प्राचीन घाट

काशी के प्राचीन घाट

शिव नगरी काशी के गंगा घाटों की महिमा न्यारी है, प्राचीन नगर काशी पूरे विश्व में सबसे पवित्र शहर है, धर्म एवं संस्कृति का केन्द्र बिन्दु है। असि से आदिकेशव तक घाट श्रृंखला में हर घाट के अलग ठाठ हैं, कहीं शिव गंगा में समाये हुये हैं तो किसी घाट की सीढ़ियां शास्त्रीय विधान में निर्मित हैं, कोई मन्दिर विशिष्ट स्थापत्य शैली में है तो किसी घाट की पहचान वहां स्थित महलों से है, किसी घाट पर मस्जिद है तो कई घाट मौज-मस्ती का केन्द्र हैं। ये घाट काशी के अमूल्य रत्न हैं, जिन्हें किसी जौहरी की आवश्यकता नहीं। गंगा केवल काशी में ही उत्तरवाहिनी हैं तथा शिव के त्रिशूल पर बसे काशी के लगभग सभी घाटों पर शिव स्वयं विराजमान हैं। विभिन्न शुभ अवसरों पर गंगापूजा के लिए इन घाटों को ही साक्षी बनाया जाता है। विभिन्न विख्यात संत महात्मा ने इन्हीं घाटों पर आश्रय लिया जिनमें तुलसीदास, रामानन्द, रविदास, तैलंगस्वामी, कुमारस्वामी प्रमुख हैं। विभिन्न राजाओं-महाराजाओं ने इन्हीं गंगा घाटों पर अपने महलों का निर्माण कराया एवं निवास किया। इन घाटों पर सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति का समन्वय जीवन्त रूप में विद्यमान है। घाटों ने काशी की एक अलग छवि को जगजाहिर किया है; यहां होने वाले धार्मिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों में गंगा आरती, गंगा महोत्सव, देवदीपावली, नाग नथैया (कृष्ण लीला), बुढ़वा मंगल विश्वविख्यात है। काशी वासियें के लिये गंगा के घाट धार्मिक-आध्यात्मिक महत्व के साथ ही पर्यटन, मौज-मस्ती के दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। घाट पर स्नान के पश्चात भांग-बूटी के मस्ती में डूबे साधु-सन्यासियों एवं यहां के निवासियों ने बनारसी-मस्ती के अद्भुत छवि का निर्माण किया है, जिसके अलग अंदाज को सम्पूर्ण विश्व देखना, समझना एवं जीना चाहता है।

असि घाट (अस्सी घाट) :- असि घाट-अस्सी घाट के नाम से भी जाना जाता है जो संख्या सूचक एवं असि का अपभ्रंश मालूम पड़ता है। अस्सी घाट काशी के महत्वपूर्ण प्राचीन घाटों में से एक है, यदि गंगा के धारा के साथ-साथ चलें तो यह वाराणसी का प्रथम घाट तथा काशी की दक्षिण सीमा पर गंगा और असि (वर्तमान में विलुप्त) नदियों के संगम पर स्थित है।इस घाट पर स्थित मंदिर 19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के हैं, लक्ष्मीनारायण मंदिर पंचायतन शैली का है, यह मंदिर न केवल तीन अलग-अलग देवताओं से सम्बन्धित है बल्कि नागर स्थापत्य शैलियों को भी दर्शाते हैं। असिसंगमेश्वर मंदिर काशीखण्ड में वर्णित शिव मंदिरों में से एक है, जिसके दर्शन-पूजन का विशेष महात्मय है। जगन्नाथ मंदिर पुरी के जगन्नाथ मंदिर का प्रतीक रूप है, 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में इस मन्दिर का निर्माण जगन्नाथपुरी (उड़ीसा) के महन्त ने करवाया था, ब्रह्मवैवर्तपुराण में काशी के सात पुरियों कि स्थिति के संदर्भ में इसे काशी का हरिद्वार क्षेत्र माना गया है। इसके अतिरिक्त नृसिंह, मयूरेश्वर तथा बाणेश्वर मंदिर इस घाट क्षेत्र में स्थित है। काशीखण्ड के अनुसार संसार के अन्य सभी तीर्थ इसके सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं हैं, अतः इस घाट पर स्नान करने से सभी तीर्थों में स्नान करने का पुण्यफल प्राप्त हो जाता है।असि घाट (अस्सी घाट)
पूर्व में इस घाट का सम्पूर्ण क्षेत्र वर्तमान भदैनीघाट तक था, तुलसीदास जी ने इसी घाट पर एक गुफा में निवास कर ‘रामचरित मानस’ की रचना की और संवत् 1680 में इसी घाट पर उन्होंने अपना प्राण त्याग दिया। 19वीं शताब्दी के बाद यह घाट पाँच घाटों अस्सी, गंगामहल (प्रथम), रीवां, तुलसी तथा भदैनी घाटों में विभाजित हो गया। सन् 1902 में बिहार राज्य के सुरसण्ड स्टेट की महारानी दुलहिन राधा दुलारी कुंवर ने तत्कालीन काशी नरेश प्रभुनारायण सिंह से घाट तथा मंदिर निर्माण हेतु जमीन को क्रय कर लिया, जून 1927 ई0 को महारानी की आकस्मिक मृत्यु के कारण घाट का निर्माण नहीं हो पाया लेकिन उनके द्वारा निर्मित लक्ष्मीनारायण पंचरत्न मंदिर उनकी धार्मिकता एवं कलाप्रियता का प्रतीक है। सन् 1988 में राज्य सरकार के सहयोग से इस घाट का पक्का निर्माण कराया गया।
यह घाट सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक मस्ती के स्वरूप में वाराणसी का केन्द्र है, इस घाट पर दैनिक स्नानार्थियों की भीड़ सर्वाधिक होती है। प्रातः चार बजे से ही लोग इस घाट पर जमघट लगाना आरम्भ कर देते हैं और यह क्रिया कलाप पूरे दिन इसी तरह से चलता रहता है, सूर्यास्त के पश्चात इस घाट पर प्रशिक्षित पण्डों द्वारा मंत्रों एवं घण्ट-घड़ियालों के गूंज के साथ गंगा आरती का अद्भुत नजारा देखने को मिलता है। जन्म, मुण्डन संस्कार, उपनयन, विवाह, गंगा पुजईया आदि मांगलिक कार्य, उत्सव इस घाट पर साक्षी के रूप में सम्पन्न किये जाते हैं।

गंगामहल घाट (प्रथम) :- पूर्व काशी नरेश प्रभुनारायण सिंह ने बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में इस घाट पर एक विशाल भवन का निर्माण कराया, जिसका नाम गंगामहल रखा गया, इसी नाम पर ही इस घाट का भी नामकरण हुआ। गंगामहल में राजपूत और स्थानीय वास्तु शैली का सुन्दर समन्वय दिखाई पड़ता है। वर्तमान समय में यह महल काशी नरेश महारानी ट्रस्ट के संरक्षण में है। कला एवं संगीत के अध्ययन के लिये आये विदेशी यात्रियों के निवास की व्यवस्था इस महल में है। गंगामहल घाट असिघाट की उत्तरी सीमा से सटा हुआ है, पूर्व में यह असिघाट का ही एक भाग था।गंगामहल घाट (प्रथम)
रीवां घाट :- पंजाब के राजा रणजीत सिंह के पुरोहित लालामिसिर ने इस घाट एवं घाट पर स्थित विशाल महल का निर्माण करवाया था, अतः इस घाट का पूर्व नाम लालामिसिर घाट था। महाराज रीवां ने सन् 1879 में इस घाट एवं महल को क्रय कर लिया तब से ही इस घाट का नाम रीवां घाट हो गया, महल पर रीवां कोठी, बनारस 1879, राजचिन्ह के साथ अंकित है। महल का तटीय भाग पत्थर के कई अर्द्धस्तम्भों के योग से निर्मित है, गंगा के बहाव से घाट एवं महल की सुरक्षा के लिये पक्की सीढ़ियों तथा तटीय उत्तरी एवं दक्षिणी भाग पर मढ़ियों (अष्टपहल) का निर्माण कराया गया है। पूर्व में यह घाट भी असिघाट का एक हिस्सा था। बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में इस महल को रीवां नरेश ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय को दान में दे दिया, विश्वविद्यालय ने इसमें दृश्य और संगीत कला के विद्यार्थियों के लिये छात्रावास का आरम्भ किया।रीवां घाट
तुलसी घाट :- अट्ठाहरवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में बाला जी पेशवा ने इस घाट का पक्का निर्माण कराया था। इसके पहले यह असिघाट का ही एक भाग था। तुलसीदास जी ने यहीं निवास कर ‘रामचरित मानस’ के कई खण्डोंकी रचना की थी एवं यहीं पर ब्रह्मलीन हुये थे, इसी कारण इसे तुलसीघाट नाम दिया गया। सन् 1941 में इस घाट का पुर्ननिर्माण बलदेव दास बिड़ला ने करवाया था। इस घाट पर काशी के द्वादश आदित्यों में प्रथम प्रसिद्ध लोलार्ककुण्ड है, इसलिये इसे लोलार्कघाट भी कहा जाता था। धार्मिक दृष्टि से यह एक महत्वपूर्ण घाट है, घाट एवं समीपवर्ती भागों में लोलार्केश्वर, अमरेश्वर, भोलेश्वर, महिषमर्दिनी (स्वप्नेश्वरी), अर्कविनायक, हनुमान (18वीं एवं 20वीं शताब्दी के दो मंदिर), राम पंचायतन (दो मंदिर) के मंदिर हैं। ऐसी मान्यता है कि हनुमान मंदिर (B 2/14) की स्थापना स्वयं तुलसीदास जी ने की थी एवं एक व्यायाम शाला का भी निर्माण किया था, जिसमें प्रतिवर्ष जोड़ी, गदा, कुश्ती इत्यादि की प्रतियोगिता आयोजित की जाती है। भाद्र शुक्ल षष्ठी को लोलार्ककुण्ड में स्नान का विशेष महात्म्य है, मान्यता है कि इस दिन इस कुण्ड में स्नान करने से निःसंतान स्त्रियों को संतान प्राप्त होता है एवं कुष्ठ रोगियों को रोग से मुक्ति मिलती है। अर्क विनायक मंदिर काशीखण्ड में वर्णित 56 विनायक मंदिरों में से एक है। पंचक्रोशी यात्रियों के लिये इसके दर्शन-पूजन के बाद आगे की यात्रा करने का विधान है।तुलसी घाट रामचरित मानस का सामूहिक पाठ एवं प्रवचन भी इस घाट पर आयोजित होता है। विश्व प्रसिद्ध नाग नथैया लीला इसी घाट पर कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को सायंकाल गोधुलि बेला में मात्र कुछ क्षणों में सम्पन्न होता है, जिसमें काशी नरेश सहित नगर एवं नगर के बाहर के असंख्य लोगों की उपस्थिति रहती है, जो घाट की सीढ़ियों, समीप के भवनों एवं नावों पर से पारम्परिक मेले का आनन्द लेते हैं। इस घाट पर धुपद संगीत मेला का भी आयोजन होता रहा है, इस तीन या पाँच दिवसीय मेले में भारत के प्रसिद्ध धुपद गायक अपने सुर-ताल एवं गायन-वादन से संगीत की मधुर धारा प्रवाहित करते हैं। इस घाट पर आयोजित समस्त धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम संकट मोचन मंदिर के महन्त के देख-रेख में सम्पन्न होते हैं।

भदैनी घाट :- भदैनी मुहल्ले में स्थित होने के कारण इसे भदैनीघाट कहा जाता है। सर्वप्रथम इस घाट का उल्लेख ग्रीब्ज ने सन् 1909 में किया था। घाट का निर्माण ईटों से किया गया है, घाट पर स्नान के लिये कोई विशेष व्यवस्था नहीं है, धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से भी बहुत कम ही कार्यक्रम इस घाट पर होते हैं। घाट पर जल निगम का विशाल पम्पिंग स्टेशन है जिसके द्वारा नगर क्षेत्र में पानी की आपूर्ति की जाती है।भदैनी घाट एवं जानकी घाट
जानकी घाट :- सन् 1870 से पूर्व यह घाट कच्चा था एवं इसे नघम्बरघाट के नाम से जाना जाता था। बिहार प्रान्त के सुरसण्ड स्टेट की महारानी रानी कुंवर ने सन् 1870 में इसका पक्का निर्माण करवाया, जिसके पश्चात् ही इसे जानकी घाट के नाम से जाना जाने लगा। इस नामकरण के संदर्भ में लोगों का मत है कि सीतामढ़ी जिले में स्थित सुरसण्ड स्टेट के लोग सीता (जानकी) के अनन्य भक्त होते हैं, महारानी का वहाँ से सम्बन्धित होने के कारण ही इस घाट का नाम जानकीघाट रखा गया। इस घाट क्षेत्र में शिव मंदिर, राम-जानकी मंदिर, लक्ष्मीनारायण मंदिर हैं। घाट पर स्नान का कोई विशेष धार्मिक महत्व नहीं है लेकिन पक्का एवं स्वच्छ घाट होने के कारण स्थानीय लोग यहां स्नान करते हैं। सन् 1985 में राज्य सरकार के सहयोग से सिंचाई विभाग द्वारा इस घाट का पुनः निर्माण कराया गया था।

माता आनन्दमयी घाट :- माता आनन्दमयी घाटपूर्व में यह घाट कच्चा था और इसका नाम इमिलियाघाट था। सन् 1944 में माता आनन्दमयी ने अंग्रेजों से घाट की जमीन क्रय कर घाट का पक्का निर्माण तथा घाट पर विशाल आश्रम का निर्माण करवाया, तभी से इसे आनन्दमयी घाट कहा जाता है, घाट तट पर माता आनन्दमयी आश्रम (B 2/291) है, आश्रम परिसर में ही अन्नपूर्णा एवं विश्वनाथ (शिव) मंदिर तथा एक विशाल यज्ञशाला है, जहाँ प्रायः धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन होता रहता है। घाट पर स्थित भवन (B 2/294) में माता आनन्दमयी कन्यापीठ है, जहाँ लड़कियाँ गुरूकुल पद्धति से शिक्षा ग्रहण करती हैं, जिन्हें आश्रम के द्वारा निःशुल्क आवास, भोजन एवं वस्त्र की सुविधा प्रदान की जाती है। सन् 1988 में सिंचाई विभाग द्वारा इस घाट का मरम्मत कराया गया था। पक्का एवं स्वच्छ घाट होने के कारण स्थानीय लोग इस घाट पर स्नान करते हैं।

वच्छराज घाट :- अट्ठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में काशी के प्रमुख व्यापारी वच्छराज ने इस घाट का पक्का निर्माण करवाया था,जिसका उल्लेख प्रिन्सेप (सन् 1831) ने किया है। इस घाट क्षेत्र में गंगा मंदिर, अक्रुरेश्वर (शिव) मंदिर, सुपार्श्वनाथ जैन (श्वेताम्बर) मंदिर, एवं माता आनन्दमयी द्वारा निर्मित गोपाल मंदिर (सन् 1968) है। जैन सम्प्रदाय के धार्मिक दृष्टि से भी यह घाट महत्वपूर्ण है। क्योंकि ऐसा स्वीकार किया गया है कि जैन सम्प्रदाय के सातवें तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ का जन्म स्थान वच्छराजघाट से जुड़े भदैनी मुहल्ले में है। सांस्कृतिक-धार्मिक कार्यक्रमों में अक्रुरेश्वर (शिव) मंदिर के वार्षिक श्रृंगार के अवसर पर आयोजित गायन-भजन-कीर्तन प्रमुख हैं। यह गंगातट क्षेत्रीय लोगों के स्नान एवं व्यायाम का केन्द्र है। सन् 1965 में राज्य सरकार के द्वारा इस घाट का पुनः निर्माण कराया गया था।

