मेले

काशी में व्रत, त्यौहार, मेलों का अपना अलग रस है, रंग है। कहा जाता है कि काशी में हर्षोल्लास हर समय रहता है। यहां के मेले तो अपने-आप में अनूठे हैं। कई मेले ऐसे भी हैं जिसमें लाखों की भीड़ जुटती है। जैसे नाग नथैय्या, भरत मिलाप आदि।

रथयात्रा मेला – काशी के लख्खा मेलें में शुमार तीन दिवसीय रथयात्रा मेला 28 जून रविवार से आरम्भ हुआ। रथारूढ़ जगन्नाथ प्रभु भाई बलराम व बहन सुभद्रा के साथ नगर भ्रमण को निकले। लगभग 212 साल पुरानी यह रथयात्रा मेला अपने आप में कई जो परम्पराओं को समेटे हुए है। इस परम्परागत रथयात्रा मेला के आयोजन के सन्दर्भ में अस्सी स्थित जगन्नाथ मन्दिर के प्रधान पुजारी आचार्य श्री राम शर्मा ने बताया कि प्रातः 3 बजे जगन्नाथ मंदिर (इस मन्दिर को काशी की सप्तपुरियों में स्थान प्राप्त है) का कपाट खुलने के पश्चात मंगला आरती होती है, इसके बाद प्रभु जगन्नाथ, बलराम व सुभद्रा की डोली यात्रा निकाली जाती है। यह यात्रा अस्सी स्थित जगन्नाथ मंदिर से शहर के विभिन्न क्षेत्र दुर्गाकुण्ड, खोजवां, शंकुलधारा, कमच्छा, बैजनत्था, होते हुए रथयात्रा स्थित बेनीराम बाग तक जाएगी। प्रभु अपने परिवार के साथ कुछ समय के लिये यहा विश्राम करते है, विश्राम करने के बाद उसी रात को भगवान को रथारूढ कर रथयात्रा स्थित मेला क्षेत्र में पहुंचाया जाता है। रविवार की भोर में श्रृंगार व मंगला आरती होने के बाद रथारूढ़ प्रभु जगन्नाथ मंदिर के पट भक्तजनों के दर्शन के लिए खुल गया। तीन दिवसीय रथयात्रा मेले के अंतिम दिन मंगलवार को रात्रि तीन बजे तक दर्शन-पूजन होगा। रथयात्रा से पूर्व प्रभु जगन्नाथ को 15 दिनों तक परवल का काढ़ा, दोपहर के भोजन में परवल की भुजिया, मिठाई व पुड़ी का भोग लगाया जाता हैं। प्रभु के स्वस्थ होने की घोंषणा वैद्य व जगन्नाथ मंदिर के पुजारी श्री रामशर्मा स्वयं करते हैं। इस घोषणा के बाद ही श्वेत वसन श्रृंगार किया जाता है। जगन्नाथ प्रभु को डोली में बिठाकर नगर भ्रमण कराते हुए उन्हें रथयात्रा ले जाया जाता है। यहा पर प्रभु रथारूढ़ होकर स्वयं भक्तों को दर्शन देते हैं। भक्तजन इस नगर से ही नहीं बल्कि अन्य नगरों से भी से लोग दर्शन के लिए आते हैं।

 दुर्गाजी का मेला सावन के महीने (जुलाई-अगस्त) में मंगलवार को दुर्गाजी का मेला लगता है। सावन माह के आखिरी दिन मंगलवार को दुर्गाजी का दिन होता है। काशी में यह मेला दुर्गा कुण्ड स्थित दुर्गा जी के मंदिर में लगता है। इस मेले में पहले कजरी गायी जाती थी। साथ ही कजरी का दंगल भी होता था। काशी के रईस वर्ग इस मौके पर अपने उद्यानों को सजाकर वहां निजी मनोरंजक कार्यक्रमों का आयोजन भी कराते थे। हालांकि वर्तमान में मेले का स्वरूप बदल गया है। अब मेले में सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं होते हैं। मेले में दूर-दूर से लोग आते हैं।

