आयुर्वेदज्ञ

वाराणसी में आयुर्वेद की सुदृढ़ परम्परा

वाराणसी अति प्राचीन काल से आयुर्वेद का केन्द्र रही है। यहाँ आयुर्वेद के दोनों प्रमुख सम्प्रदाय-शल्यचिकित्सा एवं कायचिकित्सा साथ-साथ फूलते-फलते रहे हैं। देश के अन्य किसी नगर को शायद ही ऐसा सौभाग्य प्राप्त हुआ हो।

सम्प्रति उपलब्ध आयुर्वेदीय संहिताओं में चरक संहिता प्राचीनतम है जिसके मूलभाग का काल कम से कम 3000 वर्ष पूर्व माना जाता है। इसमें यञःपुरुषीय परिषद् (सूत्र0 25) में काशीपति वामक विवेच्य विषय की स्थापना करते हैं। अधिक संभावना है कि यह परिषद् वाराणसी में ही हुई हो जिसमें देश या विदेश के अनेक ऋषि-मुनियों तथा विद्वानों ने भाग लिया। राजर्षि का नाम ‘वामक’ इस ओर इंगित करता है कि वह वमन-विरेचन आदि पञ्कर्म तथा काय चिकित्सा में पारंगत थे। दृढ़बल ने भी आस्थापन बस्ति के लिए उपयोगी द्रव्यों की तुलनात्मक विवेचना के प्रसंग में राजा वामक के मत का उल्लेख किया है। इससे भी उपर्युक्त धारणा की पुष्टि होती है।

शल्यतन्त्र के क्षेत्र में भी वाराणसी को उसकी जननी होने का गौरव प्राप्त है। काशीराज दिवोदास धन्वन्तरिशल्यतन्त्र के प्रवर्त्तक माने जाते हैं जिन्होंने अपने विद्यापीठ में सुश्रुत आदि शिष्यों को प्रशिक्षित कर इसका प्रचार-प्रसार देश-देशान्तर में किया। वृद्धकाल नामक मुहल्ले में दिवोदास से सम्बन्धित कूप आज भी विद्यमान है। धन्वन्तरि कूप के नाम से प्रसिद्ध उक्त कूप में आठ घाट हैं और आठों घाटों का जल भिन्न-भिन्न स्वादों का है। वहीं पर उनके द्वारा स्थापित धन्वन्तरेश्वर महादेव की मूर्ति भी है।

सुश्रुत संहिता शल्यतन्त्र की उपजीव्य आकार-ग्रन्थ मानी जाती है। ‘धन्वन्तरि’ आदि आगे चलकर शल्य-विशेषज्ञ की उपाधि के रूप में प्रचलित हो गया (धन्वं शल्यशास्त्रं, तस्य अन्तमियर्ति गच्छतीति धन्वन्तरिः)। इसी के आधार पर शल्यसंप्रदाय को धान्वन्तरीय संप्रदाय भी कहा जाने लगा जिसका उल्लेख चरक ने भी किया है- ‘अत्र धान्वन्तरीयाणामधिकारः क्रियाविधौ’। किस प्रकार समुद्र मन्थन से भगवान् धन्वन्तरि का आविर्भाव हुआ तथा किस प्रकार वह पुनः काशीराज के कुल में धन्वन्तरि के रूप में अवतीर्ण हुए यह आख्यान पुराणों में विस्तार से वर्णित है। आयुर्वेद के आचार्य पातंजलि भी काशी से जुड़े रहे। पातंजलि कूप आज भी यहाँ विद्यमान है। काशी के नागकूप पर नागपंचमी के दिन शास्त्रार्थ की परम्परा मौजूद है।

मगधसम्राट बिम्बिसार का राजवैद्य तथा भगवान् बुद्ध का सुहृद् एवं वैद्य जीवक तक्षशिला में कायचिकित्सा की शिक्षा लेकर काशी आया था। यद्यपि इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता किन्तु अधिक संभावना है कि उसने शल्यतन्त्र की शिक्षा काशी में ली और इसमें भी पारंगत हो गया।