वच्छराज घाट
वच्छराज घाट

जैन घाट :- पूर्व में यह घाट कच्चा था एवं वच्छराज घाट के ही परिक्षेत्र में आता था। सन् 1931 में जैन समाज के द्वारा इस घाट का पक्का निर्माण कराया गया तथा जैनघाट के नाम से इसका नामकरण किया गया। घाट तट पर प्रसिद्ध सुपार्श्वनाथ (दिगम्बर) जैन मंदिर है जिसका निर्माण सन् (1885) में हुआ था। इस घाट पर मुख्य रूप से जैन सम्प्रदाय के लोग ही स्नान करते हैं। सन् 1988 के पश्चात् उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग द्वारा घाट का पुनः निर्माण हुआ है।जैन घाट
 निषादराज घाट :- बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में यह घाट अस्तित्व में आया, इसके पूर्व यह प्रभुघाट का एक भाग था। निषाद (मल्लाह) जाति बाहुल्य क्षेत्र होने के कारण इसे निषादराज घाट के नाम से जाना जाता है। घाट पर निषादराज (शिवलिंग) मंदिर एक मात्र मन्दिर है, जिसका निर्माण लगभग दो दशक पूर्व निषाद समाज के द्वारा कराया गया था। इस घाट क्षेत्र पर प्रमुख रूप से मल्लाह जाति के लोग ही स्नान करते हैं।

प्रभु घाट :- बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में बंगाल के निर्मल कुमार के द्वारा इस घाट का पक्का निर्माण करवाया गया। निर्मल कुमार के द्वारा स्वयं का एक विशाल भवन भी इसी तट पर बनवाया गया। निषादराज घाट की भांति यह घाट भी मल्लाह बाहुल्य क्षेत्र है, इस घाट पर धोबी लोग कपड़ा साफ करते हैं एवं स्नान आदि कार्य नहीं होता है। सन् 1989 में उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग द्वारा इस घाट का मरम्मत कराया गया था।प्रभु घाट
पंचकोट घाट :- पंचकोट (बंगाल) नरेश के द्वारा उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम चरण में इस घाट का निर्माण करवाया गया। इसी कारण इसको पंचकोट घाट कहा गया। गंगातट से कुछ दूरी पर राजा का भवन एवं विशाल बगीचा है, इसी बगीचे में शिव मंदिर एवं काली मंदिर है। हालांकि घाट पक्का एवं स्वच्छ है लेकिन धार्मिक महत्व न होने के कारण सामान्यजन बहुत कम ही इस घाट पर स्नान करते हैं, घाट तट चौड़ा होने के कारण बच्चे यहाँ खेल-कूद करते हैं।पंचकोट घाट
चेतसिंह घाट :- घाट एवं घाट स्थित किले का निर्माण पूर्व काशी नरेश बलवन्त सिंह के द्वारा कराया गया था। घाट का नामकरण महाराजा प्रभुनारायण सिंह द्वारा अपने पूर्वज चेतसिंह के नाम पर किया गया। पूर्व में यह घाट शिवालाघाट का ही हिस्सा था। ऐतिहासिक दृष्टि से काशी के महत्वपूर्ण घाटों में चेतसिंह घाट का विशिष्ट स्थान है, सन् 1781 में वारेन हेस्टिंग और चेतसिंह का प्रसिद्ध युद्ध इसी घाट स्थित किले में हुआ था, जिसमें चेतसिंह पराजित हो गये और किले पर अंगेजों का अधिकार हो गया। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में महाराज प्रभुनारायण सिंह ने अंग्रेजों से पुनः यह किला प्राप्त कर लिया और किले के उत्तरी भाग को नागा साधुओं को दान कर दिया।घाट पर अट्ठारहवीं शताब्दी के दो शिव मंदिर हैं। बीसवीं शताब्दी के पूर्व यह घाट सांस्कृतिक कार्यक्रमों की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण था। चैत्र के प्रथम मंगलवार से प्रारम्भ साप्ताहिक प्रसिद्ध ‘बुढ़वा मंगल मेला’ काशी के इसी घाट पर सम्पन्न होता था, अपरिहार्य कारणों से विगत कुछ वर्षों से स्थानीय सांस्कृतिक संस्थायें इसे दशाश्वमेध घाट पर आयोजित करती हैं। अधिकतर स्थानीय लोग ही इस घाट पर स्नान करते हैं। सन् 1958 में राज्य सरकार के द्वारा इस घाट का पुनः निर्माण करवाया गया।चेतसिंह घाट
निरंजनी घाट :- इस घाट पर नागा साधुओं का प्रसिद्ध निरंजनी अखाड़ा (B 3/155) है, सन 1897 में काशी नरेश ने इस अखाड़ा भवन को नागा साधुओं को दान कर दिया था, इसी अखाड़े के कारण ही इस घाट का नामकरण निरंजनी घाट के रूप में हुआ। सन् 1958 में राज्य सरकार के द्वारा इसका पुनः निर्माण कराया गया। वर्तमान में घाट पक्का एवं स्वच्छ है, इस घाट पर बहुत कम मात्रा में स्नान कार्य होता है। घाट स्थित अखाड़े में निरंजनी महाराज पादुका मंदिर, गंगा मंदिर, दुर्गा मंदिर एवं गौरी-शंकर मंदिर है। पूर्व में यह घाट भी शिवाला घाट का एक भाग था।निरंजनी घाट
महानिर्वाणी घाट :- इस घाट पर महानिर्वाणी सम्प्रदाय के नागा साधुओं का प्रसिद्ध अखाड़ा है। इसी के नाम से ही घाट का नामकरण हुआ, बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में अखाड़े की स्थापना हुई, पूर्व में यह चेतसिंह किले का एक भाग था। अखाड़े में तत्कालीन नेपाल नरेश द्वारा निर्मित चार शिव मंदिर हैं। साक्ष्य से प्रतीक होता है कि सातवीं शताब्दी के लगभग सांख्य दर्शन के आचार्य कपिल मुनि यहीं पर निवास करते थे। इस अखाड़े के पास ही मदर टरेसा द्वारा संचालित दीन-हीन संगति निवास है, जिसमें निसहाय, अपाहिज, कुष्ठ रोगों से पीड़ित लोगों का उपचार होता है। घाट के एक भाग में शहर का नाला गंगा में मिलता है जिसके कारण यहाँ स्नानार्थियों की उपस्थिति नहीं होती है। सन् 1988 में राज्य सरकार के सहयोग से सिंचाई विभाग द्वारा घाट के ऊपरी भाग का मरम्मत करवाया गया था।महानिर्वाणी घाट
शिवाला घाट :- अट्ठारहवीं शताब्दी में तत्कालीन काशी नरेश बलवन्त सिंह ने इस घाट का निर्माण कराया था, कालान्तर में यह घाट कई भागों में बंट गया। शिवाला घाटवर्तमान में प्राचीन घाट का उत्तरी भाग अपने पुराने नाम से ही जाना जाता है। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में नेपाल के राजा विक्रम शाह द्वारा घाट पर एक विशाल भवन का निर्माण करवाया गया तथा एक शिव मंदिर की भी स्थापना की गई। घाट पर ही काशी नरेश द्वारा स्थापित ब्रह्मेन्द्र मठ है, जिसमें दक्षिण भारतीय तीर्थ यात्रियों के निवास की व्यवस्था है।बीसवीं शताब्दी के मध्य तक सांस्कृतिक दृष्टि से यह घाट महत्वपूर्ण था क्योंकि प्रसिद्ध ‘बुढ़वा मंगल’ मेला इसी घाट क्षेत्र पर होता था। शिवाला घाट पर मुहर्रम की दसवीं तारीख को कुछ ताजियों को गंगा जी में बहाया जाता है। यह बनारस की गंगा-जमुनी तहजीब की एक मिसाल है। पत्थरों से निर्मित घाट स्वच्छ एवं सुदृढ़ है जहाँ तीर्थयात्री एवं स्थानीय लोग धार्मिक क्रियाओं को सम्पन्न करते हैं। सन् 1988 में राज्य सरकार के सहयोग से सिंचाई विभाग द्वारा घाट का पुनः निर्माण कराया गया।
गुल्लरिया घाट :- बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में वाराणसी के व्यवसायी लल्लू जी अग्रवाल ने इस घाट का निर्माण करवाया था कुछ वर्षों पूर्व तक घाट पर एक विशाल गुल्लर का वृक्ष था जिसके कारण इस घाट का गुल्लरियाघाट नाम पड़ा। पूर्व में यह दण्डीघाट का ही एक अंग था। घाट पक्का है लेकिन धार्मिक महत्व न होने के कारण इस घाट पर लोग स्नान आदि कार्य नहीं करते।

दण्डीघाट :- बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में वाराणसी के व्यवसायी लल्लू जी अग्रवाल ने इस घाट का भी निर्माण कराया था। घाट पर दण्डी स्वामियों का मठ होने के कारण ही इस घाट को दण्डीघाट कहा गया। सन् 1868 में शेरिंग ने इस घाट का प्रथम उल्लेख किया था। घाट तट पर व्यायामशाला एवं एक शिव मंदिर है। स्वच्छता के कारण स्थानीय लोग इस घाट पर स्नान आदि कार्य सम्पन्न करते हैं। सन् 1958 में राज्य सरकार के द्वारा घाट का पुनः निर्माण कराया गया।

हनुमान घाट :- ऐसी मान्यता है कि इस घाट पर स्थित हनुमान मंदिर की स्थापना तुलसीदास के द्वारा की गई है, इस मंदिर के कारण ही इसका नाम हनुमान घाट पड़ा। घाट पर नागा साधुओं का प्रसिद्ध जूना अखाड़ा है। गीर्वाणपदमंजरी (सत्तरहवीं शताब्दी) के अनुसार इसका पूर्व नाम रामेश्वर घाट था, इसके संदर्भ में यह मान्यता है कि स्वयं भगवान राम ने इस शिवलिंग की स्थापना काशी यात्रा के दौरान की थी, जो वर्तमान में जूना अखाड़ा परिसर में है। रामेश्वर शिव को काशी के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में पूजा जाता है। कालान्तर में यहीं रामेश्वरघाट हनुमानघाट हो गया, जिसका प्रथम उल्लेख सन् 1831 में जेम्स प्रिन्सेप ने किया था।हनुमान घाट
उन्नीसवीं शताब्दी में जूना अखाड़े के महन्त हरिहरनाथ के द्वारा घाट का पक्का निर्माण कराया गया था, बीसवीं शताब्दी के पूवार्द्ध में मैसूर स्टेट द्वारा घाट का पुनः निर्माण कराया गया था। इस घाट के बारे में एक कहावत है कि बनारस के जुआरी नन्ददास ने अपनी एक दिन की कमाई से घाट की सीढ़ियों को बनवाया था। घाट पर रामेश्वर, सीतेश्वर, लक्ष्मणेश्वर, भरतेश्वर, शत्रुध्नेश्वर (सभी शिवलिंग) मंदिर, हनुमान, मंदिर, विष्णु मंदिर एवं रूरू भैरव मंदिर है। रामेश्वर शिव तमिलनाडु के रामेश्वर मंदिर का प्रतीक है, जबकि रूरू भैरव को काशी के अष्ट भैरव में स्थान प्राप्त है। विष्णु मंदिर के गर्भगृह में काले पत्थर की चतुर्भुज विष्णु की मूर्ति स्थापित है। इस घाट का धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व प्राचीन काल से ही है, सोलहवीं शताब्दी में बल्लभाचार्य ने इसी घाट पर निवास किया और ब्रह्मलीन हुए। धार्मिक महत्व के कारण यहाँ विभिन्न पर्वों पर स्नान एवं अनुष्ठान तीर्थ यात्रियों एवं स्थानीय लोगों के द्वारा सम्पन्न किया जाता है। इस घाट पर दक्षिण भारतीय तीर्थ यात्रियों की संख्या अधिक रहती है। सन् 1984 में राज्य सरकार के सहयोग से सिंचाई विभाग द्वारा घाट का पुनः निर्माण करवाया गया।

कर्नाटक घाट :- बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक यह हनुमान घाट का ही एक अंग था, घाट का निर्माण मैसूर राज्य के योगदान से हुआ, जिससे यह घाट मैसूरघाट के नाम से प्रसिद्ध हुआ और कालान्तर में कर्नाटक घाट में परिवर्तित हो गया। घाट तट पर मैसूर राज्य द्वारा स्थापित धर्मशाला एवं एक शिव मंदिर है। घाट पर सतियों के भी कई स्मारक हैं। घाट पर दक्षिण भारतीय स्नानार्थियों की संख्या अधिक होती है, जो अधिकतर यहाँ स्थापित धर्मशाला में निवास करते हैं।कर्नाटक घाट
हरिश्चन्द्र घाट :- ऐसी मान्यता है कि सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र सत्य की रक्षा के लिए काशी के इस श्मशान घाट पर स्वयं बिके थे, इसी कारण इस घाट का नाम हरिश्चन्द्र घाट पड़ा। यह काशी के दो श्मशान घाटों में से एक है। इस घाट पर शवदाह कब से आरम्भ हुआ इसका कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है, इस घाट पर 15-16वीं शताब्दी के सती स्मारक इस बात के प्रमाण हैं कि उस समय यहाँ श्मशान घाट था। ग्रन्थों के अनुसार यहाँ प्राण त्यागने वाले को भैरवी यातना से मुक्ति मिलती है और वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है। काशी केदारमाहात्म्य के अनुसार केदारेश्वर अन्तर्गृही यात्रा इसी घाट पर स्नान करने के पश्चात प्रारम्भ होती थी। वर्तमान के घाट पर केवल शवदाह का कार्य सम्पन्न होता है। सन् 1988 के पूर्व यह घाट बालू क्रय-विक्रय का केन्द्र था परन्तु घाट का पक्का निर्माण हो जाने के पश्चात् यह प्रतिबन्धित हो गया तथा इसी समय यहाँ विद्युत शवदाह गृह का भी निर्माण हुआ जो परम्परागत शवदाह के साथ-साथ चलता रहता है। घाट पर तीन शिव मंदिर हैं, जिसमें सन् 1960 में निर्मित काशी कामकोटीश्वर मंदिर (शिव मंदिर) प्रमुख है, जो दक्षिण भारतीय स्थापत्य शैली में बना हुआ है।हरिश्चन्द्र घाट
लालीघाट :- उन्नीसवीं शताब्दी में घाट का पक्का निर्माण महाराजा विजयानगरम् ने कराया था, इस घाट को लल्ली घाट भी कहते हैं। चम्पारन (बिहार) के संत लाली बाबा यहीं पर निवास करते थे जिसके कारण इसका नाम लाली घाट पड़ा। लाली बाबा द्वारा स्थापित गूदड़दास का अखाड़ा आज भी घाट पर सुरक्षित है, सन् 1831 में जेम्स प्रिन्सेप ने घाट का प्रथम उल्लेख किया था। इस घाट पर 19वीं शताब्दी का किरातेश्वर शिव मंदिर स्थापित है। एवं छोटी-छोटी देव कुलिकायें हैं, जिसमें गणेश, शिव, हनुमान की मूर्तियां प्रतिष्ठित हैं। हरिश्चन्द्र घाट के समीप होने के कारण अधिकतर शवयात्री ही यहां स्नान आदि कार्य करते हैं। सन 1988 में सिंचाई विभाग ने इस घाट का मरम्मत कराया था।

