अघोरपंथ

अघोरपीठ बाबा कीनाराम स्थल

पुष्प दन्त जी ने ‘शिव महिम्न’ में कहा है- “अधोरान्ना परो मंत्रों नास्ति तत्वं, गुरौः परम।” अघोर कोई तंत्र-मंत्र या तांत्रिक क्रिया नहीं है। यह तो गुरु के माध्यम से आत्मा का परमात्मा से मिलन की साधना है। यह धर्म, सम्प्रदाय, परम्परा या पंथ नहीं है, यह मनुष्य की एक मानसिक स्थिति की अवस्था है जिसे प्राप्त कर मनुष्य मृत्यु लोक के माया के कुचक्र से मुक्त होकर परमात्मा को स्वयं में समाहित कर लेता है। अघोर का अर्थ है अनघोर। अर्थात जो घोर, कठिन, जटिल न होकर सभी के लिए सहज, सरल, मधुर और सुगम हो। अघोरेश्वर बाबा भगवान राम ने कहा है “जो अघ को दूर कर दे वह अघोर है।” अघ का अर्थ है पाप। अतः अघोर व्यक्ति को पाप से मुक्त कर पवित्र बना देता है। मनुष्य के इस अवस्था में पहुंचने पर विभिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न भाषाओं में अनेक नामों से सुशोभित या सम्बोधित किया जाता है जैसे- औघड़, अवधूत, कापालिक, औलिया, मलंग इत्यादि। अघोर साधना करने और समझने की प्रक्रिया है न कि इसे तर्क से ग्रहण किया जा सकता है। अघोरेश्वर साधक संशय से दूर रहते हैं। वह संसार के सभी प्राणियों से परस्पर स्नेह रखते हैं। इनका एकमात्र लक्ष्य होता है ‘सर्वे भवन्तु सुखिन’ के माध्यम से पराशक्ति परमात्मा से मिलन। इनकी कोई भेषभूषा नहीं होती और न ही कोई जातिधर्म। साधना पथ पर जो भी मिला उसे ग्रहण कर लिया। अघोरी घृणित से घृणित कार्य करने वाले और चरित्र वाले को स्नेहपूर्वक अपने पास घेर कर रखते हैं ताकि वह समाज को इससे बचा सकें। अघोर साधकों के रहन-सहन, खान-पान के प्रति सामान्य मनुष्य के मन की जो सोच है, वह मात्र एक भ्रम है। अघोरी साधक ऐसा इसलिए करते है ताकि वह संसार में ही सांसारिक मोह माया से दूर रहकर अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकें। अघोर साधना के लिए ब्रह्मचर्य एवं वाणी पर नियत्रंण आवश्यक है। भगवान शिव ही अघोर साधना के प्रथम गुरू है। पिड़ितों के पीड़ा पर रूदन करने वाले और अत्याचारियों को अपने रौद्र रूप से रूलाने के कारण ही शिव ‘रूद्र’ कहलाये। यह रूद्र रूप अघोर का है। लिंगपुराण के अनुसार शिव के पांच रूपों में एक अघोर का स्वरूप है। ब्रह्माण्ड को पाप से मुक्त करने के लिए शिव ने यह रूप धारण किया। काशी में अघोर साधना को केन्द्र शिवाला स्थित क्रीं-कुण्ड है। शिवाला अर्थात शिव का आलय। जहां शिव औघड़ दानी के रूप में सदैव विराजमान रहते हैं। प्राचीन समय में यहा क्रीं-कुण्ड‘हिंग्वाताल’ नाम का एक सरोवर था। बनारस गजेटियर 1883 के बन्दोबस्ती नक्सा में भी भदैनी मुहल्ले में ‘हिंग्वाताल’ को दर्शाया गया है। सरोवर का नाम क्रि-कुण्ड माँ हिंग्लाज के बीज मंत्र क्रीं से अभिमंत्रित होने के कारण पड़ा। ऐसा माना जाता है कि सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र के पुत्र रोहित को इसी सरोवर के तट पर सर्प ने कांटा था। अघोर साधना का यह केन्द्र कीनाराम के कारण प्रसिद्ध हुआ। इस अघोर साधना केन्द्र को कीनाराम-स्थल भी कहते है। सम्वत 1684 में चन्दौली जिले के रामगढ में कीनाराम का जन्म हुआ था, माँ हिंग्लॉज देवी की आज्ञा से काशी के शिवाला क्षेत्र में स्थित क्रीं-कुण्ड को उन्होने अपनी साधना का केन्द्र बनाया। श्री आदिगुरु दत्तात्रेय जी ने ही औघड़ बाबा कालूराम के स्वरूप में कीनाराम को अघोर साधना की दीक्षा प्रदान की थी।

