बहुत लोगों को ज्ञात न हो लेकिन काशीवासियों के लिए खास महत्व रखते हैं। इसी मास की प्रतिपदा को कुंद पड़ता है। वहीं चतुर्थी को तिलुआ चौथ के रूप में मनाया जाता है। इस दौरान कई लोग व्रत भी रहते हैं। साथ पूजा-पाठ करते हैं। सप्तमी अचला के रूप में मनाई जाती है। इसी दिन रथ सप्तमी भी रहता है। अष्टमी को भीमाष्टमी के रूप में मनाया जाता है। काशी में नवमी को महानन्दा नवमी के रूप में मनाया जाता है। इसीलिए कहा गया है कि काशी नगरी अपने आप में अद्भुत और न्यारी है जहां मृत्यु पर भी शोक नहीं वरन् उल्लास मनाया जाता है। इस मास की नवमी को महानंदा नवमी और एकादशी को जया एकादशी के रूप में मनाया जाता है। वहीं द्वादशी पर भीष्म की पूजा होती है। लाला लाजपत राय की जयंती भी इसी दिन मनाई जाती है। इस मौके पर विविध कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। पूर्णिमा को रविदास जयंती का त्यौहार धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन लोग अल सुबह गंगा स्नान करते हैं।

फाल्गुन का कृष्ण पक्ष – इस मास की अष्टमी को जानकी जयंती का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। एकादशी को विजया एकादशी के रूप में मनाया जाता है। त्रयोदशी को वैद्यनाथ जयंती का त्यौहार रहता है। वहीं मास की चतुर्दशी को शिवरात्रि का त्यौहार पड़ता है। इस दिन तो मानिये पूरा काशी ही शिवमय हो जाता है। लोग भोर से ही हाथों में धतूरा बेलपत्र लिए शिवालयों की ओर बढ़ते हैं। इस दिन काशी में समस्त शिवमंदिरों में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। लोग शिवलिंग पर जलाभिषेक करते हैं। वहीं काशी विश्वनाथ मंदिर में तो दर्शनार्थियों का हुजूम उमड़ता है। काफी लोग इस दिन व्रत भी रहते हैं।

फाल्गुन शुक्ल पक्ष – इस मास की एकादशी को रंगभरी एकादशी के रूप में मनाया जाता है। काशी में होली के पर्व के पहले से ही होली का त्यौहार लोगों के दिलो दिमाग पर छा जाता है। रंगभरी को बाबा विश्वनाथ के मंदिर में विशेष रूप से हर्षोल्लास होता है। इस मास की द्वादशी को गोविंद द्वादशी के रूप में मनाया जाता है। इसके बाद पूर्णिमा की शाम होलिका दहन किया जाता है। शहर के लगभग हर गली में चौराहे पर रेड़ के पेड़ को गाड़कर उसके चारो तरफ घास-फूस डालकर उसे जलाया जाता है। लोग जयकारे लगाते हुए कबीरा भी गाते हैं। अगले दिन चैत्र कृष्ण की प्रतिपदा को सुबह से ही लोग रंगों से सराबोर हो जाते हैं। एक दूसरे पर रंग बिरंगे रंग फेंकते हैं। काशी में तो होली खास होती है। मस्ती में लोगों की टोलियां गाते-बजाते और गुलाल उड़ाते आगे बढ़ती है। वहीं घाटों पर भी भांग ठंडई का घोल लेने के बाद लोग एक दूसरे को रंगते हैं। कलाकार ढ़ोल, मजीरे संग होली गीत गाते हैं। समय के साथ अब पारंपरिक होली गीतों की जगह फूहड़ भोजपुरी गीतों ने ले लिया है। घरों में लोग तेज आवाज साउण्ड पर हिन्दी गानों को बजाकर रंग खेलते हैं। घरों में खासतौर से कई तरह के व्यंजन बनते हैं। इस दिन गुझिया खास रूप से लोगों की पहली पसंद रहती है। शाम को लोग एक दूसरे से मिलकर होली की बधाई माथे पर अबीर लगाकर देते हैं। यही नहीं काशी में अगले कई दिनों तक होली मिलन समारोह चलता रहता है। चैत्र कृष्ण पक्ष के आखिरी मंगलवार को लोग पहले गंगा में नाव से यात्रा करते थे। इस दौरान ऐसा लगता था जैसे पूरा शहर गंगा की लहरों पर चल रहा हो। इसी को काशी का प्रसिद्ध बुढ़वा मंगल कहा जाता था। इसमें लाखों लोगों की भीड़ होती थी। इस दौरान मेला भी लगता था। जो तीन दिन तक चलता था। लेकिन आधुनिकता की दौड़ में बुढ़वा मंगल हो गया। अब न तो गंगा यात्रा होती है और न ही मेला लगता है। बस इसका गौरवमयी इतिहास ही नयी पीढ़ी के लिए बचा है। चैत्र महीने के इसी मास में गुलाबबाड़ी का पर्व भी काशी में मनाया जाता है। इस दिन पहले इस दिन महफिले सजती थी नामचीन संगीत कलाकार अपनी प्रस्तुति देते थे। महफिलों के गुलाब की पंखुड़ियां इधर-उधर बिखरी रहती थी। जिससे माहौल महमह करता रहता था। लेकिन अब उस स्तर की गुलाबबाड़ी नहीं मनाई जाती है। हालांकि अब भी इस दिन काशी में कई स्थानों पर गीत संगीत का कार्यक्रम  आयोजित होता है। चैत्र कृष्ण पक्ष की एकादशी को पापमोचनी के रूप में मनाया जाता है। लोग व्रत रखते हैं।