विजयानगरम् घाट :- उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में विजयानगरम् महाराज द्वारा घाट एवं घाट पर स्थित विशाल भवन का निर्माण करवाया गया, इस कारण इसे विजयानगरम घाट कहते हैं। बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में महाराज द्वारा घाट स्थित भवन को काशी के संत स्वामी करपात्री जी को दान कर दिया गया, इसी भवन में ही करपात्री जी निवास करने लगे। वर्तमान में यह भवन स्वामी करपात्री आश्रम के नाम से प्रचलित है। घाट पर मोक्षलक्ष्मी मंदिर एवं शिव मन्दिर उन्नीसवीं शताब्दी से स्थापित हैं। घाट पक्का एवं स्वच्छ होने के कारण स्थानीय लोग यहाँ स्नान करते हैं। सन् 1958 में राज्य सरकार के द्वारा घाट का पुनः निर्माण कराया गया था।विजयानगरम् घाट
केदार घाट :- केदारेश्वर शिव का प्रसिद्ध मंदिर होने के कारण ही इस घाट का नाम केदारघाट पड़ा है, काशी के द्वादश ज्योतिर्लिगों में केदारेश्वर शिव को स्थान प्राप्त है, जिसका संदर्भ काशी खण्ड, मत्स्य पुराण, अग्निपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण, गीर्वाणपदमंजरी में मिलता है। ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार केदार घाट को आदि मणिकर्णिका क्षेत्र के अन्तर्गत माना गया है, जहाँ प्राण त्यागने से भैरवी यातना से मुक्ति मिल जाती है और व्यक्ति मोक्ष को प्राप्त करता है।
केदारेश्वर शिव मंदिर को हिमालय में स्थित केदारनाथ मंदिर का प्रतिरूप माना जाता है, ऐसी मान्यता है कि इनके दर्शन-पूजन से हिमालय के केदारनाथ के दर्शन-पूजन का फल प्राप्त होता है, ऐसी भी मान्यता है कि स्वयं ब्रह्मा जी ने काशी में इनका दर्शन-पूजन किया था। स्थानीय लोग केदारेश्वर शिव को काशी विश्वनाथ के अग्रज के रूप में स्वीकार करते हैं। घाट पर विटंकन नृसिंह मन्दिर एवं भैरव मंदिर भी स्थापित हैं, घाट पर सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में कुमारस्वामी ने कुमारस्वामी मठ की स्थापना की थी। मठ के द्वारा ही 18वीं शताब्दी में घाट का पक्का निर्माण कराया गया था। घाट स्वच्छ एवं सुदृढ़ होने से दैनिक स्थानार्थियों के साथ-साथ विशेष पर्वों एवं अवसरों पर स्नान करने वालों की संख्या अधिक होती है। श्रावण माह में इस घाट पर स्नान-दान, पूजन-पाठ का सर्वाधिक महात्म्य है। दूर्गापूजा एवं कालीपूजा के बाद प्रतिमाओं का विसर्जन भी इस घाट पर सम्पन्न होता है। सन् 1958 में राज्य सरकार के द्वारा घाट का पुनः निर्माण कराया गया था।केदार घाट
चौकी घाट :- घाट के नामकरण के सम्बन्ध में मान्यता है कि घाट स्थित गली के चौमुहानी से संलग्न होने के कारण ही इसका नाम चौकी घाट पड़ा, जिसका एक मार्ग केदारेश्वर, दूसरा मानसरोवर, तीसरा सोनारपुरा और चौथा मार्ग घाट पर जाता है। उन्नीसवीं शताब्दी में कुमारस्वामी मठ के द्वारा घाट का निर्माण कराया गया था, घाट पर शिव एवं हनुमान मंदिर है, ऐसी मान्यता है कि हनुमान मंदिर में हनुमान मूर्ति की स्थापना स्वयं तुलसीदास जी ने की थी। घाट पर स्थानीय लोग ही स्नान आदि कार्य करते हैं, सन् 1988 में सिंचाई विभाग के द्वारा घाट का मरम्मत कराया गया था। स्थानीय लोगों की सुविधा के लिये घाट के उपरी तट पर सुलभ शौचालय निर्मित है तथा सिवेज पम्पिंग स्टेशन का भी निर्माण हुआ है।चौकी घाट
क्षेमेश्वर घाट :- ऐसी मान्यता है कि शिव भक्त क्षेमक (राक्षस) ने घाट तट पर क्षेमकेश्वर मंदिर की स्थापना की थी, इसी मंदिर के कारण ही इस घाट का नामकरण हुआ। मोतीचन्द्र (सन् 1931) ने घाट का उल्लेख सोमेश्वर नाम से किया है, लेकिन घाट पर सोमेश्वर शिव का कोई मंदिर एवं तीर्थ नहीं है, इसलिये ऐसा लगता है कि भ्रमवश क्षेमेश्वर को सोमेश्वर कहा गया। घाट का पक्का निर्माण उन्नीसवीं शताब्दी में कुमारस्वामी मठ के द्वारा करवाया गया था। किसी विशेष सांस्कृतिक महत्व से न जुड़े होने के कारण स्थानीय लोग भी यहाँ कम संख्या में स्नान करते हैं, गौड़ (भूजा) जाति के लोग ही विशेषतः क्षेमेश्वर शिव की पूजा-अर्चना करते हैं। सन् 1958 में राज्य सरकार ने घाट का मरम्मत करवाया था।क्षेमेश्वर घाट
मानसरोवर घाट :- मानसरोवर घाट का प्रथम उल्लेख गीर्वाणपदमंजरी में मिलता है। आमेर (राजस्थान) नरेश मानसिंह ने इस घाट का एवं समीपवर्ती क्षेत्र में मानसरोवर कुण्ड का निर्माण कराया था। इस सरोवर का विशेष धार्मिक महत्व है, ऐसी मान्यता है कि इस सरोवर में स्नान करने से हिमालय में स्थित कैलाश मानसरोवर के स्नान का पुण्य मिलता है। समीपवर्ती परिक्षेत्र इसी के नाम से मानसरोवर मुहल्ला जाना जाता है। आवासीय भवनों के वृद्धि फलस्वरूप वर्तमान में यह कुआँ के रूप में परिवर्तित हो गया है जो आन्ध्राश्रम भवन में सुरक्षित है, अतः इस सरोवर का स्नान मानसरोवर घाट पर ही होता है। बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में यह घाट क्षतिग्रस्त हो गया था, जिसका पुनः निर्माण सन् 1950 में राज्य सरकार ने कराया था। वर्तमान में घाट पक्का एवं सुदृढ़ है और अधिकतर धार्मिक प्रवृत्ति के लोग स्नान-दान करते हैं।
नारदघाट :- पूर्व में इसका नाम कुवाईघाट था जिसका उल्लेख जेम्स प्रिंसेप (सन् 1831) ने किया है। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में घाट पर नारदेश्वर (शिव) मंदिर का निर्माण हुआ, जिससे घाट का नाम परिवर्तित होकर नारद घाट पड़ा। ऐसी मान्यता है कि नारदेश्वर शिव की स्थापना देवर्षि नारद ने किया था। उन्नींसवीं शताब्दी के अन्त में दक्षिण भारतीय स्वामी सतीवेदान्द दत्तात्रेय ने घाट का पक्का निर्माण कराया, घाट के ऊपरी भाग पर दत्तात्रेयेश्वर (शिव) मंदिर की स्थापना एवं दत्तात्रेय मठ का निर्माण कराया। घाट पर अत्रीश्वर मंदिर (उन्नीसवीं शताब्दी) एवं बीसवीं शताब्दी में स्थापित एक शिव मंदिर भी है। घाट पर एक विशाल पीपल वृक्ष है, जिसके छांव में 12-13वीं शताब्दी के खण्डित विष्णु मूर्तियों के अवशेष हैं। स्थानीय एवं धार्मिक प्रवृत्ति के लोग यहाँ स्नान आदि कार्य करते हैं। राज्य सरकार ने सन् 1965 में घाट का पुनः निर्माण कराया था।
राजाघाट :- सन् 1807 में पूना के पेशवा अमृतराव ने घाट का निर्माण करवाया था, अतः प्रारम्भ में यह अमृतराव घाट के नाम से जाना जाता था, बाद में यह राजाघाट के नाम से जाना जाने लगा, जिसका प्रथम उल्लेख मोतीचन्द्र (सन् 1931) ने किया है। अमृतराव ने घाट तट पर ही एक महल एवं श्री संस्थान अन्नपूर्णा मठ की भी स्थापना की थी। वर्तमान में मठ द्वारा साधु-सन्यासियों एवं निःसहायों को अन्न-वस्त्र की सुविधा निःशुल्क प्रदान की जाती है।
मठ में ही अन्नपूर्णा मंदिर, लक्ष्मीनारायण मंदिर एवं शिव मंदिर स्थापित है। महल एवं महल के सामने गंगा में नाव पर विभिन्न प्रकार की सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है, इसमें शास्त्रीय एवं स्थानीय लोक कलाओं की प्रस्तुति स्थानीय कलाकारों के द्वारा किया जाता है। घाट पक्का एवं स्वच्छ है जिसके कारण स्थानीय लोग स्नान करते हैं। घाट पर मठ द्वारा गंगा आरती का भी भव्य आयोजन होता है। सन् 1965 में राज्य सरकार के द्वारा घाट का पुनः निर्माण कराया गया था।
पाण्डेय घाट :- उन्नीसवीं शताब्दी में छपरा (बिहार) के बबुआ पाण्डेय ने इस घाट का निर्माण कराया था, इसी कारण इसको पाण्डेय घाट के नाम से जाना जाता है। गीर्वाणपदमंजरी के अनुसार उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्व इस घाट का नाम सर्वेश्वर घाट था, घाट पर स्थित सर्वेश्वर शिव मंदिर इसके पूर्व नाम को प्रमाणित करता है। इसके अतिरिक्त घाट तट पर सोमेश्वर शिव मंदिर भी स्थापित है। इस घाट पर धोबियों द्वारा कपड़ा धोने की प्राचीन परम्परा रही है। घाट क्षेत्र में ही बबुआ पाण्डेय द्वारा निर्मित व्यायामशाला भी है। घाट पक्का एवं स्वच्छ है किन्तु स्थानीय लोग ही यहाँ स्नान-कार्य करते हैं। सन् 1965 में राज्य सरकार के द्वारा घाट का पुनः निर्माण कराया गया था।
दिग्पतिया घाट :- अठ्ठारहवी शताब्दी के अन्त में पूर्वी बंगाल के राजा दिग्पतिया द्वारा घाट एवं घाट तट पर विशाल महल का निर्माण करवाया गया, इसलिये इसका नामकरण दिग्पतिया घाट हुआ। पूर्व में यह चौसट्टी घाट का एक भाग था। घाट पर अठ्ठारहवी शताब्दी का एक शिव मंदिर स्थापित है। महल बंगाली वास्तुकला का सुन्दर प्रतीक है, वर्तमान में महल काशी आश्रम के नाम से प्रसिद्ध है। घाट पक्का एवं सुदृढ़ है किन्तु विशेष धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व न होने के कारण अधिकतर स्थानीय लोग ही स्नान करते है। सन् 1965 में राज्य सरकार ने घाट का पुनः निर्माण करवाया था।
 चौसट्टी घाट :- सोलहवीं शताब्दी में बंगाल के राजा प्रतापादित्य ने इस घाट का निर्माण कराया था, जर्जर हो जाने के कारण अठ्ठारवीं शताब्दी में बंगाल के राजा दिग्पतिया ने इसका पुनः पक्का निर्माण करवाया था। घाट तट पर चौसट्टी देवी मंदिर स्थापित है जिसके कारण घाट का चौसट्टी घाट नाम पड़ा। चौसट्टी देवी मंदिर के पहले राणामहल में चौसठयोगिनी मंदिर था, खजुराहों एवं जबलपुर के चौसठयोगिनी मंदिर के स्वरूप में इसका निर्माण हुआ था, कालान्तर में मंदिर के क्षतिग्रस्त होने के कारण नये मंदिर का निर्माण हुआ। घाट का प्रथम उल्लेख गीर्वाणपदमंजरी में हुआ है। वर्तमान में चौसट्टी देवी मंदिर (D 22/17) में स्थापित है। मंदिर स्थापत्य शैली से सामान्य होते हुये भी धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, मंदिर में केवल महिषासुरमर्दिनी की मूर्ति प्रतिष्ठित है जिसके दर्शन-पूजन से चौसठयोगिनीयों के दर्शक-पूजन के समान पुण्य प्राप्त होता है। काशीखण्ड के अनुसार अश्विन नवरात्र में इनकी आराधना से सभी मनोकामनायें पूर्ण होती हैं, चैत्र माह के कृष्ण चतुर्दशी को इनके दर्शन का महात्म्य है। काशी के वासी फाल्गुन माह के शुक्ल एकादशी (रंगभरी एकादशी) को देवी को अबीर-गुलाल अर्पित करने के पश्चात ही होली का उत्सव आरम्भ करते हैं। घाट तट पर एक काली मंदिर एवं कई देवकुलिकायें (शिव, गणेश, कार्तिकेय) भी हैं। घाट के ऊपरी तट पर पीपल वृक्ष के समीप राजा प्रतापादित्य का स्मारक है, यह स्मारक बंगाली लोगों के लिये विशेष पूजनीय है, बंगाली समुदाय पुत्र का मुण्डन संस्कार घाट पर इसी स्मारक के सम्मुख करते हैं। घाट पक्का एवं स्वच्छ है एवं धार्मिक एवं दैनिक स्नानार्थी यहां स्नान करते हैं। फाल्गुन शुक्ल एकादशी को घाट पर स्नान करने के पश्चात ही लोग चौसट्टी देवी का दर्शन-पूजन करते हैं। सन् 1965 में राज्य सरकार ने घाट का पुनः निर्माण करवाया था।
राणामहल घाट :- उदयपुर (राजस्थान) नरेश राणा जगत सिंह ने सत्तरहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में घाट एवं घाट स्थित महल का निर्माण करवाया था। इस कारण घाट का नाम राणामहल घाट पड़ा। घाट के उत्तरी एवं दक्षिणी भाग में अठ्ठारहवी शताब्दी का शिव मंदिर स्थापित है। महल राजस्थानी वास्तुकला का सुन्दर स्वरूप है, सन् 1765 में काशीयात्रा के दौरान राणाजगत सिंह ने इसी महल में निवास किया था। वर्तमान में घाट पक्का एवं स्वच्छ है तथा यहाँ स्थानीय लोग स्नान आदि कार्य करते हैं। सन् 1965 में राज्य सरकार द्वारा घाट का मरम्मत कराया गया था।
दरभंगा घाट :- सन् 1812 में नागपुर राजा के मंत्री श्रीधर मुंशी ने घाट एवं घाट स्थित महल का निर्माण कराया था। पूर्व में यह वर्तमान मुंशीघाट का ही एक भाग था। सन् 1920 में मुंशीघाट के दक्षिणी भाग को दरभंगा (बिहार) के राजा ने क्रय कर लिया और घाट का पक्का निर्माण करवाया। कालान्तर में यह दरभंगा घाट के नाम से जाना जाने लगा। घाट पर उन्नीसवीं शताब्दी का एक शिव मंदिर है तथा घाट स्थित महल पत्थरों से निर्मित एवं अत्यन्त कलात्मक है। वर्तमान में घाट पक्का एवं स्वच्छ है लेकिन घाट का धार्मिक दृष्टि से विशेष महात्म्य नहीं है, इस कारण अधिकतर स्थानीय लोग ही यहाँ स्नान कार्य करते हैं।
मुंशीघाट :- घाट एवं घाट तट पर स्थित महल एवं मंदिर का निर्माण सन् 1812 में नागपुर नरेश के मंत्री श्रीधर मुंशी ने कराया था, मंत्री के नाम से ही घाट का नामकरण हुआ। वर्तमान राणामहल घाट पूर्व में इसी घाट का हिस्सा हुआ करता था, सन् 1920 में इस घाट का विभाजन हुआ। घाट के ऊपरी भाग में महल एवं राम जानकी मंदिर, नारायण मंदिर स्थापित है। उन्नीसवीं शताब्दी में इस घाट पर एक शिव मंदिर का भी निर्माण हुआ। वर्तमान में घाट पक्का स्वच्छ एवं सुदृढ़ है और स्थानीय लोग यहाँ स्नान करते हैं, गंगा नाविकों का यह केन्द्र है जहाँ नाविक अपने नाँव को बांधते हैं। सन् 1965 में राज्य सरकार ने घाट का नवनिर्माण कराया था।
