दस्तावेज

 बनारस में कुपोषण की जांच को 1908 में भी बनी थी कमेटी

 हिंदी प्रदीप जनवरी 1908 अंक के पृष्ठ 32 में चौबेपुर में कुपोषण की जांच करने के लिए एक अंग्रेज अफसर की नियुक्ति की गई थी, उसके द्वारा की गई जांच का पूरा विवरण पत्र के संपादक पं. बालकृष्ण भट्ट ने दिया था। लेख का शीर्षक ‘मिस्टर केयर हार्डी की जांच’ है।इसमें चौबेपुर की तत्कालीन सामाजिक, भौगोलिक व आर्थिक स्थिति को बताया गया है। विद्यालय एवं यहां की शिक्षा का स्तर भी बताया गया है। लेख का आशय यही है कि उस समय अंग्रेज भारत के प्रत्येक गांवों को पिछड़ा घोषित करने के लिए जांच किया करते थे और गांव को पिछड़ा घोषित करते थे।

(पं. बालकृष्ण भट्ट के वंशज अभिनव भट्ट की ओर से 105 वर्ष पुराने उपलब्‍ध कराए गए दस्‍तावेज की प्रति)
 

वाराणसी के प्राचीन कुण्डों व तालाबों का दस्तावेज

प्राचीन कुण्ड व तालाब धरोहर हैं। इनसे धार्मिक आस्था तो जुड़ी ही है ये जल स्रोत के भी महत्वपूर्ण अवयव हैं। बावजूद इसके सामाजिक हितों के इन धरोहरों को लोग पाटकर रिहायशी बना दे रहे हैं। इन अमूल्य धरोहरों को बचाने के उद्देश्य से सन् 1999 में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया था कि 1952 के बाद पाटे गये सभी तालाबों को खुदवा कर उन्हें पुनः रिस्टोर किया जाय। इसी आदेश के आलोक में उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने 2007 में वरीयता के आधार पर वाराणसी में पाटे गये कुण्डों,तालाबों, कूपों को खुदवा कर रिस्टोर करने का निर्णय दिया था। उस समय नगर निगम ने आदेश को ध्यान में रखते हुए तालाबों कुण्डों व कूपों को रिस्टोर करने की दिशा में खूब कागजी घोड़ा दौड़ाया लेकिन अभी तक वह घोड़ा हकीकत की ज़मी पर नहीं दौड़ पाया और तालाबों, कुण्डों की हालत यथावत बनी हुई है| प्रस्तुत है सामाजिक कार्यकर्ता सुरेन्द्र नाथ गौड़ के सौजन्य से बनारस में कुंडों-तालाबों को रिस्टोर करने से सम्बन्धित दस्तावेज की प्रति:

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