कला

काशी की नाट्य परंपरा

अलग-अलग शहरों की नाट्य परंपराओं का जिक्र आने पर वाराणसी का स्थान संभवतः सबसे महत्वपूर्ण साबित होगा। महज इसलिए नहीं कि वाराणसी की नाट्य परंपरा बेहद पुरानी और अटूट सिलसिलों वाली है, बल्कि इसलिए भी कि वाराणसी की नाट्य परंपरा में सामान्य जनता के वृहत्तर कल्याण के प्रति जवाबदेही की भावना भी रही है। आज अपनी परंपराओं पर हमारा ध्यान नाट्य के संदर्भ में जितना ज्यादा गया है उतना शायद किसी दूसरी कला के संदर्भ में नहीं। पिछली लगभग डेढ़ शताब्दी से हम जिस आधुनिक नाट्य को अपने जीवन में स्थापित करने की पुरजोर कोशिशों में लगे हुए थे, वह अपनी संपूर्ण अवधारणा में विदेशी था। आज हम अपने समकालीन जीवन मूल्यों के सदंर्भ में नाट्य की प्रासंगिकता नए सिरे से तलाश रहे हैं और इस खोज का एक महत्वपूर्ण आयाम पारम्परिक नाट्य हैं।

 नाट्यशास्त्र के केंद्रीय अनुशासन के बावजूद भारत की नाट्य परम्पराएँ मूलतः आंचलिक और स्थानीय रही हैं। शायद नाट्य कला की मूल प्रकृति ही उसे आंचलिकता से बांधे रहती है। वाराणसी की नाट्य परंपरा को खोजने की कोशिशों का जायजा इसी संदर्भ में लिया जाना चाहिए। यह जितना अकादमिक महत्व का है, उतना ही महत्वपूर्ण नाट्यकर्मियों के लिए भी है। वरुणा और गंगा के तट की यह भूमि, जिस पर आज वाराणसी बसी हुई है, शायद लाखों साल पहले ही मानव जाति से आबाद होती चली आई होगी क्योंकि इसकी भौगोलिक परिस्थितियां आदिमानव के निवास के अनुकूल पड़ती थीं। वाराणसी के आस-पास के पहाड़ी इलाकों की प्राकृतिक गुफाओं और शिलाश्रयों में पाए जाने वाले आदि मानवों द्वारा उकेरे गए चित्र इस बात की पुष्ट गवाही देते हैं।

 नाट्य भी अपने बीज रूप में आदिम चित्रों की भांति आदि मानव की ऐसी क्रियाओं से प्रस्फुटित हुआ है, जिन्हें हम आज रिचुअल की संज्ञा से पहचानते हैं। आदिमानव अपने शिकार में सफलता पाकर उसे अपनी गुफा में ले आते थे और यह सोचते थे कि शिकार ने कृपा करके अपने आपको उन्हें सौंप दिया है ताकि वे अपनी भूख मिटा सकें। इसीलिए वे खाने के पहले उसके प्रति शुक्रिया अदा करते थे ताकि भविष्य में भी उन्हें शिकार मिलते रहें। वे उसे बीच में रखकर उसके चारों ओर घूमते हुए नृत्य-नाट्यमूलक गतियां करते थे, जिसमें शिकार की क्रियाओं का अभिनटन होता था। इसमें वे अक्सर शिकार की खाल और उसके सिर को ओढ़ भी लेते थे। इन्हीं क्रियाओं से नाट्य का रिचुअल वाला रूप बनता चला गया जो सारी दुनिया में अलग-अलग तरह से विकसित मानव समुदायों में तरह-तरह के लोकनाट्यों और पूजा-पाठ, जन्म-मरण, शादी-ब्याह के अवसरों पर रूढ़िगत तौर पर प्रस्तुत होता रहा।

 वाराणसी में आर्येतर जनसमुदायों के बीच इस तरह के अनेक रूप प्रचलित रहे होगें लेकिन यह कहना आज मुश्किल है कि शास्त्रीय नाट्यों पर इनका क्या प्रभाव पड़ा। फिर भी नाट्य के जन्म के संदर्भ में नाट्यशास्त्र तथा अन्यत्र भी जो मिथक हमें उपलब्ध हैं उनके अनुसार नाट्य के स्वरूप के विकास के संदर्भ में शिव का अन्यतम योगदान है। इसीलिए वे नटराज भी कहे जाते हैं और काशी का एक नाम ‘अविमुक्त क्षेत्र’ इसीलिए है कि शिव उसे छोड़कर कभी नहीं जाते। तब इस कल्पना को एक आधार जरूर मिलता है कि नाट्यशास्त्र और संस्कृत नाट्य के विविध रूपों में कहीं न कहीं काशी का महत्वपूर्ण योगदान होना चाहिए।  वह जमाना आद्य नाटकों का था। यह नाट्य कहीं तो नृत्यपरक था और कहीं गायनपरक। कहीं इसमें पुरुषों के युद्ध कौशल का प्रदर्शन था तो कहीं स्त्रियों की शृंगारिक लीलाओं का। इन्हीं में से नाट्यचार्य धीरे-धीरे संस्कृत के क्लासिकी नाट्य का विकास कर रहे थे और उसके लिए सिद्धांतों, नियमों, तकनीक आदि का शास्त्र बना रहे थे। वाराणसी में राजघाट की खुदाई से प्राप्त पुरातात्विक सामग्री और जातक कथाओं में आए संदर्भों में हमें इनके संकेत मिलते हैं।

 कणवेरा जातक के काशी की श्यामा नामक गणिका अपने पलायित प्रेमी का पता लगाने के लिए नटों से सहायता लेती है। नटों को बहुत-सा धन देकर वह उनसे कहती है- ‘तुम्हारे लिए कोई स्थान अगम्य नहीं है। इसलिए तुम गांव-गांव नगर-नगर में जाना और समस्त मंडल में लोगों की भीड़ इकट्ठी कर इस आशय का गीत गाना कि श्याम जी रही है और केवल तुम्हारे लिए ही जी रही है। वह तुमसे प्रेम करती है और बस तुम्ही से प्रेम करती हैं।’  राजघाट की खुदाई में दूसरी शती ई0पूर्व की पत्थर में उकेरी हुई स्त्री की एक ऐसी प्रतिमा मिली है जो हाथ में दर्पण लेकर अपना शृंगार कर रही है। उसकी वस्त्र-भूषा, अंग-भंगिमा, मुख-मुद्रा सब कुछ उसके अभिनेत्री नर्तकी होने का प्रमाण दे रहे हैं। यहीं से मिली कुछ मृण्मूर्तियों में नाट्य की आनुषंगिक कलाओं, जैसे गायन तथा वादन, के कलाकारों के अस्तित्व के प्रमाण मिलते हैं। किन्नर युगल की मृण्मूर्तियों तथा पार्श्वनाथ की प्रस्तर प्रतिमा के ऊपर नागफण पर उकेरी गई गायकों, वादकों की मूर्तियों द्वारा भी ऐसे ही प्रमाण मिलते हैं।

 संस्कृत के क्लासिकी शास्त्रीय नाट्य की परंपरा भी वाराणसी में खूब फली-फूली। उज्जयिनी, विदिशा, पाटलिपुत्र आदि की ही तरह वाराणसी में भी संस्कृत नाट्य की समृद्धि के सारे उपकरण मौजूद थे। प्रशिक्षित नाट्यकर्मी, कलाविलासी नागरिक, राजन्य और श्रेष्ठि वर्ग का धन ऐश्वर्य, बड़े-बड़े प्रासादों के प्रांगण और विशाल मंदिरों के नाट्य मंडप वाराणसी में नाट्य प्रयोक्ताओं को सहज सुलभ थे जिससे वे निश्ंिचत होकर धीरललित नायकों और मुग्धा नायिकाओं को अनेकानेक भावों से भावित करते हुए शरीर, मन और बुद्धि से आरंभ होने वाले अनुभवों के सहारे आहार्य, आंगिक, वाचिक और सात्विक अभिनयों द्वारा रस सृष्टि कर विदग्ध प्रेक्षकों को उसमें आकंठ निमज्जित कर देते थे।  संस्कृत नाट्य के चरम विकास की वाराणसी राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक बड़े परिवर्तनों के दौर से गुजरी। इस दौर में संस्कृत की क्लासिकी शास्त्रीय नाट्य परंपरा क्रमशः छीजती चली गई। उसके अंतिम दौर का एक उदाहरण हमें आठवीं शती की काशी पर आधारित कुट्टनीमतम् नामक ग्रंथ में मिलता है।

 महाराष्ट्र का एक युवा राजकुमार समर भट काशी विश्वनाथ का दर्शन करने वाराणसी पहुंचा। दर्शन के बाद वह मंदिर के सभागार में अपने स्वागत में इकट्ठे सेठों, महाजनों, पुजारियों, पंडितों के बीच बैठा। स्वागत की बहुत-सी औपचारिकताओं के बाद उसने नर्तकों, बंसीवादकों, गायकों और गणिकाओं के दल के बीच बैठे नृत्याचार्य से कहा, ‘अब कहिए आपका सांगीतक कैसा है?’ तब नाट्याचार्य जो कुछ कहते हैं, उससे संस्कृत नाटक की पतनशील अवस्था का पूरा खाका खिंच जाता हैं।  ‘अब नाटक की हालत बड़ी पतली हो गई है। अब तो गुण ग्राहक राजाओं की जगह मोल भाव करने वाले बनिए ही नाटक चला रहे हैं। दूसरी ओर नर्तकियां ढीक और धूर्त हो गई हैं। ऐसे में नाटक में सौष्ठव कहां से आ सकता है? अब तो नाटक करने के लिए नर्तकियां मिलती ही नहीं क्योंकि हम उन्हें पूरी जीविका दे नहीं पा रहे हैं। इसीलिए वे देह विक्रय की ओर ज्यादा झुकती जा रही हैं। वे अपना घर छोड़कर हटना ही नहीं चाहतीं और यदि रंगशाला में पहुंच भी जाती हैं तो जैसे ही यह सुनती हैं कि घर पर कोई आया है, भाग खड़ी होती हैं। अक्सर वे पूर्ण युवती होने के पहले ही दिल दे बैठती हैं। इसलिए अभिनय में अन्यमनस्क बनी रहती हैं। इससे चित्त एकाग्र नहीं होता और बिना एकाग्रता के अभिनय में रमणीयता नहीं आती। महाराज श्री हर्ष का स्वर्गवास होने पर मैं तीर्थ समझकर आजीविका के लिए वाराणसी चला आया और यहां इस मंदिर में आश्रय पाकर ठहर गया। अब तो बिना किसी उत्साह के रत्नावली नाटिका के अभिनय करने के लिए हाथ पैर चलाना भर रह गया।’