अहिल्याबाई घाट :- सन् 1785 में इन्दौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने घाट एवं घाट तट पर विशाल महल का निर्माण कराया था। घाट का प्राचीन नाम केवलगिरिघाट था, परन्तु निर्माण के कुछ समय पश्चात् यह अहिल्याबाई घाट के नाम से जाना जाने लगा। घाट पर महल के अतिरिक्त अहिल्याबाई बाड़ा (D 18/16) एवं महारानी द्वारा स्थापित हनुमान मंदिर तथा दो शिव मंदिर है। घाट पक्का एवं स्वच्छ है। विशेष धार्मिक महत्व न होने के बाद भी यहाँ स्थानीय एवं दशाश्वमेध घाट पर आये यात्री स्नान करते हैं। घाट पर सायंकाल में बंगाली महिलायें भजन-कीर्तन करती हैं। सन् 1965 में राज्य सरकार ने वर्तमान घाट का पुनः निर्माण कराया था।
शीतला घाट
अठ्ठारवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में इन्दौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने घाट का निर्माण कराया था। उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्व यह दशाश्वमेध घाट का ही हिस्सा था, घाट के निर्माण होने के कुछ वर्षों के पश्चात यहाँ प्रसिद्ध शीतला मंदिर (म0स0 D 18/19) का निर्माण हुआ, जिसके कारण इस घाट का नाम शीतला घाट पड़ा। स्थापत्य की दृष्टि से सामान्य होते हुये भी धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से यह घाट बहुत महत्वपूर्ण है। शीतला मंदिर के अतिरिक्त यहां चार शिव मंदिर है, छः रथिकायें हैं जिनमें दो दत्तात्रेय, दो विठ्ठल तथा गंगा एवं यमुना की मूर्तियाँ हैं। शीतला मंदिर में नवरात्र में दर्शनार्थियों का रेला उमड़ा रहता है। शहर के मध्य स्थित होने से यहां दैनिक स्नानार्थियों और तीर्थयात्रियों की भीड़ होती है। इस घाट पर स्नान का विशेष महात्म्य है, सूर्य एवं चन्द्र ग्रहण, गंगादशहरा, शिवरात्रि, डालाछठ आदि पर्वो पर यहाँ अधिक मात्रा में लोग स्नान-दान करते हैं। मुण्डन संस्कार, विवाह पश्चात गंगा पुजईया, पियरी चढ़ाना आदि क्रिया-कलाप इस घाट पर प्रायः देखने को मिलता है। देवदीपावली पर होने वाले भव्य कार्यक्रम को देखने के लिये देश-विदेश से पर्यटक यहाँ आते हैं। वाराणसी में एक कहावत है कि हर वर्ष बाढ़ के रूप में गंगा जी शीतला जी से मिलने आती है और जिस वर्ष यह नहीं होता उस वर्ष शहर में महामारी फैलने की आशंका रहती है। घाट पक्का एवं सुदृढ़ है। यहां सायंकाल को भी पर्यटक एवं स्थानीय लोग घूमने-फिरने आते हैं। सन् 1958 में राज्य सरकार ने घाट का पुनः निर्माण कराया था।
दशाश्वमेध घाट
सन् 1735 में घाट का निर्माण बाजीराव पेशवा ने कराया था। पूर्व में इस घाट का विस्तार वर्तमान अहिल्याबाई घाट से लेकर राजेन्द्रप्रसाद घाट तक था। काशीकेदार महात्म्य के अनुसार ब्रह्मा जी ने काशी के इसी गंगा तट पर दस अश्वमेघ यज्ञ किया था, इसी संदर्भ के अनुसार ही घाट का नामकरण हुआ। जबकि डॉ0 काशी प्रसाद जायसवाल का अनुमान है कि दूसरी शताब्दी में प्रसिद्ध भारशिव राजाओं ने कुषाणों को परास्त कर दस अश्वमेध यज्ञ करने के पश्चात यहीं पर स्नान किया था तभी से इसका नाम दशाश्वमेध घाट पड़ा। प्राचीन काल में इसका नाम रूद्र सरोवर था, घाट के सामने गंगा को रूद्र सरोवर तीर्थ माना जाता है, ऐसी मान्यता है कि इस तीर्थ में स्नान मात्र से समस्त पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। आज भी संकल्प मंत्रोच्चारण में इस जगह के लिये ‘रूद्र सरोवर’ का ही नाम लिया जाता है| धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से यह काशी का सर्वाधिक प्रसिद्ध घाट है। मत्यस्यपुराण के अनुसार काशी के पाँच प्रमुख तीर्थों में इस घाट को स्थान प्राप्त है। घाट पर गंगा, काली, राम पंचायतन एवं शिव मंदिर स्थापित है जो स्थापत्य के दृष्टि से सामान्य तथा स्वरूप में छोटे-छोटे हैं। मुण्डन संस्कार, विवाह, गंगा पुजईया आदि शुभ कार्य गंगा के साक्षी स्वरूप इस घाट पर सम्पन्न किये जाते हैं। वाराणसी में होने वाले दुर्गापूजा, सरस्वती पूजा, काली पूजा एवं अन्य आराध्यों के पूजा के पश्चात उनके प्रतिमाओं का विसर्जन इस घाट पर पूरे विधि-विधान के साथ किया जाता है। प्रतिदिन सायंकाल में घाट पर गंगा आरती का आयोजन होता है जिसके मनोरम दृश्य से दर्शकों को अद्भुत आनन्द प्राप्त होता है। देव दीपावली पर घाट को पारम्परिक दीयों से भव्य रूप से सजाया जाता है जिसके रोशनी से घाट जगमगा उठता है। राज्य सरकार द्वारा घाट के सामने गंगा में बजड़ों (कई नावों को आपस मेंजोड़कर एक विशाल मंच तैयार किया जाता है) पर गंगा महोत्सव का आयोजन किया जाता है, इस शास्त्रीय संगीत समारोह में विख्यात कलाकारों की सहभागिता होती है। चैत्र के प्रथम मंगलवार को होने वाला ‘बुढ़वा मंगल’ विशेष रूप से विश्व विख्यात है, बनारसी मस्ती-मिजाज के उमंग में यहां राजा को भी घोषित किया जाता है वह भी पूरे सम्मान के साथ। घाट पक्का एवं स्वच्छ है, शहर के मध्य एवं मुख्य मार्ग से जुड़े होने के कारण यहाँ दैनिक एवं पर्व विशेष पर गंगा स्नानार्थियों का आवागमन होता रहता है। देशी-विदेशी पर्यटकों के लिये यह वाराणसी का केन्द्र है। सन् 1965 में राज्य सरकार ने वर्तमान दशाश्वमेध घाट का नव निर्माण कराया था।
प्रयागघाट
पोटिया (बंगाल) की महारानी एच0के0 देवी ने उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में प्रयागघाट का निर्माण कराया था। काशीखण्ड के अनुसार इस घाट को प्रयागतीर्थ माना जाता है, अतः इसी कारण इसका नाम प्रयागघाट पड़ा। बेनिया तालाब से मिसिर पोखरा तथा गोदौलिया होते हुये गोदावरी नदी (अब बरसाती नाला) का प्रयाग घाट पर गंगा में संगम होता है। घाट पर प्रयागेश्वर शिव, शूलटंकेश्वर शिव, ब्रह्मेश्वर (चतुर्मूख शिवलिंग), अभदय विनायक, प्रयागमाधव (लक्ष्मी नारायण) मंदिर स्थापित है। ऐसी मान्यता है कि ब्रह्मा ने दस अश्वमेघ यज्ञ के पश्चात घाट पर ब्रह्मेश्वर शिवलिंग की स्थापना की थी। ऐसा माना जाता है कि इस घाट पर स्नान एवं शूलटंकेश्वर शिव के दर्शन करने से प्रयाग (इलाहाबाद) में स्नान करने के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। वर्तमान में घाट पक्का एवं स्वच्छ है, दशाश्वमेध घाट से संलग्न होने के कारण यहां भी दैनिक एवं पर्व-विशेष पर स्नानार्थियों की भीड़ होती है। माघ-माह में घाट पर स्नान का विशेष धार्मिक महत्व है। घाट पर विभिन्न उत्सवों एवं शुभ कार्यों को सम्पन्न किया जाता है। सन् 1977 में भागलपुर (बिहार) के ललित नारायण खण्डेलवाल ने घाट का पुनः निर्माण कराया था।
राजेन्द्र प्रसाद घाट
सन् 1984 में राज्य सरकार ने घाट का पक्का निर्माण करवाया तथा स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद के नाम से घाट का नामकरण किया गया। पूर्व में इसका नाम घोड़ा घाट था; मौर्य काल से ही यह घोड़ों के क्रय-विक्रय का केन्द्र था। जेम्स प्रिसेंप ने इसकी प्रामाणिकता छायाचित्रों के माध्यम से पुष्ट की है। सम्भवतः घोड़ों के क्रय-विक्रय का केन्द्र होने के कारण ही इसका नाम घोड़ा घाट हुआ होगा। घाट तट पर दुर्गा, राम-जानकी एवं शिव के नवनिर्मित मंदिर स्थापित हैं। मंदिरों के समीप ही डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद की आदमकद प्रतिमा भी प्रतिस्थापित है। वर्तमान में घाट पर सिवेज पम्पिंग स्टेशन बना हुआ है। घाट सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन इस घाट पर भी होता है। घाट पक्का स्वच्छ एवं शहर के मुख्य मार्ग से जुड़ा हुआ है जिससे काफी संख्या में स्नानार्थियों का आवागमन होता है। नाविक यहाँ नाँव बांधते हैं जो नौका-विहार के लिये उपलब्ध होता है।
मानमंदिर घाट
सोलहवीं शताब्दी में आमेर (राजस्थान) के राजा मानसिंह ने घाट तथा घाट स्थित महल एवं मंदिर का निर्माण कराया था, इसी कारण इस घाट का नामकरण मानमंदिर घाट हुआ। मानमंदिर घाट का प्रथम उल्लेख जेम्स प्रिसेंप (सन् 1831) में किया था। गीवार्णपदमंजरी के अनुसार घाट का पूर्व नाम सोमेश्वर घाट था, अठ्ठारहवी शताब्दी तक यह पूर्व नाम से ही लोकप्रिय रहा। यह घाट धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व की अपेक्षा विशाल कलात्मक महल एवं इसमें निर्मित नक्षत्र वेधशाला के लिये अधिक महत्वपूर्ण है। महल मथुरा के गोवर्धन मंदिर का स्वरूप एवं उत्तर-मध्य कालीन राजस्थानी राजपूत दुर्ग शैली का सुन्दर उदाहरण है। सत्तरहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में मानसिंह के वंशज राजा सवाई जय सिंह ने ग्रह-नक्षत्रों की सटीक जानकारी देने वाले नक्षत्र वेधशाला का निर्माण कराया था, इसका नक्शा सवाई जय सिंह के प्रसिद्ध ज्योतिषी समरथ जगन्नाथ ने बनाया था। वेधशाला में सम्राट यंत्र, लघु सम्राट यंत्र, दक्षिणोत्तर भित्ति यंत्र, नाड़ी वलय यंत्र, दिशांग एवं चक्र यंत्र है। वर्तमान में महल भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है। घाट पर राजा मान सिंह द्वारा स्थापित अदाल्मेश्वर शिव मंदिर (म0सं0 D 16/28) तथा उन्नीसवीं शताब्दी में निर्मित सोमेश्वर शिव, रामेश्वर शिव, स्थूलदन्त विनायक मंदिर (वर्तमान में तीनों आवासीय भवन में) है। घाट पक्का एवं स्वच्छ है एवं स्थानीय लोग स्नान आदि कार्य करते हैं। आज भी देशी-विदेशी पर्यटक इस कलात्मक महल एवं वेधशाला का अवलोकन कर मुग्ध होते हैं, वर्तमान में वेधशाला के अस्तित्व को बचाये रखने के लिये मरम्मत की आवश्यकता है। सन 1988 में राज्य सरकार के सहयोग से सिंचाई विभाग ने घाट का पुनः निर्माण कराया था।
वाराही घाट
घाट के समीप अठ्ठारहवी शताब्दी का प्रसिद्ध वाराही देवी (दुर्गा) मंदिर (म0सं0 D 16/84) है, जिसके नाम पर घाट का नाम पड़ा। वाराही देवी को काशी के अष्ट मातृकाओं में स्थान प्राप्त है। ऐसी मान्यता है कि इस घाट पर गंगा स्नान करने के पश्चात् वाराही देवी का दर्शन करने से मुनष्य की सभी विपत्तियाँ दूर हो जाती हैं। पूर्व में यह त्रिपुरभैरवी घाट का भाग था एवं कच्चा था। सन् 1958 में राज्य सरकार द्वारा घाट का पक्का निर्माण हो जाने के पश्चात यह वाराहीघाट के नाम से विख्यात हुआ। घाट पर मणिकर्णिका घाट (श्मशान) के डोम राजा (जिसे काशी का दूसरा राजा कहा जाता है) कैलाश चौधरी का विशाल मकान है। घाट क्षेत्र हरिजन बाहुल्य क्षेत्र है और स्थानीय लोग ही अधिक संख्या में स्नान करते हैं। वर्तमान में घाट पक्का है किन्तु लोग वाराहीघाट के स्थान पर त्रिपुरभैरवी घाट पर स्नान करने के पश्चात वाराही देवी का दर्शन-पूजन करते हैं।
त्रिपुरभैरवी घाट
घाट जाने वाले गली मार्ग में प्राचीन त्रिपुरभैरवी (दुर्गा) मन्दिर स्थापित है। अठ्ठारहवीं शताब्दी में मंदिर का पुनः निर्माण हुआ जिसके कारण इस घाट को त्रिपुरभैरवी घाट कहा जाने लगा। गीर्वाणपदमंजरी के अनुसार घाट का पूर्व नाम वृद्धादित्य घाट था। घाट पर त्रिपुरेश्वर शिव एवं रूद्रेश्वर शिव का मंदिर है तथा पीपल वृक्ष के नीचें पंचायतन शैली में मध्य में शिवलिंग तथा चारो ओर शक्ति, विष्णु, गणेश एवं सूर्य की मूर्तियां है तथा एक छोटे मंदिर में आदित्य रूप में सूर्य की प्रतिमा स्थापित है। बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में दयानन्द गिरि के द्वारा घाट का पक्का निर्माण एवं घाट तट पर एक मठ (म0सं0 D 51/100) भी बनवाया था। वर्तमान में घाट पक्का एवं स्वच्छ है, यहां स्थानीय लोग स्नान कार्य करते हैं। घाट पर मुण्डन संस्कार, विवाह, गंगा पुजईया आदि शुभ कार्यों को सम्पन्न किया जाता है। राज्य सरकार द्वारा सन् 1958 में घाट का पुनः निर्माण कराया गया था।
मीर घाट
सन् 1735 में घाट एवं घाट स्थित विशाल किले का निर्माण काशी के तत्कालीन फौजदार मीर रूस्तमअली ने करवाया था; इसी कारण कालान्तर में इसे मीरघाट कहा जाने लगा। गीर्वाणपदमंजरी के अनुसार घाट का पूर्व नाम जरासंध घाट था। घाट स्थित गंगा में जरासंध तीर्थ की स्थिति मानी गई है एवं ऊपरी भाग में जरासंधेश्वर शिव मंदिर है, इस कारण ही इसका पूर्व नाम पड़ा था। कार्तिक माह के कृष्ण चतुर्दशी को यहां स्नान करने एवं जरासंधेश्वर शिव के दर्शन-पूजन का विशेष महात्म्य है। घाट पर ही प्रमुख विशालाक्षी देवी का मंदिर है जो धार्मिक महत्व के साथ ही वास्तुशिल्प का सुन्दर उदाहरण है, इसका निर्माण दक्षिण भारतीय वास्तु परम्परा के अनुरूप हुआ है। विशालाक्षी देवी को काशी के नौ गौरियों में स्थान प्राप्त है, जिनके दर्शन मात्र से सम्पूर्ण सांसारिक कष्टों से छुटकारा मिल जाता है। भाद्र माह के कृष्णपक्ष तृतीया को घाट पर स्नान के बाद इनके दर्शन-पूजन का महात्म्य है। इसके अतिरिक्त घाट पर विशालाक्षीश्वर शिव, श्वेत माधव (विष्णु), आशा विनायक (गणेश) एवं यज्ञबराह मंदिर स्थापित है। घाट पर दो मठ निर्मित है, भजनाश्रम मठ में अधिकांशतः बंगाली विधवायें निवास करती हैं इस मठ की सम्पूर्ण व्यवस्था कलकत्ता के स्व0 गनपत राय खेमका ट्रस्ट द्वारा की जाती है। दूसरा मठ नानक पंथी सिक्ख साधुओं का है, इस मठ के द्वारा प्रतिदिन निःशुल्क भोजन एवं औषधियों का वितरण गरीबों एवं निसहायों के मध्य किया जाता है। वर्तमान में घाट पक्का एवं स्वच्छ है, यहाँ स्थानीय लोग स्नान कार्य करते है। सन् 1958 में राज्य सरकार के द्वारा घाट का पुनः निर्माण कराया गया था।