लोलार्क छठ मेला- काशी के विश्व प्रसिद्ध घाटों में से एक अस्सी घाट के समीप ही लोलार्क कुण्ड है। इस कुण्ड पर भाद्र की शुक्ल षष्ठी (अगस्त-सितंबर) में लोलार्क छठ मेला लगता है। संतान प्राप्ति की कामना से महिलाएं अपने पति के साथ इस कुण्ड में स्नान करती हैं। स्नान के बाद नये कपड़े, लाल चूड़ियां और सिन्दूर से सजी महिलाएं लोलार्केश्वर लिंग को स्पर्श करती हैं। पहले लोलार्क मेले में नर्तकियों का कार्यक्रम होता था। वर्तमान में मेले का रंग रूप पूरी तरह से परिवर्तित हो गया है। अब मेले में कई तरह के कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। मेले में काफी संख्या में लोगों की भीड़ जुटती है।

शंकुलधारा मेला- काशी में शंकुलधारा का मेला भी लगता है। यह मेला हर वर्ष 16 जुलाई को लगता है। इसे कटहरिया मेला भी कहा जाता है। शंकुलधारा तालाब के पास ही द्वारकाधीश मंदिर भी है। मंदिर ही मेले का केन्द्र बिन्दु है। पहले इस मेले में गीत संगीत का भव्य कार्यक्रम होता था, जिसमें राजा महाराजा आते थे।

दुर्गापूजा या दशहरा मेला- वैसे देश भर में दुर्गा पूजा व दशहरा मेला लगता है। काशी में भी बड़े धूम-धाम से दुर्गापूजा होती है। अश्विन महीने के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से दुर्गापुजा शुरू होकर नौ रातों तक चलती है। इस दौरान काशी में कई जगह भव्य पंडाल बनाये जाते हैं, जिसमें माँ दुर्गा की अतिसुन्दर मूर्तियां स्थापित की जाती हैं। यहां प्रमुख रूप से लहुराबीर स्थित हथुआ मार्केट, पाण्डेयपुर मच्छोदरी में उत्कृष्ट पण्डाल बनाये जाते हैं। रात में झिलमिलाती लाइटिंग के बीच इन पंडालों की खूबसूरती बढ़ जाती है। इन पण्डालों को रात में देखने के लिए काफी संख्या में लोग आते हैं, लेकिन विजयादशमी के दिन मेला वृहत रूप ले लेता है। इस दौरान शाम को सिर्फ सड़कों पर लोग ही दिखते हैं।

02लीलाएं काशी में कई प्रकार की लीलाएं भी होती है। काशी की विश्वप्रसिद्ध रामलीला का आज भी जबर्दस्त आकर्षण हैं रामलीला को देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं। इस लीला का इतना भावपूर्ण मंचन होता है कि दर्शक पूरे राममय हो जाते हैं। काशी में वैसे तो कई जगह रामलीला आयोजित होती है। लेकिन सबसे प्रसिद्ध रामनगर की रामलीला है।

रामनगर की रामलीला- रामनगर की रामलीला की शुरूआत कब हुई, इस संबंध में कई रोचक किस्से हैं। कहा जाता है कि राजा महीपनारायण सिंह छोटा मीरजापुर की रामलीला के मुख्य अतिथि थे। लेकिन किसी कारणवश वे रामलीला में कुछ देर से पहुँचे। तब तक धनुषभंग हो चुका था। इसका उन्हें अत्यधिक खेद हुआ। तब उन्होंने 1855 ई0 में रामनगर में रामलीला कराने का निर्णय लिया। रामनगर की रामलीला को नाटकीय रूप से समृद्ध करने का श्रेय महाराजा ईश्वरीनारायण सिंह को जाता है। उन्हेंने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और रीवां के महाराजा रघुराज सिंह के सहयोग से रामलीला के संवादों का पुनः लेखन कराया। साथ ही कथा के अनुसार अयोध्या, जनकपुर, अशोक वाटिका और लंका को रामनगर के अलग-अलग स्थानों का नाम दिया। एक ही दिन अलग-अलग स्थानों पर कई दृश्यों का मंचन होता है। परम्परा के अनुसार  रामलीला का शुभारंभ प्रतिदिन शाम पांच बजे शहनाई वादन के साथ होता है। इसी समय हाथी पर सवार होकर काशीनरेश लीला स्थल पर आते हैं। रामलीला शाम सात बजे से रात 10 बजे तक चलती है। जिसका लोग भरपूर आनंद उठाते हैं। रामनगर की रामलीला भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी से लेकर अश्विन पूर्णिमा तक चलती है। यानी 31 दिनों तक रामनगर में भगवान राम की लीलाएं होती रहती है। रामलीला के लिए पात्रों का चयन ब्राह्मण परिवार के 10 से 12 वर्ष के बीच बटुकों में से पहले ही हो जाता है। जो राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और सीता का पाठ निभाते हैं। रामलीला की अन्य भूमिकाओं के लिए 16 वर्ष से अधिक आयु वाले बच्चों का चयन होता है। रामलीला होने से करीब दो महीने पहले से ही चयनितों को व्यास प्रशिक्षण देने लगते हैं। रामलीला में चौपाइयों को संगीतमय ढंग से प्रस्तुत करने वाले को रामायणी कहते हैं। रामलीला के निर्देशक व संचालक को व्यास कहते हैं। इस समय रामनगर की रामलीला के व्यास पं0 लक्ष्मी नारायण पाण्डेय हैं, जो इस समय रामलीला का बेहतर संचालन और निर्देशन कर रहे हैं। रामलीला के दौरान काशी नरेश की ओर से पहले साधु महात्माओं के भोजन और रहने की व्यवस्था की जाती थी हालांकि अब यह परम्परा समाप्तप्राय हो गयी है। रामनगर की रामलीला देखने के लिए लोगों में गजब की उत्कंठा रहती है।