 इस तरह संस्कृत नाटक की प्रस्तुतियां तो काशी में धीरे-धीरे निःशेष हो गईं, लेकिन संस्कृत नाटकों और नाट्यशास्त्र के अध्ययन-अध्यापन, टीका तथा व्याख्या की परंपरा बराबर चलती रही। पंद्रहवीं शताब्दी में राघव भट्ट ने अभिज्ञानशाकुन्तल के प्रसिद्ध अर्धद्योतनिका टीका काशी में ही लिखी। इस टीका की बहुत बड़ी विशेषता यह है कि इसमें अभिनय निर्देश के संकेत भी हैं। राघव भट्ट का जन्म और स्वर्गवास काशी में ही हुआ था।  काशी की नाट्य परंपरा के संदर्भ में जैन और बौद्ध नाट्य परंपराओं का उल्लेख भी महत्वपूर्ण है। इन दोनों ही धर्मों का काशी के साथ ढाई हजार साल पुराना संबंध रहा है और दोनों ही धर्मों में नाटक महत्वपूर्ण रहा है। जैन धर्म में तो नाट्य को बहुत अधिक महत्व दिया गया है। श्रावक के कर्तव्यों में अभिनीत करना ही महत्वपूर्ण माना गया है। इसलिए यह अनुमान किया जा सकता है कि काशी में जैन और बौद्ध परंपराओं के नाटकों का अभिनय होता रहा होगा। अवश्य ही इनकी भाषा संस्कृत न होकर पालि, प्राकृत या अपभ्रंश रही होगी।

 वस्तुतः काशी के सबसे समर्थ परंपरा जननाट्यों की ही थी जिसके सबसे प्रारंभिक उदाहरण का संकेत हम कणवेरा जातक के प्रसंग में पहले ही कर आए हैं। जन नाटकों की भाषा प्राकृत, अपभंश, अवहट्ट से लेकर आधुनिक आर्य भाषाओं-हिंदी, भोजपुरी-इत्यादि के रूप में क्रमशः विकसित होती रही। यह परंपरा भी ढाई हजार वर्ष से कम पुरानी नहीं है। संस्कृत नाट्य का कमल इसी निरंतर प्रवाहमान जलाशय में लिखा था। इस परंपरा के प्राचीन प्रमाण बहुत विरल और परोक्ष हैं।  बारहवीं शती के राजा गोविंदचंद्र ने वाराणसी को ही अपनी राजधानी बनाया था। उनके सभा पंडित दामोदर शर्मा ने राजकुमारों को तत्कालीन काशी की जनभाषा सिखाने के लिए उक्ति व्यक्ति प्रकरण नामक ग्रंथ की रचना की थी। इसमें एक उद्धरण आया है- ‘पूत करें बधावें नाच’ अर्थात् पुत्र जन्म पर बधावे और नाच हुआ करते थे। यह कार्य आज भी यहां गौनहारिनें और किन्नर किया करते हैं। नकल इनके प्रदर्शन का प्रमुख अंग है। पुतली खेलाव से मालूम होता है कि उस समय यहां कठपुतली के खले भी होते थे। ‘नटाव बेटी नचाव’ अर्थात नट अपनी बेटियों को नचाते थे। ‘भांडु भंडा अवरहु भंडाव’ यानी काशी में उस समय बड़े ढीठ भांड हुआ करते थे जो डांटने पर और भी ज्यादा भंड़ैती करते थे।

 प्रसिद्ध नाट्य इतिहासकार डॉ0 दशरथ ओझा ने लिखा है। ‘शंकरदेव की भाषा बारहवीं शताब्दी में प्राप्त बनारस के आस-पास की भाषा से बहुत कुछ साम्य रखती है। अभी शोध द्वारा बारहवीं शताब्दी की बोलचाल की भाषा का परिचय प्राप्त हुआ है। आज भी बनारस जिले के पूर्वी भाग की भाषा प्रायः वही जो शंकरदेव के नाटकों के गद्य मे ंपाई जाती हैं’ शंकरदेव असम के अंकिया नाट्क के बहुत प्रसिद्ध नाटककार हैं जिनके नाटक आज भी खेले जाते हैं। अवश्य ही उन्होंने काशी में प्रवास करते हुए यहां परंपरागत चले आ रहे किसी नाट्य रूप से प्रभाव ग्रहण किया होगा, जिसके साथ यहां की भाषा भी उनकी रचनाओं में चली गई होगी।  राजा गोविंदचंद्र के समय में काशी में जन भाषा के साहित्यिक और बोलचाल वाले दोनों रूपों का काफी प्रचलन हो गया था और जन भाषा में जननाट्य के विविध रूपों का भी बहुत विकास हो चला था। भंड कला जिसे अब भांड या भंड़ैती कहते हैं, वह भी जननाट्य का ही एक रूप है जिसकी ओर नाट्यशास्त्र के प्रसिद्ध टीकाकार अभिनव गुप्त ने भी संकेत किया है। इस कला का काशी और आस-पास के क्षेत्रों में निरंतर विकास होता रहा। बनारसी दास ने अपनी आत्मकथा अर्थकथानक में उल्लेख किया है कि व्यापार का दिवाला निकलने पर उन्हेंने भी भंडकला सीखी और उसके प्रदर्शन द्वारा अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने की कोशिश की।

 वस्तुतः लगभग अठ्ठारहवीं शताब्दी तक काशी में जननाट्यों के अनेक रूपों का विकास हुआ और ‘सात वार नौ त्यौहार’ वाली काशी का कोई कोना ऐसा नहीं था जहां निरंतर कुछ न कुछ रंग कार्य न होता रहता हो। काशी पूर्वांचल की नाट्य राजधानी हो चली थी। यहां नाट्यकर्मियों, उनके पोषक संरक्षक नाट्यदर्शकों और नाट्यमर्मज्ञों की सजीव परंपरा विकसित हो गई थी। उस समय नाटकों का सबसे प्रचलित और प्रसिद्ध रूप वह था जो दोहे और चौपाइयों के रूप में लिखा जाता था और प्रस्तुतियों में गाने, नाचने, अभिनय करने और आशुसर्जित संवाद बोलने की प्रथा थी। ऐसा ही नाटक लछीराम ने करूणाभरण नाम से लिखा था और इस नाटक की परीक्षा करने के लिए उन्होंने काशीवासी कवींद्राचार्य सरस्वती को चुना

 लछीराम प्रभु इह बिधि कही, सुधि बुधि सुनत न काहू रही।

 तहं कवींद्र सुरसती संन्यासी पंडित ग्यानी कासी वासी।।

 शास्त्र बेद पुराण बखाणै अर्थ उपनिषद् अनु भै जानें।

 कृष्ण कथा जिन नीकैं सुनी प्रश्न करी तिन ग्यानी गुनी।।

 लछीराम ने अपना पूरा नाटक कवींद्र सरस्वती को सुनाया। उन्होंने कई प्रश्न किए और लछीराम के उत्तर से संतुष्ट हुए। तब लछीराम ने लिखाः

 “जब कवींद्र यूं लई परीच्छ्या तब जानी सतगुरु की सिच्छ्या।”

 इसके बाद इस नाटक का पूरे साजोसमान के साथ अभिनय प्रस्तुत किया गया।

 लछीराम नाटक कह्यौ दीनौ गुनिनु पढ़ाय।

 भेख रेख नर्तन निपुन लीनौ नरनि सधाय।।

 सुहृदमंडली जोरि कै कीनो बड़ो समाज।

 जो उनि नाच्यौ सो कह्यौ कविता में सुख साज।।

 खेद की बात है कि अभी तक हिंदी साहित्य में मध्यकाल के ऐसे नाटकों का ठीक से मूल्यांकन नहीं किया गया है।

 काशी में जननाट्यों की दर्जनों परंपराएं अठ्ठारहवीं शती के अंत तक पूरे दमखम के साथ मौजूद थीं जिनका विस्तार से वर्णन विवेचन करने का यहां अवसर नहीं है।

 लेकिन मध्यकाल में गोस्वामी तुलसीदास ने अपने महान महाकाव्य रामचरितमानस के आधार पर जो रामलीला चलाई वह लगभग चार सौ वर्षों से चली आ रही है और आज यह विश्वप्रसिद्ध हो गई है। इसकी जीवन्तता के पीछे छिपे रहस्यों को खोजने के लिए और इसमें निहित नाट्य के मूल तत्वों को समझने की कोशिश में यूरोप, अमेरिका तथा विश्व के और भी दूसरे भागों से बड़े-बड़े नाट्यकर्मी और विशेषज्ञ यहां प्रतिवर्ष सितंबर-अक्टूबर में आते रहते हैं और इसे लेकर तरह-तरह के मिथक भी गढ़ते रहते हैं। वस्तुतः काशी ने रामलीला के रूप में एक ऐसा सर्वथा विलक्षण नाट्य रूप विकसित किया जो संपूर्ण भारत में अपनी तरह का बिल्कुल अकेला है।

 दरअसल तुलसी ने अपना रामचरितमानस मुख्यतः पढ़ने वाली पोथी की तरह नहीं लिखा था। जितने विशाल जनसमुदाय तक तुलसी पहुंचना चाहते थे उस निरक्षर जनसागर तक तब पोथी की पहुंच कहां संभव थी, इसीलिए व्यापक जनसंपर्क के तत्कालीन साधनों, जैसे कथा वाचन, गायन, नाट्याभिनय आदि के उपयोग की दृष्टि तुलसी में मानस लेखन के आरंभ से ही थी। उसका रूपबंध भी इसी दृष्टि से चुना गया था। वस्तुतः रामचरितमानस का रचना विधान बहुत कुछ मध्यकालीन पारम्परिक हिंदी नाट्य के आलेखों जैसा ही है लेकिन इसके बावजूद तुलसीदास नहीं चाहते थे कि मानस का अभिनय तत्कालीन लोकप्रचलित नाट्य परंपरा में हो। कारण वह परंपरा भोंड़े हास्य, नैतिक पतन और कामुकता का शिकार होकर बेहद भ्रष्ट हो चुकी थी। उसके व्यावसायिक नाट्यकर्मी भी सामाजिक सम्मान से रहित थे। ऐसी स्थिति में उनके हाथ मानस की क्या गति होती, इसे तुलसी अच्छी तरह समझ रहे थे। इसीलिए मानस की अपनी रचना के उद्देश्यों के अनुकूल अभिनय के लिए किसी सार्थक नाट्य रूप की तलाश में वे बराबर लगे रहे। इसके लिए वे नाट्यशास्त्र के गहरे अनुशीलन के साथ ही अपने व्यापक भारत भ्रमण के नाट्याशास्त्र के गहरे अनुशीलन के साथ ही अपने व्यापक भारत भ्रमण के नाट्यानुभवों को टटालते भी रहे। एक बार वे गंगा के तट पर बैठे हुए वाल्मीकिय रामायण ध्यान से सुन रहे थे। राम राज्य का प्रसंग था। सहसा वे अन्यमनस्क हो उठे और गंगा की लहरों को देखने लगे। उनकी चेतना में नाट्यशास्त्र और हनुमन्नाटक साकार हो उठा। तभी उन्हेंने अस्सी घाट के निकट शरत्पूर्णिमा की संध्या के समय रामराज्य की लीला का समारंभ किया। (संदर्भ गौतमचंद्रिका)।