ललिता घाट
घाट की तरफ जाने वाली गली मार्ग में ललिता देवी मंदिर है ललिता देवी को काशी के नवगौरियों में स्थान प्राप्त है तथा घाट स्थित गंगा को ललिता तीर्थ माना जाता है, इसलिये इसका नाम ललिताघाट पड़ा। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में नेपाल नरेश ने घाट का पक्का निर्माण करवाया था। ललिता देवी मंदिर के अतिरिक्त समराजेश्वर शिव, राजराजेश्वरी तथा गंगादित्य (सूर्य) मंदिर (सभी 18वीं शताब्दी के) भी महत्वपूर्ण है। काशी के द्वादश आदित्यों में गंगादित्य को भी स्थान प्राप्त है। समराजेश्वर शिव मंदिर काशी में नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर के प्रतीक रूप में प्रतिष्ठित है, इसे नेपाली मंदिर भी कहते हैं। लकड़ी से निर्मित यह मंदिर कलात्मक एवं पगोड़ा शैली का विशिष्ट उदाहरण है। इस मंदिर के समीप नेपाल नरेश ने लकड़ी से निर्मित नेपाली कोठी का भी निर्माण कराया था। घाट तट पर सिद्धगिरि एवं उमरावगिरि मठ का निर्माण अठ्ठारहवीं शताब्दी के अन्त में कराया गया तथा सन् 1922 में रतनगढ़ (राजस्थान) के जवाहर मल खेमका ने काशी में मुमुक्षुओं के लिये मोक्ष भवन का निर्माण कराया था। वर्तमान में घाट के एक हिस्से में स्थानीय लोग स्नान कार्य करते हैं, घाट के उत्तरी भाग में सिवेज पम्पिंग स्टेशन है। सन् 1965 में राज्य सरकार के द्वारा घाट का पुनः निर्माण करवाया गया था।
जलशायी घाट
यह ऐसा गंगातट है जहाँ शिव तट पर न होकर स्वयं गंगा में समाये हुये हैं, ऐसी मान्यता है कि इस गंगातट के समक्ष गंगा में शिव शिवलिंग रूप में शयन करते हैं। गंगा में शिव का निवास होने के कारण ही इसे जलशायी घाट या जलासेन घाट कहते हैं। गीर्वाणपदमंजरी के अनुसार इसका पूर्व नाम मोक्षद्वारेश्वर घाट था, जो बाद में जलशायी घाट के नाम से परिवर्तित हो गया। काशी में ऐसी भी मान्यता है कि मृतक की अस्थियां जलशायी शिवलिंग को अर्पित करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में राजा बलदेवदास बिड़ला ने घाट का पक्का निर्माण कराया एवं एक धर्मशाला भी बनवाया। मणिकर्णिका घाट (श्मशान) से संलग्न होने के कारण इस घाट पर भी शवदाह किया जाता है। यह घाट कब से श्मशान घाट बना, इस पर अनेक मत है। धर्मशाला में शवदाह के लिये आये बाहरी व्यक्ति निवास करते हैं। घाट पर स्नान कार्य नहीं होता तथा तट पर मिट्टी का ढेर है, जहाँ शवदाह के लिये नाव से लायी गयी लकड़ियाँ उतरती हैं।
मणिकर्णिका घाट
सन् 1730 में घाट का पक्का निर्माण महाराष्ट्र के पेशवा बाजीराव के सहयोग से सदाशिव नाईक ने कराया था। घाट पर स्थित मणिकर्णिका कुण्ड और इससे जुड़ी मान्यताओं के कारण ही इस घाट का नाम मणिकर्णिका घाट पड़ा। काशीखण्ड के अनुसार इसका पूर्व नाम चक्रपुष्करणी कुण्ड था, जिसे भगवान विष्णु ने शिव की तपस्या करते समय अपने चक्र से खोदा था। दूसरी मान्यता यह है कि शिव और पार्वती चक्रपुष्करणी कुण्ड का अवलोकन कर रहे थे तभी पार्वती के कान की मणि कुण्ड में गिर गयी, जिसके पश्चात इसका नाम मणिकर्णिका पड़ा। मत्यस्यपुराण में उल्लेख है कि यह काशी के पाँच प्रमुख घाट तीर्थों में सर्वश्रेष्ठ है। यहाँ प्राण त्यागने से मोक्ष की प्राप्ति होती है, ऐसी मान्यता है कि शिव स्वयं मृतक के कान में तारक मंत्र प्रदान करते हैं। यहां जन्म और मरण दोनो ही मंगलकारी होता है। घाट के सम्मुख गंगा में मणिकर्णिका, इन्द्रेश्वर, अविमुक्तेश्वर, चक्रपुष्करणी, उमा, तारक, पितामह, स्कन्ध एवं विष्णु तीर्थ की स्थिति मानी जाती है। काशी में पंचक्रोशी यात्रा यहीं से स्नान के साथ आरम्भ कर, यहीं पर स्नान-दान के पश्चात समाप्त किया जाता है।
घाट पर अधिकांश मंदिर शिव को समर्पित है, इनमें तारकेश्वर शिव, रानी भवानी शिव, मणिकर्णिकेश्वर शिव, रत्नेश्वर शिव, आमेठी शिव (शिव एवं महिषमर्दिनी), मनोकामेश्वर शिव, रूद्रेश्वर शिव, सिद्धिविनायक (गणेश), मणिकर्णिका विनायक (गणेश) मंदिर मुख्य है। इन मंदिरो का निर्माण बंगाल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश एवं बिहार के शासकों ने अलग-अलग समयों पर करवाया था।
काशी का यह घाट श्मशान घाट के रूप में भी प्रसिद्ध है, शवदाह के लिये दूर-दूर से लोग यहाँ आते हैं, यहां चिता की अग्नि लगातार जलती रहती है। अठ्ठारहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में कश्मीरीमल ने श्मशान भूमि की स्थापना की और उन्हीं को प्रथम शवदाह करने का श्रेय जाता है। कहा जाता है कि अपनी माँ के दाह-संस्कार को लेकर हरिश्चन्द्र घाट पर चण्डाल से कश्मीरीमल की कहा-सुनी हो गई थी, अतः उन्होंने मणिकर्णिका घाट पर जमीन क्रय कर अपनी माँ का दाह-संस्कार किया और घाट को भी बनवाया।
प्रारम्भ में यह घाट केवल तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध था, जहाँ बाद में शवदाह की परम्परा आरम्भ हुई। वर्तमान में यह घाट तीर्थ एवं श्मशान दोनों के लिये विख्यात है। धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से यह घाट महत्वपूर्ण है, घाट पर सदैव स्नानार्थियों की भीड़ रहती है। कार्तिक माह, सूर्य-चन्द्र ग्रहण, एकादशी, संक्रान्ति, गंगा दशहरा, भैयादूज आदि विभिन्न पर्वों पर यहां स्नान का विशेष महात्म्य है। शवदाह के अतिरिक्त पिण्डदान, तर्पण, मनौती एवं अन्य धार्मिक कार्यों को यहां सम्पन्न किया जाता है। कार्तिक माह में घाट पर रामलीला का भी आयोजन किया जाता है। यह श्मशान भूमि तंत्र साधकों के लिये विशेष महत्वपूर्ण मानी जाती है, यहां तंत्र साधना में लीन तांत्रिकों को सदैव देखा जा सकता है। कार्तिक अमावस्या (दीपावली) की रात्रि (तंत्र साधना के लिये सर्वाधिक उपयुक्त समय) को तंत्र साधना के लिये देश-विदेश से तांत्रिक यहाँ आते हैं।
सन् 1988 में राज्य सरकार के सहयोग से सिंचाई विभाग ने घाट का पुनः निर्माण कराया था। घाट का उत्तरी भाग पक्का एवं स्वच्छ है, जहाँ लोग स्नान करते हैं तथा दक्षिणी भाग में शवदाह होता है। घाट पर विष्णु चरण पादुका चबूतरा है जिस पर विष्णु चरण का प्रतीक चि अंकित है, चार दशक पूर्व तक केवल विशिष्ट व्यक्तियों का शवदाह जिलाधिकारी के अनुमति से इस चबूतरे पर किया जाता रहा, वर्तमान में इस चबूतरे पर शवदाह पूर्ण रूप से प्रतिबन्धित है।
सिन्धिया घाट
सन् 1835 में ग्वालियर की महारानी बैजाबाई सिन्धिया ने घाट का पक्का निर्माण कराया, इसके पश्चात इसको सिन्धिया घाट कहा जाने लगा। गीर्वाणपदमंजरी के अनुसार घाट का प्राचीन नाम वीरेश्वर घाट था। सन् 1302 में विरेश्वर नामक सज्जन ने घाट पर आत्मवीरेश्वर (शिव) मंदिर का निर्माण कराया जिसके कारण इसको वीरेश्वर घाट कहा जाता था। इसका उल्लेख काशीखण्ड में भी हुआ है। ऐसी मान्यता कि अग्निदेव का जन्म यहीं पर हुआ था। घाट के समक्ष गंगा में हरिश्चन्द्र एवं पर्वत तीर्थ की स्थिति मानी गई है, घाट पर वीरेश्वर (शिव) मंदिर के अतिरिक्त पर्वतेश्वर शिव एवं दत्तात्रेयेश्वर (शिव एवं दत्तात्रेय) मंदिर प्रमुख है। सन् 1949 में ग्वालियर राजपरिवार द्वारा घाट का जीर्णोद्धार कराया गया था। यह गंगा तट काशी के सर्वाधिक रमणीय घाटों में स्थान पाता है। वर्तमान में घाट पक्का, स्वच्छ एवं सुदृढ़ है, यहां दैनिक एवं स्थानीय स्नानार्थी स्नान करते हैं, घाट के समीपवर्ती क्षेत्रों में शैव-वैष्णव, कबीर, नानक आदि विभिन्न-पन्थों के साधू-सन्यासी निवास करते हैं।
संकठा घाट
घाट का पक्का निर्माण सन् 1825 में विश्वम्भर दयाल की पत्नी ने कराया था, घाट क्षेत्र में संकठा देवी (कात्यायनी दुर्गा) का प्रसिद्ध मंदिर स्थापित है जिसके कारण घाट का नामकरण हुआ। पूर्व में इसका विस्तार वर्तमान गंगामहल (द्वितीय) तक रहा, सन् 1864 में गंगामहल (द्वितीय) का निर्माण होने के पश्चात यह दो भागों में बँट गया। काशीखण्ड के अनुसार संकठाघाट प्राचीन समय में श्मशान घाट था, घाट स्थित यमेश्वर शिव एवं हरिश्चन्द्रेश्वर मंदिर तथा यम द्वितीया को घाट पर होने वाले स्नान से इसकी प्रामाणिकता सिद्ध होती है। घाट के सम्मुख चन्द्र एवं वीर तीर्थों की स्थिति मानी गई है।
प्रत्येक शुक्रवार, यम द्वितीया एवं नवरात्र के छठवें दिन घाट पर स्नान करने एवं संकठा देवी के दर्शन-पूजन का विशेष महात्म्य है। पद्मपुराण के अनुसार इस देवी को विजया, कामदा, दुखःहरिणी, कात्यायनी, सर्वरोगहरणा के नाम से भी जाना जाता है, इसके अतिरिक्त घाट पर वशिष्ठेश्वर शिव, बैकुण्ठमाधव, चिन्तामणि विनायक मंदिर भी प्रतिस्थापित है। इस घाट के आस-पास के क्षेत्र को देवलोक कहते हैं, इसकी गणना काशी के रमणीय घाटों में होती है। वर्तमान में घाट पक्का एवं स्वच्छ है, धार्मिक महत्व होने के कारण यहाँ स्नानार्थियों की भीड़ होती है। घाट पर बड़ौदा के राजा का महल भी स्थित है जिसे महारानी गुहनाबाई (महानाबाई) ने बनवाया था। समीपवर्ती क्षेत्रों में गुजराती ब्राह्मणों का निवास स्थान है, सन् 1965 में राज्य सरकार ने घाट का जीर्णोंद्धार कराया था।
गंगामहल घाट (द्वितीय)
सन् 1864 में ग्वालियर महाराज जियाजी राव सिन्धिया ने घाट तट को क्रय करके घाट का पक्का निर्माण एवं विशाल भव्य महल बनवाया था, इस गंगा तट पर महल होने के कारण ही इसे गंगामहल घाट कहा गया। यह महल अपने कलात्मकता के लिये विख्यात है, महल में प्रवेश के लिये गंगातट पर ही दो मार्ग निर्मित हैं। महल में ही नागर शैली का राधा-कृष्ण का भव्य मंदिर है जहाँ कृष्ण जन्माष्टमी, रामनवमी, गणेश चतुर्थी, शिवरात्रि एवं अन्य पर्वों पर धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है। यहां कृष्ण लीला का भी मंचन किया जाता है जिसमें ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा एवं भोजन की जीवन्त परम्परा को देखा जा सकता है। इसके अतिरिक्त घाट पर अठ्ठारहवीं शताब्दी का लक्ष्मीनारायण मंदिर भी स्थापित है। वर्तमान में घाट पक्का एवं सुदृढ़ है, धार्मिक महत्व कम होने के बाद भी यहां दैनिक एवं स्थानीय स्नानार्थी स्नान कार्य करते हैं। सन् 1988 में राज्य सरकार के सहयोग से सिंचाई विभाग ने घाट के मरम्मत का कार्य कराया था।
वर्तमान में घाट पक्का, स्वच्छ एवं सुदृढ़ है। यहाँ मुख्यतः स्थानीय लोग स्नान आदि कार्य करते हैं। घाट के समीपवर्ती क्षेत्रों में महाराष्ट्र तथा गुजरात के लोगों की संख्या अधिक है, जिनके संस्कारों (रहन-सहन, खाना-पीना) में बनारसीपन का अद्भुत समन्वय देखा जा सकता हैं सन् 1965 में राज्य सरकार ने घाट का मरम्मत कराया था।
भोंसला घाट
सन् 1795 में नागपुर (महाराष्ट्र) के भोंसला महाराज के द्वारा घाट एवं यहाँ स्थित विशाल महल का निर्माण कराया गया था जिसके पश्चात यह भोसला घाट के नाम से जाना जाने लगा। गीर्वाणपदमंजरी के अनुसार इसका प्राचीन नाम नागेश्वर घाट था। घाट के समीप ही नागेश्वर शिव मंदिर है जिसको काशी के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में स्थान प्राप्त है। घाट स्थित महल दुर्ग के समान तथा कलात्मकता एवं शिल्प संयोजन की दृष्टि से विशिष्ट है। गंगातट पर ही महल का प्रवेश द्वार है, महल के मध्य लक्ष्मीनारायण एवं रघुराजेश्वर (शिव) मंदिर स्थापित है।
अग्निश्वर घाट
सन् 1965 में राज्य सरकार के द्वारा घाट का पक्का निर्माण कराया गया था। यह घाट काशी के प्राचीन एवं प्रमुख घाटों में स्थान रखता है जिसका उल्लेख गीर्वाणपदमंजरी में भी हुआ है। उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्व तक इसका विस्तार वर्तमान गणेशघाट तक था। घाट के समीप अग्निश्वर (शिव) मंदिर स्थापित होने के कारण इसका नाम अग्निश्वर घाट पड़ा। घाट के समक्ष गंगा को अग्नितीर्थ की मान्यता है। लिंगपुराण में उल्लेख है कि काशी की अष्टायतन शिव यात्रा इसी घाट पर स्नान करने के पश्चात अग्निश्वर शिव के दर्शन से आरम्भ होती है। घाट पर नागेश विनायक (गणेश) मंदिर एवं उपशान्तेश्वर शिव मंदिर भी स्थापित है। पूर्व में घाट पर बालू तथा लकड़ी का क्रय-विक्रय होता था जिसे सन् 1985 से प्रतिबन्धित कर दिया गया। वर्तमान में घाट पक्का एवं स्वच्छ है। धार्मिक महत्व होने के कारण यहाँ दैनिक एवं पर्व विशेष पर स्नान करने वालों का आवागमन होता है।