क्रीं-कुण्ड के मुख्य द्वार से प्रतीत होता है कि यह तंत्र साधना का केन्द्र है जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है। कीनाराम स्थल के मुख्यद्वार के उपर दो नर-मुण्ड स्थापित किये गये है, ऐसा माना जाता है की जब कीनाराम माँ हिंग्लॉज देवी के आज्ञा से काशी में आये तो हरिश्चन्द्र घाट पर आदिगुरू दत्तात्रेय जी औघड़ कालूराम जी के स्वरूप में पहले से ही विराजमान थे और अपने चारों ओर नरमुण्डों को चना खिला रहे थे, कीनाराम को समझते देर न लगी की यह मेरी परीक्षा है और उन्होंने उन नर मुण्डों को चना खाने से रोक दिया। इन्हीं किंवदंतियों के स्मृति में यह नर मुण्ड स्थापित किये गये हैं, जबकी मुख्य द्वार पर दोनों ओर एक के उपर एक तीन नर मुण्ड का निर्माण हुआ है जो अभेद का प्रतीक है और कार्य के अनुसार तीन स्वरूप में दर्शाये गये हैं। मुख्य द्वार से प्रवेश करने पर सामने लाल पत्थर से निर्मित विशाल मंदिरनुमा समाधि है, जिसमें जाने के लिये गुफानुमा रास्ता है। गुफा के अन्दर मां हिंग्लॉज देवी की यन्त्रवत उपस्थिति है, जिसके बगल में कीनाराम की समाधि स्थित है। यहां तक पहुंचने के अघोरपीठ बाबा कीनाराम स्थलसकरे मार्ग के एक तरफ कालूराम जी की समाधि और दूसरी तरफ औघड़ बाबा राजेश्वर राम जी की सफेद प्रतिमा स्थापित है। यह मार्ग वर्ष में दो बार ही खुलता है। पहला लोलार्क षष्ठी को और दूसरी बार अभिषेक और निर्वाण दिवस(दस फरवरी) पर। क्रीं-कुण्ड परिसर में ही दाहिनी तरफ एक प्राचीन कुआं है, जिसके जल को ग्रहण करने से सभी तरह के रोग दूर होते हैं। इस कुंए पर कीनाराम के पदचिह्न स्थापित किये गये हैं। कहा जाता है कि कीनाराम जी इसी कुयें में कुद कर अदृश्य हो गये थे, भक्तों के अनुरोध पर उन्होंने कहां- ‘तुम जाओं मैं आऊगां’। इसी के प्रतीक स्वरूप यह पदचिह्न स्थापित किया गया है। परिसर में एक सफेद आसन स्थित है जिस पर महाराज कीनाराम विशेष अवसरों पर आसन ग्रहण करते थे। कीनाराम के समाधि ग्रहण करने के पश्चात इस आसन को तत्कालीन गुरु ने इसे बारादरी में स्थिर कर दिया। इस आसन से उत्तर दिशा की ओर ही क्रीं-कुण्ड है। रविवार और मंगलवार को मिलाकर कुल पांच दिन कुण्ड में स्नान करने के पश्चात वस्त्रों को त्यागकर वहां स्थित समाधि का तीन बार परिक्रमा करने के बाद विभूति ग्रहण करने से व्यक्ति को विपत्ति, आपदा और भवबाधा से मुक्ति मिलती है। श्माशान घाट से लाई गई लकड़ियों से यहां सदैव घुनि की अखण्ड अलख जलती रहती है। इस धुनि को साक्षात आग्नेय रूद्र का स्वरूप माना जाता है, इस धुनि की राख (विभूति) ही यहां का एकमात्र प्रसाद है। क्रि-कुण्ड परिसर में दक्षिण की ओर विशाल और भव्य समाधि कीनाराम के साथ ही ग्यारह अघोर पीठाधीशों के समाधियो की श्रृंखला है जिसे एकाशद रूद्र का स्वरूप माना जाता है। इन समाधियों के उपरी भाग पर भगलिंगात्मक यंत्र बना हुआ है जिसकी अर्चना करने से सिद्धियां प्राप्त होती है। इस अघोर साधना केन्द्र में मछली, चावल एवं शराब का प्रसाद ही चढाया जाता है तथा प्रत्येक शनिवार को श्रद्धालुओं को प्रसाद स्वरूप इसे वितरीत भी किया जाता है।