 इस तरह उन्होंने रामलीला का अपना नया नाट्यविधान पा ही लिया। तुलसी द्वारा वाराणसी में प्रवर्तित रामलीला भारत में प्रचलित सैंकड़ों पारम्परिक नाट्यरूपों में से बस एक रूप भर नहीं है। न ही वह राम नाट्यों और लीलाओं की बहुत सारी शैलियों में से महज एक और शैली मात्र है, जैसा कि रामनाट्य पर अनुसंधान करने वाले बहुत से लोगों ने प्रमाणित करने की चेष्टा की है। यह तो सामाजिक बदलावों से गहरा सरोकार रखने वाले एक ऐसे युगपुरुष की संपूर्ण कलात्मक रचनाधर्मिता का सबूत है जो अपनी बात कहने के लिए प्रचलित कला रूपों को मनचाहें तरीकों में ढाल सकता है। तुलसी की रामलीला के जरिए वाराणसी की नाट्य परंपरा ने अपनी एक खास पहचान बना ली। भक्तिकाल की वाराणसी में और भी कई लीलाएं विकसित हुई जिनमें वामनलीला, नृसिंहलीला और कृष्णलीला प्रमुख हैं।  उन्नीसवीं शती में जब आधुनिक युग की शुरूआत हुई तब मध्यकालीन पारंपरिक नाट्य के रूप में इन लीलाओं के अलावा वाराणसी के नाट्य परिवेश में भांड़ों के तमाशे, गौनहारिनों की नकलें, जुगीड़े आदि तथा गायिका नर्तकियों के भावाभिनव नाट्य की आवश्यकताओं की पूर्ति कर रहे थे।

 ब्रितानी उपनिवेशवादियों के भारत आगमन के साथ ही यहां आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में जो अनुक्रिया-प्रतिक्रिया आरंभ हुई, उससे नाट्य भी अछूता न रहा। बल्कि नाट्य के क्षेत्र में तो ब्रितानी माडल कुछ ज्यादा ही निर्णायक साबित हुए और एक प्रकार से संपूर्ण पारम्परिक नाट्य को नकारता एक नया नाट्यान्दोलन भारत में शुरू हो गया। नये नाट्यान्दोलन की यह लहर बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र होती हुई हिंदी के हृदयस्थल वाराणसी में उन्नीसवीं शती के छठें-सातवें दशक तक पहुंच गई।

 उन दिनों बनारस हिंदी माध्यम से बौद्धिकता और राष्ट्रीय चेतना का केंद्र बन रहा था। यहां की परंपराशीलता आधुनिकता के तेज दबाव से बचने की कोशिश में कहीं बीच का रास्ता ढूंढ रही थी। ऐसे परिवेश में यहां के बुद्धिविलासियों और सांस्कृतिक उन्नायकों का ध्यान इस नये नाट्यान्दोलन के संभावनाओं पर भी केंन्द्रित हुआ और वाराणसी में आधुनिक रंगमंच की स्थापना के उपाय सोचे जाने लगे। ऐसे लोगों की अगुवाई की तत्कालीन काशी के महाराज श्री ईश्वरी प्रसाद नारायण सिंह ने। नाट्यकला के उद्धार की सदृइच्छा से उन्होंने उन्नीसवीं शती के छठे दशक के अंत के आसपास अपने दरबारी कवि गणेश को इस दिशा में कदम उठाने की आज्ञा दी। इसे गणेश कवि ने इस प्रकार संकेतित किया है :

 भपमौली श्री ईश्वरी नारायण महाराज।

 लखि मेरे गुन रिझिकै आयुस दिए दराज।।

 गए बीति अनगन बरस नाटक विधि व्योहार।

 भये गुप्त तेहिं प्रगट करि दरसाबो सुखसागर।।

 गणेश ने जो नाटक लिखकर तैयार किया वह बिल्कुल पारम्परिक और छंदबद्ध था। इससे नाट्य की पुनर्स्थापना की महाराज की इच्छा पूरी नहीं हो सकती थी। वह तो कोई ऐसी हिंदी नाट्य प्रस्तुति की परंपरा स्थापित करना चाहते थे जो सामान्य जन को शिष्ट मनोरंजन के साथ चरित्र निर्माण की प्रेरणा दे सके और साथ ही नए ढंग की अंग्रेजी नाट्य प्रस्तुति से टक्कर भी ले सके।  इस तरह का नाट्यालेख तैयार करने की जिम्मेदारी उन्होंने पंडित शीतलाप्रसाद त्रिपाठी को सौंपी। त्रिपाठी जी ने क्लासिकी संस्कृत नाटक, पारंपरिक रामलीला और यूरोपीय नाट्य प्रस्तुति के तत्वों को लेकर रामचरितमानस के आधार पर जानकी मंगल नाटक लिखकर तैयार कर दिया। इसकी प्रस्तुति का उत्तरदायित्व बाबू उश्वर्यनारायण प्रसाद सिंह को सौंपा गया। उन्होंने मुख्य रूप से रामलीला के अभिनेताओं को लेकर रिहर्सल शुरू कर दिया। नवागत नाट्य प्रस्तुति की शैली के अनुसार चित्रित पर्दों को भी तैयार कराना था। उस समय महाराज के दरबार में कंपनी शैली के कुछ महत्वपूर्ण चित्रकार मौजूद थे। उन्होंने तीन-चार पर्दे तैयार कर दिए। संगीत वृंद (आर्केस्टा) के लिए दरबार के संगीतज्ञों से तैयारी करायी गई।

 अब प्रश्न था नाट्य प्रस्तुति के लिए स्थान कौन-सा चुना जाए। उस समय सबसे महत्वपूर्ण संभावित दर्शक अंग्रेज सैनिक और नागरिक अधिकारी थे जो मुख्य रूप से कैंटोनमेंट क्षेत्र में और उसके आसपास रहते थे। अंग्रेज अधिकारियों के मनोरंजन के लिए पचीस-तीस वर्ष पहले काशी के एक प्रतिष्ठित नागरिक, महाराज विजयानगरम् ने एक भवन यहीं बनवा दिया था जिसमें एक बड़ा हाल और कई कमरे तथा एक अहाता था। यहां अंग्रेज अधिकारी सपरिवार इकटठे् होते, नाचते-गाते और शौकिया छोटे-मोटे नाटक भी कर लेते। इसीलिए इस इमारत का नाम ‘असेंबली रूम्स एंड थियेटर’ रखा गया। लेकिन साधारण जनता ने इसका टकसाली नामकरण किया ‘नाचघर’ जानकी मंगल की प्रस्तुति के बाद भारतेन्दु ने इसे बनारस की नाट्यक्रियाओं के केन्द्र के रूप में देखा और अपनी ओर से इसका नामकरण किया ‘बनारस थियेटर’ लेकिन पंडित शीतलाप्रसाद ने इसके सरकारी संबंधों और अपनी राजभक्ति के कारण इसे ‘थियेटर रॉयल’ कहा। महाराज बनारस ने फैसला किया जानकी मंगल का अभिनय यहीं होगा। तिथि निश्चित की गई- चैत्र शुक्ल एकादशी संवत 1925 वि0 तदनुसार 3 अप्रैल 1868 ई0।  उस दिन बनारसियों के ऊपरी तबके में बड़ी गहमागहमी थी। बड़े-बड़े रईस, बुद्धिविलासी, कुछ महत्वपूर्ण महिलाएं, देशी और विलायती हाकिम, सैनिक अधिकारी, पहुंच वाले पंडित, ब्राह्मण, सबके बग्घी, फिटिन, इक्के, घोड़े, हाथी आदि के तामझाम कैंटोनमेंट के असेंबली रूम्स की ओर मुखातिब थे। सब महाराज बनारस द्वारा आयोजित ‘नया तमाशा थियेटर’ देखने को उतावले।

 लेकिन वहां जुटी महफिल में तब खलबली मच गई जब यह मालूम हुआ कि लक्ष्मण बनने वाला लड़का बीमार पड़ गया। अब नाटक किसी दूसरे दिन के लिए स्थगित हो गया। तभी वहां अठ्ठारह साल के हरिश्चंद्र आ पहुंचे। उन्हें नाटक का स्थगित किया जाना पसंद नहीं आया और बड़े उत्साह, साहस और आत्मविश्वास के साथ उन्हेंने स्वयं लक्ष्मण की भूमिका में उतरने की पेशकश की : मैं लक्ष्मण बनूंगा, पोथी मुझे दीजिए, पाठ देखूं।’ महाराज ने कहाः ‘इस समय याद होना कठिन है।’ हरिश्चंद्र ने कहा : ‘गुस्ताखी माफ हो। मैं एक पाठ क्या संपूर्ण जानकी मंगल स्मरण कर लूंगा। एक बार देखना भर चाहिए।’ महाराज ने पुस्तक दी और भारतेन्दु ने घंटे भर के भीतर महाराज के हाथ में वह पुस्तक देकर ज्यों का त्यो अक्षर-अक्षर जानकी मंगल सुना दिया। तब महाराज बहुत प्रसन्न हुए। हरिश्चंद्र लक्ष्मण बने और नाटक खेला गया।  प्रेक्षक के रूप में समवेत सांस्कृतिक नेतृत्व करने वाले काशी के विशिष्ट और प्रभावशाली नागरिकों ने सूत्रधार के मुंह से नाट्यकला के नवीन अवतार की स्पष्ट घोषणा सुनी। यह प्रस्तुति सिर्फ वाराणसी के आधुनिक नाट्य युग की ही शुरूआत नहीं थी बल्कि पूरे हिंदी क्षेत्र में आधुनिक नाट्य का समारंभ था।