गणेश घाट
सन् 1807 में पूना के अमृतराव पेशवा ने घाट का पक्का निर्माण कराया तथा घाट पर अमृत विनायक मंदिर (नागर शैली) एवं भवन भी बनवाया। अमृत विनायक (गणेश) मंदिर स्थापित होने के कारण ही घाट का नाम गणेश घाट पड़ा। पूर्व में यह अग्निश्वर घाट का ही अंग था। घाट पर भाद्र माह के शुल्क चतुर्थी को स्नान का विशेष महात्म्य है, इस अवसर पर लोग घाट पर स्नान के पश्चात अमृत विनायक मंदिर में दर्शन-पूजन करते हैं। मंदिर में विभिन्न पर्वों पर धार्मिक अनुष्ठान, प्रवचन-कीर्तन का आयोजन होता है तथा गरीबों एवं निसहायों को अन्न-वस्त्र प्रदान किया जाता है। पेशवाओं का व्यक्तिगत मंदिर होने के कारण मन्त्रोच्चारण में उनके गोत्र नाम का भी उच्चारण किया जाता है। वर्तमान में घाट पक्का एवं सुदृढ़ है, यहाँ दैनिक एवं पर्व-विशेष पर स्नान करने वाले स्नानार्थियों का आवागमन होता है।
मेहता घाट
सन् 1960 में कलकत्ता निवासी बल्लभ राम सालिगराम मेहता ने घाट की भूमि क्रय करके घाट का निर्माण कराया था। अतः यह मेहताघाट के नाम से जाना जाने लगा। पूर्व में यह रामघाट का कच्चा भाग था। घाट पर कोई मंदिर नहीं है लेकिन वैदिक शिक्षा और उपचार दोनों ही दृष्टियों से इसका महत्व है, घाट के ऊपरी भाग में चिकित्सालय एवं प्रसिद्ध सांग्वेद संस्कृत विद्यालय है। ईंट और सीमेन्ट से निर्मित घाट पक्का एवं स्वच्छ है किन्तु धार्मिक महत्व कम होने के कारण यहाँ स्थानीय लोग ही स्नान करते हैं। घाट परिक्षेत्र में महाराष्ट्रीय समुदाय की बाहुल्यता है।
राम घाट
अठ्ठारहवीं शताब्दी में जयपुर के राजा सवाईमान सिंह के द्वारा घाट एवं घाट स्थित राम पंचायतन मंदिर का निर्माण कराया गया था, घाट पर राम पंचायतन मंदिर स्थापित होने के कारण घाट का नाम रामघाट पड़ा। पूर्व में घाट का विस्तार वर्तमान मेहताघाट तक था। सत्रहवीं शताब्दी में औरंगजेब के द्वारा मंदिर को नष्ट कर दिया गया था, अठ्ठारहवीं शताब्दी में मंदिर का पुनः निर्माण सवाई मान सिंह द्वारा कराया गया था जो वर्तमान में सुरक्षित है। गीर्वाणपदमंजरी के अनुसार घाट के सम्मुख गंगा में राम, ताम्रवराह, इन्द्रद्युम्न एवं इक्ष्वाकु तीर्थों की स्थिति मानी जाती है। चैत्र माह के रामनवमी पर घाट पर स्नान एवं राममंदिर में दर्शन-पूजन का विशेष महात्म्य है। राम मंदिर के अतिरिक्तकाल विनायक एवं महाराष्ट्र के लोक देवता खण्डोबा का मंदिर भी घाट पर स्थित है, मार्गशीर्ष माह के पंचमी एवं अष्टमी को महाराष्ट्रीयन लोग हर्षोल्लास के साथ खण्डोबा का पूजा करते हैं तथा नृत्य-संगीत एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं। वर्तमान में घाट पक्का, स्वच्छ एवं सुदृढ़ है, यहां स्थानीय एवं पर्व विशेष पर स्नानार्थी स्नान कार्य करते है। समीपवर्ती क्षेत्रों में महाराष्ट्र के लोगों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक है। सन् 1988 में राज्य सरकार के सहयोग से सिंचाई विभाग ने घाट का पुनः निर्माण कराया था।
जटार घाट
उन्नीसवी शताब्दी के मध्य में घाट एवं भवन का निर्माण ग्वालियर के राजा जियाजी राव शिन्दे के दीवान बालाजी चिमणाजी जटार ने कराया था, अतः घाट का नामकरण जटार घाट हुआ। जेम्स प्रिंसेप के अनुसार घाट का प्राचीन नाम चोरघाट था, जिसके संदर्भ में स्थानीय लोगों का मत है कि पहले इस घाट पर स्नान करने वालो के समान (जो स्नान करने के लिये साथ लाते थे) प्रायः चोरी हो जाते थे, जिससे लोगों में यह चोरघाट के नाम से प्रचलित हो गया। कालान्तर में घाट एवं यहाँ स्थित भवन का निर्माण हो जाने के पश्चात घाट का नाम परिवर्तित हो गया। बाला जी जटार के द्वारा निर्मित बहुमंजिले भवन (K 24/33) के एक भाग में लक्ष्मीनारायण का कलात्मक मंदिर है, मंदिर पर रंगीन काँच के टुकड़ों का मनोहारी जड़ाऊ अलंकरण है इस कारण इसे जड़ाऊ मंदिर भी कहते है। घाट स्थित गंगा में कालगंगा तीर्थ की स्थिति मानी गई है। वर्तमान में घाट पक्का एवं स्वच्छ है यहाँ दैनिक एवं स्थानीय लोग स्नान करते हैं। घाट के समीपवर्ती क्षेत्रों में महाराष्ट्र एवं गुजरात के लोगों की संख्या अधिक है। घाट स्थित लक्ष्मीनारायण (जड़ाऊ मंदिर) मंदिर समुचित रख-रखाव न होने के कारण अपनी कलात्मकता को खो रहा है जिसके जिर्णोद्धार की आवश्यकता है।
ग्वालियर घाट
उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में ग्वालियर के राजा जियाजी राव शिन्दे ने घाट एवं घाट स्थिति विशाल भवन का निर्माण कराया था, ग्वालियर राजा द्वारा निर्माण होने के कारण घाट का नाम ग्वालियर घाट पड़ा। पूर्व में यह वर्तमान जटार घाट का ही भाग था। घाट स्थित भवन में छोटे-छोटे तीन शिव मंदिर हैं। घाट के सम्मुख गंगा में पिप्पलाद तीर्थ की स्थिति मानी गई है। वर्तमान में घाट पक्का एवं स्वच्छ है हालांकि घाट का धार्मिक-सांस्कृतिक दृष्टि से कम महत्व है लेकिन स्वच्छ होने के कारण स्थानीय लोग यहाँ स्नान कार्य करते है।
बाला जी घाट
अठ्ठारहवीं शताब्दी के मध्य में पूना के बाजीराव पेशवा ने घाट एवं यहाँ स्थित विशाल भवन (म0सं0 K 22/24) का निर्माण कराया था। सन् 1864 में भवन को अंग्रेजों ने अपने अधिकार में लेकर इसे नीलाम कर दिया, जिसे ग्वालियर महाराज जियाजी राव शिन्दे ने क्रय कर लिया और उसमें बाला जी (विष्णु) की प्रतिमा को प्रतिष्ठित किया। यह भवन ही वर्तमान में बाला जी मंदिर के नाम से प्रचलित है, इसी मंदिर के नामपर ही घाट का नामकरण हुआ है। प्रसिद्ध मंगलागौरी मंदिर इस घाट का प्राचीनतम् मंदिर है, बाला जी मंदिर की स्थापना से पूर्व यह मंगलागौरी घाट के नाम से विख्यात था जिसका उल्लेख गीर्वाणपदमंजरी में भी हुआ है। नवरात्रों में मंगलागौरी देवी के दर्शन-पूजन का विशेष महात्म्य है। बाला जी एवं मंगलागौरी मंदिर के अतिरिक्त घाट पर राधेश्वर शिव, गर्भतीश्वर शिव, मंगल विनायक, चर्चिकादेवी, मयूखादित्य (सूर्य आदित्य रूप में) का मंदिर प्रमुख है। घाट के समक्ष गंगा में बिन्दु, मख, मंगल एवं मयूखार्क तीर्थों की स्थिति मानी गई है। धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से यह घाट महत्वपूर्ण है, बाला जी मंदिर में आश्विन तथा कार्तिक माह में अनेक धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है, जिसमें रामचरितमानस का पाठ, धार्मिक प्रवचन का आयोजन एवं कार्तिक पूर्णिमा को सायंकाल सामूहिक रूप से दीप प्रज्ज्वलन मुख्य है। घाट पर मुण्डन संस्कार, विवाह, सामूहिक विवाह, उपनयन, गंगा पुजईया आदि शुभ कार्यों को भी सम्पन्न किया जाता है। वर्तमान में धाट पक्का, स्वच्छ एवं सुदृढ़ है। धार्मिक महत्व के कारण घाट पर दैनिक एवं स्थानीय स्नानार्थियों के साथ ही पर्व विशेष पर स्नान करने वाले स्नानार्थियों का भी आगमन होता है।
पंचगंगा घाट
सन् 1580 में घाट का पक्का निर्माण रघुनाथ टण्डन ने कराया था, ऐसी मान्यता है कि इस घाट पर गंगा में अदृश्य रूप से यमुना, सरस्वती, किरणा एवं धूतपापा नदियों का संगम होता है, अतः इन पाँचों नदियों का संगमस्थल होने के कारण इसे पंचगंगा घाट के नाम से जाना जाता है। प्राचीन समय में घाट का नाम बिन्दुमाधव घाट था एवं यहाँ बिन्दुमाधव (विष्णु) का मंदिर स्थापित था। मान्यताओं के अनुसार बिन्दुमाधव मंदिर का निर्माण आमेर (राजस्थान) के राजा मान सिंह ने सत्रहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में कराया था, जिसे सत्रहवीं शताब्दी में औरंगजेब द्वारा नष्ट कर इसे आलमगीर मस्जिद का रूप दे दिया गया, इसके पश्चात ही घाट का नाम परिवर्तित होकर पंचगंगा हो गया। अठ्ठारहवीं शताब्दी के मध्य में औध (सतारा) महाराष्ट्र महाराजा के पंथ प्रतिनिधि भावन राव ने वर्तमान बिन्दुमाधव मंदिर का निर्माण कराया था। काशी में स्थित सप्तपुरियों के अन्तर्गत इस घाट को कांचीपुरी क्षेत्र माना गया है तथा बिन्दुमाधव मंदिर की तुलना पुरी (उड़ीसा) के जगन्नाथ मंदिर से की गई है।
काशीखण्ड के अनुसार शरद ऋतु एवं कार्तिक माह में इस घाट पर स्नान का विशेष महात्म्य है, प्रयाग (इलाहाबाद) में सम्पूर्ण माघ माह के स्नान का जो पुण्य प्राप्त होता है वह पंचगंगा घाट पर मात्र एक दिन के स्नान से प्राप्त होता है। काशीखण्ड एवं काशीरहस्य के अनुसार घाट के सम्मुख गंगा में पंचतीर्थ की स्थिती मानी गई है। वर्तमान में घाट पर अनेक मठ एवं मंदिर है, मठों में रामानन्द (श्री मठ संस्थान), श्री संस्थान गोकर्ण पर्तकाली जिवोत्तम, सत्यभामा एवं तैलंगस्वामी मठ मुख्य है तथा मंदिरों में बिन्दुमाधव के अतिरिक्त बिन्दु विनायक, राम मंदिर (कंगन वाली हवेली) राम मंदिर (गोकर्णमठ), रामानन्द मंदिर, धूतपापेश्वर (शिव), रेवेन्तेश्वर (शिव) मंदिर, एवं आलमगीर मस्जिद प्रमुख है। असि से आदिकेशव तक घाटों के मध्य गंगाघाट पर स्थित एक मात्र मस्जिद आलमगीर मस्जिद है जो कलात्मक दृष्टि से भी विशिष्ट है। 14वीं-15 वीं शताब्दी में वैष्णव संत रामानन्द रामानन्दमठ में निवास करते थे और जीवन पर्यन्त इसी घाट पर रामभक्ति का प्रसार-प्रचार एवं कबीर-रैदास और विचारकों का मार्ग दर्शन किया। उन्नीसवीं शताब्दी में घाट पर स्थित तैलंग स्वामी मठ में महान संत तैलंगस्वामी निवास करते थे, इन्होंने मठ में एक विशाल शिवलिंग (भार लगभग पचास मन) स्थापित किया। जिसके बारे में कहा जाता है कि तैलंगस्वामी नेइसे गंगा से निकाल कर यहां स्थापित किया था। रामानन्द मठ के समीप ही अहिल्याबाई होल्कर के द्वारा बनवाया गया दीप हजारा स्तम्भ है जिसमें कार्तिक पुर्णिमा को दीप प्रज्जवलित किया जाता है, इन दीपकों की ज्योति काशी के सभी घाटों पर फैल गई, वर्तमान में सार्वजनिक रूप से अपने श्रद्धा-सामर्थ्य के अनुसार लोग दीप जलाकर काशी के घाटों को प्रकाशमान करते हैं, जिसे देवदीपावली पर्व के रूप में प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है। यह मधुर मनोहारी दृश्य अद्भुत होती है मानों काशी नगरी तारा मण्डल को आईना दिखा रहा हो, इस मधुकर दृश्य का आनन्द लेने के लिये देश-विदेश से पर्यटकों का आगमन होता है।
काशी के पाँच प्राचीन तथा वर्तमान में सर्वाधिक जीवन्त घाटों में पंचगंगा घाट भी समान स्थान रखता है। यह एकमात्र ऐसा घाट है जिसके उपरी भाग की सीढ़ियाँ प्राचीन समय से वर्तमान तक सुरक्षित हैं। घाट पर कार्तिक शुल्क एकादशी से पूर्णिमा तक पंचगंगा स्नान का मेला लगता है, इस अवसर पर स्नान के पश्चात् लोग मिट्टी से निर्मित भीष्म प्रतिमा का पूजन करते हैं। कार्तिक माह में गंगातट पर लम्बे-लम्बे बाँस गाड़कर उसमें दीप लटकाते हैं, असंख्य टिमटिमाती आकाशदीपों की शोभा अलौकिक होती है। घाट एवं समीपवर्ती क्षेत्रों में स्थित मंदिरों में धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता रहता है। काशी की द्वि, त्री, एवं चतुर्थ तीर्थी यात्रा करने वाले यात्री घाट पर स्नान-पूजन करने के पश्चात् ही आगे की यात्रा करते है।
वर्तमान में घाट पक्का, स्वच्छ एवं सुदृढ़ है, धार्मिक महत्व के कारण दैनिक एवं पर्व विशेष पर स्नान करने वाले स्नानार्थियों का आगमन प्रचुर मात्रा में इस घाट पर होता है। घाट के समीपवर्ती क्षेत्रों में महाराष्ट्र, आन्ध्र, गुजरात एवं राजस्थान के मूल निवासियों की संख्या अधिक है। सन् 1965 में राज्य सरकार के द्वारा घाट के निचले भाग का पुनः निर्माण कराया गया था।
दुर्गा घाट
इस घाट का प्रथम उल्लेख गीवार्णपदमंजरी (सत्रहवीं शताब्दी) में हुआ है। सन् 1740 में पेशवाओं के सहयोग से नारायण दीक्षित ने इस घाट का पक्का निर्माण कराया था। घाट तट पर ब्रह्मचारिणी दुर्गा मंदिर (मकान सं0 K 22/17) स्थापित होने के कारण ही इसका नाम दुर्गा घाट पड़ा, चैत्र एवं अश्विन माह के नवरात्र द्वितीया को घाट पर स्नान करने के बाद ब्रह्माचारिणी दुर्गा के दर्शन करने का विशेष महात्म्य है। इसके अतिरिक्त घाट पर खर्वनृसिंह मंदिर भी स्थापित है, घाट के सम्मुख गंगा में खर्वनृसिंह तीर्थ की स्थिति मानी गई है। गंगातट पर सीढ़ियों का निर्माण शास्त्रीय विधि से की गई है, गंगातट पर नौ-नौ सीढ़ियों के बाद चौकी का निर्माण किया गया है, नौ सीढ़ियां दुर्गा के नौ स्वरूपों की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति मानी जा सकती हैं। घाट पर धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन प्रायः होता रहता है। स्थानीय एवं दैनिक स्नानार्थियों के अतिरिक्त धार्मिक महत्व होने के कारण तीर्थयात्री स्नानार्थियों की भी संख्या इस घाट पर अधिक होती है। घाट के समीपवर्ती क्षेत्रों में महाराष्ट्रीयन ब्राह्मणों की संख्या अधिक है, जिनमें कुछ विद्वान गुरूकुल पद्धति के द्वारा वैदिक ज्ञान प्रदान करते हैं। सन् 1958 में राज्य सरकार के द्वारा घाट का पुनः निर्माण कराया गया था।