सिद्धपीठ औघड़नाथ का तकिया

कबीरचौरा मुहल्ले में स्थित औघड़ नाथ की तकिया प्रसिद्ध अघोर सिद्ध पीठ है। इस पीठ पर गुरु गोरखनाथ के समकालीन अवघूत महाराज ब्रम्हनाथ जी ने सिद्धि प्राप्त कर समाधि ग्रहण की थी। उनके पश्चात उन्ही के परम्परा के तेरह औघड़ संतों ने यहाँ सिद्धि प्राप्त की, इन तेरह औघड़ संतों की भी समाधिया परिसर में स्थापित हैं। यही के एक औघड़ संत मसाननाथ नाम से जाने जाते थे, जिनके समय मे मसान से लकड़ियाँ लाकर यहा पर धुनि जलाई जाती थी। इस सिद्धपीठ परिसर में ही एक अद्भुत कुआँ है, जिसके चारों किनारे के पानी का स्वाद अलग-अलग है तथा इस पानी का सेवन करने से पेट से जुड़ी सभी तरह की बिमारिया दूर हो जाती है। इस सिद्धपीठ में दूर-दूर से श्रद्धालुओं का आवागमन होता रहता है।

सिद्धपीठ सर्वेश्वरी समूह आश्रम

सन 1961 में अघोरेश्वर भगवान राम ने राजघाट पुल के पास, पड़ाव पर सर्वेश्वरी समूह की स्थापना की। बाबा अवधूत भगवान राम ने अघोर परम्परा में एक नया अध्याय आरम्भ किया, यज्ञ- अनुष्ठान, मंत्र-जाप के साथ ही मानव कल्याणार्थ कार्य के स्थान को भी सिद्धपीठ बताया। उनका विचार था कि औघड़ी साधना को समाजोन्मुखी बनाया जाय। लगभग चौदह-पन्द्रह वर्ष की अवस्था में काशी के अघोर साधना के केन्द्र क्रीं-कुण्ड में तत्कालीन पीठाधीश्वर राजेश्वर राम से अघोर दीक्षा ग्रहण करने के पश्चात साधना के लिये अनेक गुफाओं, कन्दराओं, श्मशानों पर भ्रमण किया। इन यात्राओं से उन्हें समझ में आया कि लोग अघोरियों से भय रखते है, अतः अघोर साधना से समाज को बहुत कम लाभ ही मिल पाता है। उन्होंने तत्कालीन सामाजिक स्थितियों के अनुसार तथा अघोर साधकों एवं साधना को समाज के समीप लाने के लिये सर्वेश्वरी समूह की स्थापना कर समाज के सम्मुख एक आदर्श प्रस्तुत किया। उन्होने सर्वेश्वरी समूह के आश्रम में उन सभी क्रिया-कलापों जैसे- शराब,भांग,गाँजा के सेवन व अघोरियों के विकट और उद्दंड स्वभाव प्रदर्शित करने तक को प्रतिबन्धित कर दिया जिससे समाज अघोरियो से भय रखता था, इसके स्थान पर कुष्ठ रोगियों के इलाज के लिये एक चिकित्सालय की स्थापना की, जहाँ देशी उपचारों के आधार पर जड़ी-बुटियों के द्वारा इलाज किया जाता है। इस चिकित्सालय में इतने अधिक कुष्ठ रोगियों का सफल इलाज किया गया है कि इसका नाम गिनिज एवं लिम्का बुक में शामिल हो गया है। इसके साथ ही इस समूह द्वारा समाज में व्याप्त दहेज एवं अन्य विभिन्न आडम्बरों से मुक्ति के लिये सार्थक प्रयास किये जाते हैं। सर्वेश्वरी समूह के देश-विदेश में लगभग 130 शाखाएँ सक्रिय हैं। वर्तमान में इस पीठ के पीठाधीश्वर औघड़ गुरूपद सम्भवराम जी हैं, जो सर्वेश्वरी समूह के अध्यक्ष भी हैं। पड़ाव स्थित सर्वेश्वरी समूह के पास ही अघोरेश्वर भगवान राम की समाधि है, सर्वेश्वरी समूह आश्रम में आने के पश्चात श्रद्धालु समाधि का दर्शन करना नही भूलते हैं।

 * धीरज कुमार गुप्ता

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