 इस घटना के बाद भारतेन्दु के मन में हिंदी नाटक लेखन और उसके अभिनय के प्रति बेहद उत्साह जग गया और शीघ्र ही उन्होंने नाटक लिखना आरंभ कर दिया। लेकिन उससे भी बड़ा काम उन्हेंने यह किया कि वाराणसी में उन्होंने अपना एक नाट्य दल बना लिया जिसके प्रमुख कार्यकर्ता राधाकृष्ण दास, रविदत्त शुक्ल, दामोदर शास्त्री, पं0 चिंतामणि, पं0 माणिक लाल जोशी और उनकी मित्र मंडली के कई सदस्य थे। इसके द्वारा उन्होंने न केवल वाराणसी में, बल्कि बलिया के मेले में जाकर भी नाट्य प्रस्तुतियां की। उनके एक अभिनय का आंखों देखा विवरण अभी भी उपलब्ध है। गोपाल राम गहमरी ने एक संस्मरण में लिखा है : काशी के बाबू हरिश्चंद्र ने बलिया में सत्य हरिश्चंद्र नाटक स्वयं हरिश्चंद्र बनकर खेला था जिसमें हिंदी के सुलेखक बाबू राधाकृष्ण दास सरीखे हिंदी सेवक और रविदत्त शुक्ल जैसे कवियों ने पार्ट लिया था। उस समय पर्दा और सीनों का जमाव नहीं था, लेकिन जो कुछ स्टेज उस समय बना था- बजाज के कपड़े तानकर जो काम भारतेन्दु ने दिखाया था उसकी महिमा यूरोपियन महिलाओं तक ने गायी थी। उस समय के कलक्टर साहब की मेम ने आंसुओं से भरा रुमाल निचोड़कर जब साहब की मार्फत भारतेन्दु जी से आग्रह किया था कि रानी शैव्या का श्मशान में विलाप अब धीरज छुड़ा रहा है, सीन बदला जाए तो इस पर सत्य हरिश्चंद्र बने हुए भारतेन्दु ने स्वयं ओवर एक्ट किया था और दर्शक मंडली में करुणा के मारे त्राहि-त्राहि मच गई थी।

 भारतेन्दु के इस रंगकार्य ने काशी ही नहीं, पूरे हिंदी क्षेत्र के साहित्यकारों और अन्य प्रतिष्ठित बुद्धिवादियों के मन में रंगकार्य के प्रति ऊंचा भाव पैदा किया और उन्हें रंगकार्य करने की ओर प्रेरित किया जिससे सोद्देश्य सार्थक और जन कल्याणकारी नाट्य लेखन और प्रस्तुति की बड़ी समर्थ परंपरा सिर्फ काशी में ही नहीं बल्कि पूरे हिंदी क्षेत्र में चल पड़ी। भारतेन्दु की ही प्रेरणा के फलस्वरूप काशी में नाटक करने के लिए नाट्य संस्थाओं का बनना आरंभ हो गया। ऐसी जिस पहली संस्था की सूचना हमें मिलती है उसका नाम था ‘द इंडियन नैशनल थियेटर’। आगे चलकर बीसवीं शताब्दी में काशी में जो पहली महत्वपूर्ण नाट्य संस्था बनी, उसका नाम ‘श्री नागरी नाट्यकला संगीत प्रवर्तक मंडली’ (1906 ई0) था। यही संस्था आगे चलकर दो संस्थाओं में बंट गई- भारतेन्दु नाटक मंडली और नागरी नाटक मंडली। इन दोनों ही मंडलियों ने काशी में रंगकर्म की बड़ी ही शक्तिशाली परंपरा कायम की जिससे सैकड़ों की संख्या में अभिनेता तैयार हुए। इन संस्थाओं ने नाट्य प्रस्तुतियों के लिए काशी में एक जीवंत परिवेश रचा, जिसके तहत यहां के विद्यालयों, क्लबों और अनेक तरह की संस्थाओं द्वारा नाटक खेले जाने लगे और काशी में समय के अनुकूल नाट्य प्रस्तुति का इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार हो गया।

 बीसवीं शताब्दी के तीस के दशक तक नाट्य प्रस्तुतियों का सिलसिला काफी अच्छा और भरा पूरा था और इसका मॉडल पूरी तरह से पारसी व्यावसायिक रंगमंच था। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात, जो उस समय के रंगमंच के विश्लेषण से ज्ञात होती है, वह यह कि यहां नाट्य की दो समानान्तर धाराएं बनने लग गई थी। एक धारा तो पूरी तरह से पारसी व्यावसायिक रंगमंच का अंधानुकरण और नकल थी जिसमें ज्यादा सफल होने वाले पारसी रंगमंच के नाटकों का थोड़ा हिंदीकरण करके और कुछ बदलकर नाटककार अपना नया नाटक तैयार कर उसे खेलने के स्तर पर भारतेन्दु की ही परंपरा में गंभीर, सोद्देश्य और सरस ऐसे नाटक लिखने की थी हो हिंदी साहित्य की श्रीवृद्धि कर सके और साथ ही हिंदी का अपना स्वतंत्र रंगमंच बनाने के लिए प्रेरणा दे सके। दूसरी धारा के रंगकर्मी साहित्यिक नाटक और पारसी व्यावसायिक प्रस्तुति शैली के बीच किसी तरह का समझौता करने की कोशिश के साथ आगे बढ़ रहे थे क्योंकि प्रस्तुति शैली का दूसरा विकल्प उन्हें मिल नहीं रहा था।

 काशी को इस बात का गर्व है कि भारतेन्दु के अलावा उसने जयशंकर प्रसाद के रूप में हिंदी के महान साहित्यिक नाटककार और आगा हश्र के रूप में पारसी व्यावसायिक शैली के महान नाटककार को जन्म दिया। इतना ही नहीं, शायद यह काशी के समृद्ध नाट्यपरिवेश की करामात थी कि प्रेमचंद जैसे महान उपन्यास और कहानीकार ने भी मौलिक नाटक लिखे और नाटकों के अनुवाद भी किए। काशी के नाट्य परिवेश ने हिंदी के माध्यम से नाट्य के सैद्धांतिक और शास्त्रीय अध्ययन तथा अभिनीत नाटकों की समीक्षा की भी सुदृढ़ परंपरा आरंभ की।

 बीसवीं शती के चौथे दशक के शुरू में बोलती फिल्मों का निर्माण आरंभ हो गया। इसने व्यावसायिक सफलता का नया दरवाजा खोला दिया। इस नए व्यवसाय में पूंजी की तुलना में मुनाफा कई गुना ज्यादा होने की संभावना नजर आई। इससे नाट्य व्यावसायिकों का दल तुरंत इस ओर झुकने लगा। नाटक कंपनियां बंद होने लगीं और नाट्यशालाएं सिनेमाघरों में रूपांतरित की जाने लगीं। आगा हश्र ने 1933 ई0 में स्पष्ट कह दिया- ‘अब थियेटर नहीं चलेगा। उसका स्थान फिल्म लेगी।’ इसी समय जयशंकर प्रसाद भी इस बात को लक्ष्य करते हैः ‘हिंदी का कोई अपना रंगमंच नहीं है। जब उसके पनपने का अवसर था तभी सस्ती भावुकता लेकर वर्तमान सिनेमा में बोलने वाले चित्रों का अभ्युदय हो गया और फलतः अभिनयों का रंगमंच समाप्त-सा हो गया।’  इसी चौथे दशक उत्तरार्थ में आगा हश्र (1935 ई0) और जयशंकर प्रसाद (1937 ई0) दोनों महान नाटककार भी रंगमंच की जगमगाती दुनिया को उजड़ती देखकर दूसरी दुनिया के लिए कूच कर गए। इस तरह ब्रिटिश औपनिवेशिक युग में अंग्रेजी के साथ आने वाले हलचल से भरे एक नाट्य युग का का अंत हो गया।

 इस घटना का असर काशी के नाट्य परिवेश की नियति पर पड़ना ही था। यहां के नाट्यशालाएं भी धड़ाधड़ सिनेमाघरों में बदल गईं। व्यावसायिक रंगमंच के अनुकरण पर चलने वाली काशी की शौकिया नाट्य संस्थाएं दम तोड़ने लगीं। जैन नाटक मंडली काशी की शौकिया नाट्य संस्थाएं दम तोड़ने लगीं। जैन नाटक मंडली बंद हो गई। नागरी नाटक मंडली की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ थी और यह अपना पक्का रंगमंच बनवा रही थी। तब भी 1935 ई0 से 1947 ई0 के बीच यह बस मात्र तीन नाटक खेल सकी। पहले से ही लड़खड़ाती हुई चलने वाली भारतेन्दु नाटक मंडली का भी कोई पुरसाहाल न रहा। छोटी-मोटी इस तरह की और दूसरी संस्थाओं का तो कहीं पता भी न चला। नाटकों का अभिनय अब किसी स्कूल और कॉलेज या दूसरी तरह की संस्था के समारोहों पर यदा-कदा होने वाली प्रस्तुतियों तक ही सीमित रह गया। इस तरह भारत की स्वतंत्रता के पूर्व के काशी के रंगमंच के इतिहास की कहानी पूरी हुई। स्वतंत्रता के बाद की काशी के रंगमंच का इतिहास मेरे रंग अनुभवों से प्रत्यक्षतः जुड़ा हुआ है जिसकी कहानी फिर कभी।

– कुंवरजी अग्रवाल

जंगे-आजादी में काशी की कला का योगदान

उपनिवेशवाद को पोषक पश्चिम वालों का औपनिवेशिक देश की लम्बी गुलामी के लिए उसकी कला, संस्कृति और इतिहास पर हमला एक मुख्य औजार है, दुनिया के जिस भाग में तिजारत और फौजी ताकत के बल बूते पश्चिम वालों ने अपना उपनिवेश कायम किया। वहां के लोगों को उनकी कला, संस्कृति और इतिहास से बड़ी बारीकी से बेदखल भी किया। उनका यह काम एक सोची समझी योजना के तहत ही हुआ। क्योंकि वे इस बात को अच्छे से जानते हैं, कि कला संस्कृति और इतिहास किसी समाज की नींव है और उसमें उसके स्वाभिमान की मूल शक्ति निहित होती है। वास्तव में स्वाभिमान रहित कोई भी समाज शक्तिविहीन और मृतप्राय सा हो जाता है। अतः किसी समाज को लम्बे समय तक राजनैतिक और मृतप्राय सा हो जाता है। अतः किसी समाज को लम्बे समय तक राजनैतिक और दिमागी रूप से गुलाम बनाये रखने के लिये उसकी सामाजिक, सांस्कृतिक और कलात्मक चेतना को कुन्द बनाकर उसे निष्क्रिय बनाने का सबसे सशक्त और आजमाया हुआ औजार है। हाल के दिनों में इराक युद्ध के दौरान अमेरिका ने इसी रास्ते पर चलते हुये इराकी संग्रहालयों से विश्व की प्राचीन बेबीलोनी सभ्यता की कला एवं पूरी सामग्रियों को रटकर इराकियों को उनके कला संस्कृति, स्वाभिमान से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा से काटने का ही रास्ता अख्तियार किया है।

भारतीय कला संस्कृति पर गोरों का हमला सन् 1857 की ‘जंगे आजादी’ के बाद अंग्रेज यह अच्छी तरह से समझ गये थे कि अब फौजी, तिजारती और फरेबी रास्ते से हिन्दुस्तान के लोगों को लम्बे समय तक गुलाम बनाये रखना मुमकिन नहीं है। इस बात को अच्छी तरह समझते हुये अंग्रेज अपनी सोची समझी कुटिल चाल के तहत बड़ी बारीकी से वे हिन्दुस्तानियो को उनकी कला, संस्कृति, इतिहास और परम्परा से काटने में लग गये। अपनी कुटिल चालों से हिन्दुस्तान की लम्बे समय तक गुलाम रखने की चाहत में अंग्रेज के इसी चाल का सहारा लेकर काम करने लग गये। उन्होंने भारतीय कला, संस्कृति और परम्राओं पर बड़ी बारीकी से हमला करते हुये उसे महत्त्वहीन और अनुपयोगी प्रमाणित करना शुरू कर दिया।