भारतीय इतिहास के मध्यकाल में भी अनेक उपद्रवों-हलचलों के बावजूद वाराणसी में आयुर्वेद की समृद्धि बनी रही। मुसलमान बादशाहों के दरबारों में भी काशी के मूर्धन्य वैद्यों का समादर होता रहा। सामान्य जनता भी आयुर्वेद की चिकित्सा से लाभान्वित होती रहती। धार्मिक और राजनीतिक स्तरों पर भले पारस्परिक विद्वेष उभरा हो किन्तु चिकित्सा के क्षेत्र में हकीम और वैद्य परस्पर कन्धे से कन्धा मिला कर चलते रहे और जनता को अधिकाधिक लाभान्वित करने के उद्देश्य से अपने चिकित्सा पद्धति को अधिकाधिक प्रभावी बनाने के लिए एक दूसरे से सीखते रहे। परिणामतः हकीमों ने आयुर्वेद की अनेक औषधियाँ और विधियाँ अपनाई तथा वैद्यों ने भी उनकी अनेक प्रभावी औषधियाँ अपना कर निघण्टुओं में समाविष्ट कर लिया। ऐसा साम्प्रदायिक सद्भाव एवं सहयोग का वातावरण शायद ही कहीं मिले। मध्यकाल के काशी में
प्र0 भाव मिश्र ने ‘भावप्रकाश’ का प्रणयन किया। जिसमें फिरंग शरीखे रोगों का प्रथम उल्लेख है। प्र0चतुर्भुज मिश्र ने ‘रसशास्त्र’ का निर्माण किया। रूपलाल जी वैश्य ने निघण्टु को उत्तम ढंग से विकसित किया। काशीपति नायक ने काय चिकित्सा का विकास किया।

चिकित्सा पद्धति के विकास के साथ-साथ आयुर्वेद-वाङ्मय की समृद्धि में भी वाराणसी का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। इस क्षेत्र में उल्लेखनीय हैं-शिवकोश के रचयिता पं0 शिवदत्त मिश्र, बृहद् योग बृहत् योग तरंगिणी के रचयिता पं0 त्रिमल्ल भट्ट तथा शारीर पद्यिमी के प्रणेता पं0 भास्कर भट्ट। आधुनिक काल में काशी के आयुर्वेदीय चिकित्सा क्षेत्र को देखने से लगता है कि सारा देश की सिमट कर यहाँ आयुर्वेद की ज्योति जला रहा हो। काशी में आयुर्वेद की चार परम्परायें विद्यमान हैं। प्रथम पंजाबी परम्परा में अर्जुनमिश्र का नाम अग्रणी है। इन्होंने ‘अर्जुन आयुर्वेद विद्यालय’ की स्थापना की। इनकी परम्परा में कुछ प्रसिद्ध रस शास्त्री एवं नाड़ी प्रशिक्षक हुए। नव्य नागार्जुन रसायन शास्त्री पं0 श्यामसुन्दराचार्य वैश्य, रस वैद्य पं0कृष्णपाल शास्त्री और पं0 हरिप्रपन्न शास्त्री ने अपनी विशिष्ट आयुर्वेदीय चिकित्सा पद्धति से काशी को गौरवान्वित किया। आयुर्वेद चिकित्सा के आठ अंगों-शल्य, शाल्क्य, काय, भूत, कौमारभृत्य, अगद, रसायन ऐर बाजीकरण में पारद का उपयोग अत्यन्त महत्वपूर्ण है। पं0 कृष्णपाल शास्त्री ने सन् 1939 में पारे को स्वर्ण के रूप में परिवर्तित कर दिया। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के विश्वनाथ मन्दिर की यज्ञशाला में लगे शिला पट्टों पर इसका उल्लेख है। पं0 हरिप्रपन्न के शिष्यों में पं0 लालचन्द राधाकृष्ण, पं0तिलक राम ब्रह्मचारी, आचार्य मौदगल्य, बालगोविन्द, पं0 पुरुषोत्तम मिश्र, सत्यदेव वशिष्ट, पं0 ताराशंकर मिश्र, कैलाश नाथ जेतली ने वाराणसी में आयुर्वेद को गति दी। वंगीय परम्परा के कविराज उमाचरणभट्टाचार्य तथा कविराज धर्मदास ने आयुर्वेद की पताका फहराया। इनकी परम्परा में हरिदास कविराज,हरिरंजन मजुमदार, विद्वदुमाधव भट्टाचार्य, हराणचन्द, अम्बिका चरण, आषुतोष मजुमदार ने काशी को अपना कार्य क्षेत्र बनाया। इसके बाद अवतरित होते हैं पं0 प्रकाण्ड पद्म भूषण, पं0 सत्यनारायण शास्त्रीजिन्होंने अपनी विद्वता, नाड़ीज्ञान तथा चिकित्साकौशल से देश-विदेश को प्रभावित किया। शास्त्रीजी डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद के निजी चिकित्सक थे। धर्मदास की शिष्य परम्परा में राजेश्वर शास्त्री, दुर्गादत्त शास्त्री,वंशीधर जोशी, पं0 रमानाथ द्विवेदी, पं0 यदुनन्दन उपाध्याय, विश्वनाथ द्विवेदी, व्रजमोहन दीक्षित,हरिहर नाथ उपाध्याय, सिद्धिनन्दन मिश्र, भैरव प्रसाद शुक्ल, राजित राम पाण्डेय, सुरेन्द्रनाथ त्रिपाठी, गंगासहाय पाण्डेय, चुनेकरजी तथा दामोदर शर्मा आदि ने अपने गुण की ध्वजा को काशी में फहराये रखा। पं0श्री श्रीधर महासिया का नाम भी काशी की परम्परा में अद्वितीय है। कविराज उमाचरण, पुत्र विश्वेश्वर जी तथा पौत्र आशुतोष भट्टाचार्य ने आयुर्वेद परम्परा को दिशा दी। काशी के सुड़िया मुहल्ले की चमकदार वैद्यगी में पं0 शिवकुमार शास्त्री का नाम आयुर्वेद में कौन नहीं जानता। इसी मुहल्ले की परम्परा में पं0 रघुनन्दन,पं0 गणेश दत्त वाजपेयी, पूर्णानन्द जी, और पं0 रामशंकर भट्ट ने वर्तमान परम्परा को जीवंत बनाये रखा है। आयुर्वेद की दक्षिण परम्परा में पं0 अमृतशास्त्री और उनके सुयोग्य पुत्र वैद्यरत्न त्र्यम्बक शास्त्री ने उल्लेखनीय सफलता अर्पित की। अमृत शास्त्री जी विलक्षण शल्य चिकित्सक थे। उन्हें अग्नि कर्म में महारत हासिल था। त्र्यम्बक शास्त्री क्षयरोग के विशेषज्ञ थे। पर्पटी चिकित्सा में उन्होंने महारत हासिल की। वे नाड़ी देखकर ही रोगी की पूर्व घटनाओं को स्पष्ट कर देते थे। इनकी शिष्य परम्परा में श्री निवास शास्त्री,सोना भैया, चुन्नीलाल, दुर्गादत्त, शिवदत्त मिश्र, विश्वनाथ आचार्य और बलदेवजी प्रमुख हैं। श्री निवासजीने चेचक के आधुनिक टीके के बिना निरोध का सफल प्रयास किया।