चेतगंज की नाक कट्टैया काशी में चेतगंज की नाककट्टैया भी काफी प्रसिद्ध है। इसमें करीब एक लाख लोगों की भीड़ जुटती है। लोग अपने घरों की छतों से भी इस लीला को देखते हैं। शूपर्णखा की नाक कट्टैया के दृश्य के रूप में यह लीला प्रचलित है। लक्ष्मण जी की ललकार के जवाब में चेतगंज में एक विशाल राक्षस सेना जुलूस के रूप में आती है। यह जुलूस पिशाचमोचन से शुरू होकर रामलीला मैदान तक जाता है। इस दृश्य को देखने के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ता है। लोग अपने कैमरे में इस दृश्य को कैद करते हैं। नाक कट्टैया करवा चौथ या कार्तिक महीने की कृष्ण पक्ष के चतुर्थी को पड़ती है।

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भरत मिलाप काशी में नाटी ईमली का भरत मिलाप भी विश्व प्रसिद्ध है। विजयादशमी के दूसरे दिन एकादशी को भरत मिलाप का आयोजन बड़े ही रोचक एवं आकर्षक ढंग से किया जाता है। इस लीला में एक अभूतपूर्व झांकी होती है। जिसमें राम, सीता और लक्ष्मण तपस्वी के वेश में मंच पर बैठे रहते हैं। वहीं दूसरी ओर भरत और शत्रुघ्न रहते हैं जो उनके सामने आकर साष्टांग प्रणाम करते हैं। राम उन्हें गले से लगा लेते हैं। इसके बाद विमान आकर राजकुमार को नगर की ओर ले जाता है। यह लीला महज 5 मिनट की होती है। लेकिन इस ऐतिहासिक भावपूर्ण मंचन को देखने के लिए लाखों की भीड़ जुटती है। भरत मिलाप के सम्मान में काशी में उस दिन कहीं पर रामलीला नहीं होती है।

नागनथैया काशी में नाग नथैया का भी अपना अलग आकर्षण है। तुलसीघाट पर मात्र पांच मिनट की इस कृष्ण लीला को देखने के लिए लोगों का हुजूम उमड़ पड़ता है। इस लीला के दौरान श्रीकृष्ण अपनी मित्र मंडली के साथ यमुना तट पर गेंद खेल रहे होते हैं। तभी गेंद नदी में चली जाती है। गेंद निकालने के लिए कृष्ण कदम्ब की डाली से यमुना में कूद जाते हैं। कुछ देर बाद विषधर कालिया के फन (मस्तक) पर खड़े होकर नदी के सतह पर आते हैं। इस लीला में भाग लेने वाले बच्चे 11 से 14 वर्ष के होते हैं। लोग कदम्ब की डाल संकटमोचन मंदिर से तुलसीघाट तक लाते हैं। लीला समाप्त होने के बाद डाली गंगा तट पर रोप दी जाती है। इसको देखकर लोग भाव विभोर हो जाते हैं।

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