काशी में त्यौहारों की श्रृंखला में एक मुख्य त्यौहार मकर संक्रांति भी है जिसे लोग खिचड़ी भी कहते हैं। 14 या 15 जनवरी को पड़ने वाले इस त्यौहार पर लोग पानी में तिल मिलाकर सुबह स्नान करते हैं। फिर लाई, चूरा, रेवडा, तिल से बनी खास बरफी खाते हैं। इसके बाद शुरू हो जाती है पतंगबाजी। भाग-कटे के शोर और लोगों की नजरें कटी पतंगों की ओर रहती है। शहर के ऊपर आसमान में लाखों पतंगे मंडराती रहती हैं। इस त्यौहार पर लोग दान भी करते हैं।

देवदीपावली

dev di 01 अप्रितम, अद्भुत एवं अविस्मरणीय शायद ये अलंकारपूर्ण शब्द भी देवदीपावली की गरिमा का बखान करने में कमजोर पड़ जायें। इस त्यौहार की ऐसी लोकप्रियता जिसका गवाह बनने के लिए काशीवासियों का जनसैलाब तो छोड़िये विदेशी भी खिंचे चले आते हैं और उस खास निशा का आनंद उठाते हुए बरबस ही कह उठते हैं- ‘फैबुलश‘। दुल्हन की तरह सजे घाटों के सामने देवदीपावली की रात पूर्णिमा का चांद भी काशी में फीका नजर आता है। लाखों दीपों से जगमागा उठने वाले घाटों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि अंतरिक्ष के सितारे जमीं पर उतर आये हैं और सभी मिलकर काशी का अभिनंदन कर रहे हैं। ‘देवदीपावली‘, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट हो जा रहा है देवों की दीपावली। कार्तिक पूर्णिमा के दिन पतित पावनी मां गंगा के तीरे घाटों पर देवों के स्वागत में लाखों दीप एक साथ टिमटिमा उठते हैं। ऐसा माना जाता है कि देवदीपावली के अवसर पर देवलोक धरती पर उतर आता है और समस्त देवता एक साथ मिलकर देवादिदेव भगवान शिव की महाआरती करते हैं। काशी और देवत्व के इस अनुपम मिलन का साक्षी बनता है- अथाह जनमानस। देवदीपावली की तैयारी घाटों पर एक दिन पहले से ही शुरू हो जाती है। अस्सी से लेकर राजघाट तक के घाटों को सजाने के लिए लोग जी-जान से जुट जाते हैं। देवदीपावली वाले दिन तो सुबह से ही घाटों पर दीपों को रखने का क्रम शुरू हो जाता है। दीपों से लोग स्वास्तिक, ओम, रंगोली सहित अन्य मंगलकारी प्रतीकों का आकार देते हैं। घाटों को सजाने का काम भी बड़ा ही परिश्रमपूर्ण होता है। घाटों की सीढ़ियों पर दीपों को सजाने में जितनी आसानी होती है वहीं, ढलाननुमा सीढ़ियों पर दीपों को रखने में उतनी ही दिक्कत होती है। बावजूद इसके गीली मिट्टी को ढलाननुमा सीढ़ियों पर चिपका कर दीपों को उसी के सहारे रखा जाता है।