श्री छन्नूजी पग्गड़ वाले बहुत बड़े विद्वान् वैद्य थे। पं0 हनुमान प्रसाद मिश्र ने उनकी परम्परा को आगे बढ़ाया। बुलानाला मुहल्ले में नागेश्वर प्रसाद मिश्र भारती ने काफी ख्याति अर्जित की। मलदहिया मुहल्ले में साधु मलूकराम, पितरकुण्डा के पं0 बटुक प्रसाद मिश्र एवं जतनबर मुहल्ले के पं0 बद्रीनाथ वैद्य ने काशी में आयुर्वेद की परम्परा को सुदृढ़ता दी। काशी के अन्य विद्वानों में पद्मश्री के0एन0 उडुप्पा, प्रो0 पी0 जी0देशपाण्डे, डॉ0 झारखण्डे ओझा, प्रो0 रामहर्ष सिंह, आचार्य दिवाकर ओझा, प्रो0 वी0एल0 गुरु, डॉ0कविरत्न शर्मा, प्रो0 घनश्याम सिंहल का नाम भी उल्लेखनीय है।

पं0 जगन्नाथ शर्मा वाजपेयी ने अपनी धवल काया, मनः संस्मृति एवं वेषभूषा के द्वारा स्वास्थ्यवर्धक औषधालय के माध्यम से आयुर्वेद की धवल कीर्ति का विस्तार किया। इनके देहावसान के बाद अस्सी क्षेत्र में आयुर्वेद प्रांगण को गौरवान्वित किया पं0 राजेश्वरदत्त शास्त्री आयुर्वेद शास्त्राचार्य ने, जो काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में गृहचिकित्सक से लेकर प्राचार्य पद तक कार्य करते रहे। आयुर्वेद अनुसन्धान के निदेशक भी रहे। इनके रचित दो ग्रन्थ स्वस्थवृत्त समुच्चय तथा चिकित्सादर्श आज भी छात्रों, अध्यापकों तथा चिकित्सकों के कण्ठहार हैं। यह परम्परा आज भी जीवित है तथा अनेक वैद्य आयुर्वेदीय चिकित्सा द्वारा जनसाधारण को लाभान्वित कर रहे हैं।