ब्रह्मा घाट
सन् 1740 में नारायण दीक्षित ने दुर्गाघाट के साथ ही इस घाट का भी पक्का निर्माण कराया था। घाट का प्रथम उल्लेख गीवार्णपदमंजरी में हुआ है। घाट के नामकरण के सम्बन्ध में कथा प्रचलित है कि जब शिव जी के आदेश पर ब्रह्मा जी का काशी में आगमन हुआ तो ब्रह्म जी ने इस घाट को अपना निवास स्थान बनाया, इसीलिये इस घाट को ब्रह्मघाट कहा जाने लगा। ब्रह्मा एवं काशी के सम्बन्ध का उल्लेख मत्यस्यपुराण में हुआ है। घाट पर ब्रह्मा मंदिर (13वीं शताब्दी की ब्रह्मा की प्रतिमा स्थापित) तथा ब्रह्मेश्वर शिव मंदिर स्थित है। घाट पर ही स्थित श्री काशी मठ संस्थान के अन्दर बिन्दु माधव (दत्तात्रेय) एवं लक्ष्मीनृसिंह मंदिर स्थापित है। घाट के समक्ष गंगा में भैरव तीर्थ की स्थिति मानी गई है। गंगातट से ब्रह्मेश्वर शिव मंदिर तथा ब्रह्मा मंदिर में जाने के लिये अलग-अलग सीढ़ियाँ शास्त्रीय विधान के अनुसार निर्मित हैं, ब्रह्मेश्वर शिव तक जाने के लिये पाँच-पाँच सीढ़ियों के बाद चौकी का निर्माण किया गया है जो पंचायतन शिव का प्रतीक है, वहीं ब्रह्मा मंदिर तक चार-चार सीढ़ियों के पश्चात चौकी का निर्माण हुआ है जो चतुर्मुखी ब्रह्मा का प्रतीक माना जा सकता है। मान्यताओं के अनुसार आदि शंकराचार्य काशी आगमन पर श्री काशीमठ संस्थान में निवास करते थे। कांचिकोटि शंकराचार्य द्वारा प्रत्येक वर्ष इसी घाट पर चातुर्मास अनुष्ठान का आयोजन किया जाता है। वर्तमान में घाट पक्का, स्वच्छ एवं सुदृढ़ है, यहां स्थानीय लोग स्नान कार्य करते हैं। सन् 1958 में राज्य सरकार के द्वारा घाट का पुनः निर्माण कराया गया था।
बूँदीपरकोटा घाट
सोलहवीं शताब्दी के अन्त में बूँदी (राजस्थान) महाराजा राव सुरजन ने घाट एवं घाट पर स्थित विशाल महल का निर्माण कराया था। गीर्वाणपदमंजरी के अनुसार घाट का प्राचीन नाम आदिविशेश्वर घाट था। घाट स्थित महल के मध्य विश्वेश्वर शिव का मंदिर है जिसके कारण ही घाट का नाम आदि विश्वेश्वर पड़ा था। पूर्व में यह वर्तमान शीतलाघाट (द्वितीय) तक फैला था, उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तर्राद्ध में बूँदी के राजा राव प्रीतम सिंह ने शीतला घाट (द्वितीय) का पुनः निर्माण कराया जिसके पश्चात् ही घाट प्रीतम सिंह और शीतला घाटों में बंट गया। सन 1958 में राज्य सरकार के द्वारा दोनों घाटों की मरम्मत करायी गयी और प्रीतम सिंह घाट का नाम बूँदी राजाओं से सम्बन्धित कर बूँदी परकोटा घाट कर दिया गया। घाट पर आदि विश्वेश्वर के अतिरिक्त अन्नपूर्णा, शेषमाधव (विष्णु) तथा कर्णादित्य सूर्य, आदित्य रूप में) मंदिर स्थापित है। घाट के सम्मुख गंगा में कर्णादित्य तीर्थ की स्थिति मानी गई है। यद्यपि घाट पक्का है लेकिन गंगातट तक पहुँचने के लिये शीतला घाट के सीढ़ियों से होकर जाना पड़ता है। अतः स्थानीय लोग इस घाट पर स्नान न करके शीतला घाट पर ही स्नान कार्य करते हैं परन्तु महल के कलात्मक स्तम्भों एवं नक्काशियों के अवशेष को आज भी देखा जा सकता है।
शीतला घाट (द्वितीय)
अठ्ठारहवीं शताब्दी के पूर्व यह प्राचीन आदि विशेश्वर घाट का ही भाग था। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में बूँदी (राजस्थान) के राजा प्रीतम सिंह के द्वारा घाट का पुनः निर्माण होने के पश्चात घाट दो भागों में बंट गया, पूर्व में घाट का विस्तार वर्तमान बूँदीपरकोटा घाट तक था। घाट पर शीतला मंदिर (अठ्ठारहवीं शताब्दी का) स्थापित है, इस घाट पर भी कर्णादित्य तीर्थ की स्थिति मानी गई है, चैत्र शुक्ल नवमी को घाट पर स्नान करने एवं शीतला मंदिर में दर्शन-पूजन का विशेष महात्म्य है। घाट पर राजस्थान का प्रसिद्ध मेला गणगौर एवं श्रावणी तीज लोगों के द्वारा पूरे उल्लास के साथ मनाया जाता है। वर्तमान में घाट पक्का एवं स्वच्छ है, धार्मिक महत्व होने से यहाँ दैनिक स्नानार्थियों के साथ ही पर्व-विशेष पर स्नान करने वालों का आगमन होता है। घाट के समीपवर्ती क्षेत्रों में राजस्थानी मूल के लोगों की संख्या अधिक है, सन् 1988 में राज्य सरकार के सहयोग से सिंचाई विभाग ने घाट का मरम्मत कराया था।
लाल घाट
तिजारा (राजस्थान) महाराजा द्वारा उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में घाट के दक्षिणी भाग का निर्माण कराया गया था। घाट का उल्लेख जेम्स प्रिंसेप ने भी किया है, सन् 1935 में राजा बलदेवदास बिड़ला ने काशी में निवास के लिये घाट एवं समीपवर्ती भवन को क्रय कर लिया तथा भवन एवं घाट का पक्का निर्माण कराया। घाट का उत्तरी भाग सन् 1988 के पूर्व कच्चा था तथा यहाँ धोबी लोग कपड़ा धोते थे, अतः यह धोबिया घाट के नाम से भी जाना जाता था। घाट पर गोप्रेक्षेश्वर शिव एवं गोपीगोविन्द मंदिर स्थापित है, माघ माह के पूर्णिमा को गंगा स्नान का महात्म्य है। गंगातट पर एक भवन में बलदेवदास बिड़ला द्वारा निर्मित बलदेव दास बिड़ला संस्कृत विद्यालय है तथा समीप के ही दूसरे भवन में विद्यार्थियों के निवास की व्यवस्था है। घाट स्थित बिड़ला धर्मशाला में तीर्थयात्री, साधु-सन्यासी निवास करते हैं। संस्कृत विद्यालय एवं धर्मशाला का संचालन बिड़ला ट्रस्ट के द्वारा होता है, यहाँ निःशुल्क शिक्षा, भोजन एवं वस्त्र की सुविधा प्रदान किया जाता है। वर्तमान में घाट पक्का एवं स्वच्छ है, यहाँ पर स्थानीय लोग स्नान करते हैं किन्तु माघ माह में स्नानार्थियों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक होती है। सन् 1988 में राज्य सरकार के सहयोग से सिंचाई विभाग ने घाट का पक्का निर्माण कराया था।
हनुमानगढ़ी घाट
सन् 1972 में घाट का पक्का निर्माण श्यामलदास के शिष्य टेकचन्द्र साहू ने कराया था। पूर्व में यह गायघाट का ही भाग था। घाट पर मूलतः बिहार के निवासी बाबा श्यामलदास निवास करते थे। सन् 1950 में इन्होंने घाट पर ही हनुमान मंदिर की स्थापना की थी, अतः कालान्तर में इसे हनुमानगढ़ी घाट के नाम से जाना जाने लगा। हनुमान मंदिर के अतिरिक्त घाट पर एक शिव मंदिर भी है। घाट पर ही श्यामलदास के शिष्य रमण महात्यागी के द्वारा ‘महात्यागी आश्रम’ का निर्माण कराया गया जिसमें विद्यार्थियों को संस्कृत, योग तंत्र एवं ज्योतिष की शिक्षा निःशुल्क प्रदान की जाती है। वर्तमान में घाट पक्का एवं स्वच्छ है, यहाँ स्थानीय लोग ही अधिकतर स्नान कार्य करते हैं। घाट के ऊपरी भाग में एक व्यायामशाला स्थित है, जहाँ जोड़ी-गदा, कुश्ती की विभिन्न प्रतियोगिता आयोजित होती रहती है।
गाय घाट
उन्नीसवीं शताब्दी में घाट के दक्षिणी भाग का निर्माण नेपाल नरेश राणा शमशेर बहादुर ने तथा उत्तरी भाग का निर्माण ग्वालियर राजवंश के दीवान मालवजी नरसिंह राव शितोले की पत्नी बालाबाई शितोले ने कराया था। ऐसी मान्यता है कि घाट पर स्नान करने से गौ-हत्या के पाप से मुक्ति मिलती है, इसी कारण घाट का नाम गाय घाट पड़ा। जबकि स्थानीय लोगों का मानना है कि प्राचीन समय में समीपवर्ती क्षेत्र के लोग गायों को पानी पिलाने तथा स्नान कराने इसी घाट पर आते थे, संभवतः इस कारण इसका नामकरण हुआ। सवाई मानसिंह द्वितीय संग्रहालय से प्राप्त घाट सम्बन्धित छायाचित्रों से भी इसकी प्रामाणिकता सिद्ध होती है। लिंगपुराण एवं काशीखण्ड के अनुसार घाट के सम्मुख गोप्रेक्ष तीर्थ की स्थिति मानी गई है, तीर्थ में स्नान के पश्चात मुखनिर्मालिका गौरी के दर्शन-पूजन का विशेष महात्म्य है। मुख निर्मालिका गौरी को काशी के नवगौरियों में स्थान प्राप्त है। मुख निर्मालिका गौरी के अतिरिक्त हनुमान, शीतला, लक्ष्मीनारायण, शिव मंदिर (डालमिया भवन में) घाट क्षेत्र में स्थापित है। घाट के ऊपर दक्षिणी भाग में नेपाल नरेश द्वारा निर्मित विशाल महल को सन् 1940 में उद्योगपति डालमिया ने क्रय कर लिया, इस महल में डालमिया की माँ काशी लाभ के लिये रहती थी, यह महल वर्तमान में डालमिया भवन के नाम से जाना जाता है। उत्तरी भाग में बालाबाई शितोले द्वारा निर्मित विशाल भवन में अब किरायेदार रहते हैं। घाट की सीढ़ियों पर कई शिवलिंग है तथा पत्थर से निर्मित बैठे नंदी की प्रतिमा (लगभग तीन फीट ऊंची) भी है। घाट पर अनेक धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है जिनमें मुण्डन संस्कार, विवाह, गंगा पुजईया, पिण्डदान एवं मंदिरों के वार्षिक श्रृंगार पर आयोजित भजन-कीर्तन, संगीत, प्रवचन तथा कार्तिक माह मे होने वाला रामलीला विशेष है। वर्तमान में घाट पक्का, स्वच्छ एवं सुदृढ़ है घाट पर दैनिक स्नानार्थियों के साथ-साथ पर्व विशेष पर भी स्नान करने वालों का आगमन होता है। स्थानीय लोगें के अनुसार गौ-हत्या पाप से मुक्ति के लिये दूर-दूर से लोग यहाँ आकर घाट पर स्नान-दान, पूजन एवं अनुष्ठान करते हैं। सन् 1965 में राज्य सरकार के द्वारा घाट का मरम्मत कराया गया था।
बद्रीनारायण घाट
बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में नगर परिषद (वर्तमान में नगर निगम) द्वारा घाट के उत्तरी भाग का पक्का निर्माण कराया गया था। पूर्व में यह महता घाट के नाम से जाना जाता था, घाट पर बद्रीनारायण (नर-नारायण) मंदिर स्थित होने के कारण कालान्तर में यह बद्रीनारायण घाट के नाम से जाना जाने लगा। घाट पर स्थित बद्रीनारायण मंदिर का प्रतीक रूप माना जाता है। घाट के समक्ष गंगा में नर-नारायण तीर्थ की स्थिति मानी गई है, ऐसी मान्यता है कि नर-नारायण तीर्थ में स्नान के पश्चात बद्रीनारायण के दर्शन-पूजन के समान पुण्य प्राप्त होता है। बद्रीनारायण मंदिर के अतिरिक्त घाट पर नागेश्वर शिव मंदिर भी स्थापित है। पौष माह में घाट पर स्नान करने का विशेष महात्म्य है। सन् 1988 में राज्य सरकार के सहयोग से सिंचाई विभाग ने पक्के घाट का पुनः निर्माण तथा शेष कच्चे भाग का पक्का निर्माण कराया था। वर्तमान में घाट पक्का एवं स्वच्छ है, धार्मिक महत्व के कारण तीर्थयात्री एवं स्थानीय लोग यहाँ स्नान कार्य करते हैं। घाट की स्वच्छता बनाये रखने के लिये घाटपर सुलभ शौचालय का भी निर्माण कराया गया है।
त्रिलोचन घाट
सन् 1740 में पेशवाओं के सहयोग से नारायण दीक्षित ने घाट का पक्का निर्माण कराया था। घाट क्षेत्र में त्रिलोचन महादेव मंदिर स्थित होने के कारण इसे त्रिलोचन घाट कहा गया, काशीखण्ड के अनुसार यह मंदिर शिव के तीसरे नेत्र को समर्पित है। स्थानीय ब्राह्मणों के अनुसार इस तट पर गंगा में नर्मदा एवं पिप्पिला नदियों का अदृश्य रूप में संगम होता है, ये तीनों नदियाँ शिव के तीनों नेत्र के समान हैं इसलिये घाट का नाम त्रिलोचन घाट पड़ा है। यह घाट काशी के श्रेष्ठ तीर्थों में से है जिसका उल्लेख गहड़वाल काल से ही मिलता है। घाट स्थित त्रिलोचन मंदिर को औरंगजेब के समय में नष्ट कर दिया गया था। जिसका निर्माण अठ्ठारहवीं शताब्दी में पूना के नाथूबाला पेशवा ने कराया था, सन् 1965 में रामादेवी द्वारा इस मंदिर का पुनः निर्माण कराया गया था। त्रिलोचन महादेव काशी के ओंकारेश्वर तीर्थ के प्रमुख देव हैं, ओंकारेश्वर यात्रा करने वाले तीर्थयात्री घाट पर स्नान एवं त्रिलोचन महादेव के दर्शन-पूजन के पश्चात ही यात्रा आरम्भ करते हैं। घाट के सामने गंगा में पिप्पिला एवं त्रिविष्टप तीर्थ की स्थिति मानी गई है।वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया) को त्रिलोचन महादेव का वार्षिक श्रृंगार होता है, इस अवसर पर लोग घाट पर स्नान के पश्चात त्रिलोचन शिव का दर्शन-पूजन करते हैं तथा घाट पर भजन-कीर्तन, सत्संग आदि धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है। त्रिलोचन मंदिर के अतिरिक्त घाट पर पंचाक्षेश्वर शिव, कोटीश्वर शिव, उद्दण्डमुण्ड विनायक, यमुनेश्वर शिव, का मंदिर स्थापित है। अरूणादित्य (सूर्य) को काशी के द्वादश आदित्यों में पूजा जाता है। इस घाट की सीढ़ियाँ भी शास्त्रीय विधान में निर्मित है, गंगातट से बारह-बारह सीढ़ियों के पश्चात चौकी का निर्माण हुआ है, इन बारह सीढ़ियों को द्वादश शिव का प्रतीक माना जा सकता है। वर्तमान में घाट का पक्का एवं स्वच्छ है, वैशाख माह में घाट पर स्नान का विशेष महत्व है, धार्मिक महत्व के कारण यहाँ स्थानीय स्नानार्थियों के साथ ही बाहरी स्नानार्थियों का भी आगमन होता है। सन् 1965 में राज्य सरकार ने घाट का मरम्मत कराया था, पूर्व में घाट का दक्षिणी भाग कच्चा था जिसका नव निर्माण सन् 1988 में राज्य सरकार के सहयोग से सिंचाई विभाग ने कराया था।
