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बिरहा की उत्पत्ति और उसका विकास

पूर्वी उत्तर प्रदेश का लोक गायन ‘बिरहा’ का आज लोक गायकी के क्षेत्र में अपना एक विशिष्ट स्थान है। उत्तरोत्तर विकास की ओर अग्रसर गायकी की यह लोकविधा आज अपने मूल क्षेत्र की सीमाओं से बाहर निकल कर भारत के विभिन्न प्रान्तों में लोकप्रियता हासिल कर दुनिया के अन्य मंचों पर भी अपना जलवा बिखेर […]

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हिन्दी भाषा के उन्नायक एवं “काशी के सुकरात” प्रो. लाल जी राम शुक्ल

काशी मनोविज्ञानशाला के संस्थापक-संचालक पं. लाल जी राम शुक्ल काशी की एक विभूति थे। उनकी मित्रमंडली में डा. राजबली पाण्डेय (कुलपति जबलपुर विश्वविद्यालय), डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी, प्रो. गोपाल त्रिपाठी, प्रो. राजाराम शास्त्री, प्रो. रामअवध द्विवेदी, पं. विश्नाथ मिश्र आदि थे। उनका अधिकांश समय अध्ययन-चिंतन में व्यतीत होता था। वे सादा जीवन और उच्च विचार […]

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काशी : मरने के लिए नहीं, न मरने के लिए

* विद्यानिवास मिश्र काशी के बारे में जन-विश्वास यही है कि यहाँ जो मरता है, मृत्यु के समय बाबा विश्वनाथ उसके कान में मंत्र देते हैं। वही मंत्र तारक होता है, काशी में मुक्ति हो जाती है। लोग संदेह करते हैं, फिर शुभ-अशुभ कार्यों का फल भोगे बिना कैसे मुक्ति होगी? मेरे ननिहाल में एक […]

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काशी, वाराणसी और बनारस

* प्रो. शिवजी उपाध्याय उपर्युक्त शीर्षक में काशी और वाराणसी के साथ बनारस नाम को जोड़ने का आशय नगर के आधुनिक सन्दर्भ को परिलक्षित कराना है। क्या ‘बनारस’ काशी और वाराणसी के नामगत विशेषता से कुछ या किसी रूप में आन्वित होता है या नहीं? यही होता है तो किस रूप में उसकी सार्थकता निरूपित […]

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बनारस का बुढ़वा मंगल

* चौधरी बदरीनारायण उपाध्याय ‘प्रेमधन’ काशी के पूर्व छोर से लेकर पश्चिम पर्यन्त घाटों पर जो अनुमान से ढाई-तीन कोस के विस्तार में होंगे, काशिराज और नगर प्रतिष्ठित महाजनों से लेकर, मदनपुरा के जुलाहों तथा श्मशान के डोमड़ों तक नौकाएँ निज शक्ति और श्रद्धा के अनुसार सुसज्जित दीख पड़ने लगीं। संख्या भी उनकी और वर्षा […]

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काशी-इतिहास और संस्कृति के दर्पण में

– भानुशंकर मेहता व्यास जी कथा कह रहे थे- “भक्तजनों एक थे राजा दिवोदास-सो इन्द्र भगवान उनसे कहते भये कि आप काशी का राजकाज संभालो क्योंकि वहाँ बड़ी दुर्व्यवस्था है। तब दिवोदास कहते कि सो हम कर लेंगे पर इक शर्त हमारी भी है कि सब देवता लोग काशी छोड़ चले जायें काहें कि इन्हीं […]

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प्राचीनता, ऐतिहासिकता एवं नवीनता का अदभुत् मेल मानसिहं वेधशाला

प्राचीनता, ऐतिहासिकता एवं नवीनता तीनों के अदभुत् मेल का नाम वाराणसी है। यहां के समृद्ध कालजयी इतिहास से जुड़ा है राजा-महाराजाओं का काशी प्रेम। काशी सभी को प्रभावित करती रही है। इसी वजह से समूचे भारत वर्ष से लोग

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काशी और बंगाली समाज

जब मुगल साम्राज्य का संघर्ष शुरू हुआ, तब से अब तक बनारस के जीवनगत विकास में बंगाली संस्कृति फैशन की तरह हावी रही है- एक समय बनारस की तीन चौथाई जमींदारी के स्वामित्व के कारण नहीं, बल्कि अपने आकर्षणों और स्वाभाविक माधुर्य की बदौलत, अपनी देनों और दानों की बदौलत, अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक और धार्मिक-राजनीतिक समझदारी […]

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सत्यजीत राय के निगाह में बनारस

सदियों से बनारस में अलग-अलग क्षेत्र के महान व्यक्तियों का निवास और उनके ऊपर बनारस का प्रभाव रहा है। उनके संस्मरणों, रचित गद्य एवं काव्य के द्वारा हमें बनारस के प्रति उनका लगाव और उनके ऊपर बनारस का प्रभाव समझ में आता है। यह क्षेत्र बहुत विस्तृत है। इसमें धार्मिक, राजनीतिक, साहित्यिक और सामाजिक क्षेत्र […]

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काशी के सांस्कृतिक उन्मेष में बंग समाज का योगदान

वाराणसी का नाम मन में आते ही हमारे सामने इस शहर के अनेक रूपों का खाका खिंच जाता है। वाराणसी अपने धार्मिक, आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक वैभव का समन्वय करते हुए भारत के बहुसांस्कृतिक स्वरूप का प्रतिबिम्ब भी प्रस्तुत करता है। प्राचीन काल से ही काशी धर्म एवं विद्या का केन्द्र होने की वजह से […]