आधुनिक काल में भी काशी के वैद्यों ने आयुर्वेद-वाङ्मय की समृद्धि में अपूर्व योगदान किया है। डॉ0भास्कर गोविन्द घाणोकर ने सुश्रुतसंहिता की विवेचनात्मक व्याख्या लिखकर एक नवीन शैली का सूत्रपात किया। इनके अतिरिक्त, पं0. दामोदर शर्मा, गौड़, अत्रिदेव विद्यालंकार, पं0 विश्वनाथ द्विवेदी, पं0रमानाथ द्विवेदी प्रभृति विद्वानों ने प्रभूत आयुर्वेदवाङ्मय का सृजन किया।

इस प्रकार वाराणसी प्राचीन काल से आज तक आयुर्वेद का प्रमुख केन्द्र रही है। जहाँ से वैद्यविद्या का आलोक समस्त विश्व में फैलता रहा है। गंगा की अजस्र धारा के समान आयुर्वेद की शाश्वत कल्याणकारिणी पयस्विनी वाराणसी में अनन्तकाल से प्रवाहित हो रही है। बड़े ही खेद की बात है कि भारत में शुद्ध आयुर्वेदिक दवाओं का अभाव हो रहा है। अच्छी देशी दवाओं का मिलना और पहचान बड़ा कठिन हो गया है। एलोपैथिक चिकित्सा के विस्तार से आयुर्वेद की विश्वसनीयता में कमी आयी है। विदेशों में भारत की चीजें मँगाकर दवायें बनायी जा रही हैं। कोश में हर्रें, बहेड़ा, आँवलाँ, करंज, मजीठ, घुँघुची, मूँगा, ब्रह्मबूटी, तुलसी, लौंग, पीपल, गदहपूर्णा, की जड़ आदि कितनी ही ऐसी वस्तुएँ हैं जिनकी व्यासायिक खेती कर निर्यात् की जा सकती है।

काशी में आयुर्वेद की उन्नति के लिए एक शोध शाला की स्थापना होनी चाहिये। जहाँ नयी-नयी दवाओं और जड़ी बूटियों पर खोज और निर्माण हो सके। कम से कम 100 एकड़ का फार्म हो जहाँ दवाओं की खेती हो सके। इन दवाओं के बारे में जन-साधारण को जानकारी देने की भी व्यवस्था होनी चाहिए। इस प्रकार की संस्था स्थापित होने पर आयुर्वेद में मृतसंजीवनी और कायाकल्प की वे शक्तियाँ पुनः उत्पन्न हो सकेंगी जिनके लिये आयुर्वेद विख्यात रहा है। इस प्रकार विदेशों में जाने वाले करोड़ों रुपयों को बचा सकते हैं।

काशी में कुछ वैद्यों ने मरीजों को विशुद्ध आयुर्वेदिक दवा के स्थान पर एलोपैथिक दवा देना प्रारम्भ कर दिया है यह शिकायतें भी सुनने को मिलती हैं। कुछ वैद्य एलोपैथिक की गोलियाँ पीसकर आयुर्वेदिक दवा के नाम से मरीजों को देते हैं। इस प्रकार की धूर्तता से तत्कालीन व्यावसायिक लाभ भले ही मिल जाय लेकिन काशी में आयुर्वेद की महान प्रतिष्ठा को चोट पहुँचती है। आयुर्वेद में महँगी से महँगी एवं सस्ती से सस्ती दवायें उपलब्ध हैं। निर्माण विधि में शुद्धता ही आयुर्वेद का मूलाधार है मशीनी युग में आयुर्वेदिक औषधियों के निर्माण की प्रक्रिया को नष्ट नहीं करना चाहिये। नये-नये जटिल रोगों का निदान आयुर्वेदीय विधि से सम्भव है।

इस प्रकार हमें आशा रखनी चाहिए कि काशी की नई पीढ़ी इस बहुमूल्य धरोहर को न केवल सँभाल कर रखेगी अपितु इसे और भी समृद्ध बनायेगी। (आचार्य प्रियव्रत शर्मा के सुप़ुत्र डा0 मनुव्रत शर्मा के सौजन्य एवं वाराणसी विशेषांक 1986 सन्मार्ग से साभार)

  आचार्य प्रियव्रत शर्मा

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