गोला घाट
बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में नगर परिषद (वर्तमान में नगर निगम) द्वारा घाट का पक्का निर्माण कराया गया था। स्थानीय लोगों के अनुसार प्राचीन समय में घाट के उपरी भाग पर गल्ला मण्डी (अनाज क्रय-विक्रय का केन्द्र) लगती थी जिसे स्थानीय लोगों में ‘गोला’ कहा। मण्डी लगने से यह घाट गोलाघाट के नाम से प्रचलित हो गया। घाट का उल्लेख जेम्स प्रिसेंप ने भी किया है। घाट क्षेत्र में भृगुकेशव (विष्णु) मंदिर स्थापित है। वर्तमान में घाट पक्का है लेकिन धोबियों द्वारा घाट पर कपड़ा साफ करने के कारण स्थानार्थियों की संख्या बहुत कम होती है। सन् 1988 में राज्य सरकार के सहयोग से सिंचाई विभाग ने घाट का नवनिर्माण कराया था।
नन्दीश्वर घाट
सन् 1940 में भवानीपुर (बंगाल) के द्वारिकानाथ चक्रवर्ती ने घाट के कुछ भाग का पक्का निर्माण कराया एवं घाट तट पर एक विशाल भवन भी बनवाया था। घाट तट पर नन्दीश्वर शिव मंदिर स्थापित है जिसके कारण घाट का नामकरण हुआ। घाट का प्रथम उल्लेख मोतीचन्द्र ने ‘बनारस एण्ड इट्स घाट’ में किया है। वर्तमान में घाट पक्का एवं सुदृढ़ है एवं यहां अधिकतर स्थानीय लोग ही स्नान करते हैं। सन् 1988 में राज्य सरकार के सहयोग से सिंचाई विभाग ने शेष कच्चे भाग का पक्का निर्माण एवं पक्के भाग का मरम्मत कराया था।
शुका घाट
सन् 1988 में राज्य सरकार के सहयोग से सिंचाई विभाग ने घाट का पक्का निर्माण कराया, घाट का उल्लेख जेम्स प्रिंसेप (सन् 1822 में) ने भी किया है जबकि वैक्स (सन् 1868 में) ने इसे बाबू सूका घाट के नाम से दर्शाया है। स्थानीय लोगों में यह सक्का घाट के नाम से प्रचलित है। घाट के उपरी भाग में संत हरदासराम सेवाश्रम स्थित है, इसी के परिसर में बाल चन्द्रेश्वर शिव मंदिर है। वर्तमान में घाट पक्का हैं लेकिन धोबियों द्वारा कपड़ा साफ करने के कारण इस घाट पर भी स्नानार्थियों की संख्या अपेक्षाकृत कम होती है।
तेलियानाला घाट
सन् 1988 में शुकाघाट के साथ ही इस घाट का भी पक्का निर्माण राज्य सरकार के सहयोग से सिंचाई विभाग ने कराया था। इस घाट पर नगर का प्राचीन नाला गंगा में मिलता था, जिससे यह लोगों के मध्य तेलियानाला नाम से प्रचलित हो गया। सन् 1988 में घाट के निर्माण के पश्चात सरकार द्वारा नाला को बन्द कर दिया गया। सवाई मान सिंह द्वितीय संग्रहालय जयपुर में काशी के घाट सम्बन्धित छाया चित्रों (17वीं-18वीं शताब्दी का) में इस घाट को भी दर्शाया गया है। घाट क्षेत्र में एक शिव मंदिर स्थापित है। वर्तमान में घाट पक्का एवं स्वच्छ है लेकिन यहाँ भी कम संख्या में लोग स्नान कार्य करते हैं, इस घाट पर भी धोबियों द्वारा कपड़ा साफ किया जाता है।
नया घाट
बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में चैनपुर, भभुआ (बिहार) के नरसिंह जयपाल ने घाट के उत्तरी भाग का एवं घाट तट पर एक विशाल भवन का निर्माण कराया था, जिसके पश्चात ही इसे नया घाट के नाम से जाना जाने लगा। घाट का पूर्व नाम फूटेश्वर घाट था, जिसका उल्लेख जेम्स प्रिसेंप ने किया है, घाट पर फूटेश्वर शिव मंदिर स्थित होने के कारण इसका नामकरण हुआ था। इसके अतिरिक्त घाट पर एक हनुमान मंदिर भी स्थापित है। वर्तमान में घाट पक्का एवं सुदृढ़ है, धार्मिक महत्व कम होने के बाद भी स्थानीय लोग यहां स्नान कार्य करते हैं। सन् 1988 में राज्य सरकार के सहयोग से सिंचाई विभाग ने शेष कच्चे भाग का पक्का निर्माण कराया था।
प्रहलाद घाट
बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में घाट का पक्का निर्माण नगर परिषद (वर्तमान में नगर निगम) के द्वारा कराया गया था। घाट के नामकरण के संदर्भ में मान्यता है कि घाट के समीप ही भगवान विष्णु ने भक्त प्रहलाद की उनके दैत्य पिता हिरण्यकश्यप से रक्षा की थी, इस कारण घाट का नाम प्रहलाद घाट पड़ा। सवाई मान सिंह द्वितीय संग्रहालय, जयपुर में काशी के घाट सम्बन्धि छायाचित्रों (17वीं-18वीं शताब्दी का) में भी इस घाट को दर्शाया गया है। घाट क्षेत्र में स्थापित प्रहलादेश्वर शिव, प्रहलाद केशव (विष्णु), शीतला, ईशानेश्वर शिव, जगन्नाथ एवं नृसिंह मंदिर प्रमुख है। संदर्भों के अनुसार तुलसीदास काशी में पहले इसी घाट पर निवास करते थे बाद में वह अस्सी घाट पर गये। घाट पर तुलसीदास के निवास स्थान (म0सं0 B 10/58) पर तुलसीदास मंदिर का निर्माण कराया गया है। घाट के सम्मुख गंगा में बाण तीर्थ की स्थिति मानी गई है, यह काशी के महत्वपूर्ण घाटों में से एक है। घाट पर वैशाख माह के शुक्लपक्ष एकादशी से पाँच दिवसीय नृसिंह मेला का आयोजन पूरे हर्षोल्लास के साथ होता है जिसमें पूर्णिमा की झाँकी का दृश्य मनोरम होता है। यहाँ सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता रहता है। वर्तमान में घाट पक्का, स्वच्छ एवं सुदृढ़ है, धार्मिक महत्व के कारण घाट पर दैनिक स्नानार्थियों के साथ ही पर्व-विशेष पर स्नान करने वाले स्नानार्थियों का अधिक संख्या में आगमन होता है। सन् 1980 में इस घाट के दो भागों में बाँट कर निषादराज नाम से नये घाट का निर्माण किया गया।
निषादराज घाट
सन् 1980 के पूर्व यह प्रहलाद घाट का ही कच्चा भाग था, जिसका सन् 1988 में राज्य सरकार के सहयोग से सिंचाई विभाग ने पक्का निर्माण कराया। घाट क्षेत्र में निषाद (मल्लाह) जाति की बाहुल्यता होने से इसका नामकरण निषादराज घाट नाम से हुआ। घाट तट पर मंदिरों की संख्या नगण्य है। वर्तमान में घाट पक्का है इस घाट पर आने वाले श्रद्धालु एवं स्थानीय लोग भी प्रहलाद घाट पर स्नान करते हैं। इस घाट पर भी धोबियों के द्वारा कपड़ा साफ किया जाता है।
रानी घाट
सन् 1988 में राज्य सरकार के सहयोग से सिंचाई विभाग ने घाट का पक्का निर्माण कराया था, पूर्व में यह घाट कच्चा एवं राजघाट का ही एक भाग था। सन् 1937 में इटौजा (लखनऊ) की रानी मुनिया साहिबा के द्वारा घाट के उपर ‘जानकी-कुंज’ नाम का एक विशाल भवन बनवाया गया जिसके पश्चात यह घाट रानी घाट के नाम से प्रचलित हो गया। वर्तमान में घाट पक्का है लेकिन विशेष धार्मिक महत्व न होने के कारण यहाँ स्नान कार्य अपेक्षाकृत कम होता है। घाट पर धोबियों द्वारा कपड़ा साफ किया जाता है।
राज घाट
सन् 1988 में राज्य सरकार के सहयोग से सिंचाई विभाग ने घाट के दक्षिणी भाग का पक्का निर्माण कराया था। प्राचीन समय में काशी के राजाओं का निवास स्थान इसी घाट के समीपवर्ती क्षेत्रों में था जिसके कारण घाट का नाम राजघाट पड़ा। शासन द्वारा महामना मदन मोहन मालवीय के नाम पर इस घाट का नाम परिवर्तित कर मालवीय घाट कर दिया गया परन्तु अब भी यह राजघाट के नाम से ही प्रचलित है। घाट के सामने गंगा में महिषासुर तीर्थ होने से कुछ लोग इसे महिषासुर घाट भी कहते हैं। राजघाट काशी के प्राचीनतम घाटों में से हैं जिसका उल्लेख् मौर्यकाल से ही मिलता है; संदर्भो के अनुसार गहड़वाल शासकों का महल यहीं था। घाट क्षेत्र में बद्रीनारायण, राम-जानकी, संत रविदास मंदिर एवं दो मठ स्थापित है, ऐसी मान्यता है कि संत रविदास ने काशी के इसी घाट पर अपना निवास स्थान बनाया था। घाट के समक्ष गंगा में महिषासुर, वामन, उद्दालक, दत्तात्रेय, नर-नारायण एवं यज्ञवराह तीर्थ की स्थिति मानी जाती है। घाट के उपरी भाग पर श्री सत्संग परिवार व्यायामशाला में नागपंचमी के दिन वृहत स्तर पर कुश्ती प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। घाट के समीप ही सड़क मार्ग पर लाल खाँ का मकबरा (अठ्ठारहवीं शताब्दी का) स्थित है, वर्तमान में यह पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है।
साक्ष्यों केअनुसार प्राचीन समय में काशी का नगर क्षेत्र इसी घाट के आस-पास बसा था, इसके समीपवर्ती क्षेत्र धार्मिक-सांस्कृतिक एवं व्यापारिक केन्द्र थे। घाट पर डर्फिन ब्रिज का निर्माण हुआ है, यह अपने आप में विशिष्ट है यहाँ से काशी के सभी घाटों को देखा जा सकता है। शासन द्वारा इसका नाम परिवर्तित कर मालवीय पुल कर दिया गया परन्तु अब भी यह राजघाट पुल के नाम से ही प्रचलित है। पुल के समीप ही काशी रेलवे स्टेशन है। पुल रेल एवं सड़क यातायात की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है जो काशी को देश के पूर्वी भागों से जोड़ता है। प्राचीन समय के किला क्षेत्र में वर्तमान में बसन्त महिला महाविद्यालय स्थापित है। काशी में प्रत्येक वर्ष आयोजित दुर्गा पूजा, सरस्वती पमूजा, विश्वकर्मा पूजा एवं अन्य आराध्यों की पूजा के पश्चात उनकी प्रतिमा का विर्सजन इस घाट पर भी किया जाता है। वर्तमान में घाट का दक्षिणी भाग पक्का एवं उत्तरी भाग कच्चा है, यहाँ पर अधिक संख्या में दैनिक एवं स्थानीय स्नानार्थियों का आगमन होता है। घाट की स्वच्छता को बनाये रखने के लिये घाट तट पर शुलभ शौचालय का निर्माण कराया गया है।
खिड़की घाट
अभी तक यह घाट कच्चा है। गहड़वाल दानपत्र में उल्लेखित वेदेश्वर घाट सम्भवतः यही घाट है, लिंगपुराण एवं काशीखण्ड में आदिकेशव और राजघाट के मध्य वेदेश्वर घाट की स्थिति को दर्शाया गया है, अतः प्राचीन वेदेश्वर घाट की वर्तमान खिड़की घाट हो सकता है। खिड़की घाट नाम से घाट का प्रथम उल्लेख मोतीचन्द्र ने किया है। घाट पर पीपल वृक्ष के समीप एक शिव मंदिर है, घाट के उपरी भाग में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से सम्बद्ध बसंत महिला महाविद्यालय और गांधी विद्या संस्थान स्थित है। घाट कच्चा होने के कारण यहाँ स्नानार्थियों का बहुत कम संख्या में आगमन होता है, घाट पर साधु-सन्यासी रहते हैं एवं यही गंगा में स्नान करते हैं।
आदिकेशव घाट
अठ्ठारहवीं शताब्दी में बंगाल की महारानी भवानी ने घाट का पक्का निर्माण कराया था। परन्तु कुछ वर्षों के पश्चात यह क्षतिग्रस्त हो गया जिसका पुनः निर्माण सन् 1906 में ग्वालियर राज के दीवान नरसिंह राव शितोले ने कराया। ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव के आज्ञा से विष्णु जी जब सर्वप्रथम काशी में आये तो वह इसी घाट पर पधारे थे उन्हेंने स्वयं की प्रतिमा इस घाट पर प्रतिस्थापित किया, वर्तमान में यह प्रतिमा आदिकेशव मंदिर में स्थापित है, जिसके कारण ही घाट का नाम आदिकेशव घाट पड़ा गंगा एवं वरूणा के संगम स्थल पर स्थित होने से इसे गंगावरूणा संगम घाट भी कहते हैं। घाट पर आदि केशव के अतिरिक्त ज्ञान केशव, संगमेश्वर शिव चिन्ताहरण गणेश, पंचदेवता एवं एक अन्य शिव मंदिर स्थापित है। ऐसी मान्यता है कि संगमेश्वर शिवलिंग की स्थापना स्वयं ब्रह्मा ने की है। काशी के घाट श्रृंखला में यह काशी का अन्तिम घाट है। मत्यस्यपुराण के अनुसार इस घाट को काशी के प्रमुख पाँच घाट तीर्थों में स्थान प्राप्त है एवं काशी का प्रथम विष्णु तीर्थ माना जाता है। इस संदर्भ में मान्यता है कि विष्णु जी जब काशी में पधारे तो इसी गंगातट पर अपने पैर धोया। इस घाट के सम्मुख गंगा में विष्णु से सम्बन्धित पदोदक, अम्बरीश, महालक्ष्मी, चक्र, गदा, पद्म, आदित्यकेशव एवं श्वेतदीप तीर्थों की स्थिति मानी गई है। लिंगपुराण एवं काशीखण्ड के अनुसार घाट के सम्मुख गंगा में स्नान, स्पर्श या जलग्रहण मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।
घाट का महत्व गहड़वाल काल से ही रहा है, घाट के समीप ही गहड़वाल शासकों का किला था, इनके दानपत्रों में घाट पर मुण्डन संस्कार, नामकरण, उपनयन एवं अन्य संस्कारों के सम्पन्न होने का प्रमाण है। भाद्र माह के शुक्ल द्वादशी घाट को वारूणी पर्व का मेला आयोजित होता है जिसमें विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। काशी के पंचतीर्थी एवं पंचक्रोशी यात्री इस घाट पर स्नान एवं दर्शन के पश्चात आगे की यात्रा करते हैं जो मणिकर्णिका घाट पर जाकर समाप्त होता है। घाट के उपरी भाग में एक व्यायामशाला भी है। वर्तमान में मुख्य घाट पक्का है किन्तु शहर के बाहर स्थित होने के कारण यहाँ दैनिक स्नानार्थियों की संख्या कम होती है, पर धार्मिक महात्म्य के कारण स्थानीय एवं पर्व विशेष पर स्नान करने वाले स्नानार्थियों का आगमन होता है। सन् 1985 में राज्य सरकार के द्वारा घाट का मरम्मत कराया गया एवं वर्तमान में इसकी स्वच्छता को बनाये रखने के लिये सराहनीय प्रयास किये जा रहे हैं।

– धीरज कुमार गुप्ता

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