dev d 02 देवदीपावली के खास आकर्षण का केन्द्र दशाश्वमेध, पंचगंगा, राजेन्द्र प्रसाद, शीतला घाट रहता है। इन दोनों घाटों के सामने गंगा की मद्धिम लहरों के उपर नावों पर बने बड़े-बड़े मंचों पर होने वाले कार्यक्रमों को देखने के लिए लोगों का हुजूम उमड़ पड़ता है। वैसे दीप प्रज्जवलन की शुरूआत पंचगंगा घाट से होती है। जहां महारानी अहिल्या बाई होल्कर द्वारा बनवाया गया हजारा दीप स्तम्भ पर शाम को करीब पांच बजे दीप जलाये जाते हैं। इसके बाद धीरे-धीरे सभी घाट रोशनी से नहा उठते हैं और आसमान सतरंगी आतिशबाजी से रंगीन हो जाता है। गंगा की कल-कल करती धारा और घाटों पर लपकते लौ में जलते दीपों की श्रृंखला विहंगम दृश्य प्रस्तुत करती है। एक ओर जहां लोगों की भीड़ एक से दूसरे घाटों पर आते-जाते हुए इस दृश्य का मजा उठाते अघाती नहीं है वहीं, गंगा में हजारों नावों पर सवार लोग इस मनोरम दृश्य का अवलोकन करते हुए इसे अपने कैमरों में कैद करते हैं। दशाश्वमेध और शीतला घाट की सीढ़ियों पर तो लोग दोपहर बाद से ही कब्जा जमा कर बैठ जाते हैं। जिससे दोनों घाटों पर बने बड़े से मंच पर होने वाले कार्यक्रम का लुत्फ उठा सकें। लोगों के रोमांच की पराकाष्ठा उस समय चरम पर होती है जब गंगा आरती शुरू होती है। इस दौरान घाटों के अलावा गंगा में इधर-उधर बिखरे नाव एक साथ इसी दोनों घाटों पर सिमट जाते हैं। इस पल का नजारा देखकर ऐसा लगता है जैसे किसी च़ित्रकार ने कैनवास पर अपनी कल्पना की कूची से तस्वीर बनायी है। वहीं, लोगों के आकर्षण का केन्द्र कारगिल युद्ध में शहीद हुए जवानों को श्रद्धांजलि देने के लिए बनायी गयी इंडिया गेट का प्रतिरूप भी होता है। इस दौरान सेना के अधिकारियों के समक्ष गॉड ऑफ ऑनर भी दिया जाता है। इसके अलावा मंच पर संगीत की सुर सरिता भी बहती है, जिसमें चर्चित कलाकार अपनी प्रस्तुति देते हैं। हाल के वर्षों में देवदीपावली की लोकप्रियता इतनी बढ़ गयी है कि अब इसका आयोजन घाटों की चौहद्दी को पार कर गंगा उस पार रेती तक पहुंच गया है। dev d 01उस पार भी कई जगह दीप प्रज्जवलन कर कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। एक बात जो देवदीपावली की सुंदरता में चार चांद लगाती है वह है घाटों को सजाने की प्रतिस्पर्धा। कई समितियां अलग-अलग घाटों को सजाने का काम करती हैं। इस दौरान अपने घाट को सजाने में हर समिति जी-तोड़ प्रयास करती है। घाटों के श्रृंगार की इस प्रतिस्पर्धा में अस्सी से लेकर राजघाट तक की जो समग्र तस्वीर परिलक्षित होती है वह लाजवाब बन जाती है। घाटों को सजाने का काम सिर्फ समितियां ही नहीं करती हैं बल्कि आम जनमानस जो घाटों को अपनी विरासत समझता है वह भी दीप प्रज्जवलन में सहयोग करता है। कई लोग अपने घर से ही घाटों पर दीया, बाती और तेल लेकर भी पहुंचते हैं और बिना किसी औपचारिकता के बनारसीपन के साथ दीप जलाने में लग जाते हैं।