राष्ट्रप्रेम कलाकारों की पहल अंग्रेजों की इस कुटिल चाल को राष्ट्रप्रेमी भारतीय कलाकारों ने अच्छी तरह भांप लिया और वे उसके प्रतिकार में जोर शोर से लग गये। भारतीय कला के संरक्षण, विकास और उत्थान के इस काम की शुरूआत बंगाल से हुई, जिसके मुख्य नायक थे, अवनिन्द नाथ ठाकुर और उनके सहयोगी शिल्पाचार्य नन्दलाल बोस, अमित कुमार हल्दार, शैलेन्द्र डे, क्षितिन्द्रनाथ मजुमदार जैसे कलाकार एवं उनके अन्य सहयोगी। इस क्रम में पश्चिम भारत के आचार्य रविशंकर रावत जगन्नाथ मुरलीधर अहिवासी, कलकत्ता स्कूल ऑफ आर्ट के प्राचार्य ई0वी0 हैवेल जैसे कलाकार भी शामिल थे। इन सभी कलाकारों ने मिलकर भारत के कला ‘पुनर्जागरण’ आन्दोलन चलाकर स्वदेशी कला के द्वारा आजादी का अलख जगाया।

भारतीय कला पुनर्जागरण आन्दोलन में काशी की भागीदारी अवनीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा आजादी के परिपेक्ष्य में शुरू कला पुनर्जागरण के इस भारतीय आन्दोलन में काशी की भी काशी की भी अपनी विशेष भूमिका रही है, जिसके नायक थे , काशी के ‘कला सपूत राय कृष्णदास। रायकृष्णदास से ठाकुर अवनिन्द्रनाथ के बड़े आत्मीय सम्बन्ध थे। अवनिन्द्रनाथ के ‘राष्ट्रीय कला जागृति आन्दोलन से राय कृष्ण दास अपने को अलग नहीं रख सके बल्कि उसमें तन-मन से सक्रिय हो गये। राय साहब अपनी इस सक्रियता को साकार बनाने के लिये काशी के पारम्परिक कलाकार उस्ताद राम प्रसाद और शारदा प्रसाद को साथ लेकर काशी में पारम्परिक भारतीय मूल की विषय वस्तु पर आधारित चित्रों की रचना से पारम्परिक भारतीय कला की समृद्धि की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया।

1907 ई0 में जब मुगल शैली के काशी के सशक्त चित्रकार रामप्रसाद रायकृष्णदास जी के सम्पर्क में आये उस समय उनके पास काशी में प्रचलित उत्तर मुगल शैली की एक समृद्ध कला परम्परा थी। यद्यपि उस समय काशी में वे अपनी कला विधा के सर्वोच्च ऊंचाई के धारक थे। लेकिन इन्हीं विशेषताओं ने उन्हें उनकी परम्परागत कला से बाहर आकर मुक्ताकाश में उठकर दुनिया भर के कला क्षेत्र में हो रहे बदलावों के प्रति उदार और जिज्ञासु बनने से रोक रखा था। सम्भवतः इस स्थिति के लिये उनकी तालीम, पारिवारिक पृष्ठभूमि और कला के प्रति व्यापक सोच की कमी ही जिम्मेदार रही। कला पारखी रायकृष्णदास जी ने इस स्थिति को अच्छी तरह समझा और उस्ताद रामप्रसाद को लेकर अपने सीमित उपलब्ध साधनों में ही कला की इस स्थानीय शैली के संरक्षण और विकास का मार्ग प्रशस्त किया। यद्यपि यह कार्य बेहद चुनौतीपूर्ण था, लेकिन राय साहब ने अपने संघर्ष और धैर्य के बल पर उस्ताद राम प्रसाद के माध्यम से काशी मूल की इस भारतीय कला को पुनर्जागरण का साधन बनाकर कुटिल अंग्रेजी चालों का काशी में मजबूती से मुकाबला करते हुये, आज़ादी की लड़ाई को अपना महत्त्वपूर्ण कलात्मक योगदान प्रदान किया।

इस दिशा में रायकृष्ण दास का काशी में स्थानीय (भारतीय) कला पुनरूद्धार आन्दोलन के द्वारा आजादी की लड़ाई का इस दृष्टि से भी विशेष महत्व है कि कला के माध्यम से आज़ादी की लड़ाई में तत्पर भारतीय कला के पुनरूद्धार आन्दोलन की जन्मभूमि से दूर रहकर भी काशी को अपना कर्म क्षेत्र बनाकर इस आन्दोलन को विस्तार दिया। उनके आन्दोलन के उत्कृष्ठ प्रमाण हैं, उनके निर्देशन में उस्ताद रामप्रसाद जैसे घरानेदार पारम्परिक कलाकार ने राधा और उनकी सखियों के कमल सरोवर में स्नान के दृश्य को श्री कृष्ण छुपकर देखने की कथापरक दृश्य अंकित किया। इसके अलावा रायकृष्णदास जी ने अपने निर्देशन में उस्ताद रामप्रसाद से मुगलशैली की अनेक प्रतिकृतियां भी बनवाई, जिसमें ‘माता मरियम और शिशु ईसा’ नामक रचनायें विशेष चर्चित हुई है। रायकृष्णदास ने भारतीय कला के विकास के रूप में स्थानीय कला को और विस्तृत रूप देने के लिये उस्ताद रामप्रसाद के पुत्र शारदा प्रसाद को अपने सहयोगी और शिष्य के रूप में लिया। उन्होंने उस्ताद रामप्रसाद के द्वारा काशी की इस कला के आगे विकास के लिये शागिर्दों के न तैयार किये जोन पर स्वयं आगे आकर उस्ताद शारदा प्रसाद को अपनी विलक्षण कलात्मक क्षमता से अर्जित ज्ञान से कला की इस स्थानीय विधा से लैस किया। वास्तव में उस्ताद रामप्रसाद की उदासीनता के चलते एक ऐसा समय आ गया, जब काशी में ‘सिक्खी ग्वाल’ के द्वारा प्रारम्भ की गई, उत्तर मुगल कालीन चित्र कला शैली की शिक्षा किसी को न दिये जाने के कारण काशी की इस विधा के लुप्त हो जाने का खतरा पैदा होने लग गया था। ऐसे कठिन समय में रायकृष्णदास जी ने अपनी सूझ-बूझ और विलक्षण क्षमता के बल पर उस्ताद शारदा प्रसाद को अपनी शागिर्दी में काशी की इस स्थानीय कला की तालीम प्रदान किया और इसे जिन्दा बचाकर और आगे बढ़ाया। वास्तव में रायकृष्णदास ने अपने कला आन्दोलन के द्वारा उस्ताद शारदा प्रसाद को सहयोगी बनाकर काशी की इस कला शैली को उस्ताद राम प्रसाद की सीमाओं से और आगे ले जाने का काम किया। इस प्रकार रायकृष्णदास की कलात्मक सोच के आधार पर भारतीय मूल की स्थानीय कलासृजन के रूप में बनी इन कलाकृतियों को निम्न भागों में बांटा जा सकता है।

(1)  विस्मृत होते मुगलशैली के चित्रों का निर्माण।

(2)  देश में अनुपलब्ध विशेष चित्रों की अनुकृति रचना।

(3)  पहाड़ी शैली के चित्रों का संरक्षण।

(4)  भारतीय महापुरूषों के चित्र निर्माण।

(5)  दुर्लभ चित्रों की अनुकृति और उनका मरम्मती कार्य। रायकृष्णदास के उपरोक्त कलात्मक कार्यों पर व्यापक दृष्टिपात करने पर यह बात स्पष्ट हो जाती है कि उन्होंने काशी में रहकर भारतीय कला के पुनर्जागरण के क्षेत्र में स्थानीय कला के माध्यम से व्यापक कार्य करते हुये कला को औज़ार बनाकर आज़ादी की लड़ाई में अवनिन्द्रनाथ ठाकुर की अगुआई में शुरू कला आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

काशी की बौद्धकला

बौद्ध मूर्ति कला के प्राचीन केन्द्र सारनाथ की शैली का प्रभाव भारत में अन्यत्र बनी मूर्तियों के अलावा जावा, द्वीप की बौद्ध मूर्तियों में भी साफ झलकता है। सारनाथ की मूर्ति कला का प्रभाव मथुरा और अजन्ता की मूर्तियों पर भी स्पष्ट रूप से दिखता है। यह इस बात का प्रमाण है कि सारनाथ की तत्कालीन मूर्तिकला भारत की प्रतिनिधि मूर्तिकला है। गुप्त काल में पांचवी एवं छठीं शती में सारनाथ में बुद्ध प्रतिमाओं का निर्माण एक नये सफल और सुन्दर रूप में हुआ। पांचवीं शती के अन्त में सारनाथ में बज्रपर्यकासन मुद्रा में बैठी हुई मूर्ति बुद्ध की मूर्ति का निर्माण हुआ। इसका हाथ धर्म चक्र प्रवर्तन मुद्रा में है। इस प्रतिमा के कलात्मक पर प्रकाश डालते हुए प्रसिद्ध कलाविद एवं इतिहासकार आनन्द वेंकेटश कुमार स्वामी ने इसे ‘शुद्धशील’ की संज्ञा दी है। बुद्ध के प्रथम धर्मोपदेश का मूर्तियों में सफल अंकन गुप्त काल में ही हुआ है। सारनाथ संग्रहालय के केन्द्रीय कक्ष में प्रदर्शित इस प्रतिमा पर पांच भिक्षुओं एवं एक महिला के साथ बच्चे को भी आंका गया है। सम्भवतः ये वही भिक्षु हैं जिन्हें बुद्ध ने प्रथम धर्मोपदेश के बाद अपने पथ में शामिल किया था। इस मूर्ति को पीठिका के मध्य भाग में धर्मचक्र है जो इस घटना का प्रतीक है। इस प्रतिमा का संयोजन सम-बाहु त्रिभुज के आकार में हुआ है। धर्मचक्र प्रवर्तन मुद्रा की बुद्ध प्रतिमा के चेहरे पर पूर्ण सौम्यता का अभाव है। अधखुली आँखें (नासाग्रदृष्टि) योग की भावनात्मक अनुभूति को प्रदर्शित करती है। यहां ऐसा प्रतीत होता है कि बुद्ध तमाम सांसारिक विमाहों से मुक्त होकर अर्न्तमुखी हो गये हैं। चुनार के बलुआ पत्थर में बनी यह मूर्ति कलात्मक दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इस प्रतिमा में बुद्ध को सिल्क की तरह पारदर्शी चीवर में दिखाया गया है, जिसमें उनकी सम्पूर्ण काया परिलक्षित होती है। प्रतिमा पर अंकित चीवर तत्कालीन बनारस के सिल्क की याद दिलाता है। चीवर के नीचे शरीर की सुडौलता दर्शनीय है। अण्डाकार सुकोमल सिर के पार्श्व भाग में वृत्ताकार प्रभामण्डल है, जिस पर कमल की बेल व मोतियों की माला का एक वृत्त में अलंकरण है। इन संकेन्द्रीय वृत्तों की गति को ऊपर अंकित दो गन्धर्वों ने जैसे रोक सा दिया है। एक आयताकार पीठिका पर सम बाहु त्रिभुज के रुप में बुद्ध आकृति के पीछे वृत्ताकार प्रभामण्डल का ज्यामितीय अंकन सारनाथ के प्रभावशाली कला की अभिव्यक्ति है इस कला ने वृहत्तर भारतीय मूर्तिकला को एक नया आयाम प्रदान किया है

इसी प्रकार की वैरोचन बुद्ध की प्रतिमा बोरोबुदूर (जावा) के स्तूप हैं जिनमें बर्फीदार जालियों का अलंकरण है। ये सभी तीन संकेन्द्रीय वृत्तों में संयोजित है। प्रत्येक स्तूप में बुद्ध धर्मचक्र प्रवर्तन मुद्रा में बज्रपर्यकासन में बैठे हुए हैं। ये सभी प्रतिमाएं समबाहु त्रिभुज में संयोजित है। शरीर की कोमलता भी सारनाथ की बुद्ध मूर्ति की तरह ही है। इन मूर्तियों के वस्त्र भी पारदर्शी स्तूप की प्रतिमा की बनावट में कोई फर्क है तो वह है चेहरे के आकृति की भिन्नता। यहां चेहरा जावा के जातीय स्वरूप जैसा है। इसके अतिरिक्त शारीरिक बनावट व मूर्तिशास्त्र की दृष्टि से ये प्रतिमाएं सारनाथ में बनी मूर्ति जैसी ही हैं।

सारनाथ में कुमार गुप्त द्वितीय व बुद्धगुप्त के काल में बुद्ध की खड़ी प्रतिमायें भी बनी थीं। विश्व प्रसिद्ध अजन्ता की गुफाओं में गुफा सं0 19के आगे वाले हिस्से पर बनी बुद्ध की खड़ी प्रतिमा पर सारनाथ का प्रतिमाओं का सीधा और स्पष्ट प्रभाव दिखाता है। इन गुफाओं को वाकाटक राजाओं ने बनवाया था। वास्तव में सारनाथ की प्रतिमायें अपने समय के भारतीय बौद्ध मूर्तिकारों के लिए ‘माडल’ के रूप में थीं ये अजन्ता से होकर समुद्र मार्ग से श्रीलंका होते हुए बोरोबुदूर जा पहुंची। सारनाथ की मूर्तियों के कटिभाग की बनावट बोरोबुदूर की प्रतिमाओं में भी मिलती है। इसके विषय में विद्वानों का मत है कि यह भारतीय नृत्यका से ली गई है लन्दन के ब्रिटिश म्यूजियम में संग्रहित सारनाथ से प्राप्त भद्रासन में बैठी एक बुद्ध प्रतिमा का हाथ धर्मचक्र प्रवर्तन मुद्रा में है। इसी प्रकार की एक प्रतिमा अजंता की गुफा सं0 16 में बने स्तूप पर भी अंकित है। इसी शैली पर चण्डी में दूत तथा जावा की 9वीं-10वीं शदी की कांस्य बुद्ध प्रतिमा बनी। प्रसिद्ध विद्वान त्रय ओ0सी0 गांगुली, डी0पी0 घोष व हाल्ट के प्रभाव का परिणाम माना है। सारनाथ की यह मूर्ति शैली किस प्रकार अजन्ता से होते हुए जावा पहुंची, इसके विषय में विचारकों का मत है कि व्यापार, विवाह और धर्मप्रचार के लिए भारत आने वाले लोग जब लौटते थे, तब अपने साथ मूर्तियों की छोटी प्रतिकृतियां ले जाया करते थे। उस काल में भारतीय राजकुमार इण्डोनेशियाई कन्याओं से विवाह करते थे। जावा में भारतीय बस्तियों के माध्यम से धर्म और तकनीक का खूब प्रचार होता था। इसके अतिरिक्त जावा में ब्राह्मणों ने भारतीय धर्म और कला का खूब प्रचार प्रसार किया। कश्मीर का गुनवरमन नामक राजकुमार सुवर्ण द्वीप गया था वहां उसने बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार किया।

नालन्दा से धर्मपाल नामक विद्वान भी इण्डोनेशिया गये थे। गोंड के राजकुमार घोष, बज्रबोधि एवं अमोधबज्र नामक व्यक्ति भी चीन जाते हुए विजयद्वीप में ठहरे थे। इतशिंग के अनुसार श्री विजय द्वीप नामक स्थान महायान व संस्कृत विद्या का महत्वपूर्ण केन्द्र था। इसी स्थान से भारतीय कला का प्रवेश इण्डोनेशिया में हुआ था। इण्डोनेशिया के तीर्थयात्री भी भारत आया करते थे, जिसे देव भूमि कहा गया है। इस बात की पुष्टि देवपाल नामक पालवंशीय राजा के नालन्दा चार्टर द्वारा होती है।

जब भी विद्वान, विद्यार्थी, तीर्थयात्री भारत आते थे तो वापस जाते समय अपने साथ संस्मरण के लिए प्रस्तर व कांश्य प्रतिमाएं ले जाते थे। ये गुजरात के कच्छ बंगाल के ताम्रलिपि व उड़ीसा के पल्लूर बन्दरगाहों द्वारा वापस जाते थे। ये गुजरात के कच्छ बंगाल के ताम्रलिपि व उड़ीसा के पल्लूर बन्दरगाहों द्वारा वापस जाते थे। बौद्ध मण्डल उपासना में विश्वास रखने वाले व्यक्ति एक प्रतिमा ही नहीं, बल्कि बज्रयान और तंत्रयान से सम्बद्ध सभी देव परिवारों की प्रतिमाएं अपने साथ ले जाते थे। यही कारण है कि सारनाथ शैली का प्रभाव बौद्ध प्रतिमा विज्ञान की जटिलताएं जावा द्वीप में बड़ी आसानी से मिल जाती है। आरम्भ में वाकाटक व पाल कला सारनाथ शैली से प्रभावित हुई, उसके बाद इसका प्रभाव 9वीं शती में जावा की कला पर स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगा। इस प्रकार वाकाटक व पाल मूर्तिकला बृहत्तर भारत में सारनाथ शैली के प्रचार-प्रसार की मजबूत माध्यम बनी। इसी प्रकार सारनाथ काशी की कला न केवल काशी के लिए महत्वपूर्ण है, अपितु इसकी कला चेतना समस्त भारतवर्ष के लिए प्रेरणा का स्रोत रही है। वास्तव में सारनाथ-काशी की बौद्ध कला का कालजयी इतिहास भारतीय कला के इतिहास में एक गौरवपूर्ण अध्याय है।

काशी की लुप्त होती वाशपेंटिंग कला

परिवर्तन इस संसार और प्रकृति की अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है। जीव जन्तु, पशु-पक्षी, वनस्पति और कला संस्कृति, भाषा, बोली सभी कुछ बदलती रहती है। बदलाव की इस प्रक्रिया में विकास और विनाश भी एक साथ ही अनवरत चल रहे हैं। उपरोक्त सिद्धान्त कला के क्षेत्र में भी पर्याप्त रूप से देखने को मिलता है। इसके अनेक उदाहरणों में लुप्त हुई दृश्य कला की वाश पेंटिंग विधा को भी लिया जा सकता है। दो तीन दशक पूर्व काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कलाकारों में जलरंगों से चित्र चित्राणि की यह प्रभावी विद्या प्रतिष्ठा का विषय रही है। लेकिन आज इस विधा से चित्र बनाता यहां कोई नहीं दिखता और इस विधा के जानकार भी अब यहाँ नहीं रहे। कभी इस विधा से गहरे जुड़े काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के दृश्य कलासंकाय के एक मात्र वाशपेंटिंग विशेषज्ञ वरिष्ठ कलाकार वेद प्रकाश का कहना है कि सरलतम कला तकनीकों के विकास से लम्बी प्रक्रियाओं को प्राथमिकता दे रहा है।

वाशपेंटिंग के बन्द होने के कारणों में सबसे प्रमुख कारण यही है। वाशपेंटिंग चित्रों में रंग भरना फिर धुलना, सुखाना। पुनः रंग भरना और धूल सुखाकर फिर रंग भरना। इस प्रक्रिया को ग्यारह और इक्कीस बार लगातार दुहराना पड़ता है। जिसके चलते कलाकार को अपनी कलाकृति पूरी करने में लम्बा समय लग जाता था। जिसमें कभी पानी के प्रभाव से कागज खराब हो जाता, तो कभी अन्य व्यवधानों के चलते कलाकृति का निर्माण बीच में ही रुक जाता। इस सप्ताह कभी-कभी कलाकार के सारे किये कराये पर पानी फिर जाता। जबकि आयल और पोस्टर कलर तथा अन्य आधुनिक कला विधाओं के सामने इस प्रकार की समस्याएं बहुत कम है।

चीन से चलकर कलकत्ता के बंगाल स्कूल आफ आर्ट में पहुंची यह विदेशी कला बाद में प्रयाग से लखनऊ होती हुई बनारस पहुंची थी। इस कला विधा में कागज का विशेष महत्व होता था। इसके लिये हैण्डमेड या कैंटपेपर और वाशमैन का प्रयोग होता था। कागज की सतह दानेदार होती थी, कागज ऐसा लिया जाता था जिसमें अन्दर तक रंग न घुसे। लगाने के बाद रंग अपना रूप न बदले। इस कार्य के लिये बन्धित ड्राइंग करने के बाद ही कलाकृति का निर्माण आरम्भ किया जाता था। रंग भरने के बाद कागज को ट्रे में डूबोकर एक से आधे घंटे तक रख दिया जाता था। पुनः उसे सुखाकर मुलायम ब्रश से उस पर पानी से धुलाई की जाती थी, धुलाई के बाद सुखाकर पुनः रंग लगाया जाता था। इस पूरी पेंटिंग के दौरान कागज को किसी लकड़ी या अन्य किसी वस्तु के फ्रेम पर कसकर रखा जाता जिससे कागज सिकुड़ कर लहरदार न हो जाये। इस विधा द्वारा काशी में मूर्त और अमूर्त दोनों तरह के चित्रों का निर्माण हुआ है। भारत कला भवन में इस शैली के विख्यात कलाकारों की कृतियां आज भी संग्रह में देखने को मिल जाती है। जिसे देख कला की इस विधा का अच्छी तरह अन्दाजा लगाया जा सकता है।