देवदीपावली का इतिहास- धर्म और आस्था के केन्द्र काशी में नवीनता को परंपरा का रूप लेते देर नहीं लगती। जीवन को उल्लासपूर्ण बनाने का जो मर्म काशीवासियों के पास है वैसा शायद ही किसी के पास होगा। छोटी सी शुरूआत को भी अदभुत विस्तार देने की खास प्रवृत्ति काशी की रही है। तभी तो 18वीं सदी में पंचगंगा घाट पर महारानी अहिल्याबाई होल्कर ऩे हजार दीप एक साथ प्रज्जवलित कर देव आराधना की थी, जिसने धीरे-धीरे परंपरा का रूप धारण करती गयी। 1773 ई0 में महारानी ने पंचगंगा घाट पर ही दीप जलाने के लिए  हजारा दीप स्तम्भ का निर्माण कराया, जिस पर कार्तिक पूर्णिमा के दिन महारानी ने दीप प्रज्ज्वलित किया था। दीप जलाने की कड़ी में 1930 में काशी नरेश ने य़ुद्ध में शौर्यपूर्ण प्रदर्शन के दौरान वीरगति को प्राप्त हुए सैनिकों के सम्मान में दशाश्वमेध घाट पर देव-दीपावली के दिन आकाशदीप जलवाया था। पंचगंगा घाट पर 1986 में राजनाथ पाण्डेय उर्फ नारायण गुरू ने कुछ लोगों के साथ देवदीपावली को विधिवत मनाने की परंपरा का स़ूत्रपात किया। इस त्यौहार के विस्तार के लिए 1989 में केन्द्रीय देवदीपावली समिति का गठन किया गया।dev di 03देवदीपावली के दिन पहली बार करीब 100 लोगों ने दीप जलाये थे। 1998 में देवदीपावली के पावन अवसर पर महाआरती हुई थी। 1999 में कारगिल य़ुद्ध में शहीद हुए देश के सपूतों को श्रद्धांजलि देने की परंपरा शुरू हुई। जिसके तहत इंडिया गेट की प्रतिमूर्ति बनायी जाती है, जहां सेना के अधिकारियों की मौजूदगी में गॉड ऑफ ऑनर दिया जाता है।

पौराणिक मान्यता- देवदीपावली के बारे में पौराणिक मान्यता भी बड़ी रोचक है। कथा के अनुसार काशी के प्रथम शासक दिवोदास ने क्रोधित होकर काशी में समस्त देवी-देवताओं के प्रवेश पर रोक लगा दिया था।  ऐसी परिस्थिति में देवता काशी में आने के लिए व्याकुल हो गये । तब देवता छिपकर गंगा घाटों पर कार्तिक पूर्णिमा के दिन स्नान करने आते थे। बाद में देवताओं के काशी प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया गया। इस निर्णय से प्रसन्न देवताओं ने दीपमालाओं से सजे विजय दिवस मनाने के साथ देवादिदेव भगवान शिव की आराधना में कार्तिक पूर्णिमा पर महाआरती किया। ऐसा माना जाता है कि इस घटना के बाद से ही देवदीपावली मनायी जाने लगी। एक दूसरी घटना के अनुसार त्रिपुर नाम का एक दैत्य था, जिसने खूब उत्पात मचा रखा था। उसके भय से लोग त्रस्त हो गये थे। उससे निबटने के लिए कार्तिकेय के नेतृत्व में देवताओं ने युद्ध कर उसका संहार किया। इस विजय पर कार्तिकेय के साथ महादेव की महाआरती की गयी एवं नगर को दीपमालाओं से सजाया गया।

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