काशी में चित्रकला

मुगलों के पराभव और अंग्रेजों के आगमन ने भारतीय कला में बहुत उतार-चढ़ाव पैदा किया। ऐसे संक्रमण के समय कला के क्षेत्र में जो शैली उपजी वह ‘कम्पनी शैली’कहलाई। 18वीं से 20वीं शती के प्रारम्भिक वर्षों तक यह शैली भारत में पटना, बनारस, अवध, लखनऊ, लाहौर, तंजौर और त्रिचलापल्ली में प्रभावशाली स्थान पर थी।भारत में इस शैली के उद्भव एवं विकास का सारा श्रेय ईस्ट इण्डिया कम्पनी को है। योरोपीय लोग भारतीय जन-जीवन से सम्बद्ध चित्रों, वेषभूषा, पेशे, त्योहार, स्थापत्य, पशु-पक्षी आदि के चित्र, जिनको ‘फिरको’ कहा जाता था, बनवाकर अपने देश भेजते थे। प्रारम्भ में तो यह कार्य उन्होंने अपने साथ लाये योरोपीय कलाकारों से कराया, लेकिन जब इस प्रकार के चित्रों की मांग ज्यादा बढ़ गई तब भारतीय चित्रकारों को भी इस काम में लगाया गया। मुगल साम्राज्य के अवसान के कारण रोजी-रोटी की तलाश में भटक रहे भारतीय चित्रकारों को भी इसमें एक मौका मिला।

इस मौके का लाभ उठाते हुए समय की मार से त्रस्त भारतीय चित्रकारों ने उस समय पूरे मनोयोग से अबरख, हाथी दांत एवं विदेशों से आयातित कागजों पर जलरंगो पर जलरंगी के साथ तैल चित्र भी बनाये। नवीतनीक के अन्तर्गत आलेखन में पूर्ण साये और उजाले का प्रयोग करते हुए नेत्रबिंदु (पर्सपेक्टिव) का प्रयोग पहली बार वस्तुओं को दर्शाने के लिए इस विधा के माध्यम से किया गया। काशी और लाल कल में एक साथ चलीं। इस काम में आउट लाइन से बने चित्रों में काली स्याही और पेंसिल दोनों बारीक लाइनों के लिए उपयोग हुआ। योरोपीय विधान के साथ मिलकर भारतीय बारीकियों ने यहां इस शैली का कलेवर ही बदल दिया। काशी में यह कला यहां कई राजाओं के संरक्षण को पाकर खूब फली-फूली। महाराज मंशाराम से महीप नारायण सिंह तक तो बिना तीर्थ के कलाकृतियों का निर्माण हुआ। आगे चलकर महाराज उदित नारायण सिंह के समय में बनी इस शैली के चित्रों में तीथियां अंकित होने लग गई। वास्तव में महाराज उदित नारायण सिंह के समय में काशी कम्पनी शैली के चित्रों का गढ़ बन गई थी जो कलानुरागी शासक ईश्वरी नारायण सिंह के समय में और पुष्पित-पल्लवित हुई। इस शैली के प्रसिद्ध चित्रकार दल्लूलाल, गोपालचन्द्र, बालचन्द्र, शिवराम और सूरज को इन्हीं के समय में राजाश्रय प्राप्त हुआ था जिनकी कृतियां विश्व प्रसिद्ध है। कैमरे के आगमन के बाद यूरोपियों में फोटोग्राफी के प्रति रूचि बढ़ी। ठीक इसी समय भारतीय परम्पराओं के पुर्नजागरण के लिए भी प्रयास भी आरम्भ हो गये। एक ही समय में आयसे इन दोनों परिवर्तनों के कारण देशी-विदेशी दोनों ही कलाप्रेमियों की नजर से यह कला शैली ओझल होने लग गई। आगे चलकर यह बनारस में भी अदृश्य हो गई। वाराणसी में कम्पनी शैली में कागज की तुलना में अखबार पर ज्यादा काम हुआ। कम्पनी शैली के वाराणसी कलम के चित्रकार ने शबीर, पशु, पक्षी, फल, फूल, स्थापत्य, त्यौहार, इक्का तांग आदि स्थानीय विषय वस्तुओं की भी अपनी चित्रांकन रचनाओं में शामिल किया था। यह बात अलग है कि कोई विषयवस्तु उनको अधिक प्रभावित कर गई तो कोई कम। जिसके कारण उनके चित्र में कुछ विषयों की बहुलता है तो कुछ का अभाव भी है। वाराणसी में कम्पनी शैली ने चित्रकला के क्षेत्र में क्रांतिकारी कार्य किया। काशी की आज की आधुनिक चित्रकला शैली उसी का परिणाम है। काशी में मध्य युग में जहाँ कला साभ्रांत वर्ग की वस्तु थी वह वर्तमान युग में वह सामान्य वर्ग वस्तु की है। यह कम्पनी शैली की ही देन है। सामान्य शब्दों में यह कहा जा सकता है कि ये कम्पनी शैली के कारण कला जनसामान्य तक पहुंची।

काशी में जैन मूर्तियाँ

काशी जैन सम्प्रदाय के लिये अत्यन्त महत्वपूर्ण है। सातवें तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ का जन्म काशी के ही एक राजपरिवार में हुआ था उन्हें कैवल्य ज्ञान की उपलब्धि भी काशी में ही हुई थी। तेइसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ भी काशी के शासक परिवार से थे। इन्हें भी कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति काशी में ही हुई थी। इसके अतिरिक्त जैनियों के अन्तिम तीर्थंकर महावीर का भी काशी से विशेष लगाव था। उक्त कारणों से जैन सम्प्रदाय का काशी से दृढ़ धार्मिक संबंध रहा है। जिसके चलते काशी में अनेक जैन मंदिरों और मूर्तियों का निर्माण हुआ। काशी के जैन मूर्तियों जैन मूर्तिकला के विकास की दृष्टि से अत्यन्त महत्व रखती है। काशी की जैन मूर्तियां जैन कला के क्षेत्र में हो रहे विकास को भी रेखांकित करती हैं। जैन मूर्तिकला के रूप में गुप्त काल में काशी में तीर्थंकरों के लांक्षनों और पक्षियों का निर्माण आरम्भ हुआ। काशी की जैन मूर्तियों में दिगम्बर सम्प्रदाय की मूर्तियों की प्रधानता है। वाराणसी में छठवीं शती ई0 में बनी महावीर की मूर्ति में सिंह (लाक्षन) का अंकन हुआ है। इसी प्रकार काशी की प्राचीनतम उत्खनन स्थली राजघाट में मिली सातवीं सदी ई0 की नेमिनाथ की मूर्ति में भी पक्ष यक्षिणी निकपित हैं। ये पक्ष-यक्षिणी कुबेर और अम्बिका है। पूर्व और महथकाल में जैन तीर्थंकारों की मूर्तियों के निर्माण में लांक्षन एवं पक्ष-यक्षी युगलों के अतिरिक्त आठ प्रतिहारों सिंहासन, चामर डुमाने वाला (चामर घट) सेवक, त्रिछत्र, प्रमामण्डल, देव दुर्दुम, अशोक वृक्ष दिव्य ध्वनि, सुरपुष्पवृष्टि तथा नवग्रहों लक्ष्मी, सरस्वती, लघुतीर्थकर आदि की आकृतियों का भी अंकन हुआ है। काशी की तीर्थंकर मूर्तियों में भी ये विशेषतायें देखने को मिलती हैं।

काशी में मिली सबसे प्राचीन जैनमूर्ति लगभग छठीं शती ई0 के आसपास बनी महावीर की मूर्ति है जो काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भारत कला भवन में सुरक्षित हैं जिसकी क्रम संख्या 161 है। इस मूर्ति में भगवान महावीर एक ऊंची पीठिका पर आसीन हैं, उनके दोनों पैर मुड़े हुये हैं। वे हयानावस्थित अवस्था में हैं। पीठिका के मध्य में धर्मचक्र और उसके दोनों ओर सिंह आकृतियां बनी हैं। ये सिंह लाक्षन की आकृतियां, महावीर स्वामी के लाक्षन की चि हैं। इन सिंह आकृतियों के समीप ही ध्यानमग्न मुद्रा में दो तीर्थंकरों की छोटी मूर्तियां भी बनी है। इस प्राचीन प्रतिमा में महावीर के साथ, जैन परम्पराओं लाक्षन, प्रमामण्डल, पार्श्ववर्ती चामर घर सेवकों एवं उड़ते हुए माला पकड़े स्वागत करने वालों (या देव दूतो) का भी अंकन हुआ है। यहां भगवान महावीर के केशों की बनावट गुच्छों के रूप में है। प्रतिमा के मुख मण्डल पर योगी की ओजस्विता मंदस्मिति और शांति का भाव दिखता है। इस मूर्ति में मूर्तिकार ने महावरी के बदन और अंगों को गुप्त शैली के समान आनुपातिक और इकहरा बनाया है। इसी प्रकार भारत कला भवन की मूर्ति संख्या 212 जो राजघाट से प्राप्त नेमिनाथ की है, तथा जिसका निर्माण सातवीं सदी में काशी में ही हुआ है। इस मूर्ति में तीर्थंकर नेमिनाथ ध्यानमग्न मुद्रा में सिंहासन पर बैठे हैं। यद्यपि इस प्रतिमा में नेमिनाथ के प्रचलित शंख लांक्षन चि का अंकन नहीं हुआ है। इस मूर्ति के निचले हिस्से में यक्षिणी अम्बिका का अंकन हुआ जिससे यह पता चलता है कि यह मूर्ति नेमिनाथ की ही है। आनुपातिक अंग योजना में बनी यह मूर्ति अत्यन्त आकर्षक है। इस मूर्ति में यक्ष-यक्षिणी युगल का निर्माण सर्वथा अप्रचलित शैली में हुआ है। नेमिनाथ की मूर्तियों में हमेशा ही यक्ष और यक्षिणी को सिंहासन के दोनों ओर बनाने की परंपरा रही है। जब की यहां पूरा शिल्पकर्म दो भागों में बंटा है। जहां ऊपर की ओर नेमिनाथ की मूर्ति बनी है वहीं नीचे के आधे भाग में एक वृक्ष (संभवतः चैत्यवृक्ष) बना है। इसके दोनों ओर दो हाथों वाले यक्ष कुबेर और यक्षिणी के रूप में अम्बिका का अंकन हुआ है। यहां नेमिनाथ के साथ धर्मचक्र, सिंहासन, चामरधारी सेवक, पद्य अलंकृत प्रभा मण्डल, त्रिक्षत्र दुन्दुभिवादक, और उड़ते हुये माला पकड़े स्वागत कर्ताओं का निर्माण हुआ है। कुबेर के एक हाथ में पहलु और दूसरे में घट (संभवतः निधिपात्र) हैं। यहाँ अम्बिका के दाहिने हाथ में पुरूष और बायें में पुत्र है। जैन परम्पराओं में अम्बिका को शुभंकर और प्रियंकर नामक दो पुत्रों के साथ अंकित किया जाता रहा है। इस मूर्ति में भी वह अपने दोनों ही पुत्रों के साथ है।

काशी में दूसरे तीर्थंकर अजीतनाथ की एक प्रतिमा प्राप्त हुई है। यह प्रतिमा सम्भवतः 7वीं सदी ई0 की लगती है। लखनऊ के राज्य संग्रहालय में क्रम संख्या 49-199 में स्थित इस मूर्ति में अजीतनाथ निर्वस्त्र और दोनें हाथ लटकाये पीठिका पर लगने देह त्यागने की मुद्रा में खड़े हैं। महावीर स्वामी की प्रतिमा के समान ही इस प्रतिका में भी अजीतनाथ के गज लांक्षन की दो आकृतियां अंकित की गई हैं। इस मूर्ति में प्रभा मण्डल के अतिरिक्त कोई अन्य प्रतिहार्य नहीं दिखाया गया है। काशी में तेरहवें तीर्थकर विमलनाथ की भी एक मूर्ति प्राप्त हुई है। नौवीं सदी के आसपास की यह मूर्ति सारनाथ के राजकीय संग्रहालय के 236 वें क्रम पर संरक्षित है। यहां विमल नाथ को भी वस्त्रहीन दिखाया गया है। ये एक साधारण पीठिका पर कायोत्सर्ग वे मुद्रा में खड़े हैं। यहां पीठिका पर ही वराह लांक्षन की आकृति बनी हुई है। यहां प्रतिहार के रूप में चामर घर सेवकों के अलावा कोई अन्य प्रतिहार नहीं बनाया गया है। काशी में राजघाट से काशी में प्राप्त पार्श्वनाथ की एक मूर्ति राज्य संग्रहालय लखनऊ में क्रम संख्या-48-182 पर संग्रहीत है। लगभग 8वीं सदी की इस मूर्ति में पार्श्वनाथ निर्वस्त्र हैं, वे सिंहासन पर कार्योत्सर्ग मुद्रा में खड़े हैं। यहां पार्श्वनाथ के सिर पर सात सर्पों का छत्र बना हुआ है। पार्श्वनाथ के समीप ही दो अन्य तीर्थंकरों की छोटी आकृतियां भी अंकित हैं। मूलनायक के सिर दोनों ओर सर्पफण के क्षत्र से सज्जित यक्ष धरणेन्द्र और यक्षिणी पद्मावती की मूर्तियां हैं, जो पार्श्वनाथ को लाक्षन हैं। यहां पार्श्वनाथ की मूर्ति के बाईं ओर लम्बे दण्ड के साथ छत्र लिये पद्मावती की मूर्ति है। जैन परम्पराओं के अनुसार धरेन्द्र और पद्मावती ने तपस्यारत पार्श्वनाथ की भीषण बाधाओं से रक्षा की थी। यहां प्राप्त 11वीं सदी की एक मूर्ति में केवल सिर का भाग ही शेष बचा है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भारत कला भवन के 197 क्रम पर संरक्षित इस मूर्ति के मस्तक पर पांच सर्पकणों का छत्र है जो सुपार्श्वनाथ का चि है।

जैन सम्प्रदाय के प्रथम तीर्थंकर ऋषभ नाथ की राजघाट से प्राप्त एक मूर्ति भारत कला भवन में 176 वे क्रम पर संग्रहीत है। लगभग दसवीं ग्यारहवीं सदी ई0 की यह मूर्ति लक्षण की दृष्टि से बिल्कुल स्पष्ट है। इस मूर्ति में ध्यानमग्न मुद्रा में अलंकृत आसन पर विराजमान ऋषभनाथ के साथ गोमुख यक्ष तथा चक्रेश्वरी यक्षिणी तथा वृषभ लक्षणों का अंकन हुआ है।

काशी में मेघदूत पर बने वर्षा चित्र

भारतीय कला साहित्य और संगीत में मेघ और वर्षा की पर्याप्त चर्चा हुई है। यहाँ प्राचीन संस्कृत साहित्य से लेकर समस्त आधुनिक साहित्य में सर्वत्र जीवन दायिनी मनोहारी वर्षा ऋतु के मेघ सौंदर्य की चर्चा खूब मिलती है। इसी प्रकार लोकसंगीत कजरी, बिरहा, ठुमरी टप्पा सहित शास्त्रीय संगीत की समस्त विधाओं में भी वर्षा और मेघ को प्रचुर रूप से विषय वस्तु बनाया गया है।

भारत कला भवन के संस्थापक स्व0 रायकृष्ण दास चित्र कला, साहित्य और संगीत के प्रकाण्ड ज्ञाता थे। उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर स्थित, स्वस्थापित, भारत कला भवन में संग्रहीत अनेक महत्त्वपूर्ण वस्तुओं में प्राचीन कलाकृतियों के साथ ही, अपनी योजना के अनुसार भारतीय शैली के समकालीन विख्यात चित्रकारों द्वारा अनेक चित्रों का निर्माण कराकर, उन्हें कला भवन के संग्रह में शामिल किया। कला मनीषी रायकृष्ण दास की देख रेख में बनी इस प्रकार की कलाकृतियाँ आज भारतीय कला की श्रेष्ठतम् बानगी के रूप में इस उत्कृष्ट भारतीय संग्रहालय की अमूल्य नीधि का स्थान ले चुकी है।

भारतीय कला के पुनर्जागरण आन्दोलन के प्रणेता अवनीन्द्र नाथ ठाकुर की अगुआई में प्रारम्भ कला जागरण अभियान में रायकृष्ण दास स्वयं भी एक नायक के रूप में शामिल रहे। काशी में रहकर उन्होंने इस आन्दोलन को सशक्त विस्तार प्रदान किया। कला भवन में संग्रहित अनेक कृलाकृतियाँ उनके इस प्रकार के कार्य की सशक्त गवाह हैं। रायकृष्ण दास ने काशी में भारतीय कला पुनर्जागरण आन्दोलन को और सशक्त बनाने के लिए कलागुरू अवनीन्द्र नाथ ठाकुर से उनकी ‘कला मण्डली’ के प्रमुख कलाकार नन्दलाल बोस को काशी भेजने का आग्रह किया। वास्तव में रायकृष्ण दास की इच्छा थी शिल्पाचार्य नन्दलाल बोस के हाथों से काशी में कालीदास रचित मेघदूत के कथानकों पर आधारित बंगाल शैली में वर्षा चित्रों का निर्माण हो, जिन्हें कला भवन के संग्रहालय में संग्रहीत किया जा सके। कलागुरू अवनीन्द्र नाथ रायकृष्ण दास की कलात्मक सोच को पर्याप्त महत्व देते थे। वे राय साहब के इस सोच से पूरी तरह सहमत थे, लेकिन उनके लिए शिल्पचार्य नन्दलाल बोस को अधिक समय के लिए काशी में भेजना सम्भव नहीं दिखा। तब उन्होंने राय साहब की मांग के प्रत्युत्तर में एक अन्य कलाकार शैलेन्द्र नाथ डे को काशी भेजने की व्यवस्था किया।

राय कृष्णदास ने बंगाल शैली के इस सिद्ध कलाकार को हिमालय के पहाड़ी क्षेत्रों में वर्षा ऋतु में भुवाली, मसूरी और अन्य स्थानों पर ले जाकर इस क्षेत्र की वर्षा ऋतु में बादलों और बरसात से सम्बन्धित गतिविधियों का गहन अध्ययन कराया तथा उसके विषय में उन्हें दिशा-निर्देश प्रदान किया। वस्तुतः इस प्रकार दिशा निर्देश और हिमालय के वर्षाकालीन मौसम का अच्छी तरह परिचय देने के बाद रायकृष्ण दास ने शैलेन्द्र डे को महाकवि कालिदास की काव्य रचना मेघदूत में कल्पित मेघों से सम्बन्धित चित्रों के शृंखलाबद्ध चित्रण के लिए अच्छी तरह तैयार कर लिया। इस तैयारी प्रक्रिया के पूरी हो जाने पर राय साहब शैलेन्द्र डे को लेकर काशी आ गये। यहाँ भारत कला भवन में बैठाकर उनसे मेघदूत पर आधारित चित्रों की शृंखला का निर्माण कराया जिसमें काफी समय लगा।

भारत कला भवन में संग्रहीत महाकवि कालिदास द्वारा रचित मेघदूत के कथानक पर आधारित, बंगाल शैली के सशक्त कलाकार शैलेन्द्र डे के हाथों तथा रायकृष्ण दास के निर्देशित में बनी, ये विलक्षण कला कृतियाँ आज भारत कला भवन के समृद्ध संग्रहालय की उत्कृष्ट थाती होने के साथ ही भारतीय कला का उत्तम नमूना हैं। कलाकार शैलेन्द्र डे के हाथों बनी इन कलाकृतियों में महाकवि कालिदास द्वारा कल्पित मेघों का बनना बिगड़ना, उमड़ना घुमड़ना और फिर घनघोर रूप से बरसना पूरी तरह से साकार हो उठा है। वास्तव में मेघदूत में वर्णित वर्षा एवं मेघ वर्णन में कवि हृदय रायकृष्ण दास के सक्षम निर्देशन एवं हिमालयी क्षेत्रों में कलाकार के द्वारा विषय वस्तु के प्रत्यक्ष दर्शन ने मिलकर मेघ वर्णन का जो सशक्त दृश्य उभारा है वह महाकवि कालिदास के काव्य को चित्र के रूप में दृश्य देने में बखूबी सक्षम है।

मेघदूत पर आधारित इस श्रेष्ठतम भारतीय कलाकृति श्रृंखला में कला मनीषी रायकृष्ण दास की चित्रकला और काव्य के समन्वय की उत्कृष्ट सोच के साथ ही सशक्त कलाकार की श्रेष्ठतम् तूलिका समायोजना का प्रभावकारी प्रगटीकरण हुआ है। वास्तव में महान कला निर्देशक रायकृष्ण दास के निर्देशन में बनी ये चित्र शृंखला संस्कृत साहित्य और भारतीय मूल के चित्रकला आन्दोलन से उपजी ‘बंगाल शैली’ के मेल का उत्कृष्ट नमूना हैं। भारतीय कला के अध्येताओं के लिए मेघदूत पर आधारित यह चित्रशृंखला अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और उपयोगी सामग्री है जो रायकृष्ण दास के कलात्मक एवं काव्यात्मक दूर दृष्टि की श्रेष्ठतम उपज है।

  मधु ज्योत्सना

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